आज की तेज रफ्तार जिंदगी में तनाव महिलाओं की दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा है। काम का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां, नींद की कमी और लगातार बनी रहने वाली चिंता का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य पर ही नहीं पड़ता, बल्कि शरीर की कई सामान्य प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है। प्रजनन स्वास्थ्य के मामले में भी तनाव को एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। गर्भधारण में परेशानी का सामना कर रही महिलाओं के लिए हाल ही में सामने आए एक अध्ययन में योग, प्राणायाम और ध्यान के नियमित अभ्यास को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं। अध्ययन के अनुसार, हठयोग को नियमित रूप से करने वाली महिलाओं में चिंता, अवसाद और मानसिक तनाव के स्तर में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
नई दिल्ली में आयोजित सातवीं राष्ट्रमंडल परिचारिका एवं प्रसूति विद्या महासंघ की संगोष्ठी में इस शोध से जुड़ा पेपर प्रस्तुत किया गया। यह अध्ययन संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के चिकित्सकों और शोधकर्ताओं की ओर से किया गया। शोध में गर्भधारण संबंधी समस्या के लिए उपचार और परामर्श ले रही महिलाओं को शामिल किया गया था। शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि नियमित योगाभ्यास से इन महिलाओं की मानसिक स्थिति में किस तरह का बदलाव आता है। अध्ययन में दो सप्ताह तक प्रतिदिन करीब 60 मिनट हठयोग का अभ्यास कराया गया, जिसमें योगासन, प्राणायाम और ध्यान जैसी गतिविधियां शामिल थीं।
दो सप्ताह के अभ्यास में दिखा मानसिक स्वास्थ्य पर असर
अध्ययन में शामिल महिलाओं की मानसिक स्थिति का योगाभ्यास शुरू करने से पहले आकलन किया गया। इसके बाद उन्हें लगातार 14 दिनों तक रोजाना एक घंटे की योग आधारित दिनचर्या कराई गई। इस रूटीन में शरीर को तैयार करने के लिए हल्की गतिविधियों के बाद विभिन्न योगासन, सांस से जुड़े अभ्यास और अंत में ध्यान व विश्राम शामिल था। दो सप्ताह की अवधि पूरी होने के बाद जब प्रतिभागियों की मानसिक स्थिति का दोबारा मूल्यांकन किया गया तो कई स्तरों पर सुधार दर्ज किया गया।
शोध के मुताबिक, महिलाओं में चिंता के स्तर में 41.3 प्रतिशत तक की कमी देखी गई। इसी तरह अवसाद के स्तर में 35.3 प्रतिशत और मानसिक तनाव में 30.3 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, गर्भधारण की प्रक्रिया से गुजर रही महिलाओं के लिए मानसिक स्वास्थ्य का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि लंबे समय तक बनी रहने वाली चिंता और तनाव उनकी रोजमर्रा की जिंदगी तथा उपचार के अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, इन आंकड़ों को यह समझकर नहीं देखा जाना चाहिए कि केवल योग करने से हर महिला में गर्भधारण निश्चित रूप से हो जाएगा। गर्भधारण की क्षमता कई अलग-अलग शारीरिक, हार्मोनल, प्रजनन और अन्य स्वास्थ्य संबंधी कारकों पर निर्भर करती है। योग और तनाव प्रबंधन को उपचार का विकल्प मानने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह के साथ अपनाना अधिक उचित है।
तनाव बढ़ने पर शरीर में क्या होता है?
जब व्यक्ति लंबे समय तक तनाव में रहता है तो शरीर में तनाव से संबंधित हार्मोन और रसायनों की गतिविधि प्रभावित हो सकती है। इसी संदर्भ में कोर्टिसोल का अक्सर उल्लेख किया जाता है। लगातार तनाव की स्थिति में कोर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है और शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रियाओं पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। महिलाओं के मामले में प्रजनन तंत्र भी शरीर के हार्मोनल नेटवर्क से जुड़ा हुआ है।
एसजीपीजीआई की मातृ एवं प्रजनन स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रो. डॉ. इंदुलता साहू के अनुसार, मानसिक तनाव और अवसाद गर्भधारण की प्रक्रिया को चुनौतीपूर्ण बनाने वाले कारकों में शामिल हो सकते हैं। तनाव की स्थिति में शरीर की सामान्य कार्यप्रणाली प्रभावित होने के कारण अंडाशय की गतिविधियों और प्रजनन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर भी असर पड़ने की संभावना रहती है। यही वजह है कि गर्भधारण की योजना बना रही महिलाओं के लिए शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
एक घंटे का रूटीन कैसे तैयार किया गया?
