चीन से आयात की रफ्तार ने बढ़ाई भारत की मुश्किलें: बैटरी से लेकर इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों तक निर्भरता बढ़ी, 5320 अरब रुपये के पार पहुंचा व्यापार घाटा

चीन से आयात की रफ्तार ने बढ़ाई भारत की मुश्किलें: बैटरी से लेकर इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों तक निर्भरता बढ़ी, 5320 अरब रुपये के पार पहुंचा व्यापार घाटा

भारत में घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और विदेशी उत्पादों पर निर्भरता घटाने की कोशिशों के बीच चीन से होने वाला आयात लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। इलेक्ट्रिक वाहनों, मोबाइल फोन, कंप्यूटर और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग बढ़ने के साथ भारतीय बाजार में चीनी सामानों की हिस्सेदारी भी बढ़ रही है। खासकर बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के मामले में चीन पर निर्भरता भारत के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। इसका असर दोनों देशों के बीच व्यापार के संतुलन पर भी दिखाई दे रहा है।

वित्त वर्ष 2026-27 के शुरुआती पांच महीनों यानी अप्रैल से अगस्त के दौरान चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा बढ़कर लगभग 56 अरब डॉलर हो गया। भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत करीब 5,320 अरब रुपये बैठती है। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह आंकड़ा 44.7 अरब डॉलर था। यानी महज एक साल के भीतर व्यापार घाटे में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। आयात की मौजूदा रफ्तार जारी रहने पर भारत के सामने आर्थिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती और गंभीर हो सकती है।

इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग ने बैटरी आयात को दी रफ्तार

भारत में इलेक्ट्रिक कारों, स्कूटरों और दूसरे बैटरी चालित वाहनों का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है। पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के साथ इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को भी प्रोत्साहन मिल रहा है। हालांकि, इस बदलाव का एक दूसरा पहलू भी सामने आया है। इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली बैटरियों और संबंधित तकनीकी सामग्रियों के लिए भारत को बड़े पैमाने पर चीन से खरीदारी करनी पड़ रही है।

उपलब्ध व्यापार आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच भारत ने चीन से करीब 2.9 अरब डॉलर की बैटरियां आयात कीं। पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में यह रकम लगभग दोगुनी है। इस तेजी के चलते चीन से भारत आने वाले प्रमुख उत्पादों में बैटरी छठे स्थान पर पहुंच गई है।

बैटरी आयात में यह उछाल केवल इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग की बढ़ती जरूरतों को ही नहीं दिखाता, बल्कि घरेलू उत्पादन क्षमता से जुड़ी चुनौतियों की ओर भी संकेत करता है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का निर्माण बढ़ रहा है, लेकिन उनकी लागत और उत्पादन को प्रभावित करने वाले कई अहम घटकों की आपूर्ति अभी भी विदेशी बाजारों पर निर्भर है। चीन इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उत्पादन और मजबूत सप्लाई नेटवर्क के कारण प्रमुख भूमिका निभाता है।

अगर भारत को इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग में लंबे समय तक प्रतिस्पर्धी बने रहना है, तो उसे बैटरी निर्माण, जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता और तकनीकी विकास पर अधिक ध्यान देना होगा। केवल वाहनों की असेंबलिंग बढ़ाने से आयात पर निर्भरता अपने आप समाप्त नहीं होगी।

गाड़ियों के आयात में भी दिखाई दी बड़ी बढ़ोतरी

चीन से भारत आने वाले सामानों में बढ़ोतरी का सिलसिला बैटरी तक सीमित नहीं है। दोपहिया, तिपहिया और चारपहिया वाहनों के आयात में भी तेज उछाल दर्ज किया गया है। यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत खुद को ऑटोमोबाइल निर्माण के बड़े केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

अप्रैल-अगस्त 2026 के दौरान चीन से दोपहिया और तिपहिया वाहनों का आयात बढ़कर 10.7 करोड़ डॉलर हो गया। पिछले साल की इसी अवधि में यह आंकड़ा केवल 20 लाख डॉलर था। इस तरह दोनों अवधियों के बीच भारी अंतर देखने को मिला है।

