कांगो में इबोला ने मचाई तबाही, 4 हजार से ज्यादा मौतें; 8,300 से अधिक मामले, तेजी से फैल रहा वायरस

कांगो में इबोला ने मचाई तबाही, 4 हजार से ज्यादा मौतें; 8,300 से अधिक मामले, तेजी से फैल रहा वायरस

अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) इस समय इबोला वायरस के बेहद गंभीर प्रकोप से जूझ रहा है। मई 2026 में सामने आया यह संक्रमण कुछ ही महीनों में देश के बड़े हिस्से तक पहुंच गया है। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रकोप में अब तक 4,018 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 8,300 से अधिक मामलों की पुष्टि हो चुकी है। यह आंकड़ा इस बीमारी के पिछले कई बड़े प्रकोपों की तुलना में बेहद तेजी से बढ़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, संक्रमण देश के सात प्रांतों तक पहुंच चुका है और इसके फैलाव ने स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठनों की चिंता भी बढ़ा दी है।

मौजूदा संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने अगस्त में ही इस प्रकोप को कांगो के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा इबोला प्रकोप बताया था और कहा था कि यह पहले दर्ज किए गए किसी भी इबोला प्रकोप की तुलना में अधिक तेजी से फैल रहा है। सितंबर के अंत तक संक्रमित स्वास्थ्य क्षेत्रों की संख्या 63 हो चुकी थी। इसके बाद भी संक्रमण की रफ्तार कई इलाकों में बनी रही। WHO के मुताबिक, 23 सितंबर तक 7,890 पुष्ट मामले और 3,799 मौतें दर्ज की गई थीं। इसके कुछ दिनों बाद मौतों का आंकड़ा 4,000 के पार पहुंच गया।

मई में इटुरी से शुरू हुआ था संक्रमण

इस पूरे संकट की शुरुआत देश के उत्तर-पूर्वी इटुरी प्रांत से हुई थी। 15 मई 2026 को कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर इबोला संक्रमण की पुष्टि की थी। शुरुआती मामले मोंगबवालु और र्वामपारा जैसे स्वास्थ्य क्षेत्रों में सामने आए थे। प्रयोगशाला जांच में संक्रमण के लिए बुंडीबुग्यो वायरस की पुष्टि हुई, जो इबोला वायरस की एक अलग प्रजाति है। उस समय कुछ ही पुष्ट मामले सामने आए थे, लेकिन संदिग्ध मरीजों और मौतों की संख्या पहले से ही चिंता पैदा कर रही थी।

यह कांगो का 17वां इबोला प्रकोप है। शुरुआती दौर में संक्रमण मुख्य रूप से इटुरी प्रांत तक सीमित था, लेकिन बाद में यह दूसरे क्षेत्रों में फैलने लगा। WHO के अनुसार, कुछ समय के भीतर संक्रमण ने नॉर्थ किवु, साउथ किवु, हाउट-उएले, त्शोपो और बास-उएले समेत कई प्रांतों को प्रभावित किया। सितंबर में सूद उबांगी भी प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हो गया, जिससे देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच संक्रमण फैलने की आशंका और बढ़ गई।

बुंडीबुग्यो वायरस ने बढ़ाई मुश्किल

मौजूदा प्रकोप को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इसका कारण बुंडीबुग्यो वायरस है। WHO के अनुसार, इस वायरस के खिलाफ फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। हालांकि वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संस्थाएं संभावित उपचारों और बचाव के तरीकों पर काम कर रही हैं। मौजूदा प्रकोप के दौरान एक प्रयोगात्मक एंटीवायरल दवा का परीक्षण भी किया जा रहा है, जिसमें संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों को बीमारी विकसित होने से पहले दवा देने की संभावना का अध्ययन किया जा रहा है।

बुंडीबुग्यो वायरस की वजह से पैदा हुई बीमारी गंभीर हो सकती है और समय पर पहचान तथा चिकित्सा देखभाल बेहद महत्वपूर्ण होती है। इबोला संक्रमित व्यक्ति के रक्त और शरीर के अन्य तरल पदार्थों के संपर्क से फैल सकता है। मरीजों की देखभाल करने वाले स्वास्थ्यकर्मी और परिवार के करीबी सदस्य विशेष जोखिम में हो सकते हैं, खासकर तब जब संक्रमण की पहचान देर से हो या संक्रमण नियंत्रण के उपायों का सही तरीके से पालन न किया जाए।

