जमीन या मकान खरीदना किसी भी व्यक्ति के लिए जिंदगी का बड़ा आर्थिक फैसला होता है। कई लोग वर्षों की बचत लगाने के बाद प्रॉपर्टी खरीदते हैं, लेकिन अगर कागजात की सही जांच न की जाए तो यही निवेश परेशानी का कारण बन सकता है। प्रॉपर्टी से जुड़े मामलों में फर्जी दस्तावेज, गलत मालिकाना हक, पुरानी रजिस्ट्री, बैंक लोन या कोर्ट केस जैसी बातें बाद में सामने आने पर खरीदार मुश्किल में पड़ सकता है।
खास बात यह है कि केवल कागज को देखकर उसके असली या नकली होने का फैसला करना हमेशा आसान नहीं होता। कंप्यूटर से तैयार होने वाले मौजूदा दस्तावेजों में कई बार फर्जी कागज भी देखने में बिल्कुल वास्तविक लग सकते हैं। ऐसे में दस्तावेजों की सरकारी रिकॉर्ड से पुष्टि करना जरूरी हो जाता है।
फरीदाबाद सेक्टर-12 स्थित डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन कोर्ट के एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा ने Local18 से बातचीत में बताया कि प्रॉपर्टी खरीदने वाले व्यक्ति को सिर्फ विक्रेता, ब्रोकर या दिखाए गए दस्तावेजों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि वह करीब 25 वर्षों से वकालत कर रहे हैं और प्रॉपर्टी के कागजात की जांच में कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां खरीदारों को बरतनी चाहिए।
सबसे पहले विक्रेता से मांगें मूल दस्तावेज
एडवोकेट के मुताबिक किसी भी संपत्ति की खरीद से पहले पहला कदम उसके मालिक से मूल दस्तावेज देखना होना चाहिए। विक्रेता के पास मौजूद ओरिजिनल पेपर को ध्यान से देखने के बाद उसकी प्रतिलिपि लेना जरूरी है। इसके बाद सिर्फ उस कागज की शक्ल देखकर भरोसा करने के बजाय संबंधित सरकारी रिकॉर्ड से उसका मिलान कराया जाना चाहिए।
जिस क्षेत्र में संपत्ति स्थित है, वहां के संबंधित तहसील और सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में दस्तावेज का रिकॉर्ड उपलब्ध हो सकता है। खरीदार को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जानकारी की जांच करानी चाहिए। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि विक्रेता की ओर से दिखाया गया दस्तावेज वास्तव में सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद है या नहीं।
1 रुपये और करोड़ों रुपये के स्टांप में दिख सकता है एक जैसा अंतर
प्रॉपर्टी के कागजों को लेकर सबसे बड़ी परेशानी आधुनिक तरीके से तैयार होने वाले स्टांप पेपर से भी जुड़ी है। एडवोकेट कुणाल कांत शर्मा के अनुसार पहले स्टांप पेपर अलग-अलग निर्धारित मूल्य के प्रिंटेड रूप में मिलते थे। लेकिन अब कंप्यूटर से जनरेट किए गए दस्तावेजों के कारण सिर्फ पेपर को देखकर उसकी वास्तविकता तय करना मुश्किल हो सकता है।
उनके मुताबिक कम मूल्य के स्टांप पेपर और करोड़ों रुपये की संपत्ति से संबंधित स्टांप पेपर का प्रिंट देखने में काफी समान लग सकता है। यानी केवल कागज की छपाई, फॉर्मेट या उस पर मौजूद जानकारी देखकर खरीदार यह मान ले कि दस्तावेज असली है, तो वह गलती कर सकता है।
उन्होंने बताया कि सरकारी पोर्टल पर स्टांप वेंडर की जानकारी दर्ज होती है और उसके बाद कंप्यूटर से प्रिंट निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में अगर किसी स्तर पर गलत जानकारी डाली गई हो या दस्तावेज के साथ छेड़छाड़ की गई हो, तो सामान्य व्यक्ति के लिए उसे पहचानना मुश्किल हो सकता है। इसलिए सरकारी रिकॉर्ड से मिलान ज्यादा महत्वपूर्ण है।
सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में कराएं दस्तावेज का मिलान
प्रॉपर्टी खरीदने से पहले संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में रिकॉर्ड की जांच कराने की सलाह दी गई है। इसके लिए खरीदार संपत्ति से जुड़े दस्तावेज लेकर संबंधित तहसील कार्यालय जा सकता है और निर्धारित सरकारी प्रक्रिया व शुल्क के अनुसार रिकॉर्ड की जांच करा सकता है।
एडवोकेट के अनुसार विक्रेता द्वारा दिखाए गए दस्तावेज की जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज से मिलनी चाहिए। अगर दोनों में अंतर मिलता है तो खरीदार को आगे की डील रोककर मामले की पूरी जानकारी हासिल करनी चाहिए।
यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ फोटोकॉपी या कंप्यूटर से निकले दस्तावेज को देखकर यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि वह वास्तव में सरकारी रिकॉर्ड के अनुरूप है या नहीं।
मालिक कौन है, यह भी करें पक्का
प्रॉपर्टी खरीदते समय एक अहम सवाल यह होता है कि जिस व्यक्ति से जमीन या मकान खरीदा जा रहा है, क्या वास्तव में वही उसका मालिक है?
