अमृतपाल की पार्टी को अब तक क्यों नहीं मिली चुनाव आयोग की मंजूरी? जानिए राजनीतिक दल के रजिस्ट्रेशन का पूरा नियम

अमृतपाल की पार्टी को अब तक क्यों नहीं मिली चुनाव आयोग की मंजूरी? जानिए राजनीतिक दल के रजिस्ट्रेशन का पूरा नियम

अमृतपाल सिंह से जुड़े संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ के राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण का मामला इन दिनों कानूनी चर्चा का विषय बना हुआ है। असम की जेल में बंद सांसद अमृतपाल सिंह पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की जा चुकी है और उन पर अलगाववादी गतिविधियों को समर्थन देने जैसे आरोप लगाए गए हैं। इसी बीच उनके संगठन ने राजनीतिक दल के रूप में अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए भारत निर्वाचन आयोग का दरवाजा खटखटाया था। संगठन की ओर से जनवरी 2025 में पंजीकरण के लिए आवेदन किए जाने की बात सामने आई है, लेकिन लंबे समय बाद भी इस आवेदन पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। देरी का मामला अब अदालत तक पहुंच चुका है और दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 4 नवंबर को होनी है।

लेकिन इस पूरे विवाद को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि भारत में किसी संगठन को राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत कराने की प्रक्रिया क्या होती है और निर्वाचन आयोग किन बातों की जांच करता है। साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि किसी संगठन का राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण हो जाना और उसे राज्य या राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता मिल जाना एक ही बात नहीं है।

राजनीतिक दल बनने के लिए सबसे पहले क्या करना पड़ता है?

भारत में किसी नए राजनीतिक संगठन को चुनावी राजनीति में औपचारिक पहचान हासिल करने के लिए निर्वाचन आयोग के पास पंजीकरण कराना होता है। इस पूरी व्यवस्था का कानूनी आधार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए में मिलता है। किसी संगठन का पंजीकरण अपने आप नहीं हो जाता, बल्कि उसे आयोग के सामने निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन करना पड़ता है।

पंजीकरण मिलने के बाद संगठन का नाम निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में राजनीतिक दल के तौर पर दर्ज हो जाता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं होता कि पार्टी उसी समय राज्य या राष्ट्रीय दल बन जाती है। नए पंजीकृत संगठन को शुरुआत में आम तौर पर पंजीकृत लेकिन अमान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की स्थिति मिलती है। इसके बाद चुनावों में उसका प्रदर्शन यह तय करता है कि वह राज्य या राष्ट्रीय पार्टी के लिए निर्धारित मानकों को पूरा करता है या नहीं।

यानी राजनीतिक दल के पंजीकरण और मान्यता को अलग-अलग चरणों के रूप में समझना होगा।

गठन के बाद कितने समय में देना होता है आवेदन?

किसी नए राजनीतिक दल के गठन के बाद पंजीकरण के लिए आवेदन करने की समय सीमा भी निर्धारित होती है। नियमों के अनुसार संगठन को गठन की तारीख से 30 दिनों के भीतर निर्वाचन आयोग के पास आवेदन करना होता है।

आवेदन में केवल पार्टी का नाम लिखकर जमा करना पर्याप्त नहीं होता। संगठन को अपने गठन से लेकर उसकी आंतरिक व्यवस्था तक कई तरह की जानकारियां आयोग को उपलब्ध करानी होती हैं। इसमें पार्टी का नाम, गठन की तारीख, मुख्यालय, पदाधिकारियों का विवरण और संगठन के काम करने का तरीका शामिल होता है।

इसके अलावा पार्टी का संविधान या नियमावली भी आवेदन के साथ देनी होती है। इस दस्तावेज में संगठन के उद्देश्य, सदस्यता लेने के नियम, संगठनात्मक ढांचा और विभिन्न पदों पर नियुक्ति या चुनाव की प्रक्रिया का उल्लेख होना जरूरी होता है। पार्टी के आंतरिक चुनाव कब होंगे और पदाधिकारियों का कार्यकाल कितना होगा, इसकी जानकारी भी नियमावली में स्पष्ट करनी होती है।

सौ सदस्यों का प्रमाण क्यों जरूरी होता है?

