इजराइल में आगामी संसदीय चुनाव से पहले राजनीतिक मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को लेकर मतदाताओं के बीच समर्थन बंटा हुआ दिखाई दे रहा है। चुनाव से पहले सामने आए चार प्रमुख सर्वेक्षणों में से दो में विपक्षी गठबंधन को बढ़त मिलने का अनुमान है, जबकि एक सर्वे में दोनों पक्ष लगभग बराबरी पर हैं। एक अन्य सर्वे में नेतन्याहू के खेमे को आगे बताया गया है। इन नतीजों से संकेत मिलता है कि चुनाव में किसी एक पक्ष के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना आसान नहीं होगा। हालांकि, सर्वेक्षणों के अनुमान अंतिम चुनाव परिणाम नहीं होते और मतदान के दौरान मतदाताओं की पसंद बदल भी सकती है।
इजराइल की संसद, जिसे नेसेट कहा जाता है, में कुल 120 सदस्य होते हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना पड़ता है। मौजूदा चुनावी अनुमानों में किसी भी खेमे को इस आंकड़े तक पहुंचता हुआ नहीं दिखाया गया है। ऐसी स्थिति में चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए छोटे राजनीतिक दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है। नतीजों के बाद गठबंधन की बातचीत, अलग-अलग दलों की शर्तें और संभावित सहयोगियों का रुख यह तय कर सकते हैं कि देश की कमान एक बार फिर नेतन्याहू के हाथों में जाएगी या विपक्ष कोई नया राजनीतिक समीकरण बनाने में सफल होगा।
चुनाव में सुरक्षा, नेतृत्व और जवाबदेही सबसे बड़े सवाल
इस चुनाव की पृष्ठभूमि में 7 अक्टूबर 2023 को हमास की ओर से किया गया हमला एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। उस हमले में लगभग 1,200 लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद इजराइल ने गाजा में व्यापक सैन्य अभियान चलाया, जिसमें बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी मारे गए। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, गाजा में मरने वाले फिलिस्तीनियों की संख्या 74 हजार से अधिक हो चुकी है। इस लंबे संघर्ष ने इजराइल की सुरक्षा नीति, सरकार की तैयारियों और सैन्य कार्रवाई के नतीजों को लेकर देश के भीतर बहस तेज कर दी है।
मतदाताओं के सामने एक तरफ देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हमास के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रखने का सवाल है, तो दूसरी ओर यह मांग भी उठ रही है कि 2023 के हमले के लिए सरकार की जिम्मेदारी तय की जाए। नेतन्याहू के आलोचकों का कहना है कि इतने बड़े हमले के बाद नेतृत्व को जवाब देना चाहिए। वहीं, उनके समर्थक उन्हें अनुभवी नेता मानते हैं और चाहते हैं कि वे अपनी नीतियों को आगे बढ़ाएं। यही विरोधाभास चुनावी मुकाबले को जटिल बना रहा है।
बाजारों और सड़कों पर भी नजर आ रहा मतभेद
येरुशलम के महाने येहुदा बाजार में चुनावी पोस्टरों के बीच लोगों की राय एक जैसी नहीं है। 76 वर्षीय फल विक्रेता अब्राहम लेवी को विश्वास है कि नेतन्याहू एक बार फिर सरकार बनाने में कामयाब होंगे। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री को अपना अधूरा काम पूरा करने का अवसर मिलना चाहिए। लेवी जैसे मतदाता नेतृत्व में निरंतरता को अहम मानते हैं और बदलाव के बजाय मौजूदा प्रधानमंत्री पर भरोसा जताने के पक्ष में हैं।
लेकिन येरुशलम की जाफा स्ट्रीट पर दुकानदार इल्डा की सोच इससे अलग है। उनका मानना है कि हमास के हमले के बाद नेतन्याहू को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। तेल अवीव के जाफा इलाके में रहने वाले तुर्गेमान भी राजनीतिक बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं। उन्होंने गादी आइजनकोट का समर्थन करने की बात कही है। इस तरह अलग-अलग इलाकों में मतदाताओं की प्राथमिकताएं स्पष्ट करती हैं कि चुनाव केवल राजनीतिक दलों की लोकप्रियता का मुकाबला नहीं है, बल्कि सरकार के पिछले फैसलों और भविष्य की दिशा पर जनमत का परीक्षण भी है।
