समुद्र में होने वाले युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब केवल बड़े युद्धपोत, पनडुब्बियां और लड़ाकू विमान ही निर्णायक भूमिका नहीं निभा रहे, बल्कि बिना चालक वाले छोटे समुद्री ड्रोन (Unmanned Surface Vessels-USV) भी आधुनिक युद्ध का अहम हिस्सा बनते जा रहे हैं। हाल ही में अमेरिका ने पहली बार वास्तविक सैन्य कार्रवाई में ऐसे समुद्री ड्रोन का इस्तेमाल करते हुए ईरान के रणनीतिक बंदर अब्बास नौसैनिक अड्डे को निशाना बनाया। इस ऑपरेशन के बाद पूरी दुनिया में समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक रणनीतियों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, 13 जुलाई को किए गए अभियान में अमेरिकी लड़ाकू विमानों के साथ तीन ‘सारोनिक कोर्सेर’ (Saronic Corsair) अनमैन्ड सरफेस वेसल्स यानी USV का उपयोग किया गया। इन ड्रोन्स का उद्देश्य ईरान के नौसैनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, विशेष रूप से जहाजों और पनडुब्बियों के रखरखाव से जुड़े प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचाना था। यह पहली बार माना जा रहा है कि अमेरिका ने वन-वे अटैक (One-Way Attack) क्षमता वाले समुद्री ड्रोन को वास्तविक युद्ध में बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया।
क्या होते हैं समुद्री ड्रोन?
समुद्री ड्रोन या USV ऐसी स्वचालित नावें होती हैं जिनमें किसी नाविक, कैप्टन या चालक दल की आवश्यकता नहीं होती। ये पानी की सतह पर चलते हैं और इन्हें सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर बैठे ऑपरेटर सैटेलाइट, रेडियो नेटवर्क या अन्य सुरक्षित संचार माध्यमों से नियंत्रित कर सकते हैं। आधुनिक USV केवल रिमोट कंट्रोल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे, रडार, सेंसर और ऑटोमैटिक नेविगेशन जैसी अत्याधुनिक तकनीकें भी मौजूद होती हैं।
इनका इस्तेमाल समुद्री निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट, तटीय सुरक्षा और सीधे हमले जैसे कई मिशनों में किया जा सकता है। यही कारण है कि दुनिया की कई बड़ी नौसेनाएं अब ऐसे प्लेटफॉर्म पर तेजी से निवेश कर रही हैं।
‘सारोनिक कोर्सेर’ की खासियत
अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किया गया ‘सारोनिक कोर्सेर’ आकार में लगभग 24 फुट लंबा है। इसकी पेलोड क्षमता करीब 1,000 पाउंड बताई जाती है। यह 1,000 नॉटिकल मील से अधिक दूरी तय करने में सक्षम है और इसकी अधिकतम गति 35 नॉट से ज्यादा मानी जाती है।
इस प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी मॉड्यूलर डिजाइन है। मिशन की जरूरत के अनुसार इसमें अलग-अलग उपकरण या हथियार लगाए जा सकते हैं। यदि ऑपरेशन के दौरान यह नष्ट भी हो जाए तो मानव जीवन का कोई नुकसान नहीं होता। यही वजह है कि इसे अपेक्षाकृत कम लागत वाला लेकिन अत्यधिक प्रभावी सैन्य विकल्प माना जा रहा है।
सारोनिक कंपनी इसे ऐसे नेटवर्क-कनेक्टेड प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित कर रही है जिसे अलग-अलग सैन्य अभियानों के अनुसार तेजी से कॉन्फ़िगर किया जा सकता है। इसका उपयोग इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (ISR), समुद्री गश्त, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और सीधे आक्रामक अभियानों में किया जा सकता है।
बंदर अब्बास पर हमले से क्या संकेत मिले?