इसके लिए सेल डीड में दर्ज नाम को विक्रेता के पहचान दस्तावेज से मिलाना चाहिए। एडवोकेट ने बताया कि दस्तावेज में मालिक का नाम और पहचान संबंधी जानकारी दी जाती है। खरीदार को इन जानकारियों का मिलान विक्रेता के आधार कार्ड जैसे पहचान दस्तावेज से करना चाहिए।
दस्तावेजों में फोटो भी मौजूद होती है। इसलिए फोटो और पहचान संबंधी विवरण की भी जांच करना जरूरी है। सरकारी रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेज की कॉपी में मौजूद फोटो और विक्रेता की पहचान का मिलान अतिरिक्त पुष्टि दे सकता है।
सिर्फ यह मान लेना कि सामने वाला व्यक्ति प्रॉपर्टी का मालिक है, पर्याप्त नहीं है। मालिकाना हक की पूरी श्रृंखला यानी पिछली खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेजों को भी देखना उपयोगी होता है।
कहीं कोर्ट में मामला या स्टे तो नहीं?
प्रॉपर्टी खरीदने से पहले यह पता करना भी जरूरी है कि संपत्ति किसी कानूनी विवाद में तो नहीं फंसी हुई है। किसी जमीन या मकान पर अदालत का आदेश, स्टे या दूसरे प्रकार का विवाद होने की स्थिति में खरीदार के लिए बाद में परेशानी खड़ी हो सकती है।
एडवोकेट के मुताबिक संपत्ति से संबंधित विवाद की जानकारी ऑनलाइन माध्यम से भी खोजी जा सकती है, लेकिन केवल ऑनलाइन जानकारी पर निर्भर रहने के बजाय संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में रिकॉर्ड की जांच करना महत्वपूर्ण है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अगर किसी व्यक्ति ने किसी संपत्ति को लेकर अदालत से स्टे प्राप्त किया है, तो उसकी जानकारी संबंधित रिकॉर्ड में दर्ज कराई जा सकती है। यह मामला निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक किसी भी स्तर पर हो सकता है।
इसलिए रजिस्ट्री कराने से पहले खरीदार को संपत्ति की कानूनी स्थिति की जांच करनी चाहिए।
विक्रेता से एफिडेविट लेना भी हो सकता है उपयोगी
खरीदार अपनी सुरक्षा के लिए विक्रेता से अलग से एफिडेविट भी ले सकता है। इसमें विक्रेता से संपत्ति की स्थिति के संबंध में घोषणा कराई जा सकती है।
मसलन, यह स्पष्ट कराया जा सकता है कि संपत्ति किसी बैंक या अन्य संस्था के पास गिरवी नहीं है, उस पर कोई मॉर्गेज नहीं है और उसके संबंध में कोई लंबित विवाद या मुकदमा नहीं है।
हालांकि ऐसे दस्तावेज को सरकारी रिकॉर्ड की जांच का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। यह खरीदार के लिए अतिरिक्त दस्तावेजी सुरक्षा के तौर पर उपयोगी हो सकता है।
बैंक लोन या मॉर्गेज का पता कैसे लगाएं?
