SIR पर चुनाव आयोग की सफाई, कहा- सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए; आपत्तियों और वोटर डेटा पर 8 सवालों के जवाब

SIR पर चुनाव आयोग की सफाई, कहा- सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए; आपत्तियों और वोटर डेटा पर 8 सवालों के जवाब

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर जारी विवाद के बीच चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। आयोग ने कहा है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में किसी मुद्दे पर सुझाव, टिप्पणियां या अलग राय सामने आना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, आयोग के मुताबिक पिछले एक साल में SIR समेत लिए गए सभी अंतिम फैसले सदस्यों की सहमति से किए गए हैं।

आयोग की यह प्रतिक्रिया इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद आई, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान आयोग के कई फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट में कम से कम 14 ऐसे मामलों का उल्लेख किया गया था।

इन कथित आपत्तियों में वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया, नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन के लिए फॉर्म-6 में बदलाव, वोटर डेटा तक पहुंच और उसके केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल बताए गए थे। चुनाव आयोग ने इन दावों के जवाब में अलग-अलग पहलुओं पर स्पष्टीकरण दिया है।

आयोग ने कहा- आंतरिक टिप्पणियां प्रक्रिया का हिस्सा

चुनाव आयोग के अनुसार किसी संवैधानिक संस्था के भीतर अधिकारियों और सदस्यों की ओर से लिखित टिप्पणियां, सुझाव या तकनीकी आपत्तियां आना असामान्य नहीं है। आयोग ने कहा कि ऐसी प्रक्रिया का उद्देश्य निर्णयों की कानूनी जांच, पारदर्शिता और चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाना होता है।

आयोग ने स्पष्ट किया कि किसी प्रस्ताव के ड्राफ्ट स्तर पर सवाल उठाए जाने और अंतिम निर्णय के बीच अंतर होता है। उसके मुताबिक अंतिम स्तर पर लिए गए फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।

वोटर का नाम हटाने का अधिकार किसके पास है?

वोटर लिस्ट से नाम हटाने या नया नाम जोड़ने को लेकर उठे सवालों पर आयोग ने कहा कि यह काम सीधे दिल्ली में बैठे चुनाव आयोग के अधिकारी नहीं करते। इसके लिए कानून के तहत नियुक्त वैधानिक अधिकारी जिम्मेदार होते हैं।

आयोग ने बताया कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर यानी ERO और डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर यानी DEO अपने अधिकार क्षेत्र में मतदाता सूची से जुड़े मामलों पर कार्रवाई करते हैं। नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी प्रावधानों के अनुसार होती है।

इसी मुद्दे को लेकर पश्चिम बंगाल में वोटरों के नाम हटाने से संबंधित अपीलों का भी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया था। चुनाव आयोग का कहना है कि ऐसी प्रक्रियाओं के लिए जिम्मेदार अधिकारी कानून के तहत अपनी भूमिका निभाते हैं।

वोटर डेटाबेस को लेकर भी उठे थे सवाल

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में वोटर डेटाबेस की पहुंच को धीरे-धीरे केंद्रीय स्तर पर लाने को लेकर भी कथित आपत्तियों का जिक्र था। रिपोर्ट के मुताबिक विवेक जोशी ने यह सुझाव दिया था कि यह सुनिश्चित करने के लिए ऑडिट किया जाना चाहिए कि मतदाता रिकॉर्ड में बदलाव केवल अधिकृत अधिकारियों द्वारा ही किया जा सके।

चुनाव आयोग ने इस पर अपने डिजिटल सिस्टम की सुरक्षा व्यवस्था का हवाला दिया। आयोग के मुताबिक ECINet जैसे प्लेटफॉर्म पर डेटा सुरक्षा के लिए कई स्तरों के प्रोटोकॉल मौजूद हैं।

आयोग ने कहा कि अनधिकृत बदलाव और डेटा से छेड़छाड़ को रोकने के लिए IT सिक्योरिटी चेक, ऑडिट और कंट्रोल मैकेनिज्म लागू हैं। यानी आयोग के अनुसार वोटर रिकॉर्ड में बदलाव की प्रक्रिया तकनीकी और प्रशासनिक नियंत्रण के तहत संचालित होती है।

नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन पर विवाद

रिपोर्ट में नए मतदाताओं से संबंधित कुछ प्रक्रियाओं पर भी चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र किया गया था। दावा किया गया था कि कुछ कदमों को ‘अनधिकृत’ और ‘गैरकानूनी’ बताया गया था।

इस पर चुनाव आयोग ने कहा कि उसके सभी कार्य संबंधित कानूनों और आयोग द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार किए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि किसी प्रक्रिया के ड्राफ्ट या ऑपरेशनल स्तर पर सवाल उठना निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के मुताबिक ऐसे सवालों को अंतिम निर्णय के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

फॉर्म-6 में बदलाव का मुद्दा भी चर्चा में

नए वोटर के रूप में रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर भी रिपोर्ट में आपत्तियों का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार विवेक जोशी ने इस बात पर सवाल उठाया था कि चुनाव नियमों में संशोधन किए बिना फॉर्म में इस प्रकार बदलाव कैसे किया जा सकता है। बाद में सुखबीर सिंह संधू की ओर से भी आपत्ति दर्ज किए जाने की बात कही गई। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से जारी स्पष्टीकरण में फॉर्म-6 के इस विशेष मुद्दे पर कोई अलग जवाब नहीं दिया गया।

