नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान विदेशी मेहमानों के लिए रखे गए डिनर का मेन्यू अब राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने डिनर में मांसाहारी भोजन शामिल नहीं किए जाने पर सवाल उठाया, जिसके बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस पर इस मुद्दे को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया। देखते ही देखते यह मामला सिर्फ खाने की पसंद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत की खान-पान की विविधता और मेहमाननवाजी को लेकर नेताओं के बीच बयानबाजी शुरू हो गई।
दरअसल, 12 सितंबर को BRICS देशों के नेताओं और अन्य गणमान्य मेहमानों के लिए आयोजित डिनर में पूरी तरह शाकाहारी व्यंजन परोसे गए थे। मेन्यू में देश के अलग-अलग हिस्सों की पारंपरिक चीजों को जगह दी गई थी। इसमें पनीर के साथ सूखी सब्जी, चुकंदर का रायता, गुजराती खांडवी और मिलेट्स से तैयार पुलाव शामिल था। इसके अलावा कश्मीर से जुड़ी मशरूम की खास डिश भी मेहमानों को परोसी गई। मिठाई के तौर पर जलेबी के साथ फ्रूट क्रीम रखी गई थी।
राहुल गांधी ने भारतीय नॉनवेज खाने का किया जिक्र
डिनर के मेन्यू को लेकर राहुल गांधी ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा कि भारत की करीब 80 प्रतिशत आबादी नॉनवेज खाती है। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि देश का मांसाहारी भोजन काफी स्वादिष्ट होता है।
राहुल के इस बयान को BRICS डिनर के मेन्यू से जोड़कर देखा गया। उनके सवाल का मूल मुद्दा यही था कि जब भारत में बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी भोजन करते हैं और देश के अलग-अलग हिस्सों में इसकी समृद्ध परंपरा है, तो अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के लिए आयोजित भोज में केवल शाकाहारी व्यंजन ही क्यों रखे गए।
हालांकि, राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में 80 प्रतिशत नॉनवेज खाने वाली आबादी के आंकड़े का कोई आधिकारिक स्रोत नहीं बताया। यही वजह है कि बाद में इस आंकड़े की विश्वसनीयता को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई।
रिजिजू ने कांग्रेस पर साधा निशाना
राहुल गांधी के बयान के बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें यह देखकर हैरानी हो रही है कि कांग्रेस पार्टी अब BRICS देशों से आए नेताओं को दिए गए खाने के मेन्यू को लेकर भी राजनीति कर रही है।
रिजिजू ने कहा कि भारत आए विदेशी मेहमानों ने भारतीय शाकाहारी भोजन का आनंद लिया। उनके मुताबिक, मेन्यू में ऐसे व्यंजन शामिल किए गए थे जिनमें स्वाद के साथ पोषण का भी ध्यान रखा गया था। उन्होंने यह भी बताया कि खाने के जरिए भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की खान-पान की परंपराओं को सामने रखने की कोशिश की गई।
केंद्रीय मंत्री का तर्क था कि किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मेहमानों के लिए तैयार किया गया भोजन केवल खाने की पसंद का मामला नहीं होता, बल्कि वह मेजबान देश की संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करने का माध्यम भी बन सकता है।
कांग्रेस ने कहा- किसी पर खान-पान की पसंद नहीं थोपनी चाहिए
इस विवाद में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह लंबे समय से लोगों की खान-पान संबंधी पसंद पर अपनी सोच थोपने की कोशिश करती रही है। पवन खेड़ा के मुताबिक, अब यही रवैया विदेशी मेहमानों के मामले में भी दिखाई दे रहा है।
उन्होंने भारत की विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में खाने-पीने की परंपराएं बेहद व्यापक हैं। अलग-अलग राज्यों, समुदायों और क्षेत्रों में भोजन की अपनी अलग पहचान है। भारत में शाकाहारी व्यंजनों की जितनी समृद्ध परंपरा है, उतनी ही तरह-तरह के मांसाहारी पकवानों की भी मौजूदगी है।
पवन खेड़ा ने कहा कि भारत के कई नॉनवेज व्यंजन दुनियाभर में लोकप्रिय हैं और लोग उन्हें पसंद भी करते हैं। ऐसे में उनके मुताबिक, भारत की फूड कल्चर को केवल एक तरह के भोजन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए।
वारिस पठान ने भी मेन्यू पर उठाए सवाल
AIMIM विधायक वारिस पठान ने भी BRICS डिनर के मेन्यू को लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की। उन्होंने भारत की विविधता की चर्चा करते हुए कहा कि देश की फूड कल्चर में अलग-अलग तरह के व्यंजनों की बड़ी भूमिका है।
वारिस पठान ने सवाल उठाया कि अगर भारत अपनी विविधता को दुनिया के सामने पेश करना चाहता है, तो खाने के मेन्यू में भी उस विविधता की झलक दिखाई देनी चाहिए थी। उन्होंने शाकाहारी भोजन को बढ़ावा देने का विरोध नहीं किया, लेकिन कहा कि इसके साथ भारत में प्रचलित दूसरी खाद्य परंपराओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उनका कहना था कि भारत में बड़ी संख्या में लोग नॉनवेज भोजन करते हैं और देश की खाद्य संस्कृति को केवल शाकाहारी व्यंजनों तक सीमित करके पेश करना उचित नहीं होगा।