राजनीतिक दल के पंजीकरण के लिए आवेदन करते समय संगठन को अपने सदस्यों से संबंधित दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होते हैं। सामान्य तौर पर कम से कम 100 सदस्यों के मतदाता होने का प्रमाण देना होता है। इसके जरिए यह दिखाया जाता है कि संगठन वास्तविक सदस्यों के साथ राजनीतिक दल के रूप में काम करने की स्थिति में है।

सदस्यों से शपथपत्र भी लिए जाते हैं। इन शपथपत्रों में यह पुष्टि की जाती है कि संबंधित व्यक्ति किसी दूसरे पंजीकृत राजनीतिक दल का सदस्य नहीं है। पार्टी के अध्यक्ष या महासचिव को भी सदस्यों से जुड़ी जानकारी की सत्यता को लेकर घोषणा करनी होती है।

इसके साथ ही आवेदन के लिए निर्धारित शुल्क और निर्वाचन आयोग द्वारा मांगे गए अन्य दस्तावेज भी जमा करने पड़ते हैं। आयोग इन सभी कागजात की जांच करता है। अगर दस्तावेजों में कोई कमी मिलती है या किसी बिंदु पर अतिरिक्त जानकारी की जरूरत होती है, तो आयोग संगठन से स्पष्टीकरण या अतिरिक्त कागजात मांग सकता है।

पार्टी के संविधान में किन मूल्यों का उल्लेख होना चाहिए?

किसी राजनीतिक संगठन के लिए सिर्फ अपना आंतरिक संविधान तैयार करना ही पर्याप्त नहीं है। उसके संविधान में देश के संवैधानिक ढांचे के प्रति प्रतिबद्धता भी स्पष्ट करनी होती है।

पार्टी के संविधान में भारत के संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता तथा देश की एकता और अखंडता के प्रति निष्ठा की घोषणा शामिल होनी चाहिए। निर्वाचन आयोग आवेदन की जांच के दौरान इन प्रावधानों को भी देखता है।

इसलिए किसी संगठन का आवेदन केवल तकनीकी दस्तावेजों की जांच तक सीमित नहीं रहता। आयोग यह भी देखता है कि पार्टी के संविधान में जरूरी घोषणाएं और नियम मौजूद हैं या नहीं और आवेदन निर्धारित शर्तों के अनुरूप है या नहीं।

पार्टी के नाम पर किसी को आपत्ति हो तो क्या होगा?

राजनीतिक दल के पंजीकरण की प्रक्रिया में प्रस्तावित नाम भी महत्वपूर्ण होता है। आवेदन प्राप्त होने के बाद पार्टी के नाम को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसका उद्देश्य यह होता है कि अगर किसी व्यक्ति या संगठन को प्रस्तावित नाम को लेकर आपत्ति है, तो वह निर्धारित अवधि में निर्वाचन आयोग के सामने अपनी आपत्ति दर्ज करा सके।

इसके लिए प्रस्तावित नाम को अखबारों में प्रकाशित कराया जाता है। इसके बाद आने वाली आपत्तियों, पार्टी के दस्तावेजों और अन्य उपलब्ध जानकारी को आयोग देखता है। जरूरत पड़ने पर संबंधित संगठन से जवाब भी मांगा जा सकता है।

इसका अर्थ यह है कि आवेदन जमा कर देने के बाद पंजीकरण तत्काल स्वीकृत नहीं माना जाता। आयोग की ओर से जांच और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही इस पर फैसला होता है।

पंजीकरण मिलने के बाद पार्टी को क्या हासिल होता है?

निर्वाचन आयोग के पास पंजीकरण होने के बाद संगठन को आधिकारिक तौर पर राजनीतिक दल के रूप में दर्ज किया जाता है। इससे उसे चुनावी प्रक्रिया में एक औपचारिक पहचान मिलती है। चुनाव लड़ने के दौरान चुनाव चिह्न से संबंधित प्रक्रिया में भी पंजीकृत दल की स्थिति महत्वपूर्ण होती है।

हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। पंजीकृत राजनीतिक दल को अपने आप स्थायी आरक्षित चुनाव चिह्न नहीं मिल जाता। राज्य या राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता पाने के लिए चुनावों में निर्धारित वोट प्रतिशत, सीटों और अन्य प्रदर्शन संबंधी शर्तों को पूरा करना पड़ता है।

इसलिए किसी संगठन के लिए पंजीकरण पहला चरण है, जबकि चुनावी प्रदर्शन के आधार पर मान्यता हासिल करना अगला चरण होता है।

अब वारिस पंजाब दे के मामले में विवाद किस बात पर है?

