मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की नाराजगी अब कानूनी लड़ाई का रूप लेती दिखाई दे रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी के बीच देश की सर्वोच्च अदालत में याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया चर्चा में आ गई है। विपक्षी सांसदों ने अपनी मांगें चीफ जस्टिस सूर्यकांत के सामने रखने के लिए उनसे मुलाकात करने की योजना बनाई थी, लेकिन उन्हें मिलने का समय नहीं मिला। इसके बजाय उन्हें अपनी शिकायतें औपचारिक कानूनी प्रक्रिया के जरिए अदालत के सामने रखने का रास्ता अपनाने को कहा गया। इसके बाद राहुल गांधी ने भी सुप्रीम कोर्ट जाने और याचिका दायर करने की बात कही।
इस घटनाक्रम ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या कोई सांसद बिना वकील के सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है? क्या राहुल गांधी खुद अदालत में अपनी दलीलें रख सकते हैं? क्या हर नागरिक को देश की सर्वोच्च अदालत में सीधे जाने का अधिकार है? याचिका दाखिल करने के बाद उस पर सुनवाई कैसे होती है और पहले से चल रहे मामलों पर इसका क्या असर पड़ सकता है? इन सवालों को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र और वहां लागू प्रक्रियागत नियमों को जानना जरूरी है।
पहले से लंबित मामलों के बीच नई याचिका का क्या होगा?
चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त से जुड़े विवादों में यदि कोई नई याचिका सुप्रीम कोर्ट पहुंचती है, तो अदालत यह जांच सकती है कि उसमें उठाए गए मुद्दे पहले से विचाराधीन मामलों से संबंधित हैं या नहीं। कई बार अलग-अलग याचिकाकर्ता एक ही फैसले, प्रक्रिया या संवैधानिक सवाल को चुनौती देते हैं। ऐसी स्थिति में अदालत के सामने एक जैसे मुद्दों पर अलग-अलग सुनवाई करने के बजाय उन्हें साथ सुनने का विकल्प हो सकता है।
हालांकि, किसी नई याचिका का पुराने मामले के साथ जुड़ना अपने आप तय नहीं हो जाता। न्यायालय को यह देखना होता है कि दोनों मामलों के तथ्य, कानूनी सवाल और मांगी गई राहत कितनी समान हैं। यदि अदालत को लगता है कि मामलों को साथ सुनना उचित होगा, तो वह उसी अनुसार निर्देश दे सकती है। दूसरी ओर, केवल एक ही विषय से संबंधित होने के कारण दो याचिकाओं का एक साथ सुना जाना अनिवार्य नहीं है।
राहुल गांधी या विपक्ष के किसी अन्य नेता की ओर से याचिका दायर किए जाने की स्थिति में भी यही प्रक्रिया लागू होगी। पहले याचिका का निर्धारित नियमों के अनुसार दाखिल होना जरूरी है। इसके बाद उसकी प्रक्रियागत जांच और सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी होंगी। अंतिम फैसला अदालत के अधिकार क्षेत्र और मामले की परिस्थितियों के आधार पर होगा।
सुप्रीम कोर्ट में सीधे पहुंचने का अधिकार सभी मामलों में नहीं
देश की सर्वोच्च अदालत में याचिका दाखिल करने के लिए केवल शिकायत होना पर्याप्त नहीं है। यह देखना पड़ता है कि विवाद किस तरह का है, याचिकाकर्ता का उससे क्या संबंध है और संविधान या कानून के तहत अदालत से किस प्रकार की राहत मांगी जा सकती है। हर मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता उपलब्ध नहीं होता।
संविधान का अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देता है। इसके तहत अदालत से उचित रिट या अन्य संवैधानिक राहत मांगी जा सकती है। लेकिन याचिका में मौलिक अधिकारों से संबंधित कानूनी आधार स्पष्ट होना चाहिए। केवल किसी सरकारी संस्था या संवैधानिक पदाधिकारी के कामकाज से असहमति जताने भर से अनुच्छेद 32 के तहत राहत मिलना तय नहीं हो जाता।
इसके अलावा, हाईकोर्ट के किसी फैसले को चुनौती देने के लिए परिस्थितियों के अनुसार अपील या विशेष अनुमति याचिका यानी एसएलपी का रास्ता अपनाया जा सकता है। विशेष अनुमति याचिका संविधान के अनुच्छेद 136 से जुड़ी है। इसके माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से किसी फैसले या आदेश के खिलाफ अपील करने की अनुमति मांगी जाती है। यह अनुमति मिलना स्वतःसिद्ध अधिकार नहीं है; अदालत मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं को देखकर निर्णय करती है।
