लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने अपनी 26 दिनों की भूख हड़ताल समाप्त करने के बाद उन तमाम आरोपों का जवाब दिया है, जिनमें उन पर सरकार से किसी तरह की ‘डील’ करने का दावा किया जा रहा था। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं और सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों की ओर से लगातार सवाल उठाए जाने के बाद वांगचुक ने एक वीडियो संदेश जारी किया। इस वीडियो में उन्होंने बेहद भावुक अंदाज में कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि 26 दिनों तक बिना भोजन के संघर्ष करने के बावजूद अब उनकी नीयत और ईमानदारी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं।
इधर जंतर-मंतर पर विपक्षी नेताओं और सामाजिक संगठनों की गतिविधियां जारी रहीं, वहीं दूसरी ओर वांगचुक का यह वीडियो तेजी से चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने अपने आंदोलन को किसी दबाव या समझौते की वजह से नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परिस्थितियों और मिले लिखित आश्वासनों के आधार पर समाप्त किया। इसके बावजूद यदि लोग उनके संघर्ष को संदेह की नजर से देख रहे हैं तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
वीडियो की शुरुआत में ही सोनम वांगचुक ने कहा कि यह संदेश वह खुशी से नहीं, बल्कि गहरी पीड़ा और हैरानी के साथ रिकॉर्ड कर रहे हैं। उनका कहना था कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि अपने जीवन के सबसे कठिन संघर्षों में से एक पूरा करने के बाद उन्हें अपनी ईमानदारी का बचाव भी करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति के लिए लगातार 26 दिनों तक भूखे रहना आसान नहीं होता और यह फैसला उन्होंने केवल अपने व्यक्तिगत हित के लिए नहीं, बल्कि लद्दाख और वहां के लोगों की मांगों को लेकर लिया था।
वांगचुक ने बताया कि इतने लंबे उपवास के दौरान उनके शरीर पर गंभीर असर पड़ा। उन्होंने कहा कि इस अवधि में उनका लगभग 11 किलोग्राम वजन कम हो गया। शरीर की मांसपेशियां कमजोर हो गईं और लगातार कमजोरी की वजह से सामान्य रूप से चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया। उन्होंने कहा कि मानसिक और शारीरिक दोनों स्तरों पर उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने आंदोलन को अंत तक जारी रखा क्योंकि उन्हें अपने उद्देश्य पर भरोसा था।
उन्होंने कहा कि आंदोलन के दौरान कई बार ऐसी स्थिति आई जब उन्हें जमीन पर लेटना पड़ा। शरीर में ऊर्जा लगभग समाप्त हो चुकी थी, लेकिन फिर भी वह लोगों की उम्मीदों के कारण संघर्ष करते रहे। उनके अनुसार, जिस समय उन्होंने अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया, तब भी उनकी प्राथमिकता केवल आंदोलन की दिशा और लद्दाख के हित थे, न कि व्यक्तिगत सुविधा।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज हो गई थी कि सोनम वांगचुक ने किसी समझौते के तहत अपना अनशन खत्म किया है। कुछ लोगों ने यहां तक आरोप लगाया कि उन्होंने सरकार के साथ गुप्त बातचीत की और उसी के बाद आंदोलन वापस लिया। इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए वांगचुक ने कहा कि यदि उनका उद्देश्य किसी प्रकार का सौदा करना होता तो उन्हें 26 दिनों तक भीषण गर्मी में भूखे रहने की आवश्यकता ही नहीं थी।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति केवल समझौता करना चाहता है तो वह आरामदायक माहौल में बैठकर भी ऐसा कर सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर कोई व्यक्ति दिल्ली की गर्मी में लगातार भूखा रहकर अपनी जान जोखिम में क्यों डालेगा, यदि उसका मकसद केवल किसी तरह का लाभ हासिल करना हो। उन्होंने कहा कि ऐसे आरोप न केवल उनके संघर्ष का अपमान हैं, बल्कि उन हजारों लोगों का भी अनादर हैं जिन्होंने आंदोलन के दौरान उनका साथ दिया।
