CJP के प्रदर्शन के बीच जानिए किन आंदोलनों ने बदली सरकार की नीति और किनकी मांगें अब भी अधूरी

CJP के प्रदर्शन के बीच जानिए किन आंदोलनों ने बदली सरकार की नीति और किनकी मांगें अब भी अधूरी

लोकतंत्र में जनता के पास अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के कई संवैधानिक तरीके होते हैं। इनमें धरना, प्रदर्शन, रैली और संसद मार्च सबसे प्रभावी माध्यम माने जाते हैं। जब किसी वर्ग को लगता है कि उसकी मांगों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है, तब वह राजधानी दिल्ली का रुख करता है ताकि उसका मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन सके। हालांकि हर आंदोलन संसद भवन तक पहुंचने में सफल नहीं होता, लेकिन कई बार बिना संसद पहुंचे भी उसका असर सरकार की नीतियों और कानूनों पर दिखाई देता है।

हाल के दिनों में काकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा घोषित संसद मार्च ने इसी मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। परीक्षा प्रणाली, कथित पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे विषयों को लेकर शुरू हुआ यह अभियान फिलहाल अपने अंतिम परिणाम का इंतजार कर रहा है। लेकिन इससे पहले भी भारत में कई ऐसे आंदोलन हुए हैं, जिन्होंने देश की राजनीति, कानून और प्रशासनिक फैसलों पर गहरी छाप छोड़ी।

CJP का मार्च क्यों बना चर्चा का विषय?

काकरोच जनता पार्टी ने परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर संसद मार्च का ऐलान किया था। संगठन का आरोप है कि लगातार सामने आ रहे कथित पेपर लीक और रोजगार से जुड़े विवादों ने लाखों युवाओं का भविष्य प्रभावित किया है। इसी के साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग भी प्रमुख एजेंडे में शामिल रही।

20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च निकालने की तैयारी की गई थी, लेकिन प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक दिया। राजधानी के कई इलाकों में बैरिकेड लगाए गए और मार्च संसद तक नहीं पहुंच सका। प्रदर्शन के दौरान कुछ स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति भी बनी। आंदोलन से पहले इसके प्रमुख चेहरों में शामिल सोनम वांगचुक को हिरासत में लेकर अस्पताल भेजे जाने की घटना भी काफी सुर्खियों में रही।

फिलहाल सरकार की ओर से इस आंदोलन की मांगों को लेकर कोई बड़ा फैसला सामने नहीं आया है, इसलिए इसके नतीजों का आकलन अभी जल्दबाजी माना जाएगा।

संसद मार्च का मतलब केवल संसद तक पहुंचना नहीं

भारत में किसी भी संसद मार्च का मकसद केवल संसद भवन के बाहर प्रदर्शन करना नहीं होता। असली उद्देश्य सरकार और पूरे देश का ध्यान किसी मुद्दे की ओर आकर्षित करना होता है। कई बार आंदोलनकारियों को राजधानी में ही रोक दिया जाता है, लेकिन यदि जनसमर्थन बढ़ता है और राजनीतिक दबाव बनता है तो सरकार को फैसले बदलने पड़ते हैं।

देश के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहां आंदोलन की सफलता संसद तक पहुंचने से नहीं, बल्कि उसके बाद हुए सरकारी फैसलों से तय हुई।

कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन बना ऐतिहासिक

साल 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में देशभर के किसानों ने दिल्ली कूच का ऐलान किया। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से हजारों किसान राजधानी पहुंचे, लेकिन उन्हें दिल्ली की सीमाओं पर रोक दिया गया।

सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर आंदोलन के प्रमुख केंद्र बने। महीनों तक चले इस आंदोलन में किसानों ने तीनों कृषि कानून वापस लेने के साथ-साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी गारंटी देने की मांग रखी।

करीब एक वर्ष तक चले आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने का फैसला किया और बाद में संसद ने इन्हें निरस्त भी कर दिया। हालांकि MSP को कानूनी दर्जा देने की मांग अभी तक पूरी नहीं हुई है, इसलिए इस आंदोलन को बड़ी लेकिन अधूरी सफलता माना जाता है।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बदली राजनीतिक दिशा

2011 में सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में शुरू हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे बड़े जन अभियानों में शामिल है। जंतर-मंतर और रामलीला मैदान इस आंदोलन के मुख्य केंद्र रहे।

