भारत में 5 सितंबर का दिन केवल एक महान दार्शनिक की जयंती के तौर पर नहीं, बल्कि देश के हर शिक्षक के सम्मान के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन वर्ष 1888 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत शिक्षा के क्षेत्र से की और धीरे-धीरे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचे। शिक्षक, प्रोफेसर, लेखक, कुलपति, राजदूत, उपराष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति—उनका सफर कई महत्वपूर्ण पड़ावों से होकर गुजरा।
राधाकृष्णन की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक रास्ते से सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने के बजाय ज्ञान, शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक सेवा के जरिए अपनी पहचान बनाई। उनकी विद्वता का सम्मान भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुआ। यही वजह थी कि आजादी के बाद देश की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए उनका नाम सामने आया।
राष्ट्रपति बनने से पहले बना चुके थे अलग पहचान
जब 1962 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने, तब तक वह देश और विदेश में एक प्रतिष्ठित दार्शनिक और शिक्षाविद के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे। राष्ट्रपति भवन तक पहुंचने से पहले उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों में जिम्मेदारियां निभाईं।
उनके अनुभवों की सूची पर नजर डालें तो समझ आता है कि यह सफर किसी अचानक मिली राजनीतिक सफलता का परिणाम नहीं था। विश्वविद्यालयों में अध्यापन से लेकर कुलपति बनने तक उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को करीब से समझा। राजदूत के रूप में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का अनुभव हासिल किया और उपराष्ट्रपति रहते हुए संसदीय व्यवस्था को नजदीक से देखा।
इन्हीं अनुभवों ने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में तैयार किया, जिस पर देश की सर्वोच्च संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी जा सके।
साधारण परिवार से शुरू हुआ जीवन
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के तिरुत्तनी में हुआ था। उनका परिवार आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था। उनके पिता सर्वपल्ली वीरस्वामी थे। सीमित संसाधनों के बावजूद राधाकृष्णन ने शिक्षा को अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनाया।
बचपन से ही उन्हें अध्ययन में गहरी दिलचस्पी थी। उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। इसी दौरान भारतीय दर्शन के साथ-साथ पश्चिमी दार्शनिक परंपराओं को समझने का अवसर मिला।
दर्शन उनके लिए केवल किताबों में मौजूद विचारों का संग्रह नहीं था। वह इसे मनुष्य और समाज को समझने का माध्यम मानते थे। यही सोच आगे चलकर उनके अध्यापन और लेखन दोनों में दिखाई दी।
कक्षा से शुरू हुई असली पहचान
शिक्षा पूरी करने के बाद राधाकृष्णन ने अध्यापन को अपना पेशा बनाया। उन्होंने मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में दर्शनशास्त्र पढ़ाया। यहीं से उनके शिक्षक जीवन की नींव पड़ी। उनकी खासियत यह थी कि वह जटिल दार्शनिक विचारों को विद्यार्थियों के लिए आसान तरीके से प्रस्तुत करते थे। वह केवल पाठ्यक्रम पूरा करने पर जोर नहीं देते थे, बल्कि विद्यार्थियों को विचार करने और सवाल उठाने के लिए प्रेरित करते थे।
उनके लिए शिक्षक का मतलब सिर्फ किताब का ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं था। उनका मानना था कि एक अच्छे शिक्षक को विद्यार्थियों में तर्क करने की क्षमता, नैतिक समझ और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित करनी चाहिए। अध्यापन के दौरान ही उनकी विद्वता की चर्चा तेजी से फैलने लगी।