इसी प्रक्रिया के बीच वारिस पंजाब दे का मामला सामने आता है। संगठन की ओर से जनवरी 2025 में निर्वाचन आयोग के पास राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन किए जाने की बात कही गई है। संगठन से जुड़े लोगों का कहना है कि आवेदन लंबे समय से लंबित है और उस पर अब तक अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

आवेदन पर निर्णय में हुई देरी को लेकर संगठन ने अदालत का रुख किया। इस मामले में 1 अक्टूबर 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया और उससे जवाब मांगा। रिपोर्ट के अनुसार आयोग को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए समय दिया गया है और मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर को तय की गई है।

इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर यह सवाल उठ रहा है कि आवेदन पर फैसला अब तक क्यों नहीं हुआ और आयोग को किन पहलुओं की जांच करनी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण हो गया?

इस मामले में एक अहम पहलू राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक निर्वाचन आयोग की ओर से अदालत के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंता का उल्लेख किया गया है। यही वजह है कि इस मामले को केवल सामान्य पंजीकरण प्रक्रिया के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा।

हालांकि, अदालत द्वारा आयोग को नोटिस जारी किए जाने का मतलब यह नहीं है कि संगठन का पंजीकरण मंजूर हो गया है। इसी तरह अभी यह कहना भी सही नहीं होगा कि आवेदन खारिज कर दिया गया है। फिलहाल मामला प्रक्रिया और न्यायिक सुनवाई के स्तर पर है और आयोग को अपनी स्थिति अदालत के सामने स्पष्ट करनी है।

4 नवंबर की सुनवाई में क्या हो सकता है?

अब इस मामले में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 4 नवंबर की सुनवाई होगी। अदालत आयोग के जवाब और आवेदन की स्थिति को देख सकती है। यह भी संभव है कि आयोग को किसी निश्चित समय सीमा के भीतर आवेदन पर फैसला लेने के लिए कहा जाए।

निर्वाचन आयोग के सामने कई विकल्प हो सकते हैं। वह उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों की समीक्षा करने के बाद आवेदन को मंजूरी दे सकता है। यदि उसे और जानकारी की जरूरत महसूस होती है तो संगठन से अतिरिक्त दस्तावेज या स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है। दूसरी स्थिति में आयोग नियमों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आवेदन को अस्वीकार भी कर सकता है, लेकिन ऐसी स्थिति में उसके निर्णय के पीछे कारण महत्वपूर्ण होंगे।

पंजीकरण के बाद भी आसान नहीं होगी राजनीतिक मान्यता

अगर वारिस पंजाब दे का आवेदन स्वीकार भी हो जाता है, तो इसका सीधा अर्थ यह नहीं होगा कि संगठन को राज्य या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाएगा। पंजीकरण के बाद उसे चुनावी मैदान में अपनी राजनीतिक ताकत साबित करनी होगी।

राज्य या राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए निर्वाचन आयोग के अलग-अलग प्रदर्शन आधारित मानदंड हैं। चुनावों में सीटों और वोट प्रतिशत से जुड़े निर्धारित नियम पूरे करने के बाद ही कोई पंजीकृत दल उस स्तर की मान्यता हासिल कर सकता है।

इसलिए वारिस पंजाब दे के सामने फिलहाल सबसे पहला सवाल राजनीतिक दल के रूप में पंजीकरण का है। उसके बाद ही चुनाव चिह्न, राज्य पार्टी या राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता जैसे मुद्दे आगे आएंगे।

कुल मिलाकर इस मामले में संगठन की ओर से पंजीकरण में देरी को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है, जबकि निर्वाचन आयोग ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का उल्लेख किया है। अब अदालत में आयोग का जवाब और उसके बाद लिया जाने वाला निर्णय यह स्पष्ट करेगा कि वारिस पंजाब दे के आवेदन का अगला रास्ता क्या होगा। फिलहाल अदालत का नोटिस केवल प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाला कदम है, इसे पंजीकरण की मंजूरी नहीं माना जा सकता।