इजराइल में सरकार गठन को लेकर सियासी खींचतान तेज, आइजनकोट के समर्थन में आए अरब दल, नेतन्याहू ने खोले गठबंधन के रास्ते

इजराइल में सरकार गठन को लेकर सियासी खींचतान तेज, आइजनकोट के समर्थन में आए अरब दल, नेतन्याहू ने खोले गठबंधन के रास्ते

इजराइल में संसदीय चुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक तस्वीर लगातार बदल रही है। किसी भी पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार बनाने की कवायद तेज हो गई है। इस बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने विपक्षी नेता गादी आइजनकोट के साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावना से इनकार नहीं किया है। इजराइली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेतन्याहू को आशंका है कि अरब पार्टियों के समर्थन से आइजनकोट वैकल्पिक सरकार बनाने में कामयाब हो सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो नेतन्याहू को प्रधानमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है।

इसी राजनीतिक दबाव के बीच नेतन्याहू ने आइजनकोट के साथ गठबंधन का रास्ता खुला रखा है। हालांकि, आइजनकोट की ओर से इस प्रस्ताव पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। दूसरी तरफ अरब राजनीतिक दलों के समर्थन ने विपक्ष की सरकार बनाने की संभावनाओं को मजबूत कर दिया है।

रविवार को जॉइंट लिस्ट और राअम जैसी अरब पार्टियों ने आइजनकोट को समर्थन देने का ऐलान किया। इन दलों का साथ मिलने से विपक्षी खेमे के पास संभावित रूप से 67 सांसदों का समर्थन हो सकता है। यह बहुमत के लिए जरूरी संख्या से छह ज्यादा है। ऐसे में इजराइल की राजनीति में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू अपनी कुर्सी बचा पाएंगे या विपक्ष उन्हें सत्ता से बाहर करने में सफल होगा?

चुनाव के नतीजों ने क्यों बढ़ाई नेतन्याहू की मुश्किल?

इजराइल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव में किसी भी गठबंधन को सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला। देश की संसद में कुल 120 सदस्य हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है।

चुनावी नतीजों के मुताबिक, नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन को 53 सीटें मिलीं, जबकि गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के खाते में 48 सीटें आईं। वहीं, अरब राजनीतिक दलों को कुल 19 सीटों पर जीत मिली।

शुरुआत में ये नतीजे नेतन्याहू के लिए राहत भरे माने जा रहे थे, लेकिन अरब पार्टियों के विपक्ष को समर्थन देने के फैसले ने पूरा गणित बदल दिया है। यदि सभी संबंधित दल एकजुट रहते हैं तो आइजनकोट बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार कर सकते हैं।

हालांकि, केवल सांसदों की संख्या जुटाना ही सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। गठबंधन में शामिल अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के बीच सहमति बनाना भी बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने के तीन विकल्प

1. विपक्षी खेमे में सेंध लगाकर बहुमत जुटाना

नेतन्याहू के लिए पहला विकल्प विपक्षी गठबंधन के कुछ सहयोगियों को अपने पाले में लाना हो सकता है। उनके विरोधी गठबंधन के पास फिलहाल 48 सीटें हैं। अगर नेतन्याहू इनमें से कुछ सांसदों या राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल कर लेते हैं तो बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों तक पहुंचना संभव हो सकता है।

लेकिन इस रणनीति को लागू करना आसान नहीं होगा। चुनाव प्रचार के दौरान विपक्षी नेताओं ने जनता से नेतन्याहू की सरकार खत्म करने के नाम पर समर्थन मांगा था। ऐसे में अब उन्हीं के साथ हाथ मिलाना उनके राजनीतिक एजेंडे के खिलाफ जा सकता है। इसके अलावा समर्थकों की नाराजगी का सामना भी करना पड़ सकता है।

2. आइजनकोट के साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार बनाना

दूसरा विकल्प विपक्षी नेता गादी आइजनकोट के साथ समझौता करना है। नेतन्याहू एक ऐसी राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने पर सहमत हो सकते हैं, जिसमें अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा वाले दलों को जगह दी जाए।

इस व्यवस्था में नेतन्याहू प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं और आइजनकोट समेत विपक्षी नेताओं को भी सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। इससे दोनों खेमों के बीच टकराव कम करने और संसद में स्थिरता लाने की कोशिश की जा सकती है।

हालांकि, इस प्रस्ताव में भी सबसे बड़ी अड़चन राजनीतिक भरोसे की है। आइजनकोट ने चुनाव में नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद से हटाने के मुद्दे पर प्रचार किया था। उनके समर्थक भी लंबे समय से नेतन्याहू के विरोध में हैं। ऐसे में उनके लिए नेतन्याहू के नेतृत्व में सरकार में शामिल होना आसान फैसला नहीं होगा।

