बच्चों की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, वैसे-वैसे उनकी सोच, पसंद और भावनाओं में भी बदलाव आने लगता है। किशोरावस्था में किसी सहपाठी या दोस्त के प्रति खास लगाव महसूस करना, उससे बातचीत करने की इच्छा होना या उसके साथ समय बिताना अच्छा लगना सामान्य बात है। हालांकि, जब माता-पिता को अपने बच्चे की किसी के साथ बढ़ती नजदीकी के बारे में पता चलता है, तो वे अक्सर चिंता करने लगते हैं। उन्हें डर सताने लगता है कि कहीं बच्चे का ध्यान पढ़ाई से न हट जाए या वह कम उम्र में किसी गलत फैसले का शिकार न हो जाए।
ऐसी स्थिति में कई परिवार बच्चों को डांटने, उनके फोन पर पाबंदी लगाने या दोस्तों से मिलने से रोकने जैसे कदम उठाते हैं। लेकिन इस तरह की सख्ती हमेशा कारगर नहीं होती। कई बार बच्चा अपनी भावनाओं को साझा करना बंद कर देता है और माता-पिता से बातें छिपाने लगता है। इसलिए जरूरी है कि इस नाजुक दौर में बच्चे को नियंत्रित करने के बजाय उसकी बात समझने, सही मार्गदर्शन देने और उसके साथ भरोसे का रिश्ता कायम रखने पर ध्यान दिया जाए।
किशोरावस्था में आकर्षण महसूस करना असामान्य नहीं
बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ते समय बच्चों में शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक बदलाव आते हैं। इस दौरान वे अपनी पहचान को समझने की कोशिश करते हैं और दूसरे लोगों के प्रति उनकी दिलचस्पी भी बढ़ सकती है। स्कूल में किसी दोस्त का व्यवहार पसंद आना, किसी से बार-बार बात करने का मन करना या किसी खास व्यक्ति की तारीफ करना इसी उम्र के अनुभवों का हिस्सा हो सकता है।
माता-पिता को यह समझना चाहिए कि किसी को पसंद करना अपने आप में गलत बात नहीं है। असली चिंता तब हो सकती है, जब बच्चा भावनाओं में इतना उलझ जाए कि उसकी पढ़ाई, नींद, रोजमर्रा की गतिविधियां या मानसिक सुकून प्रभावित होने लगे। इसी तरह, अगर कोई दूसरा व्यक्ति उस पर दबाव डाल रहा है या उसका फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है, तो स्थिति को गंभीरता से समझने की जरूरत होती है।
बच्चे की उम्र और उसकी समझ के अनुसार उसे रिश्तों के बारे में जानकारी देना ज्यादा उपयोगी है। इससे वह अपनी भावनाओं को पहचानना और उनके आधार पर सोच-समझकर फैसले लेना सीख सकता है।
गुस्सा करने से पहले जानें कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है
अगर आपको पता चलता है कि आपका बच्चा किसी को पसंद करने लगा है, तो तुरंत नाराज होने या उसे गलत ठहराने से बचें। सबसे पहले यह जानने की कोशिश करें कि वह इस रिश्ते को किस तरह देखता है। हो सकता है कि वह उस व्यक्ति को केवल अच्छा दोस्त मानता हो या उसके मन में दोस्ती से बढ़कर कुछ भावनाएं हों।
बातचीत के दौरान बच्चे को अपनी बात पूरी करने का मौका दें। बीच में टोकना, उसकी भावनाओं का मजाक बनाना या दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करना उसे असहज कर सकता है। अगर वह शुरुआत में कुछ बताने से हिचकिचाता है, तो उस पर जवाब देने का दबाव न बनाएं।
आप सामान्य बातचीत के जरिए भी उसकी भावनाओं को समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए, उससे पूछ सकते हैं कि उसे उस व्यक्ति की कौन-सी बात अच्छी लगती है या वह इस दोस्ती में कैसा महसूस करता है। इस तरह के सवाल बच्चे को अपनी भावनाओं पर विचार करने का अवसर देते हैं।
सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे को यह भरोसा होना चाहिए कि अपनी परेशानी बताने पर उसे अपमानित नहीं किया जाएगा। जब माता-पिता धैर्य के साथ सुनते हैं, तो बच्चे के लिए भविष्य में भी उनसे मदद मांगना आसान हो जाता है।
भावनाओं को गलत बताने के बजाय सही दिशा दिखाएं
