चंडीगढ़: चंडीगढ़ की आधुनिक वास्तुकला से जुड़ी विरासत एक बार फिर विदेशी नीलामी बाजार में पहुंचने को लेकर चर्चा में है। शहर की प्रशासनिक इमारतों में इस्तेमाल किए गए प्रसिद्ध वास्तुकार पियरे जेनरे के डिजाइन वाले फर्नीचर की विदेशों में नीलामी प्रस्तावित है। इस मामले को लेकर एडवोकेट और यूटी सलाहकार समिति के सदस्य अजय जग्गा ने केंद्र सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है।
जग्गा ने विदेश मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और चंडीगढ़ प्रशासन को पत्र भेजकर प्रस्तावित नीलामी को रोकने की मांग की है। साथ ही उन्होंने नीलामी के लिए रखे गए फर्नीचर के स्वामित्व, उसके प्रशासनिक भवनों से बाहर निकलने और भारत से विदेश पहुंचने की परिस्थितियों की जांच कराने का आग्रह किया है।
उनका कहना है कि चंडीगढ़ की विरासत केवल शहर की इमारतों और वास्तुकला तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां इस्तेमाल किया गया पियरे जेनरे का फर्नीचर भी शहर की ऐतिहासिक और वास्तु विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में इस तरह के फर्नीचर का विदेशों में पहुंचना संरक्षण से जुड़े सवाल खड़े करता है।
पेरिस की नीलामी में रखी गई जेनरे की कुर्सी
पेरिस में प्रस्तावित ‘आर्टक्यूरियल एक्स रिफ्लेक्शंस’ नीलामी में पियरे जेनरे की वर्ष 1958 में तैयार की गई ‘चेयर वी टाइप केन सीट केन बैक’ को लॉट नंबर 73 के तहत रखा गया है।
ठोस सागौन और बेंत से तैयार की गई इस कुर्सी की अनुमानित कीमत चार हजार से छह हजार यूरो के बीच निर्धारित की गई है। नीलामी में इसे पियरे जेनरे की डिजाइन परंपरा से जुड़े फर्नीचर के तौर पर पेश किया जा रहा है।
चंडीगढ़ के संदर्भ में इस फर्नीचर की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि शहर की स्थापना और इसकी वास्तुकला के विकास के दौरान पियरे जेनरे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने शहर के लिए कई इमारतों के डिजाइन के साथ-साथ फर्नीचर डिजाइन में भी योगदान दिया था। प्रशासनिक और संस्थागत इमारतों में इस्तेमाल किए गए उनके डिजाइन आज चंडीगढ़ की पहचान से जुड़े माने जाते हैं।
नीदरलैंड में भी दो कुर्सियों की नीलामी प्रस्तावित
अजय जग्गा ने अपने पत्र में नीदरलैंड में 10 अक्टूबर को प्रस्तावित एक अन्य नीलामी का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, इस नीलामी में पियरे जेनरे की दो ‘एक्स-लेग आर्मचेयर्स’ को लॉट नंबर 28 के रूप में पेश किया जाना है।
इन दोनों कुर्सियों की अनुमानित कीमत पांच हजार से सात हजार यूरो के बीच बताई गई है। इस तरह पेरिस और नीदरलैंड में प्रस्तावित नीलामियों में पियरे जेनरे से जुड़े कुल तीन फर्नीचर आइटम सामने आए हैं।
जग्गा ने सरकार से इन सभी वस्तुओं के स्रोत और स्वामित्व की जानकारी जुटाने की मांग की है। उनका कहना है कि यह पता लगाया जाना जरूरी है कि ये फर्नीचर मूल रूप से चंडीगढ़ की किन इमारतों में इस्तेमाल किए गए थे और बाद में किस प्रक्रिया के तहत निजी हाथों में पहुंचे।
प्रशासनिक भवनों के फर्नीचर पर स्वामित्व का सवाल
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू फर्नीचर के स्वामित्व से जुड़ा है। यदि नीलामी के लिए रखी गई वस्तुएं वास्तव में चंडीगढ़ प्रशासन की किसी प्रशासनिक इमारत का हिस्सा रही हैं, तो उनके निजी हाथों में पहुंचने और फिर विदेश में बिक्री के लिए पेश किए जाने की प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है।
जग्गा ने इसी आधार पर संबंधित विभागों से रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की है। इसमें यह पता लगाने पर जोर दिया गया है कि फर्नीचर कब और किस इमारत से हटाया गया, उसे किसे सौंपा गया और भारत से बाहर ले जाने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई।
उनके अनुसार, नीलामी से पहले संबंधित दस्तावेजों की जांच होने से यह स्पष्ट हो सकता है कि विदेश में पहुंचा फर्नीचर वैध तरीके से निर्यात किया गया है या उसके स्वामित्व और स्थानांतरण से जुड़े सवाल अभी अनुत्तरित हैं।