नेतन्याहू के समर्थकों के लिए अनुभव और सुरक्षा का मुद्दा महत्वपूर्ण है, जबकि विरोधियों के लिए जवाबदेही और नए नेतृत्व की जरूरत प्रमुख है। हालांकि, कुछ मतदाताओं की राय पूरे देश के रुझान का प्रतिनिधित्व नहीं करती। चुनावी तस्वीर समझने के लिए सर्वेक्षणों, मतदान के वास्तविक नतीजों और गठबंधन की संभावनाओं को एक साथ देखना जरूरी होगा।
हमले में परिवार खोने वालों की राय भी एक जैसी नहीं
7 अक्टूबर के हमले में अपने प्रियजनों को खोने वाले परिवारों के बीच भी राजनीतिक पसंद को लेकर मतभेद हैं। किबुत्ज बेरी की मेराव के माता-पिता की मौत हमले के दौरान हुई थी। उनका मानना है कि जिस सरकार के कार्यकाल में देश को इतनी बड़ी त्रासदी का सामना करना पड़ा, उसे फिर से सत्ता सौंपना उचित नहीं होगा। उनके लिए चुनाव का सवाल केवल राजनीतिक नेतृत्व का नहीं, बल्कि उस सुरक्षा व्यवस्था की जवाबदेही का भी है जो हमले को रोकने में नाकाम रही।
दूसरी ओर, नेतन्याहू की लिकुड पार्टी की उम्मीदवार तालिक मजबूत नेतृत्व की जरूरत पर जोर देती हैं। इससे पता चलता है कि हमले से प्रभावित परिवारों और लोगों के अनुभव एक जैसे होने के बावजूद उनके राजनीतिक निष्कर्ष अलग हो सकते हैं। कुछ लोग मौजूदा नेतृत्व को जिम्मेदार मानते हैं, जबकि कुछ के लिए सुरक्षा और स्थिरता की जरूरत अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए पीड़ित परिवारों के बीच मौजूद मतभेद को भी चुनावी बहस का एक अहम पहलू माना जा रहा है।
फिलिस्तीन के भविष्य पर बड़े दलों के रुख में सीमित अंतर
इजराइल के चुनाव में फिलिस्तीन को अलग देश बनाने का विचार प्रमुख यहूदी राजनीतिक दलों की बहस में उतनी प्रमुखता से सामने नहीं आ रहा, जितनी सुरक्षा और नेतृत्व के सवालों को मिल रही है। प्रधानमंत्री नेतन्याहू फिलिस्तीनी क्षेत्रों में इजराइल का सुरक्षा नियंत्रण बनाए रखने के पक्षधर रहे हैं। दूसरी तरफ, उनका विरोध करने वाले कई दल भी राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में सख्त रुख अपनाते हैं। इसका अर्थ है कि नेतन्याहू को हटाने की मांग करने वाले सभी राजनीतिक समूह फिलिस्तीन के मुद्दे पर उनसे पूरी तरह अलग नीति नहीं रखते।
दो राष्ट्र समाधान के तहत इजराइल और फिलिस्तीन को दो अलग-अलग देशों के रूप में स्थापित करने की व्यवस्था की बात की जाती है। उपलब्ध सर्वेक्षण संबंधी आंकड़ों के अनुसार, विपक्षी मतदाताओं में 36 प्रतिशत और अरब नागरिकों में 57 प्रतिशत लोग इस समाधान का समर्थन करते हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि इस विषय पर अलग-अलग मतदाता समूहों की सोच में अंतर है। हालांकि, दो राष्ट्र समाधान को लेकर समर्थन अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित मतदाता किसी खास पार्टी को ही वोट देंगे।
फिलिस्तीन के भविष्य पर राजनीतिक बहस के सीमित दायरे का असर चुनाव के बाद बनने वाली सरकार की नीतियों पर भी पड़ सकता है। अगर विपक्ष सत्ता में आता है, तो भी सुरक्षा व्यवस्था और फिलिस्तीनी क्षेत्रों के संबंध में बड़े नीतिगत बदलाव कितने संभव होंगे, यह उसके सहयोगियों और सरकार के साझा कार्यक्रम पर निर्भर करेगा।
छोटे दलों के समर्थन से खुल सकता है सत्ता का रास्ता
सर्वेक्षणों में किसी भी खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने का अनुमान सरकार गठन को लेकर अनिश्चितता बढ़ाता है। इजराइल की गठबंधन आधारित संसदीय राजनीति में छोटी पार्टियां कई बार निर्णायक भूमिका निभाती हैं। यदि बड़े गठबंधन बहुमत के आंकड़े से पीछे रह जाते हैं, तो उन्हें अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटाने के लिए बातचीत करनी पड़ सकती है। ऐसे में छोटे दल अपनी मांगों और नीतिगत प्राथमिकताओं को सरकार गठन की चर्चा में प्रमुखता से रख सकते हैं।
