SME IPO में बदलाव की तैयारी, कंपनियों की मेन बोर्ड में एंट्री के लिए तय होंगे नए मानक

SME IPO में बदलाव की तैयारी, कंपनियों की मेन बोर्ड में एंट्री के लिए तय होंगे नए मानक

देश के छोटे और मझोले कारोबारों के लिए शेयर बाजार से पूंजी जुटाने की प्रक्रिया में आने वाले समय में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने छोटे एवं मझोले उद्यमों यानी SME के लिए IPO से जुड़े मौजूदा नियमों में संशोधन करने की दिशा में कदम उठाया है। बाजार नियामक ने एक कंसल्टेशन पेपर के जरिए कई नए प्रस्ताव सामने रखे हैं, जिनमें निवेश की न्यूनतम राशि, शेयर आवंटन पाने वाले निवेशकों की संख्या, कंपनियों की लाभ कमाने की क्षमता और SME प्लेटफॉर्म से मेन बोर्ड में स्थानांतरित होने के नियम शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य SME IPO बाजार को अधिक व्यवस्थित बनाना, निवेशकों के हितों की रक्षा करना और कंपनियों के लिए निर्धारित नियमों को मुख्य शेयर बाजार के प्रावधानों के अनुरूप तैयार करना है। हालांकि, ये अभी प्रस्ताव हैं और इन्हें अंतिम नियम मानने से पहले सेबी की औपचारिक मंजूरी तथा आगे की प्रक्रिया का इंतजार करना होगा।

शेयर आवंटन पाने वाले निवेशकों की संख्या में बड़ा बदलाव

सेबी के प्रस्तावों में एक महत्वपूर्ण पहलू SME IPO में शेयर पाने वाले निवेशकों की न्यूनतम संख्या बढ़ाने से संबंधित है। फिलहाल इस व्यवस्था में कम से कम 200 आवंटियों की जरूरत होती है, लेकिन नियामक इसे बढ़ाकर 500 करने पर विचार कर रहा है। इसका मतलब है कि IPO के जरिए बाजार में उतरने वाली SME कंपनियों को प्रस्तावित शर्त लागू होने पर अधिक निवेशकों तक पहुंच बनानी होगी। इस बदलाव के पीछे व्यापक निवेशक भागीदारी को बढ़ावा देने और शेयर आवंटन को सीमित संख्या में निवेशकों तक केंद्रित होने से रोकने का उद्देश्य हो सकता है। यदि किसी इश्यू में ज्यादा निवेशकों को शेयर मिलते हैं, तो कंपनी के शेयरधारकों का आधार व्यापक हो सकता है। इससे बाजार में हिस्सेदारी का वितरण अधिक लोगों के बीच होने की संभावना बनेगी। हालांकि, केवल आवंटियों की संख्या बढ़ने से किसी कंपनी के शेयरों में कारोबार की गुणवत्ता या कीमतों की स्थिरता सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए कंपनी के वित्तीय प्रदर्शन, शेयरों की मांग और बाजार में उपलब्ध तरलता जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

अब एक लाख रुपये से आवेदन करने का प्रस्ताव

SME IPO में निवेश के लिए न्यूनतम आवेदन राशि को लेकर भी सेबी ने बदलाव का सुझाव दिया है। वर्तमान व्यवस्था में न्यूनतम आवेदन राशि दो लाख रुपये तक होने के कारण कई ऐसे निवेशक इस श्रेणी के IPO से दूर रह सकते हैं, जो इतनी बड़ी रकम एक साथ लगाने में सहज नहीं हैं। नियामक ने इसे घटाकर एक लाख रुपये करने का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत न्यूनतम आवेदन चार लॉट का रखने की बात कही गई है और प्रत्येक लॉट की न्यूनतम कीमत 25,000 रुपये निर्धारित करने का सुझाव है। इस गणना के अनुसार चार लॉट के लिए निवेशक को कुल एक लाख रुपये का आवेदन करना होगा। इसके बाद आवेदन की राशि निर्धारित लॉट साइज के गुणकों के आधार पर बढ़ेगी।

इस प्रस्ताव का मकसद निवेश की शुरुआती सीमा को कुछ कम करके SME IPO में भागीदारी के अवसरों को व्यापक बनाना है। पहले जहां कम से कम दो लाख रुपये की व्यवस्था के कारण निवेशकों को अधिक पूंजी लगानी पड़ सकती थी, वहीं नई व्यवस्था लागू होने पर शुरुआती राशि आधी हो सकती है। इससे उन निवेशकों को भी अवसर मिल सकता है, जो SME कंपनियों में निवेश करना चाहते हैं, लेकिन अधिक न्यूनतम आवेदन राशि के कारण पीछे हट जाते हैं। सेबी के सामने चुनौती यह है कि निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें ऐसे शेयरों में जरूरत से ज्यादा जोखिम लेने से भी बचाया जाए। एक लाख रुपये की न्यूनतम सीमा होने के बावजूद SME IPO में निवेश जोखिम-मुक्त नहीं होगा और निवेश करने से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति, कारोबार तथा मूल्यांकन को समझना जरूरी रहेगा।

