CJP के प्रदर्शन और फंडिंग पर छिड़ी नई बहस, मैरी मिलबेन ने अभिजीत दीपके को दी मोदी से बातचीत की सलाह

CJP के प्रदर्शन और फंडिंग पर छिड़ी नई बहस, मैरी मिलबेन ने अभिजीत दीपके को दी मोदी से बातचीत की सलाह

भारत में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके और अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन के बीच सोशल मीडिया पर विवाद गहरा गया है। दोनों के बीच एक्स (X) पर हुई बातचीत में आंदोलन की फंडिंग, विदेशी नागरिकों की भूमिका और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संवाद जैसे मुद्दे सामने आए। मिलबेन ने दावा किया कि भारत में प्रदर्शन कर रहे CJP से जुड़े लोगों को अमेरिका से आर्थिक मदद मिल रही है। उन्होंने भारतीय युवाओं से ऐसी गतिविधियों के खिलाफ एकजुट होकर शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाने की अपील की। साथ ही दीपके को सलाह दी कि वे टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत करें और देश के विकास में सकारात्मक भूमिका निभाएं। दूसरी ओर, दीपके ने इस टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी नागरिकों को दखल देने का अधिकार नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर भी सवाल किया कि आखिर भारतीय नागरिकों को बदनाम करने के लिए अमेरिकी समर्थन की जरूरत क्यों पड़ रही है।

मैरी मिलबेन ने CJP की फंडिंग को लेकर उठाए सवाल

सोशल मीडिया पर सामने आए इस विवाद में मैरी मिलबेन ने CJP की गतिविधियों और कथित विदेशी आर्थिक सहायता को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने अपने संदेश में दीपके को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उनका आंदोलन सफल नहीं होता, तो अमेरिकी दानदाता उनसे दूरी बना सकते हैं। मिलबेन ने अपने बयान में यह भी कहा कि गैरकानूनी गतिविधियों के जरिए सफलता हासिल नहीं की जा सकती। हालांकि, अमेरिकी फंडिंग से जुड़े उनके दावे को अपने आप में किसी वित्तीय अनियमितता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, इस विवाद में फंडिंग के आरोप और उनके जवाब दोनों राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं।

मिलबेन ने दीपके से कहा कि उन्हें अपनी अमेरिकी शिक्षा और प्रतिभा का इस्तेमाल सकारात्मक उद्देश्यों के लिए करना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ बैठकर बातचीत करने और भारत की प्रगति में योगदान देने का सुझाव भी दिया। उनके संदेश का मुख्य जोर विरोध और टकराव के बजाय संवाद के रास्ते पर आगे बढ़ने पर था। हालांकि, इस सलाह के साथ उन्होंने CJP की कथित फंडिंग पर गंभीर टिप्पणी भी की, जिसके कारण सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई।

दीपके ने विदेशी हस्तक्षेप पर जताई आपत्ति

मैरी मिलबेन के बयान के जवाब में अभिजीत दीपके ने भारत के घरेलू राजनीतिक मामलों में विदेशी नागरिकों की टिप्पणी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिक अपने मुद्दों को समझने और उनका समाधान निकालने में सक्षम हैं। उनके मुताबिक, देश के भीतर चल रहे राजनीतिक आंदोलनों पर बाहरी लोगों के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है।

दीपके की प्रतिक्रिया का केंद्र राष्ट्रीय संप्रभुता और घरेलू मामलों में बाहरी प्रभाव का सवाल रहा। उन्होंने यह भी पूछा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने ही देश के नागरिकों को बदनाम करने के लिए अमेरिकियों का समर्थन क्यों ले रहे हैं। इस टिप्पणी के जरिए उन्होंने बहस को केवल CJP की फंडिंग तक सीमित रखने के बजाय सरकार, विपक्ष और विदेशी हस्तक्षेप के व्यापक मुद्दे से जोड़ दिया।

दोनों पक्षों के बयानों से स्पष्ट है कि विवाद में केवल आर्थिक मदद का सवाल नहीं है। इसके साथ यह बहस भी जुड़ गई है कि भारत के राजनीतिक घटनाक्रम पर विदेशी हस्तियों को किस तरह की टिप्पणी करनी चाहिए और क्या इस तरह की टिप्पणियां घरेलू राजनीतिक मतभेदों को और बढ़ाती हैं। फिलहाल, दोनों के बीच सोशल मीडिया पर सामने आए बयानों से इस मुद्दे पर राजनीतिक चर्चा को नया आधार मिला है।

