माता-पिता की इन बदली आदतों को सिर्फ बुढ़ापे का असर न समझें, डिमेंशिया का हो सकता है शुरुआती संकेत

माता-पिता की इन बदली आदतों को सिर्फ बुढ़ापे का असर न समझें, डिमेंशिया का हो सकता है शुरुआती संकेत

उम्र बढ़ने के साथ शरीर में बदलाव आना स्वाभाविक है। याददाश्त पहले जैसी तेज न रहना, किसी चीज को थोड़ी देर से याद करना या कभी-कभार सामान रखकर भूल जाना आम बात हो सकती है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब बदलाव केवल भूलने तक सीमित न रहकर रोजमर्रा के काम, व्यवहार, बातचीत और फैसले लेने की क्षमता को प्रभावित करने लगें। ऐसे संकेतों को परिवार के लोग अक्सर बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यही वह जगह है जहां परिवार को थोड़ा ज्यादा सजग होने की जरूरत होती है। फोर्टिस अस्पताल, नोएडा की सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. नेहा पंडिता के मुताबिक, किसी बुजुर्ग के व्यवहार या रोजमर्रा की क्षमता में लगातार और स्पष्ट बदलाव दिखाई दे, तो उसके पीछे किसी चिकित्सकीय कारण की जांच जरूरी हो सकती है। इनमें डिमेंशिया या अल्जाइमर जैसी स्थितियां भी शामिल हो सकती हैं।

हर भूलने की समस्या अल्जाइमर नहीं होती, लेकिन कुछ खास बदलाव ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

जब रोज के काम अचानक मुश्किल लगने लगें

अल्जाइमर या डिमेंशिया से जुड़े शुरुआती बदलाव हमेशा इस रूप में सामने नहीं आते कि व्यक्ति अचानक सब कुछ भूलने लगे। कई बार इसका असर उन कामों पर पड़ता है जिन्हें वह व्यक्ति वर्षों से बिना किसी परेशानी के करता आया है।

मसलन, अगर आपकी मां लंबे समय से खाना बनाने का काम आसानी से करती रही हैं, लेकिन अब अचानक उन्हें यह समझने में परेशानी होने लगी है कि खाना किस क्रम में तैयार करना है, तो इस बदलाव पर ध्यान देना चाहिए। इसी तरह, अगर पिता वर्षों से घर के बिजली, पानी या दूसरे बिल संभालते रहे हैं और अब अचानक भुगतान की तारीख भूलने लगे हैं या पैसों से जुड़े सामान्य कामों में दूसरों की मदद लेने लगे हैं, तो इसे केवल उम्र का असर मानकर छोड़ना उचित नहीं है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या व्यक्ति की क्षमता उसके पुराने स्तर की तुलना में बदली है।

परिवार को किन बदलावों पर नजर रखनी चाहिए?

बुजुर्ग माता-पिता के व्यवहार में कुछ परिवर्तन धीरे-धीरे दिखाई देते हैं। इसलिए परिवार को रोजमर्रा की आदतों पर ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, कोई व्यक्ति पहले जिस काम को आसानी से करता था, उसी में बार-बार गलती करने लगे या उसे पूरा करने के लिए लगातार सहायता की जरूरत पड़ने लगे, तो इसकी वजह जानने की कोशिश करनी चाहिए।

कुछ मामलों में व्यक्ति पहले की तरह अपने शौक में दिलचस्पी नहीं दिखाता। जो मां रोज बगीचे में समय बिताती थीं, वे अचानक पौधों की देखभाल बंद कर देती हैं। जो पिता दोस्तों या रिश्तेदारों से नियमित रूप से मिलते थे, वह सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगते हैं। अकेले रहना पसंद करना हर बार बीमारी का संकेत नहीं है, लेकिन यदि यह बदलाव अचानक आया है और दूसरे लक्षणों के साथ दिखाई दे रहा है, तो चिकित्सकीय सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।

