Zero Burning, Double Earning! Punjab सरकार का Action Plan-2025: पराली अब ‘Green Gold’

पंजाब सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए ‘एक्शन प्लान-2025’ किया लागू, फसल अवशेष को संसाधन बनाकर प्रदूषण कम करने और किसानों की आय बढ़ाने पर जोर

उत्तर भारत में धान की कटाई के बाद पराली प्रबंधन हर वर्ष एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में बड़ी मात्रा में धान का अवशेष (पराली) निकलता है। समय की कमी, अगली फसल की तैयारी और सीमित संसाधनों के कारण कई किसान पराली जलाने का विकल्प अपनाते हैं, जिससे वायु प्रदूषण, धुंध (स्मॉग), मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं।

इसी चुनौती से निपटने के उद्देश्य से पंजाब सरकार ने मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में ‘एक्शन प्लान-2025’ लागू किया है। इस योजना का उद्देश्य केवल पराली जलाने की घटनाओं को कम करना ही नहीं, बल्कि फसल अवशेष को आर्थिक संसाधन के रूप में विकसित करना भी है। सरकार का कहना है कि यदि पराली का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाए तो इसे बायो-एनर्जी, बायोगैस, जैविक खाद, बायो-सीएनजी, औद्योगिक ईंधन और बिजली उत्पादन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग किया जा सकता है।

योजना के तहत आधुनिक कृषि मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने, डिजिटल तकनीक के उपयोग, किसानों के प्रशिक्षण, जागरूकता अभियानों और निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से पराली प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने की रणनीति तैयार की गई है। सरकार का मानना है कि इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।

पराली प्रबंधन की आवश्यकता क्यों महसूस की गई

धान की कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में फसल अवशेष बच जाता है। गेहूं की बुवाई के लिए समय कम होने के कारण कई किसान खेत को जल्दी तैयार करने के उद्देश्य से पराली जलाते हैं। यह तरीका तत्काल समाधान तो देता है, लेकिन इसके दीर्घकालिक दुष्प्रभाव गंभीर माने जाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने से वातावरण में सूक्ष्म कण (PM2.5 और PM10), कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा अन्य प्रदूषक गैसों का उत्सर्जन होता है। इससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और आसपास के क्षेत्रों में धुंध की स्थिति बन जाती है। इसके अलावा मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो जाते हैं, जिससे भूमि की उर्वरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

इसी कारण पिछले कुछ वर्षों से पराली के वैकल्पिक उपयोग और वैज्ञानिक प्रबंधन पर लगातार जोर दिया जा रहा है।

‘हरा सोना’ बनाने की अवधारणा

पंजाब सरकार ने इस योजना में पराली को समस्या के बजाय संसाधन के रूप में देखने का दृष्टिकोण अपनाया है। सरकार का कहना है कि यदि फसल अवशेष का उचित उपयोग किया जाए तो यह किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है।

योजना के अनुसार पराली का उपयोग बायोगैस उत्पादन, बिजली निर्माण, बायो-सीएनजी, जैविक खाद, औद्योगिक ईंधन तथा अन्य ऊर्जा परियोजनाओं में किया जाएगा। इससे एक ओर खुले में पराली जलाने की घटनाएं कम होंगी, वहीं दूसरी ओर कृषि अपशिष्ट का उत्पादक उपयोग संभव हो सकेगा।

पटियाला पायलट परियोजना से मिले अनुभव

सरकार के अनुसार वर्ष 2024 में पटियाला जिले के 17 गांवों में पराली प्रबंधन से जुड़ा एक पायलट प्रोजेक्ट संचालित किया गया था। इस परियोजना का उद्देश्य आधुनिक मशीनों, जागरूकता कार्यक्रमों और स्थानीय सहभागिता के माध्यम से पराली जलाने की घटनाओं को कम करना था।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार पायलट परियोजना के दौरान संबंधित क्षेत्रों में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। सरकार का दावा है कि आग की घटनाओं की संख्या में भी पिछले वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली।

इन अनुभवों के आधार पर राज्य सरकार ने इस मॉडल का विस्तार पूरे पंजाब में करने की योजना तैयार की है।

500 करोड़ रुपये का राज्य बजट

एक्शन प्लान-2025 के क्रियान्वयन के लिए पंजाब सरकार ने लगभग 500 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान किया है। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार की ओर से भी लगभग 150 करोड़ रुपये का सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है।

इस राशि का उपयोग कृषि मशीनों पर सब्सिडी, प्रशिक्षण कार्यक्रम, जागरूकता अभियान, डिजिटल सेवाओं के विस्तार और अन्य प्रबंधन गतिविधियों में किया जाएगा।

सरकार का कहना है कि पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध होने से किसानों के लिए आधुनिक तकनीक अपनाना पहले की तुलना में अधिक आसान होगा।

आधुनिक कृषि मशीनों की उपलब्धता बढ़ेगी

पराली प्रबंधन में आधुनिक कृषि मशीनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। योजना के तहत किसानों को सुपर सीडर, बेलर, रेक, हैप्पी सीडर और अन्य फसल अवशेष प्रबंधन उपकरण सब्सिडी पर उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

सरकारी जानकारी के अनुसार 15,000 से अधिक मशीनों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा वर्ष 2025 के दौरान 4,367 नई सब्सिडी वाली मशीनें उपलब्ध कराने तथा 1,500 कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) स्थापित करने की योजना बनाई गई है।