कुछ मामलों में संविधान की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आ सकते हैं। ऐसे मामलों में यह जरूरी है कि याचिका सही कानूनी आधार पर तैयार की जाए और उसमें अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट किया जाए।
याचिका तैयार करने से लेकर रजिस्ट्री तक की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट में मामला ले जाने से पहले याचिका का प्रारूप तैयार किया जाता है। इसमें पूरे विवाद की पृष्ठभूमि, घटनाओं का क्रम, संबंधित तथ्यों और कानूनी तर्कों का उल्लेख होना चाहिए। याचिकाकर्ता को यह भी स्पष्ट करना होता है कि वह अदालत से क्या आदेश चाहता है और उस राहत के लिए उसके पास क्या आधार हैं।
याचिका के साथ मामले के अनुरूप जरूरी दस्तावेज भी लगाए जाते हैं। इनमें संबंधित आदेशों की प्रतियां, जरूरी रिकॉर्ड, हलफनामा और अन्य सहायक सामग्री शामिल हो सकती है। दस्तावेजों की जरूरत इस बात पर निर्भर करती है कि मामला किस प्रकृति का है और किस तरह की राहत मांगी जा रही है। यदि याचिका में कई आरोप या कानूनी दावे किए गए हैं, तो उनके समर्थन में उपलब्ध सामग्री का उल्लेख महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसके बाद याचिका सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में निर्धारित प्रक्रिया के तहत दाखिल की जाती है। अदालत की ई-फाइलिंग व्यवस्था का इस्तेमाल भी लागू नियमों के अनुसार किया जा सकता है। रजिस्ट्री यह जांचती है कि दस्तावेजों का प्रारूप, जरूरी जानकारियां, संलग्नक और अन्य प्रक्रियागत आवश्यकताएं पूरी की गई हैं या नहीं।
यदि दस्तावेजों में कोई कमी मिलती है, तो उसे निर्धारित तरीके से दूर करना पड़ सकता है। इसके बाद मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किए जाने की प्रक्रिया में आगे बढ़ता है। याचिका दाखिल कर देना और उस पर अदालत में सुनवाई शुरू हो जाना दो अलग-अलग चरण हैं। किसी याचिका को दाखिल करने के बाद भी सुनवाई की तारीख और आगे की कार्यवाही अदालत की प्रक्रिया के अनुसार तय होती है।
एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड की भूमिका क्यों है महत्वपूर्ण?
सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के लिए भी विशेष प्रक्रियागत नियम निर्धारित हैं। यहां एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड यानी एओआर की भूमिका अहम होती है। एओआर वह अधिवक्ता होता है जो निर्धारित योग्यता और प्रक्रिया पूरी करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में इस हैसियत से काम करने के लिए अधिकृत होता है।
सामान्य तौर पर किसी पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने और मामले से जुड़े प्रक्रियागत कामकाज को आगे बढ़ाने में एओआर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह याचिका और संबंधित दस्तावेजों को नियमों के अनुरूप प्रस्तुत करने, रजिस्ट्री की आपत्तियों का जवाब देने और मामले की कार्यवाही को आगे बढ़ाने में मदद करता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति को अपने मामले में अनिवार्य रूप से सामान्य वकील की सेवाएं ही लेनी होंगी। सुप्रीम कोर्ट के नियमों में स्वयं अपना पक्ष रखने वाले व्यक्ति के लिए भी व्यवस्था है। हालांकि, अदालत में खुद उपस्थित होने और अपना मामला खुद प्रस्तुत करने की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को लागू प्रक्रियाओं का पालन करना होता है। इसीलिए याचिका के कागजात तैयार करना, उन्हें औपचारिक रूप से दाखिल करना और अदालत में स्वयं बहस करना अलग-अलग पहलू हैं।
क्या राहुल गांधी खुद याचिका दाखिल कर सकते हैं?