80 प्रतिशत नॉनवेज खाने के दावे पर भी सवाल
राहुल गांधी की पोस्ट के बाद एक दूसरा सवाल भी सामने आया कि आखिर भारत में नॉनवेज खाने वालों की संख्या कितनी है। राहुल ने 80 प्रतिशत का आंकड़ा बताया, लेकिन इसके साथ किसी सर्वे या आधिकारिक रिपोर्ट का हवाला नहीं दिया।
भारत में खान-पान से जुड़े आंकड़ों को लेकर अलग-अलग सर्वेक्षणों में अलग तस्वीर देखने को मिलती है। 2023-24 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे यानी NFHS-6 में मांसाहारी भोजन के सेवन को लेकर ऐसा तुलनात्मक आंकड़ा उपलब्ध नहीं कराया गया, जिसके आधार पर देश की 80 प्रतिशत आबादी को नॉनवेज खाने वाला कहा जा सके।
हालांकि, इससे पहले हुए NFHS-5 के आंकड़े इस बात की ओर जरूर इशारा करते हैं कि भारत में मांसाहारी भोजन करने वालों की संख्या काफी बड़ी है। 2019 से 2021 के बीच किए गए इस सर्वे में 15 से 49 वर्ष की उम्र के 83.4 प्रतिशत पुरुषों और 70.6 प्रतिशत महिलाओं ने बताया था कि वे कम से कम कभी-कभार मछली, चिकन या मांस का सेवन करते हैं।
इसलिए यह कहना सही होगा कि भारत में नॉनवेज खाने की परंपरा व्यापक है, लेकिन राहुल गांधी की ओर से बताए गए 80 प्रतिशत के आंकड़े को सीधे किसी मौजूदा आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़े से जोड़ना आसान नहीं है।
BRICS डिनर को केवल भोजन के तौर पर नहीं देखा जाता
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में नेताओं के लिए आयोजित डिनर का महत्व केवल मेन्यू तक सीमित नहीं होता। ऐसे आयोजनों को अक्सर ‘डिनर डिप्लोमेसी’ के रूप में देखा जाता है। इसका उद्देश्य औपचारिक बैठकों से अलग माहौल में नेताओं को बातचीत का अवसर देना होता है।
BRICS जैसे बहुपक्षीय मंच पर कई देशों के नेता एक साथ मौजूद होते हैं। दिनभर की बैठकों में आर्थिक सहयोग, वैश्विक राजनीति, सुरक्षा, व्यापार और दूसरे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा होती है। इन बैठकों का माहौल आमतौर पर तय एजेंडे और राजनयिक प्रोटोकॉल के मुताबिक चलता है।
इसके विपरीत डिनर का माहौल अपेक्षाकृत अनौपचारिक हो सकता है। एक साथ बैठकर खाना खाने से नेताओं के बीच व्यक्तिगत संवाद की गुंजाइश बढ़ती है। इससे कई बार बातचीत अधिक सहज हो जाती है और रिश्तों में गर्मजोशी लाने में मदद मिल सकती है।
खाने के जरिए दिखती है मेजबान देश की संस्कृति
किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन में मेन्यू तैयार करते समय मेजबान देश अक्सर अपनी सांस्कृतिक पहचान को सामने रखने की कोशिश करता है। भारत जैसे विविध देश के लिए यह काम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहां हर क्षेत्र की अपनी अलग खान-पान परंपरा है।
BRICS डिनर में शामिल व्यंजनों के जरिए भी भारत के अलग-अलग हिस्सों की झलक दिखाने की कोशिश की गई। गुजराती खांडवी, कश्मीरी मशरूम, मिलेट्स का पुलाव और अन्य शाकाहारी व्यंजन भारतीय भोजन की अलग-अलग परंपराओं को सामने रखते हैं।
इसी वजह से सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि विदेशी मेहमानों को भारतीय शाकाहारी भोजन का अनुभव कराने का फैसला भारतीय संस्कृति और खान-पान की एक खास तस्वीर पेश करने से जुड़ा था।
राजनीतिक बयानबाजी ने बढ़ाया विवाद
BRICS डिनर का मेन्यू मूल रूप से एक राजनयिक और सांस्कृतिक आयोजन का हिस्सा था, लेकिन राहुल गांधी की टिप्पणी के बाद यह राजनीतिक बहस में बदल गया। एक तरफ कांग्रेस और उसके नेताओं ने इसे भारत की खान-पान की विविधता से जोड़ते हुए सवाल उठाए, वहीं सरकार की ओर से इसे अनावश्यक राजनीतिक विवाद बताया गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत में भोजन को लेकर मौजूद क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विविधता को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। देश में जहां बड़ी संख्या में लोग शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देते हैं, वहीं मछली, चिकन और मांस खाने वालों की भी बड़ी आबादी है।
ऐसे में BRICS डिनर का विवाद केवल इस सवाल तक सीमित नहीं है कि मेज पर क्या परोसा गया था। इसके पीछे भारत की पहचान, खान-पान की स्वतंत्र पसंद, सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के सामने देश की छवि जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं।
फिलहाल, एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान परोसे गए शाकाहारी भोजन को लेकर शुरू हुई बहस ने राजनीतिक रंग ले लिया है। सरकार इसे भारतीय परंपरा और मेहमाननवाजी का हिस्सा बता रही है, जबकि विपक्ष इसे भारत की वास्तविक खाद्य विविधता से जोड़कर देख रहा है। इस विवाद के बीच एक बात साफ है कि भारत की फूड कल्चर इतनी विविध है कि उसे किसी एक श्रेणी में समेटना आसान नहीं है।