SIR और चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन

CJP और विपक्ष से जुड़े विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का मुद्दा है। प्रदर्शनकारी इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठा रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस मुद्दे पर देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं और आंदोलन लगभग 15 दिनों से जारी बताया गया है।

SIR का संबंध मतदाता सूची की जांच और उसमें संशोधन की प्रक्रिया से है। इसे लेकर राजनीतिक दलों और संबंधित पक्षों के बीच मतभेद सामने आए हैं। विरोध कर रहे लोगों की मांग है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। दूसरी ओर, इस विवाद में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी लगातार बढ़ रहे हैं।

इसी माहौल में CJP की फंडिंग को लेकर उठे सवालों ने आंदोलन से जुड़ी बहस को एक नया मोड़ दिया है। जहां प्रदर्शनकारी अपने मुद्दों को लोकतांत्रिक विरोध और जवाबदेही से जोड़ रहे हैं, वहीं आलोचक आंदोलन के पीछे मौजूद आर्थिक स्रोतों और राजनीतिक उद्देश्यों पर सवाल उठा रहे हैं। मैरी मिलबेन की टिप्पणी भी इसी विवाद के बीच सामने आई है।

पहले भी कई मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन कर चुकी हैं मिलबेन

मैरी मिलबेन इससे पहले भी भारत की राजनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी राय रख चुकी हैं। उनके बयानों में मोदी सरकार के फैसलों के प्रति समर्थन दिखाई देता रहा है। किसान आंदोलन से लेकर नागरिकता संशोधन कानून तक, उन्होंने अलग-अलग मौकों पर सरकार के रुख का बचाव किया था। यही वजह है कि दीपके के साथ उनकी ताजा बहस को भी राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है।

फरवरी 2021 में जब भारत में कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलन चल रहा था, तब मिलबेन ने मोदी सरकार के कदमों का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री मोदी के उस दृष्टिकोण पर भरोसा है, जिसके तहत किसानों की जिंदगी बेहतर बनाने की बात कही जा रही थी। उस समय कृषि कानूनों को लेकर सरकार और आंदोलनकारी किसानों के बीच लंबा विवाद चल रहा था।

इसके बाद अगस्त 2023 में मणिपुर हिंसा के मुद्दे पर भी मिलबेन ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रति समर्थन जताया था। उन्होंने कहा था कि भारत को अपने नेतृत्व पर भरोसा है और प्रधानमंत्री मणिपुर के लोगों की स्वतंत्रता के लिए लड़ेंगे। मणिपुर में हिंसा को लेकर उस समय केंद्र सरकार की भूमिका पर विपक्ष की ओर से लगातार सवाल उठाए जा रहे थे।

वर्ष 2023 में ही मिलबेन ने बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘India: The Modi Question’ की आलोचना की थी। इस डॉक्यूमेंट्री में 2002 के गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए गए थे। मिलबेन ने डॉक्यूमेंट्री पर आपत्ति जताते हुए मोदी सरकार के समर्थन में अपनी बात रखी थी।

मार्च 2024 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) लागू किए जाने के बाद भी उन्होंने केंद्र सरकार के फैसले की सराहना की। लोकसभा चुनाव के दौरान मिलबेन ने भारतीय मतदाताओं से प्रधानमंत्री मोदी को वोट देने की अपील भी की थी। इन घटनाओं से पता चलता है कि भारत के राजनीतिक मामलों पर उनकी टिप्पणियां पहले भी सार्वजनिक चर्चा का विषय बनती रही हैं।

बीजेपी नेताओं ने भी उठाए थे दीपके की पढ़ाई और संगठन के खर्च पर सवाल

CJP की फंडिंग को लेकर विवाद केवल मैरी मिलबेन के बयान तक सीमित नहीं है। भारत में भी बीजेपी के कुछ नेताओं ने अभिजीत दीपके की पढ़ाई और उनके संगठन की आर्थिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए थे। इन आरोपों के बीच यह मुद्दा भी चर्चा में आया कि CJP अपने आंदोलनों और कानूनी गतिविधियों के लिए पैसा कहां से जुटाता है।