कारों के आयात में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। चीन से भारत आने वाली कारों का मूल्य पिछले वर्ष के 8.7 करोड़ डॉलर से बढ़कर इस साल 22.6 करोड़ डॉलर पहुंच गया। यह लगभग 2.6 गुना वृद्धि है। इस बढ़ोतरी के पीछे चीन की इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी BYD की भूमिका होने की संभावना जताई गई है, हालांकि उपलब्ध आंकड़ों से पूरी वृद्धि का कारण निश्चित रूप से स्पष्ट नहीं होता।

वाहनों और बैटरियों के आयात में एक साथ बढ़ोतरी से यह सवाल उठता है कि भारत इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के विस्तार के साथ घरेलू उत्पादन और स्थानीय सप्लाई चेन को किस तरह मजबूत करेगा। यदि वाहन बाजार का विकास मुख्य रूप से आयातित उत्पादों और पुर्जों के सहारे होता है, तो घरेलू उद्योग को मिलने वाले लाभ सीमित रह सकते हैं।

केमिकल और औद्योगिक उत्पादों की खरीद में भी इजाफा

चीन से भारत आने वाले कई अन्य उत्पादों के आयात में भी तेजी देखने को मिली है। अप्रैल से अगस्त 2026 के दौरान तेल उत्पादों का आयात बढ़कर 17.9 करोड़ डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले करीब तीन गुना है।

इसी अवधि में डाई इंटरमीडिएट्स का आयात लगभग 2.6 गुना बढ़कर 33.8 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। बल्क मिनरल्स के मामले में भी करीब तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई और आयात का मूल्य 18 करोड़ डॉलर रहा।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि चीन से भारत आने वाले उत्पादों का दायरा काफी व्यापक है। ऊर्जा से जुड़े उत्पादों, औद्योगिक रसायनों और खनिज सामग्रियों की आपूर्ति भी दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हालांकि, कुल आयात में इन उत्पादों की हिस्सेदारी इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, केमिकल और प्लास्टिक जैसी प्रमुख श्रेणियों के मुकाबले कम है। ये चारों श्रेणियां मिलकर चीन से भारत के कुल आयात का करीब तीन-चौथाई हिस्सा बनाती हैं। इसका अर्थ है कि व्यापार घाटे को कम करने के लिए केवल कुछ चुनिंदा उत्पादों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को उन क्षेत्रों में भी उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी, जहां चीनी सामानों की मांग और उपलब्धता दोनों काफी अधिक हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन बढ़ा, लेकिन विदेशी पुर्जों की जरूरत बरकरार

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में अपनी क्षमता बढ़ाई है। देश में उत्पादन गतिविधियों का विस्तार हुआ है और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र को औद्योगिक विकास के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। इसके बावजूद तैयार उत्पाद बनाने के लिए जरूरी पुर्जों, मशीनों और कच्चे माल के आयात पर निर्भरता बड़ी चुनौती बनी हुई है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों में चीन से टेलीकॉम उपकरणों, मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स के आयात में 40 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हुई।

इस स्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी उत्पाद का निर्माण भारत में होने का मतलब यह नहीं है कि उसकी पूरी सप्लाई चेन भी देश के भीतर विकसित हो चुकी है। मोबाइल फोन का अंतिम उत्पाद भारत में तैयार हो सकता है, लेकिन उसमें इस्तेमाल होने वाले कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स विदेशों से मंगाने पड़ सकते हैं। ऐसी स्थिति में घरेलू उत्पादन बढ़ने के बावजूद आयात का मूल्य ऊंचा बना रह सकता है।

इलेक्ट्रॉनिक्स के अलावा मशीनरी, केमिकल और प्लास्टिक जैसे क्षेत्रों में भी उद्योगों को कच्चे माल और मध्यवर्ती उत्पादों की जरूरत होती है। यदि इनकी घरेलू उपलब्धता सीमित है, तो कंपनियों के लिए आयात का विकल्प चुनना व्यावसायिक रूप से अधिक व्यावहारिक हो सकता है।

यही कारण है कि चीन से भारत का व्यापार घाटा कम करना केवल आयात घटाने का मामला नहीं है। इसके लिए वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं का विकास, घरेलू उत्पादन में निवेश और तकनीकी क्षमता को मजबूत करना भी जरूरी है।

निर्यात में सुधार के बावजूद व्यापार का अंतर बड़ा

भारत और चीन के बीच व्यापार की तस्वीर का दूसरा पहलू निर्यात से जुड़ा है। इस साल चीन को भारत का निर्यात लगभग 40 प्रतिशत बढ़ा है। यह वृद्धि सकारात्मक संकेत मानी जा सकती है, लेकिन इससे दोनों देशों के बीच व्यापार का अंतर खत्म नहीं हुआ है।

