अनशन के दौरान अगर किसी प्रदर्शनकारी की मौत हो जाए तो क्या सरकार पर बनता है केस? जानिए कानून क्या कहता है

दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन ने एक बार फिर देशभर में कानूनी और संवैधानिक बहस को तेज कर दिया है। लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी मांगों को लेकर लंबे समय तक भूख हड़ताल करता है और इसी दौरान उसकी मृत्यु हो जाती है, तो क्या सरकार को इसके लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? क्या ऐसी स्थिति में सरकार के खिलाफ हत्या या लापरवाही का मामला दर्ज हो सकता है, या फिर कानून इसे अलग नजरिए से देखता है?

भारत में विरोध-प्रदर्शन करना नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है। संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि जब कोई व्यक्ति अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल या आमरण अनशन का रास्ता अपनाता है, तब मामला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन के अधिकार, प्रशासन की जिम्मेदारी और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे कई कानूनी पहलुओं से भी जुड़ जाता है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से भोजन और पानी का त्याग करता है और किसी के दबाव या मजबूरी में ऐसा नहीं कर रहा है, तो इसे उसका व्यक्तिगत निर्णय माना जाता है। ऐसी स्थिति में यदि उसकी तबीयत बिगड़ती है या दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो जाती है, तो केवल इस आधार पर सरकार के खिलाफ हत्या या गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार ने उस व्यक्ति को भूखा रहने के लिए बाध्य नहीं किया होता।

हालांकि इसका यह अर्थ भी नहीं है कि प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। भारतीय न्यायपालिका कई मामलों में स्पष्ट कर चुकी है कि प्रत्येक नागरिक के जीवन की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर लंबे समय से अनशन कर रहा है, तो प्रशासन पर यह जिम्मेदारी होती है कि उसकी स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार नजर रखी जाए, नियमित मेडिकल जांच कराई जाए और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जाए।

यदि प्रशासन को डॉक्टरों की रिपोर्ट से यह संकेत मिलता है कि अनशनकारी की जान को गंभीर खतरा है, तो सरकार और जिला प्रशासन के पास हस्तक्षेप करने का अधिकार होता है। कई मामलों में प्रशासन व्यक्ति को अस्पताल में भर्ती कराकर इलाज शुरू कराता है। यदि चिकित्सक आवश्यक समझें तो ड्रिप या अन्य जीवनरक्षक उपचार भी दिए जा सकते हैं। इसका उद्देश्य किसी आंदोलन को समाप्त करना नहीं, बल्कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना होता है।

भारत में पहले भूख हड़ताल करने वाले लोगों के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाती थी। इसका सबसे चर्चित उदाहरण मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला का मामला रहा, जिन्हें लंबे समय तक आमरण अनशन के दौरान बार-बार हिरासत में लिया गया और चिकित्सा निगरानी में रखा गया। लेकिन समय के साथ कानूनी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं।

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम लागू होने और कानून में हुए संशोधनों के बाद अब आत्महत्या के प्रयास से जुड़े मामलों को पहले की तुलना में अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है। कानून यह मानता है कि यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार का कदम उठाता है, तो उसके पीछे मानसिक तनाव, सामाजिक परिस्थितियां या अन्य गंभीर कारण हो सकते हैं। इसलिए अब ऐसे मामलों में केवल दंडात्मक कार्रवाई ही एकमात्र विकल्प नहीं माना जाता, बल्कि व्यक्ति के स्वास्थ्य और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है।

अनशन के मामलों में प्रशासन की भूमिका केवल निगरानी तक सीमित नहीं रहती। यदि संबंधित अधिकारियों को समय रहते स्वास्थ्य संबंधी गंभीर संकेत मिलते हैं और इसके बावजूद वे आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था नहीं करते, तो ऐसी लापरवाही की जांच की जा सकती है। अदालत या मानवाधिकार आयोग यह देख सकते हैं कि प्रशासन ने अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन किया या नहीं। यदि यह साबित हो जाए कि समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई या जानबूझकर आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है।

हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ऐसी स्थिति में भी सरकार पर स्वतः हत्या का मामला नहीं बनता। प्रत्येक घटना के तथ्य, परिस्थितियां और प्रशासन की ओर से उठाए गए कदमों का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाता है। न्यायालय इस बात पर भी विचार करता है कि क्या प्रशासन ने उपलब्ध कानूनी अधिकारों का उचित उपयोग किया था और क्या जीवन बचाने के लिए सभी आवश्यक प्रयास किए गए थे।

एक अन्य महत्वपूर्ण कानूनी पहलू उन लोगों से जुड़ा है जो अनशनकारी को किसी भी कीमत पर भूख हड़ताल जारी रखने के लिए प्रेरित या दबाव डालते हैं। यदि कोई व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक समूह जानबूझकर किसी अनशनकारी को इलाज लेने से रोकता है, डॉक्टरों की सलाह मानने से मना करता है या उसे ऐसे कदम उठाने के लिए उकसाता है जिससे उसकी जान को खतरा बढ़ जाए, तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई संभव है। परिस्थितियों के आधार पर भारतीय दंड संहिता अथवा वर्तमान लागू आपराधिक कानूनों के संबंधित प्रावधानों के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने, आपराधिक षड्यंत्र या अन्य अपराधों की जांच की जा सकती है।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन और धरना-प्रदर्शन को नागरिक अधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण रूप से असीमित नहीं है। राज्य का दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों के जीवन और सुरक्षा की रक्षा करना भी है। यही कारण है कि लंबे समय तक चलने वाले अनशनों के दौरान प्रशासनिक और चिकित्सकीय निगरानी लगातार जारी रखी जाती है।

संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। इसी अनुच्छेद की व्यापक व्याख्या करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में कहा है कि राज्य पर नागरिकों के जीवन की रक्षा करने का सकारात्मक दायित्व भी है। इसलिए यदि किसी अनशनकारी की स्थिति लगातार बिगड़ रही हो, तो प्रशासन हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता। उसे कानून के दायरे में रहकर आवश्यक कदम उठाने पड़ते हैं।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अनशन एक शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध का माध्यम हो सकता है, लेकिन जब यह व्यक्ति के जीवन के लिए गंभीर खतरा बन जाए, तब सरकार और प्रशासन के सामने संतुलन बनाने की चुनौती खड़ी हो जाती है। एक ओर नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करना होता है, वहीं दूसरी ओर उसके जीवन की रक्षा करना भी संवैधानिक जिम्मेदारी होती है।

कुल मिलाकर, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से आमरण अनशन करता है और दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो जाती है, तो केवल इसी आधार पर सरकार के खिलाफ हत्या या गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। हालांकि प्रशासन पर यह कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारी अवश्य रहती है कि वह समय-समय पर स्वास्थ्य की निगरानी करे, चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराए और जान बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाए। यदि इन दायित्वों के निर्वहन में गंभीर लापरवाही सामने आती है, तो न्यायालय या मानवाधिकार संस्थाएं प्रशासन की जवाबदेही तय कर सकती हैं। वहीं यदि किसी व्यक्ति या संगठन द्वारा अनशनकारी को चिकित्सा सहायता लेने से रोका जाता है या उसे जानबूझकर ऐसे कदम उठाने के लिए उकसाया जाता है जिससे उसकी जान को खतरा बढ़े, तो उनके खिलाफ भी कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।