शारदीय नवरात्रि का आगाज, पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना और कलश स्थापना; जानें शुभ-अशुभ समय, राहुकाल और पंचांग

शारदीय नवरात्रि का आगाज, पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना और कलश स्थापना; जानें शुभ-अशुभ समय, राहुकाल और पंचांग

शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है। अगले नौ दिनों तक देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की उपासना की जाएगी। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा का विशेष महत्व रहेगा। भक्त सुबह शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना करके देवी का आह्वान करेंगे और इसके साथ ही नौ दिनों तक चलने वाले व्रत, जप, तप तथा धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होगी। इस दिन घरों और मंदिरों में माता रानी की पूजा-अर्चना के साथ दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती और सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में सच्चे मन से मां दुर्गा की आराधना करने से सुख, समृद्धि और सकारात्मकता प्राप्त होती है।

पंचांग के मुताबिक, नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय निर्धारित है। यदि कोई भक्त सुबह के इस समय में घटस्थापना नहीं कर पाता है, तो उसके लिए अभिजीत मुहूर्त में भी कलश स्थापित करने का विकल्प रहेगा। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। पूजा शुरू करने से पहले घर के पूजा स्थल को स्वच्छ करना, चौकी सजाना और मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करना शुभ माना जाता है। इसके बाद विधि-विधान से कलश स्थापना करके देवी की पूजा की जाएगी।

पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा, जानें धार्मिक महत्व

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं में उन्हें शक्ति, धैर्य और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना गया है। मां शैलपुत्री की पूजा के साथ भक्त नवरात्रि के अनुष्ठान का संकल्प लेते हैं और परिवार की सुख-शांति तथा खुशहाली की कामना करते हैं।

पूजा के दौरान देवी को फूल, अक्षत, धूप, दीप और फल अर्पित किए जा सकते हैं। इसके बाद मां के मंत्रों का जाप और दुर्गा चालीसा का पाठ किया जा सकता है। जो श्रद्धालु विस्तृत धार्मिक अनुष्ठान करना चाहते हैं, वे अपनी परंपरा के अनुसार दुर्गा सप्तशती या सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं। पूजा के समय मन को शांत रखकर माता रानी का ध्यान करना और अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोग अर्पित करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

नवरात्रि के दौरान कई श्रद्धालु पहले दिन से ही नौ दिनों का व्रत रखते हैं, जबकि कुछ लोग पहले और अंतिम दिन उपवास करते हैं। व्रत रखने का तरीका व्यक्ति की आस्था, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। पूजा-पाठ के साथ संयम, सेवा और जरूरतमंद लोगों की सहायता को भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

कलश स्थापना के लिए कौन-सा समय रहेगा शुभ?

नवरात्रि की शुरुआत में घटस्थापना को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, कलश को देवी शक्ति का प्रतीक मानकर स्थापित किया जाता है। कलश स्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को साफ करके चौकी पर लाल या अन्य शुभ वस्त्र बिछाया जाता है। इसके बाद निर्धारित विधि के अनुसार मिट्टी के पात्र में जौ बोए जा सकते हैं और जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। पूजा सामग्री में रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और फल आदि शामिल किए जा सकते हैं।

आज कलश स्थापना का पहला शुभ समय सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक रहेगा। इसके बाद अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक है। श्रद्धालु अपनी सुविधा और स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार इनमें से उपयुक्त समय चुन सकते हैं।

कलश स्थापना के बाद मां दुर्गा की विधिवत पूजा की जाएगी। कई घरों में अखंड ज्योति प्रज्वलित करने की परंपरा भी है। मान्यता के अनुसार, यह ज्योति पूरे नौ दिनों तक जलती रहती है। यदि अखंड ज्योति जलाई जाए, तो उसे सुरक्षित स्थान पर रखना और आग से बचाव के जरूरी इंतजाम करना आवश्यक है। दीपक को ऐसी जगह रखें जहां हवा, पर्दे या अन्य ज्वलनशील वस्तुओं से आग लगने का खतरा न हो।