कुछ क्षेत्रों में मामले घटे, लेकिन खतरा खत्म नहीं

हालांकि कुछ प्रभावित इलाकों में नए मामलों की संख्या में कमी के संकेत मिले हैं, लेकिन स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए इसे संक्रमण पर पूरी तरह नियंत्रण का संकेत मानना मुश्किल है। इसका एक बड़ा कारण कांगो के कुछ हिस्सों में जारी असुरक्षा और हिंसा है। कई क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों की आवाजाही प्रभावित हुई है और टीमों के लिए उन समुदायों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है जहां संक्रमण के मामले सामने आए हैं। ऐसे हालात में कम रिपोर्ट किए गए मामलों को वास्तविक संक्रमण में कमी समझना जोखिम भरा हो सकता है।

WHO ने भी लगातार इस बात पर जोर दिया है कि समय पर मरीजों की पहचान, संपर्कों की निगरानी और संक्रमित लोगों को उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए जरूरी है। जिन इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं, वहां यह काम और चुनौतीपूर्ण हो जाता है। अस्पतालों और उपचार केंद्रों पर मरीजों का दबाव बढ़ने के साथ-साथ स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा और उनके लिए जरूरी संसाधनों की उपलब्धता भी अहम मुद्दा बनी हुई है।

हिंसा और लोगों का अविश्वास बना बड़ी बाधा

कांगो में इबोला से निपटने के अभियान को सिर्फ चिकित्सा संबंधी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ रहा, बल्कि सामाजिक और सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। कुछ प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के बीच स्वास्थ्य अधिकारियों और सरकारी एजेंसियों को लेकर अविश्वास की स्थिति है। गलत सूचनाओं और अफवाहों के कारण कई बार लोग जांच, संपर्क निगरानी या उपचार केंद्रों से जुड़ने में हिचकिचाते हैं।

इसके अलावा, कुछ इलाकों में सुरक्षा स्थिति खराब होने के कारण स्वास्थ्यकर्मियों के लिए संक्रमित समुदायों तक पहुंचना मुश्किल हुआ है। AP की रिपोर्ट के मुताबिक, उपचार केंद्रों और स्वास्थ्य सुविधाओं को भी हिंसा का सामना करना पड़ा है। कुछ स्वास्थ्यकर्मियों को भुगतान से जुड़ी समस्याओं और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जिससे संक्रमण रोकने की कोशिशों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

सात प्रांतों तक पहुंचा वायरस

मई में इटुरी से शुरू हुई बीमारी अब कई प्रांतों में फैल चुकी है। WHO के 25 सितंबर के अपडेट के मुताबिक, उस समय तक 63 स्वास्थ्य क्षेत्र सात प्रांतों में प्रभावित हो चुके थे। इनमें बास-उएले, हाउट-उएले, इटुरी, नॉर्थ किवु, साउथ किवु, सूद उबांगी और त्शोपो शामिल थे। संक्रमण का नए क्षेत्रों तक पहुंचना इसलिए चिंता का विषय है क्योंकि कांगो के कई हिस्सों में लोगों की आवाजाही, व्यापारिक गतिविधियां और सीमापार आवागमन लगातार जारी रहता है।

WHO के अनुसार, प्रभावित क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति और वहां मौजूद मानवीय संकट संक्रमण की निगरानी को जटिल बनाते हैं। कई समुदाय दूरदराज के इलाकों में रहते हैं और कुछ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच सीमित है। ऐसे में किसी मरीज की पहचान में देरी होने पर वह बीमारी को परिवार या समुदाय के अन्य लोगों तक पहुंचा सकता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ रहा व्यापक असर

इबोला के इस प्रकोप का असर सिर्फ संक्रमित मरीजों तक सीमित नहीं है। जब किसी इलाके में बड़ी संख्या में स्वास्थ्यकर्मियों और संसाधनों को इबोला की रोकथाम में लगाया जाता है, तो अन्य स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। WHO ने बताया है कि कुछ प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं का इस्तेमाल भी कम हुआ है। संक्रमण का डर, स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच में कठिनाई और सीमित संसाधन दूसरी बीमारियों के इलाज को भी प्रभावित कर सकते हैं।