देश के बड़े विश्वविद्यालयों में बढ़ता गया कद
राधाकृष्णन की प्रतिभा उन्हें आगे बढ़ाती गई। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दीं। इस दौरान उनका लेखन भी लगातार जारी रहा। उस दौर में भारतीय दर्शन को लेकर पश्चिमी दुनिया में कई तरह की धारणाएं प्रचलित थीं। राधाकृष्णन ने अपने लेखों और पुस्तकों के जरिए भारतीय दार्शनिक परंपरा को तर्कपूर्ण और आधुनिक संदर्भ में समझाने का प्रयास किया।
उनकी प्रसिद्ध कृतियों में ‘Indian Philosophy’ और ‘The Hindu View of Life’ शामिल हैं। इन लेखनों के माध्यम से उन्होंने भारतीय चिंतन, संस्कृति और दर्शन को अंतरराष्ट्रीय अकादमिक जगत के सामने प्रभावशाली तरीके से रखा। धीरे-धीरे उनकी पहचान सिर्फ भारत के एक प्रोफेसर तक सीमित नहीं रही। वह विश्व स्तर पर पहचाने जाने वाले विद्वान बन गए।
ऑक्सफोर्ड तक पहुंची उनकी विद्वता
राधाकृष्णन की विद्वता का प्रभाव इतना व्यापक था कि उन्हें विदेशों में भी व्याख्यान देने के अवसर मिले। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में उन्होंने भारतीय दर्शन और धर्म से जुड़े विषयों पर व्याख्यान दिए। उन्होंने यह स्थापित करने की कोशिश की कि भारतीय दर्शन को केवल धार्मिक परंपराओं के नजरिए से देखना अधूरा है। भारतीय चिंतन में तर्क, नैतिकता, आत्मचिंतन और मानव जीवन से जुड़े गहरे प्रश्न भी मौजूद हैं।
उनकी इसी बौद्धिक पहचान ने उन्हें भारत की सीमाओं से बाहर भी सम्मान दिलाया। आगे चलकर यही अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा उनके सार्वजनिक जीवन में भी काम आई।
प्रोफेसर के बाद संभाली विश्वविद्यालयों की कमान
राधाकृष्णन के जीवन में अगला बड़ा पड़ाव विश्वविद्यालय प्रशासन था। उन्होंने आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति की जिम्मेदारी संभाली। बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का नेतृत्व भी किया। कुलपति के रूप में उनकी भूमिका केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं थी। वह शिक्षा की गुणवत्ता, शोध और विश्वविद्यालय के व्यापक उद्देश्य को लेकर गंभीर थे।
उनका विचार था कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं होना चाहिए। उच्च शिक्षा संस्थानों को ऐसे युवा तैयार करने चाहिए, जो अपने ज्ञान का इस्तेमाल समाज और देश के हित में कर सकें।
इन जिम्मेदारियों ने उनके भीतर नेतृत्व और प्रशासन की क्षमता को और मजबूत किया। अब वह केवल शिक्षक या लेखक नहीं थे, बल्कि बड़े संस्थानों का नेतृत्व करने वाले प्रशासक भी बन चुके थे।
राजनीति से अलग रास्ते पर मिली राष्ट्रीय जिम्मेदारी
राधाकृष्णन की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह पारंपरिक अर्थों में राजनीतिक नेता नहीं थे। उन्होंने जनसभाओं और चुनावी राजनीति के जरिए अपनी पहचान नहीं बनाई थी। इसके बावजूद उनकी निष्पक्ष छवि और विद्वता के कारण स्वतंत्र भारत में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने लगीं।
आजादी के बाद भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करनी थी। इसी दौर में राधाकृष्णन को सोवियत संघ में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया।
उन्होंने 1949 से 1952 तक इस जिम्मेदारी को निभाया। यह समय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि दुनिया शीत युद्ध के दौर में प्रवेश कर चुकी थी। एक दार्शनिक और शिक्षाविद के रूप में विकसित उनकी सोच ने उन्हें कूटनीतिक भूमिका निभाने में भी मदद की। उन्होंने भारत के स्वतंत्र विदेश नीति दृष्टिकोण को सामने रखा।
उपराष्ट्रपति बनकर मिली राष्ट्रीय राजनीति की समझ