कई माता-पिता बच्चों से कहते हैं कि यह प्यार करने की उम्र नहीं है और उन्हें इन बातों के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। हालांकि, केवल इस तरह की बातें कहने से बच्चे की भावनाएं खत्म नहीं हो जातीं। इसके बजाय वह उन्हें छिपाना सीख सकता है।
बच्चे को समझाएं कि किसी के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक है, लेकिन किसी को पसंद करने और किसी रिश्ते को जिम्मेदारी से निभाने के बीच अंतर होता है। किसी के साथ अच्छा समय बिताना एक बात है, जबकि अपनी पढ़ाई, स्वास्थ्य, व्यक्तिगत सीमाओं और भविष्य की जिम्मेदारियों का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।
उसे बताएं कि जिंदगी के इस दौर में कई चीजें सीखने और खुद को बेहतर बनाने के अवसर मिलते हैं। पढ़ाई, खेल, रचनात्मक गतिविधियां, नई स्किल्स और दोस्तों के साथ अच्छा समय बिताना उसके विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं।
बच्चे को यह भी समझाएं कि उसे किसी रिश्ते में बने रहने या किसी को खुश करने के लिए अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ करने की जरूरत नहीं है। अपने मन की बात कहने, जरूरत पड़ने पर दूरी बनाने और किसी फैसले के बारे में सोचने के लिए समय लेने का अधिकार हर व्यक्ति को है।
रिश्तों में सहमति, सम्मान और सुरक्षा की जानकारी दें
बच्चों को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि उन्हें किस उम्र में दोस्ती करनी चाहिए। उन्हें यह भी समझाना जरूरी है कि एक स्वस्थ रिश्ते में व्यवहार कैसा होना चाहिए। किसी भी दोस्ती या संबंध में दोनों लोगों की भावनाओं, पसंद और निजी सीमाओं का सम्मान होना चाहिए।
बच्चे को बताएं कि किसी व्यक्ति का बार-बार फोन करना, जवाब देने के लिए दबाव बनाना, दोस्तों से दूर रहने को कहना या हर समय अपनी बात मनवाने की कोशिश करना असहज स्थिति पैदा कर सकता है। किसी को पसंद करने का अर्थ यह नहीं है कि उसे दूसरे व्यक्ति पर अधिकार मिल जाता है।
ऑनलाइन सुरक्षा के बारे में बातचीत करना भी जरूरी है। आजकल बच्चों की दोस्ती सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और ऑनलाइन गेम के जरिए भी होती है। ऐसे में उन्हें समझाएं कि निजी तस्वीरें, पासवर्ड, घर का पता या अन्य संवेदनशील जानकारी किसी के साथ साझा नहीं करनी चाहिए। किसी के कहने पर निजी तस्वीर भेजना या किसी गुप्त बात को लेकर दबाव स्वीकार करना जरूरी नहीं है।
अगर कोई व्यक्ति धमकी देता है, ब्लैकमेल करता है या ऐसी गतिविधि के लिए मजबूर करता है जिसमें बच्चा सहज नहीं है, तो उसे तुरंत किसी भरोसेमंद वयस्क को बताने के लिए प्रोत्साहित करें। ऐसी स्थिति में बच्चे को दोष देने के बजाय उसकी सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है।
पढ़ाई और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाना सिखाएं
किशोरावस्था में किसी के प्रति लगाव बढ़ने पर बच्चे का ध्यान बार-बार उसी व्यक्ति की ओर जा सकता है। वह मैसेज का इंतजार कर सकता है, फोन पर ज्यादा समय बिता सकता है या पढ़ाई के दौरान भी उसी के बारे में सोच सकता है। ऐसे बदलाव नजर आने पर माता-पिता को बच्चे की दिनचर्या पर ध्यान देना चाहिए।
हालांकि, इसका समाधान अचानक फोन छीन लेना या हर समय निगरानी रखना नहीं है। बच्चे के साथ बैठकर ऐसा समय-सारणी बनाएं, जिसमें पढ़ाई, आराम, व्यायाम, परिवार, दोस्तों और पसंदीदा गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय हो।
मोबाइल इस्तेमाल करने के नियम भी मिलकर तय किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए, पढ़ाई के समय फोन को अलग रखना, रात में पर्याप्त नींद लेना और जरूरी कामों के दौरान सोशल मीडिया से दूरी बनाना उपयोगी आदतें हो सकती हैं। नियम केवल बच्चे पर थोपने के बजाय उनका कारण भी समझाएं और परिवार के सभी सदस्यों से उनका पालन करने की कोशिश करें।
