हिमाचल में नए जिलों की उम्मीद फिर जगी, 54 साल बाद प्रशासनिक नक्शा बदलने पर मंथन

हिमाचल में नए जिलों की उम्मीद फिर जगी, 54 साल बाद प्रशासनिक नक्शा बदलने पर मंथन

सुक्खू सरकार ने प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए बनाया आयोग, 1972 में हुआ था आखिरी बार जिलों का पुनर्गठन; आर्थिक बोझ और अधिकारियों की तैनाती होगी बड़ी चुनौती

शिमला। हिमाचल प्रदेश में नए जिले बनाने की मांग एक बार फिर चर्चा में आ गई है। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए आयोग का गठन किया है। इसके बाद उन क्षेत्रों में उम्मीदें बढ़ गई हैं, जहां लंबे समय से अलग जिला बनाने की मांग उठती रही है। हालांकि, सरकार ने अभी तक किसी नए जिले के गठन की घोषणा नहीं की है और न ही इसे लेकर किसी प्रस्ताव को मंजूरी मिलने की पुष्टि हुई है। आयोग के गठन को प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा की प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश में आखिरी बार एक सितंबर 1972 को जिलों का पुनर्गठन किया गया था। उस समय हमीरपुर, ऊना और सोलन को नए जिलों के रूप में स्थापित किया गया था। इसके बाद से प्रदेश में जिलों की संख्या 12 बनी हुई है। पांच दशक से अधिक समय गुजरने के बाद अब प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन की पहल ने इस बहस को फिर से तेज कर दिया है कि क्या बदलती जरूरतों के अनुसार राज्य में नए जिले बनाए जाने चाहिए।

हालांकि, नए जिले बनाना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं है। इसके साथ सरकारी खर्च, अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती, विभागीय कार्यालयों की स्थापना तथा भवनों और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था जैसे कई पहलू जुड़े हैं। हिमाचल प्रदेश पर लगभग 1.04 लाख करोड़ रुपये का कर्ज होने के कारण वित्तीय स्थिति भी इस संभावित बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

वीरभद्र सिंह के समय भी उठी थी रामपुर को जिला बनाने की मांग

हिमाचल प्रदेश में नए जिले बनाने की मांग कई सरकारों के कार्यकाल में उठती रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में रामपुर को जिला बनाने की मांग प्रमुखता से सामने आई थी। हालांकि, वीरभद्र सिंह ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया था।

वह संगठनात्मक जिलों के गठन को लेकर भी सतर्क रुख रखते थे। उनका तर्क था कि यदि संगठनात्मक स्तर पर अलग-अलग जिले बनाए जाते हैं, तो भविष्य में संबंधित क्षेत्र प्रशासनिक जिले बनाने की मांग भी कर सकते हैं। इससे सरकारी खर्च और प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

रामपुर को जिला बनाने की मांग के पीछे स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सुविधाओं को नजदीक उपलब्ध कराने की अपेक्षा रही है। दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए जिला मुख्यालय तक पहुंचना समय और संसाधनों की मांग करता है। ऐसे में अलग जिला बनने से प्रशासनिक सेवाएं नजदीक आने की उम्मीद की जाती है।

हालांकि, किसी क्षेत्र को जिला बनाने का फैसला केवल स्थानीय मांग के आधार पर नहीं होता। इसके लिए आबादी, भौगोलिक परिस्थितियों, दूरी, प्रशासनिक जरूरतों और वित्तीय संसाधनों सहित कई पहलुओं पर विचार करना पड़ता है।

धूमल और जयराम सरकारों में भी उठता रहा मुद्दा

वीरभद्र सिंह के बाद प्रेमकुमार धूमल और जयराम ठाकुर के कार्यकाल में भी नए जिलों की मांग उठी, लेकिन इन सरकारों के दौरान प्रदेश में कोई नया प्रशासनिक जिला नहीं बनाया गया।

हालांकि, कुछ क्षेत्रों में पुलिस प्रशासन को मजबूत करने के लिए अलग पुलिस जिलों की व्यवस्था की गई। सोलन जिले के बद्दी, कांगड़ा जिले के नूरपुर और देहरा में पुलिस जिला बनाया गया तथा पुलिस अधीक्षक की तैनाती की गई।

पुलिस जिला और प्रशासनिक जिला अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। पुलिस जिला बनने से संबंधित क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन का संचालन अधिक स्थानीय स्तर पर किया जा सकता है, लेकिन इससे राजस्व और अन्य सरकारी विभागों की पूरी जिला स्तरीय व्यवस्था स्वतः स्थापित नहीं होती।

इसलिए पुलिस जिलों का गठन उन क्षेत्रों की प्रशासनिक जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक कदम माना जा सकता है, लेकिन इसे नए पूर्ण प्रशासनिक जिले के गठन के बराबर नहीं माना जा सकता।

उपमंडल और तहसीलों के गठन का सिलसिला जारी

हिमाचल प्रदेश में नए जिलों की मांग के बीच उपमंडल, तहसील और उपतहसील बनाने की प्रक्रिया अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में चलती रही है। इन प्रशासनिक इकाइयों के गठन का उद्देश्य लोगों को राजस्व और प्रशासनिक सेवाएं अपेक्षाकृत नजदीक उपलब्ध कराना है।

उपमंडल बनने से क्षेत्र में उपमंडलाधिकारी की तैनाती की जा सकती है, जबकि तहसील और उपतहसील के माध्यम से भूमि रिकॉर्ड, राजस्व संबंधी मामलों तथा अन्य निर्धारित सेवाओं का संचालन स्थानीय स्तर पर होता है।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में सबसे अधिक तहसील और उपतहसीलें बनाए जाने की बात सामने आती रही है। वहीं, हाल ही में सुक्खू सरकार ने जसवां परागपुर क्षेत्र में उपमंडल बनाकर वहां उपमंडलाधिकारी की तैनाती की है।

इससे स्पष्ट है कि प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने के लिए सरकारें जिला स्तर से नीचे की इकाइयों में बदलाव करती रही हैं। अब आयोग के गठन के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि समीक्षा के दौरान केवल मौजूदा इकाइयों के पुनर्गठन पर विचार किया जाता है या नए जिलों की जरूरतों का आकलन भी किया जाता है।

1972 में तीन नए जिले बनने के बाद नहीं बदला प्रदेश का नक्शा

हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में एक सितंबर 1972 महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन जिलों का पुनर्गठन करते हुए हमीरपुर, ऊना और सोलन को अलग जिले बनाया गया था। इससे पहले प्रदेश की प्रशासनिक संरचना अलग थी। नए जिलों के गठन के बाद राज्य में जिलों की संख्या बढ़कर 12 हो गई, जो आज तक कायम है।

प्रदेश का प्रशासनिक सफर 15 अप्रैल 1948 को चार जिलों के साथ शुरू हुआ था। उस समय महासू, मंडी, चंबा और सिरमौर जिले अस्तित्व में थे। बाद के वर्षों में राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में कई बदलाव हुए।

वर्ष 1960 में कांगड़ा, लाहुल-स्पीति, कुल्लू और शिमला जिले बनाए गए। इसके बाद वर्ष 1966 में महासू जिले का अस्तित्व समाप्त हुआ और किन्नौर जिला बना। अंततः वर्ष 1972 में हमीरपुर, ऊना और सोलन के गठन के साथ प्रदेश में जिलों की संख्या 12 हो गई।

वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में 12 जिले, 81 उपमंडल, 92 विकास खंड तथा 193 तहसीलें और उपतहसीलें हैं। इन आंकड़ों से प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था का व्यापक स्वरूप सामने आता है। अब आयोग की समीक्षा के दौरान यह देखना अहम होगा कि मौजूदा व्यवस्था बदलती आबादी, भौगोलिक परिस्थितियों और प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप कितनी प्रभावी है।

नए जिले बनाने में वित्तीय स्थिति सबसे बड़ी कसौटी

हिमाचल प्रदेश में नए जिलों की संभावना पर विचार करते समय राज्य की वित्तीय स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रदेश पर लगभग 1.04 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और सरकार खर्च में कटौती के साथ उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने पर जोर दे रही है।

नया जिला बनाने पर केवल जिला मुख्यालय घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए उपायुक्त, अतिरिक्त उपायुक्त, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी और पुलिस अधीक्षक सहित विभिन्न अधिकारियों की तैनाती करनी पड़ सकती है। इसके अलावा राजस्व, स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास और अन्य विभागों के जिला स्तरीय कार्यालयों की जरूरत होगी।

इन कार्यालयों के लिए भवन, फर्नीचर, वाहन, तकनीकी सुविधाएं और कर्मचारियों की व्यवस्था करनी पड़ेगी। नए प्रशासनिक ढांचे के संचालन पर नियमित खर्च भी आएगा। अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, कार्यालयों के रखरखाव तथा अन्य प्रशासनिक जरूरतों के लिए हर वर्ष बजट आवंटित करना होगा।

दूसरी ओर, यदि किसी क्षेत्र में जिला मुख्यालय बहुत दूर है और वहां की आबादी को प्रशासनिक सेवाएं लेने में कठिनाई होती है, तो अलग जिला बनाने से लोगों को सुविधा मिल सकती है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि जनता की जरूरतों और वित्तीय क्षमता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

आयोग की समीक्षा में प्रशासनिक सुविधा, दूरी, आबादी, भौगोलिक परिस्थितियों और खर्च जैसे पहलुओं का महत्व रहेगा। हालांकि, आयोग की अंतिम सिफारिशें और सरकार का निर्णय सामने आने के बाद ही इस संबंध में स्पष्ट तस्वीर बनेगी।

विधानसभा में सरकार ने नए जिलों के प्रस्ताव से किया था इनकार

नए जिले बनाने को लेकर सरकार का रुख पहले भी विधानसभा में सामने आ चुका है। भाजपा विधायक डॉ. जनक राज ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में चार नए जिले बनाने की संभावनाओं और एक नया जिला गठित करने पर होने वाले खर्च को लेकर सवाल पूछा था।

इस पर मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने सदन को बताया था कि नए जिलों के गठन का कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है। उस समय सरकार ने किसी नए जिले के गठन की योजना से इनकार किया था।

अब प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए आयोग गठित होने से समीक्षा की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई है। हालांकि, आयोग का गठन अपने आप में नए जिले बनाने की मंजूरी नहीं है। मौजूदा प्रशासनिक ढांचे का अध्ययन करने और उसमें आवश्यक बदलावों पर विचार करने के लिए आयोग की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि हिमाचल प्रदेश में जल्द ही नए जिले बनाए जाएंगे। आयोग की रिपोर्ट, सरकार का रुख और वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता आगे की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे।

कांगड़ा को दूसरी राजधानी का दर्जा, अब पर्यटन राजधानी

हिमाचल प्रदेश में प्रशासनिक सुविधाओं को क्षेत्रीय स्तर पर उपलब्ध कराने की चर्चा के साथ कांगड़ा का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अपने कार्यकाल में कांगड़ा को दूसरी राजधानी का दर्जा दिया था। इसके तहत वहां शीतकालीन प्रवास और विधानसभा सत्र की शुरुआत की गई थी।

इस पहल का उद्देश्य यह था कि कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को अपनी समस्याएं लेकर हर बार शिमला न आना पड़े। क्षेत्रीय स्तर पर सरकारी गतिविधियां आयोजित करने से लोगों को प्रशासन तक पहुंचने में सुविधा मिलने की उम्मीद थी।

हालांकि, दूसरी राजधानी का दर्जा व्यापक प्रशासनिक ढांचे के रूप में विकसित नहीं हो पाया और इसका प्रभाव काफी हद तक सीमित रहा। वर्तमान सरकार ने कांगड़ा को पर्यटन राजधानी घोषित किया है। यह पहल पर्यटन विकास के लिहाज से अलग उद्देश्य रखती है और इसे प्रशासनिक जिले या पूर्ण दूसरी राजधानी की व्यवस्था से अलग समझना चाहिए।

कांगड़ा सहित अन्य क्षेत्रों में प्रशासनिक सुविधाओं के विस्तार की मांग इस बात को रेखांकित करती है कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में भौगोलिक परिस्थितियां और मुख्यालयों से दूरी प्रशासनिक जरूरतों को प्रभावित करती हैं।

आयोग की रिपोर्ट से तय होगी आगे की दिशा

हिमाचल प्रदेश में नए जिले बनाने की चर्चा के बीच फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण कदम प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए गठित आयोग की समीक्षा है। प्रदेश में आखिरी बार 1972 में जिलों का पुनर्गठन हुआ था। इसके बाद से राज्य में 12 जिले कायम हैं, जबकि उपमंडलों, तहसीलों और उपतहसीलों की संख्या में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं।

आयोग की रिपोर्ट से यह समझने में मदद मिल सकती है कि मौजूदा प्रशासनिक ढांचा जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है या उसमें और बदलाव की आवश्यकता है। यदि नए जिलों की सिफारिश होती है, तो सरकार को उनके गठन की उपयोगिता के साथ वित्तीय बोझ और प्रशासनिक जरूरतों का भी आकलन करना होगा।

फिलहाल, लंबे समय से अलग जिला बनाने की मांग कर रहे क्षेत्रों की उम्मीदें जरूर बढ़ी हैं, लेकिन अंतिम फैसला सरकार को ही लेना होगा। आने वाले समय में आयोग की सिफारिशें और उन पर सरकार की कार्रवाई यह स्पष्ट करेगी कि हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक नक्शे में बदलाव की संभावना कितनी है।