ईरान का बंदर अब्बास नौसैनिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह फारस की खाड़ी में ईरानी नौसेना का प्रमुख केंद्र है, जहां जहाजों और पनडुब्बियों के रखरखाव की सुविधाएं मौजूद हैं। अमेरिकी अभियान ने यह संदेश दिया कि भविष्य के युद्धों में छोटे आकार के समुद्री ड्रोन भी भारी सुरक्षा वाले नौसैनिक ठिकानों तक पहुंच सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे ड्रोन पारंपरिक युद्धपोतों की तुलना में कम खर्चीले होते हैं और यदि इन्हें झुंड (Swarm) के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो किसी भी नौसैनिक सुरक्षा प्रणाली के लिए चुनौती बन सकते हैं। क्योंकि इनमें मानव चालक नहीं होता, इसलिए इन्हें अत्यधिक जोखिम वाले मिशनों में भी भेजा जा सकता है।
यह हमला इस बात का भी संकेत देता है कि आने वाले समय में केवल बड़े जहाजों पर निर्भर रहने वाली नौसैनिक रणनीति पर्याप्त नहीं होगी। छोटे, तेज और नेटवर्क आधारित प्लेटफॉर्म भविष्य के समुद्री युद्ध में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
अमेरिकी नौसेना का बढ़ता निवेश
दिसंबर 2025 में अमेरिकी नौसेना ने सारोनिक कंपनी को लगभग 392 मिलियन डॉलर का प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट दिया था। इसके बाद इन समुद्री ड्रोन्स की तैनाती मध्य पूर्व क्षेत्र में निगरानी और सुरक्षा अभियानों के लिए शुरू की गई। अब वास्तविक सैन्य कार्रवाई में इनके इस्तेमाल के बाद माना जा रहा है कि अमेरिका भविष्य में ऐसे प्लेटफॉर्म की संख्या और बढ़ा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका का उद्देश्य पारंपरिक युद्धपोतों के साथ मानव रहित प्रणालियों का ऐसा मिश्रण तैयार करना है, जिससे कम लागत में अधिक प्रभावी समुद्री ऑपरेशन संचालित किए जा सकें।
पाकिस्तान भी विकसित कर रहा है अपनी क्षमता
समुद्री ड्रोन की बढ़ती उपयोगिता को देखते हुए पाकिस्तान भी इस क्षेत्र में काम कर रहा है। विभिन्न रक्षा रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान अपनी नौसेना के लिए कम लागत वाले अनमैन्ड सरफेस वेसल्स (USV) और ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल्स (AUV) विकसित करने की कोशिश कर रहा है।
इनका उद्देश्य अरब सागर में निगरानी बढ़ाना, तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा करना और आवश्यकता पड़ने पर कम खर्च में समुद्री अभियानों को अंजाम देना बताया जाता है। हालांकि इन परियोजनाओं की वास्तविक प्रगति, उत्पादन क्षमता और संचालन की स्थिति को लेकर सार्वजनिक रूप से बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे सिस्टम विकसित करना एक बात है, लेकिन उन्हें युद्ध के दौरान प्रभावी ढंग से संचालित करना कहीं अधिक कठिन चुनौती है। इसमें संचार नेटवर्क, इलेक्ट्रॉनिक सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म के बीच समन्वय जैसी कई जटिल आवश्यकताएं शामिल होती हैं।
पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा सवाल अपनी समुद्री परिसंपत्तियों की सुरक्षा को लेकर है। यदि भविष्य में कराची या ग्वादर जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर इसी प्रकार के छोटे लेकिन घातक समुद्री ड्रोन से हमला होता है, तो पारंपरिक तटीय सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होगी, यह स्पष्ट नहीं है।
ईरान के बंदर अब्बास पर हुए हमले ने यह चिंता और बढ़ा दी है कि छोटे आकार के समुद्री ड्रोन सुरक्षा घेरे को भेदकर संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक गश्ती जहाजों और तटीय रडार पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं माना जा रहा।
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध भी बड़ी चुनौती
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री ड्रोन जितने उपयोगी हैं, उतने ही संवेदनशील भी हैं। यदि इनके संचार नेटवर्क, सैटेलाइट लिंक या GPS सिस्टम को इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के जरिए बाधित कर दिया जाए तो उनका संचालन प्रभावित हो सकता है।
कुछ पाकिस्तानी रक्षा विश्लेषकों ने भी इस आशंका का उल्लेख किया है कि यदि किसी संघर्ष के दौरान विरोधी देश GPS जैमिंग या कम्युनिकेशन लिंक को बाधित कर दे तो ऐसे ड्रोन अपना रास्ता खो सकते हैं या मिशन पूरा करने में असफल हो सकते हैं। इसलिए केवल ड्रोन विकसित कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें इलेक्ट्रॉनिक हमलों से सुरक्षित बनाना भी उतना ही आवश्यक है।
भारत के लिए क्या हैं संकेत?
भारत पहले से ही मानव रहित प्रणालियों, समुद्री निगरानी और नेटवर्क आधारित नौसैनिक क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को देखते हुए भारतीय नौसेना समुद्री डोमेन अवेयरनेस, एंटी-ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और स्वायत्त प्लेटफॉर्म पर लगातार निवेश कर रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के समुद्री युद्ध केवल बड़े युद्धपोतों के दम पर नहीं लड़े जाएंगे। मानव रहित सतही और पानी के भीतर संचालित होने वाले प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताएं किसी भी नौसेना की ताकत तय करेंगी।
ईरान में अमेरिकी अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक नौसैनिक युद्ध अब तकनीक आधारित हो चुका है। ऐसे में दुनिया की सभी प्रमुख नौसेनाओं के सामने चुनौती केवल नए हथियार विकसित करने की नहीं, बल्कि उनसे बचाव के लिए प्रभावी रक्षा प्रणाली तैयार करने की भी है। आने वाले वर्षों में समुद्री ड्रोन और उनसे जुड़ी तकनीक वैश्विक समुद्री सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।