नवरात्रि में हाथी पर माता के आगमन की मान्यता

इस बार नवरात्रि के पहले दिन माता रानी के हाथी पर आगमन की मान्यता बताई जा रही है। धार्मिक परंपराओं में देवी के आगमन के वाहन को अलग-अलग संकेतों से जोड़कर देखा जाता है। हाथी को सुख, समृद्धि, शांति और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से माता के हाथी पर आगमन को शुभ संकेत के रूप में देखा जाता है।

हालांकि, देवी के वाहन से जुड़ी मान्यताएं पारंपरिक धार्मिक व्याख्याओं का हिस्सा हैं। इन्हें आस्था के नजरिए से समझा जाता है। नवरात्रि का मुख्य उद्देश्य देवी शक्ति की उपासना, आत्मसंयम और सकारात्मक जीवन मूल्यों को अपनाना है। इन नौ दिनों में भक्त पूजा-पाठ के साथ अपने परिवार की खुशहाली और समाज के कल्याण की प्रार्थना भी करेंगे।

रविवार व्रत का भी रहेगा संयोग, सूर्य देव को दें अर्घ्य

नवरात्रि के पहले दिन रविवार होने के कारण सूर्य देव की पूजा का भी विशेष संयोग रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रविवार का व्रत सूर्य देव को समर्पित होता है। इस दिन सुबह सूर्योदय के समय सूर्य को जल अर्पित करने और उनकी उपासना करने की परंपरा है। श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-शांति, अच्छे स्वास्थ्य और जीवन में उन्नति की कामना कर सकते हैं।

रविवार व्रत रखने वाले लोग अपनी परंपरा के अनुसार उपवास और पूजा करते हैं। कुछ लोग इस दिन नमक का सेवन नहीं करते और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। गेहूं, तांबा, लाल वस्त्र, लाल चंदन और लाल रंग के फल आदि का दान भी सूर्य पूजा से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में शामिल है। मान्यता है कि सूर्य देव की आराधना से आत्मविश्वास और कार्यक्षमता में वृद्धि की कामना की जाती है।

ज्योतिषीय मान्यताओं में सूर्य को आत्मबल, प्रतिष्ठा और करियर से जोड़ा जाता है। इसी कारण रविवार को सूर्य पूजा और दान करने का विधान बताया गया है। हालांकि, उपवास करते समय अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिए। किसी स्वास्थ्य समस्या या चिकित्सकीय सलाह के कारण भोजन करना जरूरी हो, तो कठोर उपवास से बचना उचित रहेगा।

रात में बनेगा द्विपुष्कर योग, जानें समय

आज के पंचांग में द्विपुष्कर योग का भी उल्लेख है। यह योग रात 9 बजकर 30 मिनट से 10 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं में द्विपुष्कर योग को कुछ शुभ कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, किसी विशेष कार्य के लिए योग की उपयुक्तता व्यक्ति की परंपरा और कार्य की प्रकृति के अनुसार देखी जा सकती है।

इसके अलावा आज अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। विजय मुहूर्त दोपहर 2:04 बजे से 2:50 बजे तक और अमृत काल दोपहर 3:55 बजे से शाम 5:34 बजे तक रहेगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:40 बजे से 5:30 बजे तक निर्धारित है। निशिता मुहूर्त रात 11:43 बजे से 12:33 बजे तक रहेगा, जिसमें आधी रात के बाद का समय 12 अक्टूबर में आएगा।

11 अक्टूबर का पंचांग: तिथि, नक्षत्र और चंद्र राशि

आज आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि रात 9:30 बजे तक रहेगी। इसके बाद द्वितीया तिथि शुरू हो जाएगी। नवरात्रि के पहले दिन प्रतिपदा का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी तिथि से शारदीय नवरात्रि के नौ दिवसीय पूजन की शुरुआत होती है।

