शरीर में छिपे संक्रमण से कैंसर का खतरा, भारत में हर साल करीब 1.9 लाख नए मामले

शरीर में छिपे संक्रमण से कैंसर का खतरा, भारत में हर साल करीब 1.9 लाख नए मामले

कैंसर का नाम सामने आते ही आमतौर पर लोगों के दिमाग में तंबाकू, शराब, मोटापा, खराब खान-पान, प्रदूषण या पारिवारिक इतिहास जैसी वजहें आती हैं। हालांकि कैंसर के पीछे कुछ ऐसे कारण भी हो सकते हैं जिनका संबंध किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की आदतों से सीधे तौर पर नहीं होता। शरीर में लंबे समय तक मौजूद रहने वाले कुछ वायरस और बैक्टीरिया भी धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं, जिनसे कोशिकाओं में कैंसर विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। भारत को लेकर सामने आई एक वैश्विक मेडिकल रिसर्च ने इसी खतरे की गंभीर तस्वीर पेश की है। ‘द लैंसेट ऑन्कोलॉजी’ में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार, भारत में हर साल करीब 1.9 लाख नए कैंसर मामलों का संबंध ऐसे संक्रमणों से है जिन्हें काफी हद तक रोका या नियंत्रित किया जा सकता है।

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि संक्रमण से जुड़े कैंसर के कई कारणों की पहचान पहले से की जा चुकी है और उनमें से कुछ के खिलाफ वैक्सीन, जांच, इलाज तथा बचाव के प्रभावी उपाय उपलब्ध हैं। यानी समय रहते जागरूकता बढ़ाकर और जरूरी चिकित्सा कदम उठाकर कैंसर के एक हिस्से को रोकने की संभावना मौजूद है। विशेषज्ञों के लिए भी यह विषय इसलिए अहम है क्योंकि कई संक्रमण शुरुआत में सामान्य या मामूली बीमारी जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन यदि वे लंबे समय तक शरीर में बने रहें तो गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।

भारत में कैंसर के मामलों का कितना हिस्सा संक्रमण से जुड़ा?

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) से जुड़े शोधकर्ताओं ने अलग-अलग देशों में संक्रमण और कैंसर के बीच संबंध का अध्ययन किया। भारत के आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2024 में देश में 15.62 लाख से अधिक नए कैंसर मामलों का अनुमान दर्ज किया गया। इनमें लगभग 12 प्रतिशत से अधिक मामलों का संबंध ऐसे संक्रमणों से बताया गया जिन्हें कैंसर के जोखिम से जोड़ा गया है।

इसका सीधा मतलब यह है कि देश में कैंसर के कुल बोझ का एक उल्लेखनीय हिस्सा केवल आनुवंशिक कारणों या जीवनशैली से संबंधित नहीं है, बल्कि कुछ संक्रमण भी इसकी भूमिका निभा रहे हैं। रिपोर्ट के आंकड़े यह भी बताते हैं कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनियाभर में करीब 23 लाख कैंसर के मामले ऐसे संक्रमणों से जुड़े पाए गए, जो कुल कैंसर मामलों का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा है।

इन आंकड़ों ने कैंसर की रोकथाम को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है। यदि किसी संक्रमण की पहचान समय रहते की जा सकती है और उसके खिलाफ वैक्सीन या उपचार मौजूद है, तो ऐसे मामलों में रोकथाम की रणनीति को मजबूत करके कैंसर का खतरा कम किया जा सकता है।

HPV से जुड़े कैंसर का आंकड़ा सबसे ज्यादा

भारत में संक्रमण के कारण होने वाले कैंसर की बात करें तो ह्यूमन पेपिलोमावायरस यानी HPV सबसे प्रमुख कारणों में शामिल है। अध्ययन के मुताबिक देश में एक लाख से ज्यादा कैंसर के मामलों का संबंध HPV संक्रमण से है। यह वायरस खासतौर पर सर्वाइकल कैंसर के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है।

HPV एक आम वायरस है और इसके कई प्रकार होते हैं। इनमें से कुछ प्रकार शरीर में लंबे समय तक बने रह सकते हैं और असामान्य कोशिकीय बदलाव का कारण बन सकते हैं। लंबे समय तक संक्रमण रहने पर कुछ मामलों में यही बदलाव आगे चलकर कैंसर का रूप ले सकते हैं। महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।

हालांकि HPV से जुड़े कैंसर के मामले में एक बड़ी राहत यह है कि इससे बचाव के लिए वैक्सीन उपलब्ध है। इसके अलावा नियमित स्क्रीनिंग के जरिए गर्भाशय ग्रीवा में होने वाले शुरुआती बदलावों का पता लगाया जा सकता है। समय पर जांच और उपचार से गंभीर बीमारी बनने की संभावना को काफी कम किया जा सकता है। यही कारण है कि HPV के खिलाफ जागरूकता और टीकाकरण को कैंसर की रोकथाम की अहम रणनीति माना जाता है।

पेट के कैंसर से जुड़ा है H. pylori संक्रमण

संक्रमण और कैंसर के बीच संबंध का दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण हेलिकोबैक्टर पायलोरी यानी H. pylori बैक्टीरिया है। यह बैक्टीरिया पेट में संक्रमण पैदा कर सकता है और कई लोगों में लंबे समय तक मौजूद रह सकता है। भारत में इस संक्रमण से जुड़े करीब 47,000 कैंसर मामलों का अनुमान सामने आया है।