ऐसे हालात में स्वास्थ्य अधिकारियों के सामने दोहरी चुनौती होती है। एक तरफ इबोला की संक्रमण श्रृंखला को तोड़ना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ सामान्य चिकित्सा सेवाओं को भी चालू रखना पड़ता है। गर्भवती महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और दूसरी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए नियमित स्वास्थ्य सेवाओं का बाधित होना अतिरिक्त जोखिम पैदा कर सकता है।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां बढ़ा रही हैं निगरानी

प्रकोप की शुरुआत के बाद से WHO, Africa CDC और दूसरे अंतरराष्ट्रीय साझेदार कांगो की सरकार के साथ मिलकर संक्रमण की निगरानी और नियंत्रण में सहयोग कर रहे हैं। WHO ने निगरानी, कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग, प्रयोगशाला जांच, मरीजों की देखभाल और समुदायों के साथ संवाद को मजबूत करने पर जोर दिया है। सीमापार संक्रमण की आशंका को देखते हुए पड़ोसी देशों में भी निगरानी बढ़ाई गई है।

मई में WHO ने इस प्रकोप को Public Health Emergency of International Concern यानी अंतरराष्ट्रीय चिंता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित किया था। इसके पीछे संक्रमण के तेजी से फैलने और कांगो से बाहर इसके पहुंचने की आशंका प्रमुख कारणों में शामिल थी। शुरुआती चरण में युगांडा में भी कांगो से जुड़े मामले सामने आए थे। एक अन्य संबंधित मामला बाद में फ्रांस में भी दर्ज किया गया था।

इतिहास के बड़े इबोला प्रकोपों से तुलना

मौजूदा प्रकोप की गति को समझने के लिए इसकी तुलना पिछले इबोला प्रकोपों से की जा रही है। CDC के विश्लेषण के अनुसार, 2026 के शुरुआती 100 दिनों में ही कांगो के इस प्रकोप में 5,458 पुष्ट मामले और 2,606 मौतें दर्ज की गई थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि शुरुआती 100 दिनों में मामलों की संख्या पिछले दो बड़े इबोला प्रकोपों की तुलना में बहुत अधिक थी।

अब मौतों की संख्या 4,000 से ऊपर पहुंच चुकी है और पुष्ट मामलों का आंकड़ा 8,300 पार कर गया है। इस वजह से यह कांगो के इतिहास का सबसे घातक इबोला प्रकोप बन गया है। 2018 से 2020 के दौरान देश में आए बड़े इबोला प्रकोप को भी इस बार के आंकड़ों ने पीछे छोड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसियां लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं क्योंकि संक्रमण की भौगोलिक सीमा बढ़ने पर इसे नियंत्रित करने में अधिक समय और संसाधन लग सकते हैं।

आगे की चुनौती क्या है?

फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती संक्रमण की रफ्तार को कम करने के साथ-साथ उन इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है जहां सुरक्षा, दूरी और स्थानीय परिस्थितियां मुश्किल पैदा कर रही हैं। नए मरीजों की जल्दी पहचान, संक्रमित लोगों के संपर्क में आए व्यक्तियों की निगरानी, सुरक्षित चिकित्सा व्यवस्था और स्थानीय समुदायों का सहयोग संक्रमण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

विशेषज्ञों और स्वास्थ्य एजेंसियों के लिए यह भी जरूरी है कि कुछ क्षेत्रों में मामलों में आई कमी को जल्दबाजी में प्रकोप के खत्म होने का संकेत न माना जाए। यदि स्वास्थ्य टीमें किसी प्रभावित क्षेत्र तक नहीं पहुंच पा रही हैं या वहां से सही आंकड़े नहीं मिल रहे हैं, तो आधिकारिक मामलों में गिरावट वास्तविक संक्रमण की तस्वीर नहीं दिखा सकती। यही वजह है कि WHO और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों की निगरानी लगातार जारी है।

कांगो में चल रहा यह प्रकोप फिलहाल एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बना हुआ है। 4,000 से अधिक मौतों और 8,300 से ज्यादा पुष्ट मामलों के साथ संक्रमण का पैमाना तेजी से बढ़ा है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में स्थिति में सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन नए इलाकों में संक्रमण का पहुंचना, स्वास्थ्य संसाधनों की कमी, सुरक्षा संबंधी समस्याएं और समुदायों के बीच भरोसे की कमी अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं। आने वाले समय में संक्रमण की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रभावित इलाकों में निगरानी, इलाज, संपर्कों की पहचान और समुदायों की भागीदारी कितनी प्रभावी तरीके से जारी रखी जाती है।