वांगचुक ने अपने स्वास्थ्य की स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि चिकित्सकों की सलाह के बाद अब उन्होंने धीरे-धीरे तरल पदार्थ लेना शुरू किया है ताकि शरीर को दोबारा सामान्य स्थिति में लाया जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि लंबे उपवास के बाद अचानक सामान्य भोजन करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है, इसलिए डॉक्टरों की निगरानी में ही उनकी रिकवरी की प्रक्रिया चल रही है।
उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों से उन्हें लगातार फोन कॉल और संदेश मिल रहे हैं। कई लोग उनसे पूछ रहे हैं कि उन्होंने अनशन किसके कहने पर समाप्त किया और क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक समझौता हुआ है। वांगचुक ने कहा कि ऐसे सवाल उन्हें बेहद दुख पहुंचाते हैं क्योंकि उन्होंने हमेशा पारदर्शिता के साथ अपनी बात रखी है और कभी भी अपने आंदोलन को व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं बनाया।
अपने संदेश में उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि आखिर किसी आंदोलनकारी को अपनी निष्ठा साबित करने के लिए कितनी परीक्षाएं देनी पड़ेंगी। उन्होंने कहा कि क्या 26 दिनों तक भोजन छोड़ देना भी पर्याप्त नहीं है? क्या इसके बाद भी किसी व्यक्ति को बार-बार यह साबित करना पड़ेगा कि उसका संघर्ष ईमानदार था? उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति और आंदोलन स्वाभाविक हैं, लेकिन किसी के त्याग पर बिना सबूत सवाल उठाना उचित नहीं कहा जा सकता।
वांगचुक ने यह भी याद दिलाया कि वह लद्दाख की कठिन जलवायु से निकलकर दिल्ली पहुंचे थे, जहां गर्मी और उमस के बीच उन्होंने अपना आंदोलन जारी रखा। उन्होंने कहा कि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि उनकी आवाज देश तक पहुंचेगी। ऐसे में जब लोग उनके इरादों पर शक करते हैं तो यह व्यक्तिगत रूप से उन्हें बहुत आहत करता है।
उन्होंने अपने समर्थकों से अपील की कि वे अफवाहों पर भरोसा न करें और आंदोलन के मूल उद्देश्य को याद रखें। उनके अनुसार, किसी भी जनआंदोलन की ताकत लोगों के विश्वास में होती है और यदि वही विश्वास कमजोर पड़ जाए तो लोकतांत्रिक संघर्ष भी प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि उनका संकल्प आज भी पहले जैसा ही मजबूत है और भविष्य में भी वह लद्दाख से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाते रहेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच जंतर-मंतर पर भी आंदोलन और राजनीतिक गतिविधियां जारी रहीं। विपक्ष के कुछ नेताओं ने सरकार की भूमिका पर सवाल उठाए, जबकि कुछ ने वांगचुक के फैसले को लेकर अपनी अलग-अलग राय व्यक्त की। हालांकि, वांगचुक ने अपने वीडियो में किसी राजनीतिक दल का नाम लिए बिना केवल उन लोगों को जवाब दिया जिन्होंने उनके संघर्ष की मंशा पर संदेह जताया था।
उन्होंने अंत में कहा कि उन्हें सबसे अधिक पीड़ा इस बात से हुई कि जिन लोगों के लिए उन्होंने अपना स्वास्थ्य दांव पर लगाया, उन्हीं के बीच कुछ लोग बिना किसी आधार के आरोप लगाने लगे। उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विचारों का मतभेद हो सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के त्याग और समर्पण को झूठा साबित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि लोग उनके संघर्ष को उसके वास्तविक उद्देश्य के साथ समझेंगे और लद्दाख के मुद्दों पर गंभीर चर्चा आगे भी जारी रहेगी।
सोनम वांगचुक का यह वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों और सोशल मीडिया पर नई बहस शुरू हो गई है। एक ओर उनके समर्थक इसे उनकी भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विरोधियों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। फिलहाल, वांगचुक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने कोई गुप्त समझौता नहीं किया और उनका आंदोलन केवल जनहित तथा लद्दाख के भविष्य से जुड़े मुद्दों के लिए था। उनके इस बयान के बाद अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आगे सरकार और आंदोलन से जुड़े पक्षों के बीच क्या कदम उठाए जाते हैं और लद्दाख से संबंधित मांगों पर क्या प्रगति होती है।