आज चित्रा नक्षत्र रात 10:32 बजे तक रहेगा। इसके बाद स्वाति नक्षत्र शुरू होगा। करण की बात करें तो किंस्तुघ्न करण सुबह 9:21 बजे तक रहेगा। इसके बाद बव करण रात 9:30 बजे तक प्रभावी रहेगा और फिर बालव करण शुरू होगा। आज वैधृति योग रात 9:05 बजे तक रहेगा, जिसके बाद विष्कम्भ योग लगेगा।

चंद्रमा सुबह 10:04 बजे तक कन्या राशि में रहेगा। इसके बाद चंद्रमा तुला राशि में प्रवेश करेगा। आज का पक्ष शुक्ल है और दिन रविवार रहेगा। पंचांग के इन विवरणों के आधार पर श्रद्धालु पूजा, व्रत और अन्य धार्मिक गतिविधियों का समय तय कर सकते हैं।

सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रमा निकलने का समय

आज सूर्योदय सुबह 6:19 बजे होगा, जबकि सूर्यास्त शाम 5:56 बजे निर्धारित है। चंद्रोदय सुबह 6:52 बजे और चंद्रास्त शाम 6:02 बजे बताया गया है। स्थानीय परिस्थितियों के कारण वास्तविक समय में थोड़ा अंतर संभव है।

दिन और रात के शुभ चौघड़िया मुहूर्त

दिन के चौघड़िया मुहूर्त में चर-सामान्य का समय सुबह 7:46 बजे से 9:13 बजे तक रहेगा। लाभ-उन्नति मुहूर्त सुबह 9:13 बजे से 10:41 बजे तक और अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह 10:41 बजे से दोपहर 12:08 बजे तक रहेगा। शुभ-उत्तम चौघड़िया दोपहर 1:35 बजे से 3:02 बजे तक निर्धारित है।

रात में शुभ-उत्तम मुहूर्त शाम 5:56 बजे से 7:29 बजे तक और अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त शाम 7:29 बजे से रात 9:02 बजे तक रहेगा। चर-सामान्य चौघड़िया रात 9:02 बजे से 10:35 बजे तक है। इसके बाद अगली तारीख में लाभ-उन्नति मुहूर्त रात 1:41 बजे से 3:14 बजे तक और शुभ-उत्तम मुहूर्त सुबह 4:47 बजे से 6:20 बजे तक रहेगा।

राहुकाल और अन्य अशुभ समय

पंचांग के अनुसार, आज राहुकाल शाम 4:29 बजे से 5:56 बजे तक रहेगा। गुलिक काल दोपहर 3:02 बजे से शाम 4:29 बजे तक और यमगण्ड दोपहर 12:08 बजे से 1:35 बजे तक निर्धारित है। दुर्मुहूर्त शाम 4:23 बजे से 5:09 बजे तक रहेगा। आज पश्चिम दिशा में दिशाशूल बताया गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राहुकाल और अन्य अशुभ समय में महत्वपूर्ण शुभ कार्य शुरू करने से परहेज किया जाता है। हालांकि, दैनिक पूजा और नियमित धार्मिक गतिविधियां श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार कर सकते हैं।

आज का शिववास

आज शिववास से जुड़ी पंचांग गणना के अनुसार, रात 9:30 बजे तक शिवजी का वास श्मशान में बताया गया है। इसके बाद उनका वास गौरी के साथ रहेगा। धार्मिक परंपराओं में शिववास की गणना कुछ विशेष पूजा-अनुष्ठानों के लिए देखी जाती है।

कुल मिलाकर, नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की आराधना, कलश स्थापना और नौ दिवसीय साधना की शुरुआत के साथ रविवार व्रत का भी संयोग रहेगा। श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में पूजा करके माता रानी का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करेंगे। पूजा के दौरान अपनी पारिवारिक परंपराओं का पालन करने के साथ स्वच्छता, संयम और सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है।