3. दूसरे दलों के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार चलाना

नेतन्याहू के पास तीसरा रास्ता अल्पमत सरकार बनाने का है। इसके तहत उनके गठबंधन के पास अपने दम पर 61 सांसद नहीं होंगे, लेकिन कुछ छोटे दल संसद में बाहर से समर्थन देकर सरकार को बचाए रख सकते हैं।

ऐसे दल मंत्रिमंडल में शामिल हुए बिना विश्वास मत, बजट और दूसरे महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर सरकार का साथ दे सकते हैं। कुछ मामलों में वे मतदान से दूरी बनाकर भी सरकार को गिरने से बचा सकते हैं।

लेकिन ऐसी सरकार की स्थिरता हमेशा खतरे में रहती है। हर बड़े फैसले के लिए दूसरे दलों का सहयोग लेना पड़ सकता है। बजट पारित कराने और विश्वास मत जीतने जैसी परिस्थितियों में समर्थन नहीं मिला तो सरकार मुश्किल में फंस सकती है।

आइजनकोट के पास भी सरकार बनाने के दो बड़े रास्ते

1. अरब दलों के साथ गठबंधन कर सत्ता हासिल करना

आइजनकोट के लिए फिलहाल सबसे सीधा रास्ता अरब पार्टियों का समर्थन लेकर सरकार बनाना है। उनके विपक्षी गठबंधन के पास 48 सीटें हैं और अरब दलों के पास 19। दोनों का समर्थन एक साथ मिलने पर यह संख्या 67 तक पहुंच सकती है।

इस तरह आइजनकोट बहुमत के आंकड़े से काफी आगे निकल सकते हैं। हालांकि, इस गठबंधन को लेकर इजराइल की राजनीति में मतभेद भी गहरे हैं।

अरब पार्टियों को सरकार में शामिल करने के विचार का नेतन्याहू लंबे समय से विरोध करते आए हैं। विपक्षी गठबंधन के सभी नेता भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं हैं। विपक्ष के सहयोगी नेता एविगडोर लिबरमैन पहले ही अरब दलों के साथ सरकार बनाने की संभावना पर आपत्ति जता चुके हैं।

इसलिए आइजनकोट के लिए चुनौती सिर्फ बहुमत जुटाने की नहीं, बल्कि अपने सहयोगियों को एक साथ बनाए रखने की भी होगी।

2. धार्मिक यहूदी पार्टियों को साथ लाकर नया समीकरण बनाना

आइजनकोट अरब दलों के समर्थन पर निर्भर रहने के बजाय धार्मिक यहूदी पार्टियों के साथ बातचीत का रास्ता भी अपना सकते हैं। इस रणनीति में यूनाइटेड तोराह जूडिज्म (UTJ) की भूमिका अहम हो सकती है।

यह पार्टी फिलहाल खुद को नेतन्याहू के गठबंधन का हिस्सा नहीं मान रही है। इसके नेताओं ने सरकार गठन को लेकर अपनी रणनीति पर विचार-विमर्श भी किया है।

यदि UTJ और कुछ अन्य छोटे दल आइजनकोट के साथ आने के लिए तैयार हो जाते हैं तो विपक्ष को अरब पार्टियों के समर्थन के बिना भी बहुमत जुटाने का रास्ता मिल सकता है।

लेकिन यहां भी नीतिगत मतभेद बड़ी बाधा हैं। खासतौर पर सेना में अनिवार्य सैन्य भर्ती के मुद्दे पर धार्मिक दलों और विपक्षी नेताओं के बीच सहमति बनाना मुश्किल हो सकता है।

क्या नेतन्याहू अरब पार्टियों से भी मदद मांगेंगे?

सीटों के गणित को देखें तो नेतन्याहू के लिए भी अरब दलों का समर्थन हासिल करना एक विकल्प हो सकता है। उनके गठबंधन के पास 53 सांसद हैं। ऐसे में कुछ अरब सांसदों का साथ मिलने से उनकी सरकार बनाने की संभावना मजबूत हो सकती है।

लेकिन राजनीतिक तौर पर यह रास्ता उनके लिए बेहद मुश्किल माना जा रहा है। नेतन्याहू खुद अरब पार्टियों के समर्थन से सरकार बनाने के विचार का विरोध करते रहे हैं। उनकी पार्टी के नेताओं और समर्थकों के लिए भी इस तरह के समझौते को स्वीकार करना आसान नहीं होगा।

दूसरी तरफ जॉइंट लिस्ट और राअम ने आइजनकोट की याशर पार्टी को समर्थन देने का फैसला किया है। इन पार्टियों के पास 19 सीटें हैं। वे सरकार में सीधे शामिल हुए बिना भी विपक्षी सरकार को बाहर से समर्थन दे सकती हैं।

सरकार गठन से पहले संसद के स्पीकर को हटाने की तैयारी

सरकार बनाने की बातचीत के साथ ही विपक्षी गठबंधन ने संसद में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति भी तैयार की है। उसकी शुरुआती योजना मौजूदा स्पीकर आमिर ओहाना को पद से हटाने की है। ओहाना नेतन्याहू की लिकुड पार्टी से जुड़े हुए हैं।

विपक्ष चाहता है कि संसद के कामकाज और विधायी प्रक्रिया पर उसका प्रभाव बढ़े। इसके जरिए वह अपने एजेंडे के महत्वपूर्ण प्रस्तावों को आगे बढ़ा सकता है।

इनमें 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले को रोकने में हुई नाकामी की जांच के लिए स्वतंत्र सरकारी जांच आयोग गठित करने का प्रस्ताव भी शामिल है। विपक्ष इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।

हालांकि, नए स्पीकर के नाम पर विपक्षी दलों के बीच अभी तक सहमति नहीं बन पाई है। यह पद इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक बार नया स्पीकर चुने जाने के बाद उसे हटाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में 90 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा। इतनी बड़ी संख्या जुटाना बेहद कठिन माना जाता है।

राष्ट्रपति हर्जोग की भूमिका होगी अहम

इजराइल में सरकार गठन की प्रक्रिया में राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहने वाली है। वह अगली संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाकात करेंगे।

इन बैठकों में प्रत्येक पार्टी बताएगी कि वह किस नेता को सरकार बनाने की जिम्मेदारी सौंपने के पक्ष में है। इसके बाद राष्ट्रपति तय करेंगे कि किस नेता को सरकार गठन का पहला अवसर दिया जाए।

जिस नेता को यह जिम्मेदारी मिलेगी, उसे निर्धारित समय के भीतर बहुमत का समर्थन जुटाकर सरकार बनाने का प्रयास करना होगा। अगर पहली कोशिश नाकाम रहती है तो आगे दूसरे नेता को मौका देने की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है।

इजराइल में दोबारा चुनाव की नौबत कब आएगी?

फिलहाल नेतन्याहू और आइजनकोट दोनों के पास सरकार बनाने के विकल्प मौजूद हैं। लेकिन यदि कोई भी नेता 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता है तो देश को एक बार फिर संसदीय चुनाव का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, अभी से नए चुनाव की संभावना को अंतिम नहीं माना जा सकता। आने वाले दिनों में छोटे दलों की भूमिका, गठबंधन की बातचीत और राजनीतिक समझौते पूरे समीकरण को बदल सकते हैं।

चुनाव के बाद अब तक कब क्या हुआ?

27 अक्टूबर: इजराइल में संसदीय चुनाव हुए। कुल 77.9 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। नेतन्याहू समर्थक गठबंधन को 53, आइजनकोट के विपक्षी गठबंधन को 48 और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिलीं। किसी भी पक्ष को 61 सीटों का बहुमत नहीं मिला।

29 अक्टूबर: चुनाव नतीजों के बाद राजनीतिक विवाद बढ़ गया। लिकुड पार्टी ने अरब दलों पर वोट खरीदने के आरोप लगाए, जबकि राअम ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। इसी दौरान शिन बेट ने विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को लेकर जांच शुरू की।

31 अक्टूबर: देश में यहूदी और अरब पार्टियों को मिलाकर सरकार बनाने के समर्थन में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने राजनीतिक दलों से आपसी मतभेद भुलाकर स्थिर सरकार बनाने की अपील की। वहीं नेतन्याहू समर्थकों ने ऐसे गठबंधन का विरोध किया।

1 नवंबर: गादी आइजनकोट ने सरकार गठन के लिए चार शर्तें सामने रखीं। जॉइंट लिस्ट ने भी नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए विपक्ष की मदद करने और जरूरत पड़ने पर बाहर से समर्थन देने की बात कही।

अब इजराइल की राजनीति का अगला कदम छोटे दलों के फैसलों पर निर्भर करेगा। नेतन्याहू के लिए सत्ता बचाना चुनौती बन गया है, जबकि आइजनकोट के सामने अलग-अलग विचारधारा वाले सहयोगियों को एक मंच पर लाने की परीक्षा है। आने वाले राजनीतिक समझौते तय करेंगे कि इजराइल में नई सरकार बनेगी या देश को फिर से चुनावी मैदान में उतरना पड़ेगा।