इस अभियान की सबसे बड़ी मांग मजबूत लोकपाल व्यवस्था लागू करना था। देशभर में व्यापक जनसमर्थन मिलने के बाद राजनीतिक दलों पर दबाव बढ़ा और अंततः लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम अस्तित्व में आया। हालांकि आंदोलन के समर्थकों का मानना है कि कानून बनने के बावजूद भ्रष्टाचार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, इसलिए इसे आंशिक सफलता वाला आंदोलन माना जाता है।

निर्भया आंदोलन ने बदले आपराधिक कानून

दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया सामूहिक दुष्कर्म मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। घटना के बाद हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। दिल्ली के इंडिया गेट और आसपास के इलाकों में लगातार विरोध प्रदर्शन हुए।

इस अभूतपूर्व जनदबाव के बाद सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया। समिति की सिफारिशों के आधार पर आपराधिक कानूनों में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के लिए सजा कड़ी की गई और कई नए कानूनी प्रावधान जोड़े गए। हालांकि महिलाओं की सुरक्षा आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

भूमि अधिग्रहण संशोधन पर सरकार को करना पड़ा पुनर्विचार

2015 में भूमि अधिग्रहण कानून में प्रस्तावित बदलावों का किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने जोरदार विरोध किया। संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह सरकार को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।

राज्यसभा में पर्याप्त समर्थन नहीं मिलने और लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव के कारण सरकार संशोधन आगे नहीं बढ़ा सकी। यह उदाहरण बताता है कि जब सड़क और संसद दोनों जगह विरोध मजबूत हो, तब सरकार के लिए अपने प्रस्तावों को लागू करना कठिन हो जाता है।

पूर्व सैनिकों का OROP आंदोलन

वन रैंक वन पेंशन (OROP) की मांग को लेकर पूर्व सैनिकों ने वर्षों तक आंदोलन किया। जंतर-मंतर पर लगातार धरने और प्रदर्शन के बाद सरकार ने OROP लागू करने की घोषणा की।

हालांकि इसके क्रियान्वयन के तरीके और समीक्षा प्रक्रिया को लेकर बाद में भी विवाद जारी रहे, लेकिन आंदोलन अपनी प्रमुख मांग हासिल करने में काफी हद तक सफल रहा।

एससी-एसटी कानून पर जनदबाव का असर

2018 में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भारत बंद का आह्वान किया।

विरोध के बढ़ते दबाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने संसद में संशोधन विधेयक लाकर कानून के पुराने प्रावधान बहाल कर दिए। इस आंदोलन को ऐसे उदाहरण के रूप में देखा जाता है, जहां जनदबाव का सीधा असर कानून में बदलाव के रूप में सामने आया।

CAA विरोध ने छेड़ी राष्ट्रीय बहस

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में 2019 और 2020 के दौरान देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हुए। दिल्ली का शाहीन बाग इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना।

हालांकि इस आंदोलन के दौरान कानून वापस नहीं लिया गया, लेकिन नागरिकता, संविधान और नागरिक अधिकारों पर देशव्यापी बहस शुरू हुई। संसद में विपक्ष ने लगातार यह मुद्दा उठाया, जबकि समाज के विभिन्न वर्गों में इस विषय पर लंबी चर्चा चली। इसलिए इसे वैचारिक और राजनीतिक प्रभाव वाला आंदोलन माना जाता है।

लोकतंत्र में आंदोलनों की अहमियत

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बताता है कि हर आंदोलन का परिणाम एक जैसा नहीं होता। कुछ आंदोलनों से कानून बदल जाते हैं, कुछ से सरकारी नीतियां प्रभावित होती हैं और कुछ केवल जनमत तैयार करने में सफल रहते हैं। कई बार आंदोलन तुरंत असर नहीं दिखाते, लेकिन भविष्य की राजनीति और नीतियों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसी वजह से संसद मार्च को केवल इस आधार पर सफल या असफल नहीं कहा जा सकता कि प्रदर्शनकारी संसद भवन तक पहुंचे या नहीं। असली सवाल यह होता है कि क्या आंदोलन ने सरकार, संसद और समाज को उस मुद्दे पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर किया।

फिलहाल CJP का आंदोलन भी ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है। इसकी मांगों पर सरकार भविष्य में क्या रुख अपनाती है और क्या कोई नीतिगत बदलाव किए जाते हैं, यही तय करेगा कि यह आंदोलन भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में किस रूप में दर्ज होगा।

(Photo : AI Generated)