चश्मा या चाबी भूलना और इस्तेमाल भूलना अलग बातें हैं

कभी चश्मा, मोबाइल, चाबी या कोई दूसरा सामान कहां रखा है, यह भूल जाना उम्र बढ़ने के साथ हो सकता है। लेकिन ज्यादा चिंता उस स्थिति में होती है जब व्यक्ति सामान मिलने के बावजूद उसके इस्तेमाल का तरीका भूलने लगे।

यानी अंतर केवल वस्तु भूलने का नहीं, बल्कि उस वस्तु से जुड़े परिचित काम को समझने की क्षमता में बदलाव का है। इसी तरह किसी नई जगह का रास्ता भूल जाना और वर्षों से परिचित बाजार, पार्क या रिश्तेदार के घर तक पहुंचने में अचानक परेशानी होने में भी फर्क है।

अगर कोई बुजुर्ग अपने ही परिचित इलाके में जाने से बचने लगे क्योंकि उसे रास्ते को लेकर असमंजस होता है, तो परिवार को इस बदलाव को गंभीरता से देखना चाहिए।

एक ही बात बार-बार पूछना भी हो सकता है संकेत

बातचीत के दौरान कभी-कभी कोई बात भूल जाना सामान्य हो सकता है। लेकिन यदि माता-पिता थोड़ी देर पहले हुई बातचीत को पूरी तरह भूल जाते हैं और उसी सवाल को बार-बार पूछते हैं, तो यह याददाश्त में बदलाव का संकेत हो सकता है।

उदाहरण के लिए, आपने उन्हें बताया कि किसी रिश्तेदार का फोन शाम को आएगा और कुछ ही समय बाद वह फिर पूछने लगें कि फोन कब आएगा। यदि ऐसा लगातार होने लगे और उन्हें हाल की बातचीत याद रखने में परेशानी हो, तो इस पैटर्न पर नजर रखना जरूरी है।

परिवार के लिए यह समझना भी जरूरी है कि एक-दो घटनाओं के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। लगातार दोहराए जाने वाले बदलाव ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं।

बातचीत का तरीका भी बदल सकता है

डिमेंशिया से जुड़े बदलाव केवल याददाश्त में दिखाई दें, ऐसा जरूरी नहीं है। बातचीत के दौरान भाषा का इस्तेमाल भी प्रभावित हो सकता है। व्यक्ति किसी सामान्य चीज का नाम याद करने में अटक सकता है या उसका नाम लेने के बजाय उसके बारे में घुमाकर बताने लग सकता है।

उदाहरण के लिए, किसी सामान्य घरेलू वस्तु का नाम याद न आने पर वह यह बताने लगे कि ‘जिससे टीवी चलता है’ या ‘जिससे दरवाजा खोलते हैं’। कभी-कभी बोलते हुए वाक्य का क्रम बिगड़ सकता है या व्यक्ति अपनी बात पूरी करने में असामान्य रूप से कठिनाई महसूस कर सकता है।

ऐसे बदलाव बार-बार दिखाई दें, तो परिवार को उन्हें नोट करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से चर्चा करनी चाहिए।

स्वभाव में अचानक बदलाव को भी समझें

किसी व्यक्ति के स्वभाव में अचानक बदलाव भी परिवार के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। यदि पहले शांत रहने वाले माता-पिता अचानक बहुत चिड़चिड़े हो जाएं, छोटी बातों पर गुस्सा करने लगें या लगातार दूसरों पर शक करने लगें, तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।

कुछ लोगों में निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। वे ऐसी चीजों पर पैसे खर्च करने लग सकते हैं जिनकी जरूरत नहीं है या ऑनलाइन धोखाधड़ी का शिकार आसानी से हो सकते हैं। परिवार को ऐसे मामलों में केवल ‘लापरवाही’ कहकर बात खत्म नहीं करनी चाहिए।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि व्यवहार में बदलाव के कई दूसरे कारण हो सकते हैं।

हर भूलने की समस्या अल्जाइमर नहीं होती

यही बात सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है। किसी बुजुर्ग के व्यवहार में बदलाव देखकर तुरंत यह मान लेना कि उसे अल्जाइमर या डिमेंशिया है, सही नहीं है।

डिप्रेशन, लगातार अकेलापन, पर्याप्त नींद न मिलना, सुनने में परेशानी और कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव भी याददाश्त या व्यवहार में बदलाव पैदा कर सकते हैं। कई बार अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की वजह से भी व्यक्ति पहले की तुलना में कम सक्रिय या अधिक परेशान नजर आ सकता है।

इसलिए परिवार को खुद से बीमारी का नाम तय करने के बजाय बदलाव को पहचानना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। विशेषज्ञ जरूरत के अनुसार व्यक्ति की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता का मूल्यांकन कर सकते हैं।

तुलना किसी दूसरे बुजुर्ग से नहीं, उनके पुराने व्यवहार से करें

किसी माता-पिता के व्यवहार में बदलाव समझने का एक आसान तरीका यह है कि उनकी तुलना उनकी अपनी पुरानी दिनचर्या से की जाए।

हर व्यक्ति की उम्र बढ़ने की गति और क्षमताएं अलग होती हैं। इसलिए यह कहना कि ‘इस उम्र में तो सभी लोग चीजें भूलते हैं’ सही तरीका नहीं है। इसके बजाय परिवार यह देखे कि क्या वही व्यक्ति कुछ साल पहले जिन कामों को आसानी से करता था, अब उनमें लगातार कठिनाई महसूस कर रहा है।

क्या वह पहले की तरह खाना नहीं बना पा रहा है? क्या पैसों का हिसाब रखने में परेशानी हो रही है? क्या परिचित रास्तों को लेकर असमंजस बढ़ गया है? क्या बातचीत में लगातार शब्द भूल रहे हैं? क्या पुराने शौक और लोगों से मिलने की इच्छा अचानक कम हो गई है? ऐसे सवाल बदलाव को समझने में मदद कर सकते हैं।

माता-पिता से बात करते समय अपनाएं संवेदनशील तरीका

यदि परिवार को कोई बदलाव नज़र आता है, तो बातचीत का तरीका भी बेहद महत्वपूर्ण है। सीधे यह कहना कि ‘आपको अल्जाइमर हो गया है’ व्यक्ति को परेशान या रक्षात्मक कर सकता है।

इसके बजाय परिवार प्यार और सम्मान के साथ बातचीत शुरू कर सकता है। मसलन, यह पूछा जा सकता है कि ‘मैंने देखा है कि इन दिनों इस काम में आपको थोड़ी परेशानी हो रही है, क्या कोई चीज आपको परेशान कर रही है?’ इस तरह व्यक्ति अपनी समस्या बताने में ज्यादा सहज महसूस कर सकता है।

कई बुजुर्ग मदद इसलिए नहीं मांगते क्योंकि उन्हें डर रहता है कि परिवार उनकी स्वतंत्रता कम कर देगा। कुछ मामलों में उन्हें खुद भी अपनी क्षमताओं में आए बदलाव का पूरा अंदाजा नहीं होता। इसलिए परिवार का उद्देश्य उनकी आजादी छीनना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षित तरीके से सहायता उपलब्ध कराना होना चाहिए।

समय पर ध्यान देना क्यों जरूरी है?

अल्जाइमर या डिमेंशिया जैसे मामलों में शुरुआती बदलावों की पहचान परिवार और डॉक्टर दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। हर लक्षण बीमारी साबित नहीं करता, लेकिन लगातार दिखाई देने वाले बदलाव की जांच कराने से कारण समझने में मदद मिल सकती है।

इसलिए माता-पिता का कभी चश्मा भूल जाना, कोई नाम याद न आना या सामान गलत जगह रख देना अपने आप में घबराने की वजह नहीं है। चिंता तब ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब ऐसे बदलाव बार-बार होने लगें और व्यक्ति की रोजमर्रा की स्वतंत्रता, बातचीत, व्यवहार या परिचित काम करने की क्षमता पर असर डालने लगें।

बढ़ती उम्र के साथ कुछ बदलाव सामान्य हैं, लेकिन हर बदलाव को उम्र के खाते में डाल देना भी सही नहीं है। परिवार अगर रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दे और जरूरत पड़ने पर समय रहते चिकित्सकीय सलाह ले, तो किसी संभावित समस्या को समझने की दिशा में सही कदम उठाया जा सकता है।