निर्यात में औद्योगिक इनपुट और कच्चे माल की बड़ी हिस्सेदारी बनी हुई है। दूसरी तरफ, भारत चीन से बड़ी मात्रा में तैयार उत्पादों के साथ-साथ ऐसे पुर्जे और सामग्री भी खरीदता है, जिनका इस्तेमाल घरेलू उद्योगों में किया जाता है।

अप्रैल से अगस्त 2026 के दौरान चीन को भारत का औसत मासिक निर्यात 2 अरब डॉलर से नीचे रहा। इसके मुकाबले चीन से होने वाला आयात अधिक रहने के कारण व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं आ पाया।

यदि शुरुआती पांच महीनों की प्रवृत्ति आगे भी जारी रहती है, तो चीन के साथ भारत का पूरे साल का व्यापार घाटा पिछले वित्त वर्ष के स्तर को पार कर सकता है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह घाटा लगभग 112 अरब डॉलर था। हालांकि, अंतिम आंकड़ा आने वाले महीनों में आयात, निर्यात और वैश्विक मांग में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा।

सरकार के सामने व्यापार संतुलन सुधारने की चुनौती

चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल चिंता व्यक्त कर चुके हैं। दोनों ने भारत और चीन के बीच व्यापार में उचित अवसरों और बेहतर संतुलन की जरूरत पर जोर दिया है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि एक ओर उसे घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देना है, वहीं दूसरी ओर उन उद्योगों की जरूरतों को भी पूरा करना है, जो उत्पादन के लिए चीन से आने वाली सामग्री पर निर्भर हैं। आयात पर अचानक सख्ती करने से कुछ क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ सकती है और कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है।

चीन में बड़े पैमाने पर उत्पादन, विकसित औद्योगिक नेटवर्क और सरकारी सब्सिडी जैसी वजहों से वहां की कंपनियां कई उत्पाद कम कीमत पर उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। भारतीय कंपनियों के लिए समान कीमत पर उत्पाद बनाना तब तक मुश्किल रह सकता है, जब तक घरेलू स्तर पर उत्पादन का पैमाना, तकनीक और सप्लाई चेन पर्याप्त मजबूत नहीं हो जाते।

चीन की सप्लाई बाधित हुई तो उद्योगों पर क्या होगा असर?

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, चीन के साथ व्यापार घाटे की चिंता महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत के कई उद्योग जरूरी सामानों की आपूर्ति के लिए उसी पर निर्भर हैं। यदि चीन किसी वजह से सप्लाई रोक देता है, तो भारतीय फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और केमिकल उद्योगों को गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

ऐसी स्थिति में उत्पादन प्रभावित होने के साथ कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है। जिन उद्योगों के पास वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता नहीं हैं, उनके लिए कम समय में दूसरी जगह से जरूरी सामग्री जुटाना मुश्किल हो सकता है।

यही वजह है कि आयात को नियंत्रित करने के प्रयासों पर भारतीय उद्योगों की ओर से कई बार आपत्तियां सामने आती हैं। कंपनियों को आशंका रहती है कि कच्चे माल और पुर्जों की उपलब्धता प्रभावित होने पर उत्पादन महंगा हो जाएगा और बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ सकती है।

भारत के सामने इसलिए दोहरी जिम्मेदारी है। उसे व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के साथ-साथ जरूरी औद्योगिक आपूर्ति को भी सुरक्षित रखना होगा। इसके लिए बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, मशीनरी और केमिकल जैसे क्षेत्रों में घरेलू निर्माण क्षमता विकसित करना अहम होगा।

चीन से बढ़ता आयात भारत की आर्थिक नीति के लिए एक जटिल चुनौती पेश कर रहा है। इलेक्ट्रिक वाहनों और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना जरूरी है, लेकिन वास्तविक आत्मनिर्भरता के लिए उन उत्पादों और सामग्रियों का भी देश में निर्माण करना होगा, जिनके बिना उद्योगों का संचालन संभव नहीं है। दीर्घकाल में मजबूत स्थानीय सप्लाई चेन, तकनीकी निवेश और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षमता ही भारत को आयात पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और व्यापार संतुलन सुधारने में मदद कर सकती है।

(Photo : AI Generated)