तनाव और चिंता को हल्के में न लें, डायबिटीज मरीजों के लिए मेंटल हेल्थ चेकअप क्यों है जरूरी?

तनाव और चिंता को हल्के में न लें, डायबिटीज मरीजों के लिए मेंटल हेल्थ चेकअप क्यों है जरूरी?

डायबिटीज को लंबे समय तक ऐसी बीमारी के तौर पर देखा जाता रहा है, जिसका सीधा संबंध ब्लड शुगर, खानपान, एक्सरसाइज और दवाओं से है। मरीजों को नियमित रूप से शुगर की जांच करने, डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं लेने और डाइट में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। हालांकि, अब विशेषज्ञ डायबिटीज मैनेजमेंट के एक ऐसे पहलू पर भी जोर दे रहे हैं, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। यह पहलू है मरीज की मानसिक सेहत।

डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक डायबिटीज के साथ रहने से व्यक्ति पर सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक दबाव भी बढ़ सकता है। हर दिन ब्लड शुगर पर नजर रखना, दवाओं का समय याद रखना, खाने-पीने की चीजों को लेकर सावधानी बरतना और भविष्य में बीमारी से जुड़ी जटिलताओं की चिंता करना कई मरीजों के लिए तनाव का कारण बन सकता है। यही मानसिक दबाव आगे चलकर बीमारी को मैनेज करने में भी परेशानी पैदा कर सकता है।

डायबिटीज में मानसिक परेशानी को समझना क्यों जरूरी?

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी व्यक्ति का डायबिटीज कंट्रोल में न रहना हमेशा उसकी लापरवाही या इच्छाशक्ति की कमी का संकेत नहीं होता। कई बार इसके पीछे लगातार बना हुआ मानसिक दबाव जिम्मेदार हो सकता है। मरीज बीमारी को लेकर इतना परेशान हो जाता है कि उसके लिए रोजमर्रा के उपचार से जुड़े काम भी बोझ लगने लगते हैं।

मसलन, कोई व्यक्ति बार-बार शुगर चेक करने से परेशान हो सकता है। किसी मरीज को डाइट संबंधी पाबंदियां तनाव दे सकती हैं, जबकि कुछ लोग लगातार दवाएं लेने या डॉक्टर से फॉलोअप कराने की प्रक्रिया से मानसिक रूप से थक सकते हैं। जब यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो मरीज अपने उपचार को लेकर पहले जितना सक्रिय नहीं रह पाता।

यही वजह है कि डायबिटीज की देखभाल में अब मानसिक स्वास्थ्य को भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। मरीज की शारीरिक स्थिति के साथ उसकी भावनात्मक स्थिति को समझना भी उपचार की सफलता के लिए जरूरी हो सकता है।

क्या होता है डायबिटीज डिस्ट्रेस?

डायबिटीज से जुड़ी एक महत्वपूर्ण मानसिक स्थिति को ‘डायबिटीज डिस्ट्रेस’ कहा जाता है। यह जरूरी नहीं कि इसे सीधे किसी मानसिक बीमारी के रूप में देखा जाए। दरअसल, यह लंबे समय तक बीमारी को संभालने की जिम्मेदारी से पैदा होने वाला भावनात्मक दबाव है।

ऐसे मरीजों को बार-बार यह चिंता हो सकती है कि उनकी शुगर ठीक है या नहीं, कहीं दवा छूट तो नहीं गई, खानपान में कोई गलती तो नहीं हो गई या बीमारी आगे चलकर कोई गंभीर समस्या तो पैदा नहीं करेगी। समय बीतने के साथ यह सोच व्यक्ति को मानसिक रूप से थका सकती है।

डॉक्टरों के अनुसार, डायबिटीज डिस्ट्रेस का असर मरीज के व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। व्यक्ति अपने स्वास्थ्य की देखभाल में पहले से कम रुचि लेने लगता है। कई बार वह दवाएं समय पर लेना भूल जाता है या डाइट और एक्सरसाइज को लेकर डॉक्टर की सलाह का पालन नहीं कर पाता।

इसलिए केवल ब्लड शुगर का आंकड़ा देखकर मरीज की पूरी स्थिति को समझना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। डॉक्टर को यह भी जानने की कोशिश करनी चाहिए कि मरीज बीमारी के साथ मानसिक रूप से कैसा महसूस कर रहा है।

तनाव बढ़ने पर उपचार प्रभावित हो सकता है

डायबिटीज के मरीजों के लिए तनाव एक बड़ी चुनौती बन सकता है। जब व्यक्ति लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो उसकी दिनचर्या प्रभावित होने लगती है। नींद खराब हो सकती है, शारीरिक गतिविधि कम हो सकती है और खाने-पीने की आदतों में भी बदलाव आ सकता है।

कुछ लोग तनाव के दौरान जरूरत से ज्यादा खाना शुरू कर देते हैं, जबकि कुछ लोग अपनी नियमित दिनचर्या को ही छोड़ देते हैं। अगर मरीज पहले से डायबिटीज मैनेजमेंट को लेकर दबाव महसूस कर रहा है, तो ऐसी परिस्थितियां उसके लिए समस्या और बढ़ा सकती हैं।

इसके अलावा, चिंता के कारण व्यक्ति का ध्यान बार-बार बीमारी पर जा सकता है। वह छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान हो सकता है और लगातार यह सोच सकता है कि उसकी सेहत आगे कैसी रहेगी। इस तरह का मानसिक दबाव उपचार को नियमित रूप से जारी रखना मुश्किल बना सकता है।