इसी तरह गोवा में 97 मतदाताओं से जुड़ा मामला भी रिपोर्ट में सामने आया था। बताया गया था कि संबंधित इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स ने इन लोगों को पात्र माना था, लेकिन सॉफ्टवेयर संबंधी समस्या के चलते उनके नाम अंतिम वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो सके। रिपोर्ट में इस घटना को केंद्रीय डेटा सिस्टम को लेकर उठाई गई चिंताओं के संदर्भ में रखा गया था।

चुनाव आयोग की प्रेस रिलीज में गोवा के इन 97 मतदाताओं के मामले पर अलग से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

14 कथित आपत्तियों पर EC की सफाई

रिपोर्ट के अनुसार दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के निर्णयों या आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की गई थी। इनमें चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज किए जाने का भी दावा किया गया था।

चुनाव आयोग ने इन घटनाओं को अलग नजरिए से समझाया। आयोग का कहना है कि लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच जैसे कदम लगातार चलने वाली संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

आयोग ने कहा कि इनका इस्तेमाल किसी फैसले को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि प्रक्रिया की कानूनी वैधता, पारदर्शिता और प्रशासनिक गुणवत्ता की जांच के लिए किया जाता है।

BJP ने कहा- अलग राय होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया

विवाद पर BJP प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर अलग-अलग विचार सामने आने को लोकतांत्रिक संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया।

उनका कहना था कि किसी संस्था के सदस्य आपस में चर्चा और असहमति व्यक्त नहीं करेंगे तो उस संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठेंगे। उन्होंने कहा कि आयोग के सदस्यों के बीच विचार-विमर्श होना स्वाभाविक है।

कानून में सर्वसम्मति और बहुमत का प्रावधान

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए अधिनियम, 2023 में भी प्रावधान है। इसकी धारा 18 के अनुसार आयोग को जहां तक संभव हो, अपने कामकाज में सर्वसम्मति से निर्णय लेने का प्रयास करना चाहिए।

यदि किसी मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद बना रहता है, तो कानून के तहत मामला बहुमत की राय से तय किया जा सकता है।

इसी प्रावधान के संदर्भ में आयोग ने अपने अंतिम फैसलों के सर्वसम्मति से लिए जाने की बात कही है।

विपक्ष ने CEC पर उठाए सवाल

मामला सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी उठाई। कांग्रेस ने इस विवाद को ‘ज्ञानेशगेट’ नाम दिया।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग जो कर रहा है, वह गलत है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि यदि स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्यों को निष्पक्ष तरीके से काम करने की स्वतंत्रता नहीं मिलती और उनकी बात नहीं सुनी जाती, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर स्थिति है।

AAP संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जब यह अधिकार ERO के पास है, तो दिल्ली में बैठे लोग देशभर की मतदाता सूची में बदलाव कैसे कर सकते हैं।

इन नेताओं के बयान उनके अपने राजनीतिक रुख और आरोपों को दर्शाते हैं।

ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग पहले भी उठी

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की नाराजगी नई नहीं है। अप्रैल 2026 में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया था कि विपक्ष से जुड़े 73 राज्यसभा सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए नोटिस दिया था। इसमें ‘साबित कदाचार’ का आरोप लगाए जाने की बात कही गई थी।

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। SIR के दौरान वास्तविक मतदाताओं के प्रभावित होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की थी।

इससे पहले लोकसभा में भी हटाने से जुड़ा प्रस्ताव लाए जाने की बात सामने आई थी। हालांकि, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा सभापति सीपी राधाकृष्णन ने उसे खारिज कर दिया था।

SIR का अब तक कई राज्यों में विस्तार

SIR की प्रक्रिया के पहले और दूसरे चरण में 10 राज्य तथा 3 केंद्र शासित प्रदेश शामिल किए जा चुके हैं। इसके बाद अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।

बिहार, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी और असम में SIR अथवा संबंधित मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया के बाद विधानसभा चुनाव हुए। असम में स्पेशल रिवीजन यानी SR की प्रक्रिया हुई थी।

इन राज्यों के चुनावी परिणामों को SIR की प्रक्रिया के साथ जोड़कर देखा गया है, हालांकि चुनाव परिणामों के कारणों को केवल मतदाता सूची पुनरीक्षण से जोड़ने का कोई एकमात्र निष्कर्ष नहीं है।

तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 UT

चुनाव आयोग ने 14 मई को SIR के तीसरे चरण की घोषणा की थी। इसमें हरियाणा, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली और महाराष्ट्र समेत 16 राज्यों तथा 3 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया है। आयोग के तय कार्यक्रम के अनुसार तीसरे चरण की पूरी प्रक्रिया 30 मई से 23 दिसंबर तक चलेगी। इस दौरान करीब 36.73 करोड़ मतदाताओं के रिकॉर्ड का वेरिफिकेशन किया जा रहा है।

इस चरण में शामिल राज्यों में पंजाब, उत्तराखंड और मणिपुर में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, जबकि बाकी राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव 2028 और 2029 के दौरान होने हैं।

SIR को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद और आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि उसकी पूरी प्रक्रिया कानूनी प्रावधानों, निर्धारित प्रशासनिक व्यवस्था और डेटा सुरक्षा उपायों के तहत संचालित हो रही है।