1952 में राधाकृष्णन भारत के पहले उपराष्ट्रपति बने। यह उनके जीवन का एक और महत्वपूर्ण मोड़ था। वह लगातार दो कार्यकाल तक इस पद पर रहे और कुल दस वर्षों तक उपराष्ट्रपति की जिम्मेदारी निभाई। उपराष्ट्रपति के पद के साथ उन्हें राज्यसभा के सभापति की भूमिका भी निभानी थी। यहां उन्हें देश के अलग-अलग राजनीतिक दलों और विचारधाराओं के नेताओं के बीच सदन की कार्यवाही संचालित करनी पड़ती थी।
उनकी शैली संतुलित और गंभीर मानी जाती थी। वह बहस को महत्व देते थे और संसदीय गरिमा बनाए रखने पर जोर देते थे। इस पद ने उन्हें भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को बेहद करीब से समझने का अवसर दिया। इस तरह राष्ट्रपति बनने से पहले उनके पास शिक्षा, प्रशासन, कूटनीति और संसदीय व्यवस्था, चारों क्षेत्रों का अनुभव आ चुका था।
1962 में राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी
लगभग चार दशक से अधिक समय तक शिक्षा और सार्वजनिक सेवा से जुड़े रहने के बाद राधाकृष्णन 1962 में भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने। उनका राष्ट्रपति बनना भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है। यह दिखाता है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने के लिए केवल सक्रिय राजनीति ही रास्ता नहीं है। शिक्षा, ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और राष्ट्रीय जीवन में योगदान भी किसी व्यक्ति को उस स्तर तक पहुंचा सकते हैं।
राष्ट्रपति बनने के बाद भी उन्होंने अपनी मूल पहचान नहीं छोड़ी। उनके भाषणों और सार्वजनिक संदेशों में शिक्षा, नैतिकता, मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर विशेष जोर दिखाई देता था।
जन्मदिन को क्यों बनाया गया शिक्षक दिवस?
राधाकृष्णन के जीवन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय परंपरा 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की है। जब वह राष्ट्रपति थे, तब उनके कुछ विद्यार्थियों और परिचितों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा जताई थी। इसके जवाब में उन्होंने कथित तौर पर सुझाव दिया कि उनके जन्मदिन को व्यक्तिगत उत्सव के बजाय शिक्षकों के सम्मान के दिन के रूप में मनाया जाए।
इसके बाद 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस के तौर पर मनाने की परंपरा स्थापित हुई। इस दिन स्कूलों, कॉलेजों और दूसरे शिक्षण संस्थानों में शिक्षक-विद्यार्थी संबंध और शिक्षा के महत्व को याद किया जाता है।
राधाकृष्णन की कहानी क्यों है खास?
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन यह बताता है कि शिक्षा किसी व्यक्ति के लिए सिर्फ रोजगार का माध्यम नहीं होती। सही मायने में शिक्षा सोचने, नेतृत्व करने और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने की क्षमता विकसित कर सकती है।
एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने पहले शिक्षक के रूप में अपनी जगह बनाई। फिर प्रोफेसर बने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विद्वान के तौर पर सम्मान हासिल किया, विश्वविद्यालयों का नेतृत्व किया, राजदूत की जिम्मेदारी संभाली, उपराष्ट्रपति बने और अंततः राष्ट्रपति पद तक पहुंचे।
उनकी पूरी यात्रा में एक चीज लगातार बनी रही, ज्ञान के प्रति उनका समर्पण। यही वजह है कि 5 सितंबर को जब देश शिक्षक दिवस मनाता है, तो वह केवल एक पूर्व राष्ट्रपति की जयंती नहीं मनाता, बल्कि उस विचार को भी सम्मान देता है कि एक शिक्षक समाज और राष्ट्र के भविष्य को आकार दे सकता है।
डॉ. राधाकृष्णन की कहानी आज भी विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए प्रेरणा है। उनका जीवन बताता है कि किसी व्यक्ति की शुरुआत चाहे कितनी भी सामान्य क्यों न हो, निरंतर अध्ययन, मेहनत, विचारशीलता और जिम्मेदारी के साथ वह देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान बना सकता है।




