उत्तर प्रदेश सरकार धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में एकरूपता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर वर्ष 2026 से पूरे प्रदेश में ‘एक तिथि, एक त्योहार’ व्यवस्था लागू करने की तैयारी की गई है। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य व्रत, पर्व, त्योहार और धार्मिक तिथियों को लेकर हर वर्ष सामने आने वाले मतभेदों और भ्रम की स्थिति को समाप्त करना है।
नई व्यवस्था लागू होने के बाद प्रदेशभर में त्योहारों की तिथि निर्धारित करने के लिए बनारस (काशी) से प्रकाशित मानक पंचांग को आधार बनाया जाएगा। इसके आधार पर सरकारी अवकाश, धार्मिक पर्व, व्रत और विशेष अवसरों की तिथियां तय होंगी। इससे प्रदेश के अलग-अलग जिलों में एक ही त्योहार अलग-अलग दिनों में मनाए जाने की स्थिति समाप्त होने की उम्मीद जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार, इस प्रस्ताव का प्रारूप काशी विद्वत परिषद द्वारा तैयार किया जा चुका है। परिषद की ओर से इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपा जाएगा, जिसके बाद आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

काशी विद्वत परिषद ने तैयार किया विस्तृत प्रारूप, विशेषज्ञों की टीम करेगी पंचांग का निर्धारण
काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार, प्रदेश में धार्मिक तिथियों को लेकर एक समान व्यवस्था लागू करने के लिए लंबे समय से विद्वानों के बीच चर्चा चल रही थी। अब इस दिशा में ठोस पहल की गई है और पंचांग निर्माण के लिए विशेषज्ञों की एक टीम गठित की गई है।
इस टीम में ज्योतिषाचार्य, संस्कृत विद्वान, पंचांगकार और कालगणना के विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं। इनका कार्य आगामी वर्षों के लिए वैज्ञानिक और शास्त्रीय आधार पर तिथियों का निर्धारण करना होगा, ताकि पूरे उत्तर प्रदेश में एक ही पंचांग के अनुसार धार्मिक पर्व मनाए जा सकें।
विशेषज्ञों का कहना है कि पंचांग निर्माण केवल तिथि लिखने तक सीमित प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि इसमें ग्रहों की स्थिति, नक्षत्र, योग, करण, सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रमा की गति और विभिन्न कालखंडों का विस्तृत अध्ययन शामिल होता है। इसी आधार पर किसी व्रत या पर्व की वास्तविक तिथि निर्धारित की जाती है।
2026 के नवसंवत्सर से होगा आधिकारिक प्रकाशन
हाल ही में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में आयोजित ज्योतिष सम्मेलन के दौरान इस प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की गई। सम्मेलन में मौजूद विद्वानों ने प्रदेशभर में एक समान पंचांग लागू करने की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।
योजना के अनुसार नवसंवत्सर 2026 (संवत 2083) से इस नए पंचांग का आधिकारिक प्रकाशन किया जाएगा। इस कार्य की जिम्मेदारी अन्नपूर्णा मठ मंदिर को सौंपी जाएगी। प्रकाशित पंचांग को प्रदेशभर में मानक पंचांग के रूप में स्वीकार करने की तैयारी की जा रही है।
सरकार का उद्देश्य है कि धार्मिक आयोजनों, सार्वजनिक अवकाशों और सामाजिक कार्यक्रमों में तिथियों को लेकर किसी प्रकार का भ्रम न रहे तथा सभी स्थानों पर एक समान तिथि का पालन किया जाए।
काशी के विभिन्न पंचांगों में पहले ही लाई जा चुकी है एकरूपता
धार्मिक विद्वानों के अनुसार, इस दिशा में पिछले तीन वर्षों से लगातार कार्य किया जा रहा था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय, काशी विद्वत परिषद तथा विभिन्न पंचांगकारों के बीच कई चरणों में विचार-विमर्श हुआ, जिसके बाद काशी में प्रकाशित प्रमुख पंचांगों के बीच मौजूद अंतर को समाप्त किया गया।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इस नई व्यवस्था की शुरुआत काशी स्तर पर लागू हो चुकी है। इसमें बीएचयू का विश्व पंचांग, ऋषिकेश पंचांग, महावीर पंचांग, गणेश आपा पंचांग, आदित्य पंचांग और ठाकुर प्रसाद पंचांग सहित कई प्रमुख पंचांग शामिल हैं।
इन सभी पंचांगों में तिथियों और पर्व निर्धारण की प्रक्रिया को एक समान बनाए जाने के बाद अब इसी मॉडल को पूरे उत्तर प्रदेश में लागू करने की तैयारी की जा रही है।
किन-किन त्योहारों की तिथियों में समाप्त होगा अंतर?