चंडीगढ़ की पहचान से जुड़ा है जेनरे का फर्नीचर
चंडीगढ़ को देश के नियोजित आधुनिक शहरों में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। शहर की योजना और वास्तुकला में ली कॉर्बुजिए और उनके सहयोगियों के साथ पियरे जेनरे की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। जेनरे ने शहर में कई सार्वजनिक और प्रशासनिक परियोजनाओं के लिए डिजाइन तैयार किए। इसके साथ ही उन्होंने ऐसे फर्नीचर डिजाइन किए, जो चंडीगढ़ की इमारतों की वास्तुकला और उपयोगिता के अनुरूप थे।
जेनरे के फर्नीचर में साधारण लेकिन उपयोगी डिजाइन, स्थानीय सामग्री और आधुनिक वास्तुशिल्प दृष्टिकोण का संयोजन दिखाई देता है। समय के साथ ऐसे फर्नीचर के दुर्लभ और मूल नमूने अंतरराष्ट्रीय कला और डिजाइन बाजार में संग्रहकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने हैं।
इसी वजह से चंडीगढ़ में इस्तेमाल हुए जेनरे के फर्नीचर की अंतरराष्ट्रीय नीलामी को केवल पुराने फर्नीचर की बिक्री के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इससे शहर की विरासत और उसके संरक्षण से जुड़े मुद्दे भी जुड़ते हैं।
पहले भी विदेशों में नीलाम होते रहे हैं जेनरे के फर्नीचर
पियरे जेनरे के डिजाइन किए फर्नीचर की अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग लंबे समय से बनी हुई है। उनकी डिजाइन की कुर्सियां, टेबल, डेस्क और अन्य फर्नीचर वस्तुएं विभिन्न अंतरराष्ट्रीय नीलामी घरों में ऊंची कीमतों पर पेश की जाती रही हैं।
चंडीगढ़ से जुड़े जेनरे फर्नीचर की नीलामी का मुद्दा समय-समय पर सामने आता रहा है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यही रहता है कि नीलामी के लिए रखी गई वस्तु वास्तव में चंडीगढ़ की किसी मूल इमारत से संबंधित है या बाद में तैयार किए गए प्रतिरूप अथवा निजी स्वामित्व वाला फर्नीचर है।
इसी कारण इस बार भी जग्गा ने सरकार से केवल नीलामी रोकने की मांग नहीं की है, बल्कि फर्नीचर के स्वामित्व और उसके भारत से बाहर पहुंचने की पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है।
विरासत संरक्षण के लिए स्पष्ट व्यवस्था की मांग
अजय जग्गा ने केंद्र और यूटी प्रशासन से यह भी आग्रह किया है कि चंडीगढ़ की विरासत से जुड़े फर्नीचर की पहचान और संरक्षण के लिए प्रभावी व्यवस्था की जाए। प्रशासनिक भवनों में मौजूद ऐतिहासिक फर्नीचर का रिकॉर्ड तैयार करने, उसकी सूची बनाने और उसकी निगरानी के लिए स्पष्ट तंत्र होने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है।
ऐसा होने पर भविष्य में किसी ऐतिहासिक वस्तु के गायब होने या उसके विदेश में नीलामी के लिए पहुंचने की स्थिति में उसके स्रोत और स्वामित्व का पता लगाना आसान हो सकता है।
चंडीगढ़ की विरासत को लेकर विशेषज्ञ लंबे समय से यह मानते रहे हैं कि शहर की पहचान केवल कैपिटल कॉम्प्लेक्स या प्रमुख इमारतों तक सीमित नहीं है। यहां की कुर्सियां, मेज, लैंप और अन्य डिजाइन वस्तुएं भी शहर के निर्माण काल और उसकी वास्तुकला की कहानी का हिस्सा हैं।
अब सरकार के हस्तक्षेप पर नजर
पेरिस और नीदरलैंड में प्रस्तावित नीलामी को लेकर अब केंद्र और चंडीगढ़ प्रशासन के रुख पर नजर रहेगी। यदि संबंधित विभाग नीलामी में रखी गई वस्तुओं को चंडीगढ़ की सरकारी इमारतों से जोड़ते हैं, तो उनके स्वामित्व और विदेश भेजे जाने की प्रक्रिया की जांच महत्वपूर्ण होगी।
वहीं, यदि दस्तावेजों से यह सामने आता है कि फर्नीचर निजी स्वामित्व में वैध तरीके से पहुंचा था, तो भी उसके ऐतिहासिक और विरासती महत्व को देखते हुए संरक्षण से जुड़े पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।
फिलहाल अजय जग्गा की मांग के बाद यह मामला एक बार फिर इस बड़े सवाल के केंद्र में आ गया है कि चंडीगढ़ से जुड़ी ऐतिहासिक वस्तुओं को अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में पहुंचने से पहले किस तरह संरक्षित किया जाए और उनके स्वामित्व व स्थानांतरण की प्रक्रिया को कैसे पारदर्शी बनाया जाए।