उपलब्ध चुनावी अनुमानों में कुछ छोटे दलों को कुल मिलाकर महत्वपूर्ण संख्या में सीटें मिलने की संभावना जताई गई है। इनमें राम पार्टी को पांच सीटें, संयुक्त अरब सूची को सात से नौ सीटें, ओफर विंटर की पार्टी को पांच सीटें और हेंडेल-जेलखा समूह को चार सीटें मिलने का अनुमान बताया गया है। हालांकि, इन आंकड़ों को सावधानी से देखना जरूरी है, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि सभी अनुमान एक ही सर्वेक्षण से लिए गए हैं या अलग-अलग सर्वेक्षणों से। अंतिम परिणाम में सीटों की संख्या बदल सकती है।
अरब दलों और अन्य छोटे राजनीतिक समूहों का समर्थन किस पक्ष को मिलता है, यह चुनाव के बाद की बातचीत में निर्णायक साबित हो सकता है। फिर भी, केवल सीटों की अनुमानित संख्या से यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई दल किस गठबंधन के साथ जाएगा। उसके राजनीतिक रुख, नेतृत्व के फैसले और संभावित सहयोगियों के साथ सहमति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
भ्रष्टाचार के मुकदमे ने बढ़ाई नेतन्याहू की राजनीतिक मुश्किल
चुनावी चुनौती के बीच नेतन्याहू को लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार के मुकदमे का भी सामना करना पड़ रहा है। 11 अक्टूबर को वे इस मामले की सुनवाई के लिए अदालत में पेश हुए। इस दौरान इजराइल के पूर्व अटॉर्नी जनरल अविचाई मंडेलब्लिट ने गवाही दी। मंडेलब्लिट ने ही 2019 में नेतन्याहू के खिलाफ मुकदमा चलाने का फैसला किया था। उनकी गवाही में पुलिस जांच और नेतन्याहू के तत्कालीन चीफ ऑफ स्टाफ के फोन टैप किए जाने से जुड़े मुद्दे सामने आए।
मंडेलब्लिट ने अदालत को बताया कि उनकी अनुमति के बिना नेतन्याहू के तत्कालीन चीफ ऑफ स्टाफ का फोन टैप किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि एक समय उन्हें संदेह हुआ था कि पुलिस किसी दूसरे व्यक्ति के निर्देश पर काम कर रही है। इन बयानों का महत्व मुकदमे की जांच प्रक्रिया और उससे जुड़े विवादों के संदर्भ में है। हालांकि, गवाही में सामने आए किसी एक बयान को अपने आप में आरोपों के सही या गलत होने का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसका आकलन अदालत में पेश किए गए पूरे साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किया जाएगा।
क्या हैं प्रधानमंत्री पर लगे आरोप?
नेतन्याहू पर कारोबारियों से महंगे उपहार लेने और मीडिया संस्थानों को लाभ पहुंचाने के बदले अपने पक्ष में खबरें प्रकाशित करवाने जैसे आरोप लगाए गए हैं। उनके खिलाफ रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी और विश्वासघात से जुड़े आरोपों में 2019 में मुकदमा शुरू हुआ था। प्रधानमंत्री लगातार इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं और मामला अदालत में विचाराधीन है। इसलिए उन्हें दोषी ठहराया गया है, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
भ्रष्टाचार का यह मुकदमा चुनावी माहौल में उनके विरोधियों के लिए सरकार की कार्यशैली और जवाबदेही पर सवाल उठाने का आधार बन सकता है। वहीं, नेतन्याहू के समर्थक इसे कानूनी प्रक्रिया के तहत चल रहा मामला मानते हुए उनके नेतृत्व और नीतियों को अलग नजरिए से देखते हैं।
कुल मिलाकर, इजराइल का आगामी चुनाव कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। सुरक्षा और हमास के हमले की जवाबदेही, नेतन्याहू के नेतृत्व पर भरोसा, भ्रष्टाचार का मुकदमा और फिलिस्तीन के भविष्य पर मतभेद—ये सभी मुद्दे मतदाताओं की पसंद को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल सर्वेक्षण किसी एक खेमे की निर्णायक जीत का संकेत नहीं दे रहे। ऐसे में चुनाव के बाद छोटे दलों की भूमिका, गठबंधन की बातचीत और 120 सदस्यीय संसद में बहुमत जुटाने की क्षमता ही तय करेगी कि इजराइल में अगली सरकार किसकी बनेगी।