अध्ययन में इस्तेमाल की गई योग दिनचर्या को तीन प्रमुख हिस्सों में बांटा गया था—योगासन, प्राणायाम और ध्यान। इसके अलावा शुरुआत में शरीर को अभ्यास के लिए तैयार करने और अंत में विश्राम देने का समय रखा गया। इस तरह पूरे अभ्यास की अवधि लगभग 60 मिनट रही।
योगाचार्य डॉ. सत्यराम के अनुसार, हठयोग में शरीर की गतिविधियों, सांसों के नियंत्रण और मानसिक एकाग्रता को एक साथ शामिल किया जाता है। नियमित अभ्यास का उद्देश्य शरीर को सक्रिय करने के साथ मानसिक तनाव को कम करना और व्यक्ति को आराम की स्थिति में लाना होता है।
5 मिनट: शरीर को अभ्यास के लिए तैयार करें
एक घंटे के सत्र की शुरुआत सीधे कठिन आसनों से करने के बजाय शरीर को तैयार करने से की जा सकती है। इसके लिए गर्दन, कंधे, कमर, हाथ और पैरों की हल्की गतिविधियां की जाती हैं। गर्दन को धीरे-धीरे दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे ले जाना, कंधों को घुमाना तथा हाथ-पैरों को हल्के ढंग से ढीला करना वार्म-अप का हिस्सा हो सकता है।
सुबह का समय चुना जाए तो खाली पेट या भोजन के पर्याप्त समय बाद अभ्यास करना सुविधाजनक रहता है। योग के लिए हवादार और शांत जगह का चुनाव किया जा सकता है। आरामदायक और ढीले कपड़े पहनना भी अभ्यास को सहज बनाता है।
30 मिनट: अलग-अलग योगासन
वार्म-अप के बाद लगभग 30 मिनट योगासनों के लिए रखे गए। इसमें शरीर की क्षमता के अनुसार अलग-अलग मुद्राओं का अभ्यास किया जा सकता है। भद्रासन या तितली मुद्रा को श्रोणि क्षेत्र की गतिशीलता के लिए इस्तेमाल किया जाता है। भुजंगासन शरीर के ऊपरी हिस्से को सक्रिय करने वाला आसन है, जबकि सेतुबंधासन में शरीर को पुल जैसी स्थिति में रखा जाता है।
विपरीत करणी में पैरों को दीवार के सहारे ऊपर रखा जाता है और शरीर को अपेक्षाकृत आराम की स्थिति में रखा जाता है। इसे विश्राम से जुड़ी मुद्रा के रूप में किया जाता है। प्रत्येक आसन को अपनी सुविधा और योग प्रशिक्षक के निर्देश के अनुसार कुछ समय तक किया जा सकता है। किसी भी आसन के दौरान दर्द, चक्कर या असहजता महसूस होने पर उसे रोक देना चाहिए।
15 मिनट: सांसों पर ध्यान
योग सत्र में अगला हिस्सा प्राणायाम का था। इसके लिए करीब 15 मिनट निर्धारित किए गए। अनुलोम-विलोम में सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया को नियंत्रित तरीके से किया जाता है। इसके बाद भ्रामरी प्राणायाम में सांस छोड़ते समय मधुमक्खी जैसी गुंजन ध्वनि उत्पन्न की जाती है। बचे हुए समय में धीमी और गहरी सांस लेने का अभ्यास किया जा सकता है।
इन अभ्यासों का मुख्य उद्देश्य सांसों को नियंत्रित करना और व्यक्ति को शांत अवस्था में लाने में मदद करना है। प्राणायाम करते समय सांस को जबरदस्ती रोकने या बहुत तेज गति से अभ्यास करने से बचना चाहिए, खासकर तब जब व्यक्ति को पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या हो।
10 मिनट: ध्यान और शरीर को दें पूरा आराम
एक घंटे के अभ्यास का अंतिम हिस्सा ध्यान और विश्राम के लिए रखा गया। करीब आठ मिनट तक शांत बैठकर सांसों की गति पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है। इस दौरान आंखें बंद रखकर केवल सांस के आने और जाने की प्रक्रिया पर ध्यान देना मानसिक एकाग्रता विकसित करने में मदद कर सकता है।
इसके बाद लगभग दो मिनट शवासन में आराम करने की प्रक्रिया रखी गई। इसमें पीठ के बल लेटकर हाथ-पैरों को ढीला छोड़ दिया जाता है और शरीर को पूरी तरह आराम देने की कोशिश की जाती है।
योग को इलाज का विकल्प नहीं, सहायक अभ्यास समझें
गर्भधारण में परेशानी होने पर तनाव कम करना उपयोगी हो सकता है, लेकिन केवल तनाव को ही इसकी वजह मान लेना सही नहीं है। गर्भधारण में समस्या महिलाओं या पुरुषों दोनों से जुड़े कई कारणों की वजह से हो सकती है। इसलिए लंबे समय से प्रयास के बावजूद गर्भधारण न होने पर योग्य स्त्रीरोग विशेषज्ञ या प्रजनन विशेषज्ञ से जांच और सलाह लेना जरूरी है।
इसी तरह किसी महिला को हार्मोन से संबंधित समस्या, अनियमित मासिक धर्म या अन्य स्वास्थ्य परेशानी है तो योग शुरू करने से पहले डॉक्टर अथवा प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ से सलाह ली जा सकती है। अध्ययन में दो सप्ताह के अभ्यास के दौरान मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े सकारात्मक बदलाव सामने आए हैं, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए कि 60 मिनट का योग रूटीन अपने आप हार्मोनल समस्याओं या बांझपन का उपचार कर सकता है।
फिर भी इस अध्ययन ने प्रजनन स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य को जोड़कर देखने की जरूरत पर ध्यान आकर्षित किया है। गर्भधारण की कोशिश के दौरान लगातार चिंता और तनाव का सामना कर रही महिलाओं के लिए योग, नियंत्रित श्वसन, ध्यान, पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और नियमित चिकित्सकीय सलाह जैसी चीजें समग्र स्वास्थ्य देखभाल का हिस्सा हो सकती हैं। रोजाना एक घंटे की यह दिनचर्या शरीर को सक्रिय रखने के साथ मन को शांत करने में सहायक हो सकती है, लेकिन इसे व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।