एंग्जायटी और डिप्रेशन के संकेतों को पहचानना जरूरी

विशेषज्ञों के मुताबिक, डायबिटीज के मरीजों में चिंता या उदासी के लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति लगातार परेशान रहता है, किसी काम में मन नहीं लगता, नींद या भूख में बड़ा बदलाव आता है, हर समय बीमारी को लेकर चिंता बनी रहती है या वह अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों और इलाज से दूरी बनाने लगता है, तो इस पर ध्यान देना जरूरी है।

ऐसे लक्षणों को केवल डायबिटीज का सामान्य हिस्सा मानकर छोड़ देना सही नहीं है। परिवार के लोगों को भी मरीज के व्यवहार में आने वाले बदलावों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। कई बार मरीज अपनी परेशानी खुद नहीं बता पाता, लेकिन उसके व्यवहार में बदलाव दिखाई देने लगते हैं।

समय रहते इन संकेतों पर ध्यान दिया जाए तो मरीज को उचित मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है।

हर बार लंबी काउंसलिंग की जरूरत नहीं

मानसिक स्वास्थ्य की जांच का नाम सुनकर कई मरीज यह सोच सकते हैं कि उन्हें लंबी काउंसलिंग या किसी विशेष उपचार की जरूरत पड़ेगी। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा जरूरी नहीं है।

डायबिटीज फॉलोअप के दौरान डॉक्टर कुछ सरल सवाल पूछकर भी यह समझ सकते हैं कि मरीज मानसिक दबाव, चिंता या भावनात्मक परेशानी से गुजर रहा है या नहीं। जरूरत पड़ने पर छोटे स्क्रीनिंग टूल्स की मदद ली जा सकती है।

इस तरह की जांच का उद्देश्य मरीज को किसी लेबल में बांधना नहीं, बल्कि समस्या की पहचान जल्दी करना है। अगर शुरुआती स्तर पर यह पता चल जाए कि मरीज बीमारी को लेकर अत्यधिक तनाव में है, तो समय रहते उसे उचित सलाह और सहायता दी जा सकती है।

परिवार का सहयोग भी बन सकता है बड़ा सहारा

डायबिटीज से जूझ रहे व्यक्ति के लिए परिवार का रवैया भी काफी मायने रखता है। कई बार मरीज को लगातार यह सुनना पड़ता है कि उसने डाइट क्यों तोड़ी, शुगर क्यों बढ़ गई या उसने समय पर दवा क्यों नहीं ली। ऐसी बातें उसकी परेशानी कम करने के बजाय मानसिक दबाव बढ़ा सकती हैं।

परिवार को मरीज को दोष देने के बजाय उसका साथ देने पर ध्यान देना चाहिए। स्वस्थ भोजन की आदत पूरे परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बनाई जा सकती है। साथ ही, नियमित वॉक या दूसरी शारीरिक गतिविधियों में मरीज का साथ दिया जा सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मरीज अपनी चिंता या परेशानी परिवार के साथ खुलकर साझा कर सके। उसे यह महसूस होना चाहिए कि डायबिटीज से जुड़ी चुनौतियों का सामना वह अकेले नहीं कर रहा है।

डायबिटीज मैनेजमेंट में मानसिक स्वास्थ्य को मिले जगह

डॉक्टरों का मानना है कि डायबिटीज का इलाज केवल शुगर की रिपोर्ट देखकर नहीं किया जाना चाहिए। हर मरीज की परिस्थितियां अलग होती हैं। किसी के लिए डाइट सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है, किसी के लिए दवाओं का नियमित सेवन और किसी अन्य व्यक्ति के लिए बीमारी से जुड़ी चिंता सबसे बड़ी परेशानी बन सकती है।

इसीलिए उपचार का तरीका भी मरीज की जरूरत के अनुसार होना चाहिए। ब्लड शुगर की निगरानी, दवाएं और खानपान जितने जरूरी हैं, उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि मरीज मानसिक तौर पर कैसा महसूस कर रहा है।

अगर तनाव या चिंता उपचार में बाधा बन रही है, तो डॉक्टर से इस बारे में बात करने में संकोच नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद भी ली जा सकती है।

बीमारी को कंट्रोल करने के लिए खुद पर अतिरिक्त दबाव न डालें

डायबिटीज लंबे समय तक चलने वाली स्थिति है, इसलिए इसे मैनेज करने की प्रक्रिया में उतार-चढ़ाव आना संभव है। हर दिन परफेक्ट डाइट या बिल्कुल सामान्य शुगर बनाए रखना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में खुद को लगातार दोष देने से मानसिक दबाव और बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि मरीज अपने डॉक्टर के साथ मिलकर ऐसा लक्ष्य तय करें, जिसे रोजमर्रा की जिंदगी में लंबे समय तक अपनाया जा सके। दवाएं समय पर लेना, संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और तनाव को संभालने की कोशिश उपचार का हिस्सा हो सकते हैं।

कुल मिलाकर, डायबिटीज को केवल शरीर से जुड़ी समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। बीमारी के साथ जीने का अनुभव मरीज की मानसिक स्थिति पर भी असर डाल सकता है। तनाव, चिंता और डायबिटीज डिस्ट्रेस को समय रहते पहचानकर उचित सहायता दी जाए तो मरीज के लिए अपनी बीमारी को बेहतर तरीके से मैनेज करना आसान हो सकता है।

इसलिए डायबिटीज की नियमित जांच के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी नजर रखना जरूरी है। मरीज की शारीरिक और मानसिक दोनों जरूरतों को ध्यान में रखकर किया गया उपचार ही लंबे समय में ज्यादा प्रभावी और व्यावहारिक साबित हो सकता है।

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