अगर बच्चा पढ़ाई में पिछड़ रहा है, तो केवल उसकी दोस्ती को वजह मानकर न चलें। उससे पूछें कि उसे किस विषय में परेशानी हो रही है और क्या उसे किसी तरह की मदद की जरूरत है। समस्या को समझकर समाधान निकालना डांटने से ज्यादा प्रभावी हो सकता है।
जरूरत से ज्यादा निगरानी करने से बचें
बच्चे की सुरक्षा को लेकर माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक है, लेकिन हर समय सवाल पूछना, बिना कारण फोन की जांच करना या उसके दोस्तों पर लगातार शक करना रिश्ते में तनाव पैदा कर सकता है। इससे बच्चा अपनी निजी जिंदगी के बारे में बातचीत करने से बचने लगता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि माता-पिता को बच्चे की गतिविधियों से पूरी तरह अनजान रहना चाहिए। बल्कि उन्हें उसकी उम्र, परिस्थितियों और सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुसार उचित सीमाएं तय करनी चाहिए। घर के नियम स्पष्ट हों और बच्चे को पता हो कि किसी परेशानी के समय वह किससे बात कर सकता है।
अगर किसी दोस्त या रिश्ते को लेकर वास्तविक सुरक्षा चिंता है, तो बच्चे के सामने आरोप लगाने के बजाय उपलब्ध तथ्यों पर बात करें। उसकी बात सुनें और समस्या का हल मिलकर तलाशें। इससे बच्चे को लगेगा कि माता-पिता उसके विरोध में नहीं, बल्कि उसकी मदद के लिए मौजूद हैं।
बच्चे के व्यवहार में बदलाव दिखे तो मदद लेने में संकोच न करें
किसी को पसंद करने के कारण बच्चा कुछ समय के लिए ज्यादा उत्साहित या भावुक हो सकता है। लेकिन अगर वह लंबे समय तक उदास रहने लगे, सामाजिक गतिविधियों से दूर हो जाए, नींद में परेशानी हो, पढ़ाई में अचानक गिरावट आए या लगातार तनाव महसूस करे, तो इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ऐसी स्थिति में बच्चे से बिना दबाव के बातचीत करें और जानें कि उसे किस तरह की परेशानी हो रही है। अगर समस्या बनी रहती है या उसका रोजमर्रा का जीवन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है, तो स्कूल काउंसलर या योग्य मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना मददगार हो सकता है।
काउंसलिंग का उद्देश्य बच्चे को गलत साबित करना नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं को समझने, तनाव से निपटने और स्वस्थ निर्णय लेने में सहायता करना है। माता-पिता भी जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से यह सीख सकते हैं कि किशोर उम्र के बच्चों के साथ संवेदनशील विषयों पर बातचीत कैसे की जाए।
बच्चे को डांट नहीं, समझ और भरोसे की जरूरत
किशोरावस्था में किसी के प्रति आकर्षण पैदा होना हमेशा किसी समस्या का संकेत नहीं होता। माता-पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वे बच्चे की भावनाओं को समझें और उसे रिश्तों, जिम्मेदारियों, सहमति तथा व्यक्तिगत सुरक्षा के बारे में सही जानकारी दें।
बच्चे पर अपनी सोच थोपने के बजाय उसे सवाल पूछने, अपनी बात कहने और गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिए। प्यार, धैर्य और स्पष्ट संवाद के जरिए माता-पिता उसे यह समझा सकते हैं कि भावनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन किसी भी फैसले में अपनी सुरक्षा, सम्मान, पढ़ाई और भविष्य का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।
जब घर में बातचीत का माहौल सहज होता है, तो बच्चे अपनी परेशानियों को छिपाने के बजाय साझा करना सीखते हैं। यही भरोसा उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में सही मार्गदर्शन पाने और अधिक जिम्मेदारी के साथ फैसले लेने में मदद करता है।
Photo : Shutterstock