कानूनी प्रक्रिया में पार्टी-इन-पर्सन का विकल्प मौजूद है। इसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति निर्धारित शर्तों के अधीन अपने मामले में खुद अदालत के सामने उपस्थित होकर अपना पक्ष रख सकता है। इस लिहाज से राहुल गांधी भी, यदि किसी मामले में स्वयं याचिकाकर्ता बनते हैं, तो लागू नियमों के तहत अपने मामले की पैरवी करने का विकल्प अपना सकते हैं।
लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष या सांसद होने के कारण उन्हें सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया से कोई अलग छूट नहीं मिलती। अदालत में मामला पेश करने के लिए उन्हें भी अन्य याचिकाकर्ताओं की तरह कानूनी आधार और प्रक्रियागत शर्तों को पूरा करना होगा। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति का किसी मुद्दे पर राजनीतिक विरोध करना और उस मुद्दे को चुनौती देने के लिए कानूनी रूप से उपयुक्त याचिका दाखिल करना अलग बातें हैं।
सुप्रीम कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर बहस करने के लिए संबंधित व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अनुमति मांगनी पड़ सकती है। इसमें उसे अदालत को बताना होता है कि वह खुद अपना मामला क्यों रखना चाहता है और क्या अदालत की ओर से वकील उपलब्ध कराए जाने पर वह उसकी सहायता स्वीकार करेगा। अदालत नियमों और परिस्थितियों को देखते हुए इस अनुरोध पर निर्णय करती है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि राहुल गांधी केवल याचिका पर हस्ताक्षर करके बिना किसी अन्य औपचारिकता के हर स्थिति में खुद बहस कर सकते हैं। उन्हें पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि याचिका उचित कानूनी आधार पर तैयार हुई है और उसे दाखिल करने तथा स्वयं पेश होने से संबंधित लागू नियमों का पालन किया गया है।
विपक्ष की मांगों पर अदालत कैसे करेगी विचार?
यदि विपक्षी नेता चुनाव आयोग या मुख्य निर्वाचन आयुक्त से संबंधित मुद्दों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दाखिल करते हैं, तो अदालत सबसे पहले मामले की प्रकृति, अपने अधिकार क्षेत्र और मांगी गई राहत जैसे पहलुओं पर विचार कर सकती है। इसके बाद लागू प्रक्रिया के अनुसार याचिका की जांच और सुनवाई से जुड़े कदम आगे बढ़ेंगे।
यदि उसी विषय पर पहले से याचिकाएं लंबित हैं, तो अदालत यह भी विचार कर सकती है कि नए मामले को उनके साथ सुना जाए या अलग रखा जाए। लेकिन विपक्षी नेताओं की ओर से याचिका दाखिल करना अपने आप किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई, किसी निर्णय पर रोक या मांगी गई राहत मिलने की गारंटी नहीं है।
अंततः अदालत का फैसला कानूनी दलीलों, प्रस्तुत दस्तावेजों, संवैधानिक प्रावधानों और मामले के तथ्यों के आधार पर होगा। चीफ जस्टिस या अन्य न्यायाधीशों से मुलाकात के जरिए ज्ञापन सौंपने की कोशिश और औपचारिक न्यायिक प्रक्रिया के तहत याचिका दाखिल करना अलग-अलग रास्ते हैं। सुप्रीम कोर्ट में किसी शिकायत पर न्यायिक विचार के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।