नई व्यवस्था लागू होने के बाद अनेक प्रमुख हिंदू पर्वों और व्रतों की तिथियों को लेकर होने वाला भ्रम समाप्त हो सकता है। कई बार अलग-अलग पंचांगों के कारण प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में एक ही त्योहार अलग-अलग दिन मनाया जाता रहा है।
एक समान पंचांग लागू होने के बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, चैत्र नवरात्र, राम नवमी, अक्षय तृतीया, गंगा दशहरा, रक्षाबंधन, श्रावणी पर्व, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, पितृ पक्ष, महालया अमावस्या, विजयादशमी, दीपावली, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, अन्नकूट, गोवर्धन पूजा, भैया दूज, कार्तिक एकादशी, देव दीपावली, शरद पूर्णिमा, सूर्य षष्ठी (छठ), मकर संक्रांति (खिचड़ी) तथा होली जैसे प्रमुख पर्वों की तिथि पूरे प्रदेश में समान रूप से निर्धारित की जाएगी।
इससे धार्मिक संस्थाओं, मंदिरों, आश्रमों, शिक्षण संस्थानों और सरकारी विभागों को भी कार्यक्रमों की योजना बनाने में सुविधा मिलेगी।
पंचांग निर्माण में किन सिद्धांतों का रखा जाता है ध्यान?
बीएचयू के ज्योतिष विभाग के प्रो. विनय पांडेय के अनुसार, धार्मिक तिथियों का निर्धारण केवल उदया तिथि के आधार पर नहीं किया जाता। प्रत्येक व्रत और पर्व के लिए शास्त्रों में अलग-अलग नियम निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन आवश्यक होता है।
उन्होंने बताया कि उदाहरण के लिए राम नवमी के पर्व में मध्याह्नव्यापिनी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इसी प्रकार दीपावली के लिए प्रदोषकाल, जबकि महाशिवरात्रि और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए अर्द्धरात्रि काल का विशेष महत्व होता है।
सामान्य व्रतों और पर्वों में कई बार उदया तिथि को आधार माना जाता है, लेकिन सभी धार्मिक अवसरों के लिए यही नियम लागू नहीं होता। इसलिए पंचांग तैयार करते समय प्रत्येक पर्व के लिए अलग-अलग शास्त्रीय मानकों का अध्ययन किया जाता है।
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, किसी भी धार्मिक तिथि का निर्धारण करते समय तिथि, नक्षत्र, योग, करण, वार, सूर्योदय, सूर्यास्त और संबंधित कालखंडों का विस्तृत गणितीय विश्लेषण किया जाता है। यही कारण है कि पंचांग निर्माण एक अत्यंत जटिल और विशेषज्ञता वाला कार्य माना जाता है।
धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में मिलेगी सुविधा
विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे प्रदेश में एक समान पंचांग लागू होने से मंदिर समितियों, धार्मिक संगठनों, सामाजिक संस्थाओं और प्रशासन को कार्यक्रम आयोजित करने में सुविधा मिलेगी। अभी कई बार अलग-अलग पंचांगों के कारण धार्मिक आयोजनों की तिथियों में अंतर देखने को मिलता है, जिससे श्रद्धालुओं के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।
नई व्यवस्था के लागू होने के बाद विवाह मुहूर्त, व्रत, पूजन, धार्मिक अनुष्ठान और सार्वजनिक आयोजनों के लिए भी एक समान संदर्भ उपलब्ध होगा। इससे धार्मिक कैलेंडर तैयार करने वाले संस्थानों और सरकारी विभागों के बीच भी बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकेगा।
सरकारी अवकाश निर्धारण में भी मिल सकती है एकरूपता
धार्मिक तिथियों में एकरूपता आने के बाद सरकारी अवकाशों के निर्धारण की प्रक्रिया भी अधिक स्पष्ट हो सकती है। वर्तमान में विभिन्न पंचांगों के आधार पर कभी-कभी तिथियों को लेकर अलग-अलग मत सामने आते हैं, जिससे लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बन जाती है।
मानक पंचांग लागू होने के बाद प्रशासनिक स्तर पर अवकाश सूची तैयार करना अधिक व्यवस्थित हो सकता है। इसके साथ ही स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, सरकारी कार्यालयों और अन्य संस्थानों को भी त्योहारों की तिथियों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध होंगे।
समाज में भ्रम की स्थिति दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि एक समान पंचांग लागू होने से श्रद्धालुओं, धार्मिक संस्थाओं और आम लोगों के बीच वर्षों से चली आ रही तिथियों संबंधी असमंजस की स्थिति काफी हद तक समाप्त हो सकती है। एक ही त्योहार अलग-अलग दिनों में मनाए जाने से उत्पन्न होने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को भी कम किया जा सकेगा।
काशी विद्वत परिषद और ज्योतिष विशेषज्ञों का कहना है कि शास्त्रीय परंपराओं का पालन करते हुए यदि पूरे प्रदेश में एक समान पंचांग का उपयोग किया जाता है, तो धार्मिक आयोजनों में समन्वय बढ़ेगा और लोगों को प्रमाणिक तिथियों की जानकारी एक ही स्रोत से उपलब्ध हो सकेगी। इसके लिए विद्वानों द्वारा तैयार किया जा रहा पंचांग आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश के लिए एक मानक संदर्भ के रूप में कार्य करेगा।