प्रॉपर्टी पर बैंक का कर्ज है या नहीं, यह भी खरीदारी से पहले जांचने वाली महत्वपूर्ण बात है। एडवोकेट ने बताया कि जब कोई व्यक्ति बैंक से लोन लेकर अपनी संपत्ति को मॉर्गेज करता है, तो संपत्ति के मूल दस्तावेज बैंक के पास रखे जा सकते हैं।
ऐसे मामलों में सिर्फ विक्रेता की बात पर भरोसा करने के बजाय दस्तावेजों की उपलब्धता और रिकॉर्ड की स्थिति की जांच करनी चाहिए। अगर विक्रेता मूल कागजात दिखाने या देने से लगातार बच रहा है, तो खरीदार को सावधान होकर इसकी वजह पता करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई मामलों में संपत्ति की मूल दस्तावेजी चेन बैंक के पास होने के कारण विक्रेता के पास उसे दिखाने के लिए ओरिजिनल पेपर उपलब्ध नहीं होते।
ब्रोकर की बात के बजाय खुद करें जांच
प्रॉपर्टी खरीदते समय खरीदार को केवल ब्रोकर या विक्रेता की जानकारी के आधार पर फैसला नहीं करना चाहिए। एडवोकेट के मुताबिक शुरुआत में संपत्ति के दस्तावेजों की फोटो कॉपी मांगना एक जरूरी कदम है।
अगर विक्रेता फोटोकॉपी देने से इनकार करता है तो कम से कम दस्तावेज का नंबर और विक्रेता की पहचान से जुड़ी जानकारी ली जा सकती है। इसके बाद संबंधित सब-रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकॉर्ड रूम में दस्तावेज की जांच कराई जा सकती है।
सरकारी रिकॉर्ड से मिलान होने पर खरीदार को यह समझने में मदद मिलती है कि सामने दिखाया गया दस्तावेज वास्तव में रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज से मेल खाता है या नहीं।
संपत्ति की पूरी चेन देखना जरूरी
किसी प्रॉपर्टी की जांच सिर्फ वर्तमान मालिक के दस्तावेज तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि मौजूदा मालिक को संपत्ति किससे मिली थी और उससे पहले उसका मालिक कौन था।
यानी पुराने सेल डीड और संपत्ति के पिछले लेनदेन से जुड़े दस्तावेजों की पूरी चेन देखना महत्वपूर्ण है। अगर इस चेन में कहीं कोई कमी, नाम में अंतर या दस्तावेजों में विरोधाभास दिखाई देता है तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
प्रॉपर्टी की कीमत तेजी से बढ़ने की वजह से इस तरह के मामलों में सावधानी और भी जरूरी हो जाती है। किसी जमीन या मकान की कीमत आज और कुछ समय बाद अलग हो सकती है, इसलिए खरीदारों को जल्दबाजी में सौदा करने के बजाय दस्तावेजों की जांच पूरी करनी चाहिए।
कागज देखकर नहीं, रिकॉर्ड मिलाकर लें फैसला
प्रॉपर्टी के कागजात देखने का सबसे जरूरी नियम यही है कि दस्तावेज की शक्ल को उसकी असलियत का प्रमाण न मानें। ओरिजिनल दिखाई देने वाला कागज भी सरकारी रिकॉर्ड से सत्यापित किया जाना चाहिए।
मूल दस्तावेज, मालिक की पहचान, पिछली रजिस्ट्री की चेन, सब-रजिस्ट्रार रिकॉर्ड, संभावित कोर्ट विवाद, मॉर्गेज और बैंक लोन जैसी सभी बातों की जांच के बाद ही आगे बढ़ना ज्यादा सुरक्षित दस्तावेजी प्रक्रिया बनती है। प्रॉपर्टी खरीदना बड़ा आर्थिक निर्णय है, इसलिए कागजात की जांच में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। किसी भी दस्तावेज को अंतिम मानने से पहले संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में उसका मिलान करना और जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लेना महत्वपूर्ण है।
(Photo : AI Generated)