H. pylori का लंबे समय तक बना रहने वाला संक्रमण पेट की अंदरूनी परत में सूजन और अन्य बदलाव पैदा कर सकता है। कुछ परिस्थितियों में ये बदलाव आगे चलकर गैस्ट्रिक कैंसर के खतरे को बढ़ा सकते हैं। समस्या यह है कि कई लोगों में पेट से जुड़ा संक्रमण शुरुआती दौर में बहुत स्पष्ट लक्षण नहीं देता या उसके लक्षण सामान्य गैस, अपच और पेट की परेशानी जैसे दिखाई दे सकते हैं।

इसी वजह से लंबे समय से बनी पेट की समस्या को नजरअंदाज करना उचित नहीं माना जाता। डॉक्टर जरूरत के अनुसार जांच कराकर संक्रमण की पुष्टि कर सकते हैं और यदि H. pylori मौजूद हो तो उसके इलाज के लिए दवाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। संक्रमण का समय पर इलाज पेट से जुड़ी गंभीर जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

हेपेटाइटिस वायरस भी बढ़ा सकते हैं लिवर कैंसर का खतरा

संक्रमण से जुड़े कैंसर में लिवर भी एक महत्वपूर्ण अंग है। हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी वायरस लंबे समय तक लिवर को प्रभावित कर सकते हैं। लगातार रहने वाला संक्रमण लिवर में सूजन और क्षति पैदा कर सकता है और कुछ लोगों में वर्षों बाद लिवर कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

भारत में हेपेटाइटिस बी संक्रमण से जुड़े करीब 10,000 लिवर कैंसर मामलों और हेपेटाइटिस सी से जुड़े लगभग 5,300 मामलों का अनुमान लगाया गया है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि वायरल संक्रमणों की रोकथाम केवल संक्रमण को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भविष्य में कैंसर के खतरे को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

हेपेटाइटिस बी के खिलाफ वैक्सीन उपलब्ध है, जबकि हेपेटाइटिस सी का इलाज आधुनिक दवाओं से संभव है। ऐसे में संक्रमण की पहचान, चिकित्सकीय निगरानी और उचित उपचार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। जिन लोगों में लंबे समय से हेपेटाइटिस संक्रमण मौजूद है, उनमें डॉक्टर लिवर की स्थिति की निगरानी और आवश्यक जांच की सलाह दे सकते हैं।

Epstein-Barr वायरस से भी जुड़े हैं कैंसर के मामले

रिपोर्ट में एपस्टीन-बार वायरस यानी EBV का भी उल्लेख किया गया है। यह वायरस काफी आम है और बहुत से लोग जीवन में किसी न किसी समय इसके संपर्क में आ सकते हैं। हालांकि कुछ परिस्थितियों में यह वायरस कुछ विशेष प्रकार के कैंसर के विकास से जुड़ा पाया गया है।

भारत में EBV से जुड़े लगभग 22,000 कैंसर मामलों का अनुमान सामने आया है। यह संख्या इस बात को रेखांकित करती है कि कैंसर से जुड़े संक्रमणों का दायरा केवल HPV या हेपेटाइटिस वायरस तक सीमित नहीं है। अलग-अलग रोगजनक शरीर के अलग-अलग हिस्सों और कोशिकाओं को प्रभावित कर सकते हैं।

संक्रमण से कैंसर तक पहुंचने में लग सकते हैं कई साल

इन संक्रमणों से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संक्रमण होने और कैंसर विकसित होने के बीच अक्सर लंबा अंतराल हो सकता है। किसी वायरस या बैक्टीरिया की मौजूदगी का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को निश्चित रूप से कैंसर होगा। लेकिन कुछ संक्रमण यदि लंबे समय तक बने रहें, तो वे शरीर में लगातार सूजन, कोशिकीय बदलाव या डीएनए को नुकसान जैसी प्रक्रियाओं के जरिए कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

इसीलिए केवल संक्रमण का नाम सुनकर घबराने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना ज्यादा महत्वपूर्ण है। हर संक्रमण कैंसर में तब्दील नहीं होता और कैंसर का विकास कई अलग-अलग कारकों पर निर्भर करता है। व्यक्ति की उम्र, प्रतिरक्षा प्रणाली, संक्रमण की अवधि और अन्य स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां भी भूमिका निभा सकती हैं।

बचाव और समय पर जांच से कम किया जा सकता है खतरा

रिपोर्ट से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश यह है कि कैंसर की रोकथाम केवल जीवनशैली सुधारने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। तंबाकू और शराब से दूरी, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ-साथ संक्रमणों से बचाव भी कैंसर नियंत्रण की रणनीति का हिस्सा होना चाहिए।

HPV वैक्सीनेशन, हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए टीकाकरण, जोखिम वाले संक्रमणों की जांच और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार जैसे कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसके अलावा लगातार बने रहने वाले असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना भी जरूरी है।

भारत में कैंसर का बोझ पहले से ही बड़ा है। ऐसे में यदि लगभग 1.9 लाख नए मामले संक्रमणों से जुड़े हैं, तो रोकथाम योग्य कारणों पर ध्यान देना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। जागरूकता, टीकाकरण, शुरुआती जांच और समय पर इलाज के जरिए संक्रमण से जुड़े कैंसर के मामलों को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि किसी भी व्यक्ति के लिए संक्रमण का मतलब कैंसर होना नहीं है, लेकिन लंबे समय तक रहने वाले कुछ संक्रमणों को नजरअंदाज करना भविष्य में जोखिम बढ़ा सकता है।

(Photo : AI Generated)