मार्केट-मेकिंग की अनिवार्यता खत्म करने पर विचार

SME सेगमेंट के नियमों में एक और प्रस्ताव मार्केट-मेकिंग की अनिवार्यता से जुड़ा है। सेबी ने SME प्लेटफॉर्म पर सूचीबद्ध कंपनियों के लिए लागू इस जरूरत को समाप्त करने का सुझाव दिया है। मार्केट-मेकिंग की व्यवस्था में निर्धारित बाजार प्रतिभागी शेयरों की खरीद और बिक्री के लिए कीमतें उपलब्ध कराने में भूमिका निभाते हैं। इसका उद्देश्य कारोबार को सुचारु बनाने और बाजार में खरीद-बिक्री के अवसर उपलब्ध कराने में मदद करना होता है। हालांकि, सेबी के नए प्रस्ताव के तहत SME कंपनियों के लिए इस अनिवार्यता को हटाने पर विचार किया जा रहा है, ताकि उनके लिए लागू नियम मुख्य बोर्ड पर सूचीबद्ध कंपनियों की व्यवस्था के अधिक करीब आ सकें।

मेन बोर्ड में इस तरह की अनिवार्यता लागू नहीं होने के कारण सेबी SME और मुख्य बोर्ड के बीच नियामकीय अंतर को कम करना चाहता है। प्रस्ताव लागू होने पर SME कंपनियों के लिए अनुपालन की कुछ मौजूदा जरूरतों में बदलाव हो सकता है। लेकिन इस कदम का असर बाजार की तरलता और छोटे शेयरों में खरीद-बिक्री पर किस तरह पड़ेगा, यह कंपनी और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। विशेष रूप से उन कंपनियों के शेयरों में, जिनमें कारोबार पहले से सीमित है, निवेशकों को खरीददार या विक्रेता मिलने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए मार्केट-मेकिंग से जुड़े किसी भी बदलाव का मूल्यांकन निवेशकों की सुरक्षा और बाजार में प्रभावी कारोबार की जरूरत को ध्यान में रखकर करना महत्वपूर्ण होगा।

मेन बोर्ड में जाने के लिए बाजार पूंजीकरण बनेगा आधार

सेबी ने SME प्लेटफॉर्म से मेन बोर्ड में स्थानांतरण यानी माइग्रेशन के लिए भी बाजार पूंजीकरण पर आधारित व्यवस्था का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत कंपनियों को उनके बाजार मूल्य के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाएगा। प्रस्ताव के मुताबिक, जिन SME-लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैपिटलाइजेशन 1,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक है, लेकिन 4,000 करोड़ रुपये से कम है, उन्हें अपनी इच्छा से मेन बोर्ड में स्थानांतरित होने की अनुमति देने पर विचार किया जा रहा है। इसका अर्थ है कि इस दायरे में आने वाली कंपनियां निर्धारित पात्रता शर्तें पूरी करने के बाद मुख्य बोर्ड में जाने का विकल्प चुन सकेंगी।

वहीं, जिन SME कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 4,000 करोड़ रुपये से अधिक होगा, उनके लिए मेन बोर्ड में माइग्रेशन अनिवार्य करने का प्रस्ताव है। इस व्यवस्था का उद्देश्य उन कंपनियों के लिए अलग रास्ता तय करना है, जिनका आकार SME प्लेटफॉर्म की सामान्य श्रेणी से काफी बड़ा हो चुका है। जैसे-जैसे किसी कंपनी का कारोबार बढ़ता है और उसका बाजार मूल्य ऊंचे स्तर पर पहुंचता है, उसके शेयरधारकों की संख्या, कारोबार और नियामकीय जरूरतें भी बदल सकती हैं। ऐसी स्थिति में मुख्य बोर्ड पर स्थानांतरण से संबंधित स्पष्ट मानक निवेशकों और कंपनियों, दोनों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। हालांकि, बाजार पूंजीकरण के आधार पर माइग्रेशन की प्रक्रिया किस तरह लागू होगी, इसके लिए अंतिम नियमों और अन्य पात्रता शर्तों को देखना जरूरी होगा।