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने दीपके की अमेरिका में हुई पढ़ाई के खर्च को लेकर सवाल उठाए थे। उन्होंने यह जानना चाहा था कि क्या उनकी शिक्षा के पीछे अमेरिकी कारोबारी जॉर्ज सोरोस से जुड़े किसी फाउंडेशन की भूमिका थी। इस सवाल के जरिए उन्होंने दीपके की आर्थिक सहायता के संभावित स्रोतों पर संदेह जताया था। हालांकि, इस तरह के सवाल या आरोप अपने आप में विदेशी फंडिंग की पुष्टि नहीं करते।

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी विपक्ष और CJP पर विदेशी मदद के जरिए भारत में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश करने का आरोप लगाया था। इन बयानों के बाद संगठन की आर्थिक गतिविधियों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हुई। अगस्त 2026 में RTI कार्यकर्ता अमित तिवारी ने भी दीपके की पढ़ाई पर हुए खर्च और CJP के कानूनी सहायता फंड की जांच की मांग उठाई थी।

इन सभी घटनाओं में एक समान मुद्दा सामने आया है—संगठन को मिलने वाले धन का स्रोत और उसका इस्तेमाल। हालांकि, आरोपों और जांच की मांग को किसी निष्कर्ष के बराबर नहीं माना जा सकता। विदेशी आर्थिक सहायता से संबंधित किसी भी दावे की पुष्टि के लिए संबंधित वित्तीय दस्तावेजों, आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच के निष्कर्षों की जरूरत होती है।

CJP के संस्थापक ने विदेशी चंदे के आरोपों को किया खारिज

अभिजीत दीपके पहले भी अपने संगठन को विदेशी फंडिंग मिलने के आरोपों का खंडन कर चुके हैं। CJP के विरोध प्रदर्शनों पर होने वाले खर्च के बारे में उन्होंने कहा था कि वह और उनके दोस्त मिलकर पैसों का इंतजाम करते हैं। उनके अनुसार, संगठन को किसी बाहरी दानदाता या बड़े उद्योगपति से आर्थिक सहायता नहीं मिली है।

दीपके ने संगठन की भविष्य की आर्थिक व्यवस्था को लेकर क्राउडफंडिंग का विकल्प अपनाने की बात भी कही थी। इस तरीके में किसी एक बड़े दानदाता पर निर्भर रहने के बजाय कई लोगों से छोटी-छोटी रकम जुटाई जाती है। हालांकि, CJP की वास्तविक वित्तीय व्यवस्था और प्राप्त धन के स्रोतों का स्पष्ट आकलन करने के लिए आधिकारिक जानकारी और दस्तावेजों की जरूरत होगी।

विदेशी फंडिंग के आरोपों के बीच दीपके ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी सवाल किया था। उनका तर्क था कि यदि किसी आंदोलन में विदेश से पैसा आने की बात सामने आती है, तो उसकी जांच करना और नियमों के उल्लंघन को रोकना गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी है। इस तरह उन्होंने आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ सरकार से भी जवाबदेही तय करने की मांग की थी।

उनके इस रुख से स्पष्ट है कि CJP की ओर से विदेशी आर्थिक सहायता के आरोपों को स्वीकार नहीं किया गया है। वहीं, आलोचक संगठन के वित्तीय स्रोतों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इस मामले में किसी भी दावे को अंतिम सच मानने से पहले उसके समर्थन में उपलब्ध प्रमाणों को देखना जरूरी है।

राजनीतिक विरोध से आगे बढ़कर फंडिंग पर केंद्रित हुई बहस

मैरी मिलबेन और अभिजीत दीपके के बीच हुई बहस ने SIR के खिलाफ जारी प्रदर्शन को लेकर चर्चा का दायरा बढ़ा दिया है। अब सवाल केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण और चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि आंदोलन की आर्थिक व्यवस्था और विदेशी हस्तियों की टिप्पणियां भी चर्चा में हैं।

मिलबेन ने दीपके को प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत करने की सलाह दी है, जबकि दीपके ने विदेशी नागरिकों की भूमिका पर आपत्ति जताई है। दोनों के बयानों से यह साफ है कि विवाद में राजनीतिक विचारों के साथ-साथ राष्ट्रीय मामलों में बाहरी हस्तक्षेप का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है।

फिलहाल, CJP को अमेरिकी फंडिंग मिलने का दावा और दीपके की ओर से उसका खंडन, दोनों इस विवाद के प्रमुख हिस्से हैं। किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए वित्तीय तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी होगी। आने वाले समय में इस मामले पर राजनीतिक दलों, संगठन और संबंधित अधिकारियों की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर नजर रहेगी।