कस्टम हायरिंग सेंटर के माध्यम से वे किसान भी मशीनों का उपयोग कर सकेंगे, जिनके पास स्वयं उपकरण खरीदने की क्षमता नहीं है।

पराली से ऊर्जा उत्पादन की योजना

सरकार के अनुसार लगभग 7.06 मिलियन टन पराली का उपयोग बायोगैस, बिजली और अन्य ऊर्जा स्रोतों के उत्पादन में किए जाने की योजना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि अवशेष का बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग विकसित किया जाता है तो इससे किसानों को पराली बेचने का विकल्प मिलेगा और खुले में जलाने की आवश्यकता कम हो सकती है।

इसके साथ ही कृषि अपशिष्ट आधारित ऊर्जा उत्पादन से स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।

डिजिटल तकनीक, जागरूकता अभियान और वैकल्पिक कृषि पद्धतियों पर रहेगा विशेष फोकस

‘कृषि यंत्र साथी’ मोबाइल एप की शुरुआत

योजना के अंतर्गत डिजिटल सेवाओं को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सरकार ने किसानों के लिए ‘कृषि यंत्र साथी’ (KYS) मोबाइल एप विकसित किया है, जिसके माध्यम से किसान कृषि उपकरणों की उपलब्धता, बुकिंग और उपयोग संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का उद्देश्य मशीनों तक किसानों की आसान पहुंच सुनिश्चित करना तथा कृषि कार्यों की बेहतर योजना बनाना है।

व्यापक जागरूकता अभियान

सरकार का कहना है कि केवल मशीनें उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि किसानों में वैज्ञानिक पराली प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है। इसी उद्देश्य से पूरे राज्य में बड़े स्तर पर सूचना, शिक्षा और संचार (IEC) गतिविधियां संचालित की जाएंगी।

योजना के अनुसार लगभग 3,333 गांवों में जागरूकता शिविर आयोजित किए जाएंगे तथा 296 ब्लॉक स्तर के कार्यक्रमों के माध्यम से किसानों को पराली प्रबंधन के विभिन्न विकल्पों की जानकारी दी जाएगी।

इसके अलावा प्रेरक वीडियो, डिजिटल प्रचार सामग्री, मोबाइल अभियान और स्थानीय कार्यक्रमों के माध्यम से भी किसानों तक जानकारी पहुंचाई जाएगी।

‘उन्नत सिंह’ मास्कॉट और जनसंपर्क अभियान

सरकार ने जनजागरूकता अभियान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए ‘उन्नत सिंह’ नामक शुभंकर (मास्कॉट) का भी उपयोग करने की योजना बनाई है। इसके माध्यम से गांव-गांव जाकर किसानों को पराली प्रबंधन के लाभ समझाने का प्रयास किया जाएगा।

इसके अतिरिक्त प्रचार सामग्री जैसे कैलेंडर, टी-शर्ट, कप, टोट बैग और अन्य सूचना सामग्री भी किसानों तक पहुंचाई जाएगी ताकि अभियान का संदेश अधिक व्यापक स्तर पर प्रसारित हो सके।

स्वास्थ्य पर प्रभाव को लेकर सरकार की चिंता

स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वायु गुणवत्ता को प्रभावित करता है, जिससे विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों तथा श्वसन संबंधी रोगों से पीड़ित लोगों को अधिक परेशानी हो सकती है।

धुंध और वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा, एलर्जी, आंखों में जलन तथा सांस लेने में कठिनाई जैसी समस्याओं के मामले बढ़ने की आशंका रहती है। इसी कारण पराली प्रबंधन को केवल कृषि या पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा भी माना जा रहा है।

आग की घटनाओं में कमी का सरकारी दावा

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PPCB) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 15 से 27 सितंबर 2025 के दौरान राज्य में पराली जलाने की 82 घटनाएं दर्ज की गईं, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम बताई गई हैं।

सरकार का कहना है कि आधुनिक मशीनों, जागरूकता अभियानों और स्थानीय स्तर पर बेहतर समन्वय के कारण आग की घटनाओं में कमी आने लगी है। हालांकि पूरे सीजन के दौरान वास्तविक प्रभाव का आकलन विस्तृत आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा।

डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस (DSR) को मिलेगा बढ़ावा

एक्शन प्लान-2025 के अंतर्गत लगभग 5 लाख एकड़ क्षेत्र में डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस (DSR) तकनीक को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य रखा गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक पानी की बचत, श्रम लागत में कमी तथा कृषि प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक हो सकती है। यदि इसका व्यापक स्तर पर उपयोग बढ़ता है तो कृषि क्षेत्र में संसाधनों के बेहतर उपयोग की संभावना भी बढ़ सकती है।

बायोमास आधारित परियोजनाओं पर भी कार्य

सरकार ने जानकारी दी है कि बायोमास आधारित ऊर्जा परियोजनाओं और बायोगैस संयंत्रों के विकास की दिशा में भी कार्य किया जाएगा। इसके लिए विभिन्न संस्थाओं और तकनीकी विशेषज्ञों के सहयोग से संभावित परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है।

यदि इन परियोजनाओं का विस्तार होता है तो किसानों के लिए पराली बेचने का अतिरिक्त विकल्प विकसित हो सकता है। साथ ही कृषि अवशेष आधारित ऊर्जा उत्पादन को भी प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ मिलने की संभावना है।

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