ऑपरेटिंग प्रॉफिट की शर्त होगी सख्त

IPO के लिए कंपनियों की वित्तीय पात्रता को लेकर भी सेबी ने अहम बदलाव सुझाया है। नियामक तीन वर्षों के औसत सालाना ऑपरेटिंग प्रॉफिट की न्यूनतम आवश्यकता बढ़ाकर तीन करोड़ रुपये करने पर विचार कर रहा है। ऑपरेटिंग प्रॉफिट से आशय कंपनी के मुख्य कारोबारी संचालन से होने वाले लाभ से है। इस शर्त का महत्व इसलिए है, क्योंकि IPO के जरिए बाजार से पूंजी जुटाने वाली कंपनियों की आर्थिक स्थिति का आकलन करना निवेशकों के लिए जरूरी होता है। यदि कंपनी नियमित कारोबार से लाभ कमाने में सक्षम है, तो इससे उसके व्यवसाय की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है। हालांकि, लाभ कमाने वाली कंपनी में निवेश करना भी पूरी तरह सुरक्षित होने की गारंटी नहीं है।

प्रस्तावित बदलाव के अनुसार, कंपनियों को पिछले तीन वर्षों के औसत सालाना ऑपरेटिंग प्रॉफिट के आधार पर तय सीमा पूरी करनी होगी। तीन करोड़ रुपये की न्यूनतम शर्त लागू होने पर ऐसी कंपनियों के लिए IPO लाना कठिन हो सकता है, जो अभी अपने कारोबार को विस्तार देने के चरण में हैं या जिनका मुनाफा अपेक्षाकृत कम है। दूसरी तरफ, नियामक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में आने वाली कंपनियों के लिए वित्तीय प्रदर्शन के पर्याप्त मानक मौजूद रहें। इससे निवेशकों को कंपनियों की आर्थिक स्थिति के बारे में बेहतर आधार मिल सकता है और कमजोर वित्तीय स्थिति वाली कंपनियों के जोखिम का आकलन करना आसान हो सकता है।

मुनाफे की शर्त पूरी नहीं करने वाली कंपनियों के लिए वैकल्पिक रास्ता

सेबी ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि यदि कोई कंपनी ऑपरेटिंग प्रॉफिट की निर्धारित पात्रता पूरी नहीं कर पाती, तो उसके लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जा सकती है। हालांकि, यह विकल्प कुछ विशेष शर्तों के अधीन होगा। प्रस्ताव के मुताबिक, ऐसे IPO में कम से कम 75 प्रतिशत इश्यू क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स यानी QIBs को आवंटित किया जाना चाहिए। QIBs में नियमानुसार पात्र संस्थागत निवेशक शामिल होते हैं, जिनके पास निवेश संबंधी विशेषज्ञता और संसाधन होते हैं।

इस व्यवस्था का उद्देश्य उन कंपनियों के लिए बाजार से पूंजी जुटाने का सीमित विकल्प बनाए रखना हो सकता है, जो लाभ संबंधी शर्त पूरी नहीं करतीं, लेकिन संस्थागत निवेशकों से पर्याप्त भागीदारी हासिल कर सकती हैं। हालांकि, 75 प्रतिशत आवंटन की शर्त पूरी करना अपने आप में किसी कंपनी की गुणवत्ता या भविष्य के प्रदर्शन की गारंटी नहीं है। निवेशकों को कंपनी के कारोबार, वित्तीय विवरण, IPO से जुटाई जाने वाली रकम के इस्तेमाल और जोखिमों की जानकारी पर ध्यान देना होगा।

SME कंपनियों और निवेशकों पर क्या पड़ सकता है असर?

सेबी के प्रस्तावों का व्यापक असर SME IPO बाजार पर पड़ सकता है। न्यूनतम आवेदन राशि घटने से निवेश की शुरुआती बाधा कम हो सकती है, जबकि आवंटियों की संख्या बढ़ने से कंपनियों के शेयरधारक आधार को व्यापक बनाने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, ऑपरेटिंग प्रॉफिट की शर्त सख्त होने से कंपनियों की वित्तीय पात्रता का महत्व बढ़ेगा। बाजार पूंजीकरण के आधार पर मेन बोर्ड में माइग्रेशन की व्यवस्था बड़ी हो चुकी कंपनियों के लिए अधिक स्पष्ट ढांचा तैयार कर सकती है। मार्केट-मेकिंग से जुड़े प्रस्ताव का प्रभाव भी इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम नियम किस रूप में लागू किए जाते हैं और संबंधित शेयरों में कारोबार की स्थिति कैसी रहती है।

फिलहाल इन सभी बदलावों को प्रस्तावित सुधारों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सेबी के कंसल्टेशन पेपर में दिए गए सुझावों पर आगे की नियामकीय प्रक्रिया के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कौन-से प्रावधान अंतिम रूप से लागू होंगे और उनका क्रियान्वयन कब से शुरू होगा। निवेशकों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि न्यूनतम निवेश सीमा घटने का मतलब जोखिम कम होना नहीं है। SME कंपनियों के शेयरों में कीमतों में उतार-चढ़ाव और सीमित तरलता जैसी चुनौतियां हो सकती हैं। इसलिए किसी भी IPO में आवेदन करने से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति, कारोबार की संभावनाओं और संबंधित दस्तावेजों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए।