एंटीबायोटिक्स का असर घटा, ICMR की स्टडी में चौंकाने वाले आंकड़े; रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से मौत का खतरा ज्यादा

एंटीबायोटिक्स का असर घटा, ICMR की स्टडी में चौंकाने वाले आंकड़े; रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से मौत का खतरा ज्यादा

भारत में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस यानी AMR तेजी से गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। इसका मतलब है कि कुछ बैक्टीरिया उन एंटीबायोटिक्स के असर को भी झेलने लगे हैं, जो पहले गंभीर संक्रमण के इलाज में प्रभावी मानी जाती थीं। अब इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की एक बड़ी स्टडी ने इस समस्या के खतरनाक असर को आंकड़ों के साथ सामने रखा है।

देश के 20 बड़े अस्पतालों से जुटाए गए करीब 1.6 लाख मरीजों के आंकड़ों के विश्लेषण में पाया गया कि एंटीबायोटिक-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में मृत्यु का जोखिम सामान्य बैक्टीरियल संक्रमण की तुलना में अधिक रहा। इतना ही नहीं, ऐसे मरीजों के इलाज में ज्यादा समय और ज्यादा खर्च भी करना पड़ा।

यह रिसर्च द लांसेट रीजनल हेल्थ- साउथ-ईस्ट एशिया में प्रकाशित हुई है। इसमें अप्रैल 2022 से 2025 के बीच अस्पतालों में भर्ती मरीजों से संबंधित आंकड़ों का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से चार प्रमुख ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण और उनमें मौजूद दवा प्रतिरोध का विश्लेषण किया।

20 अस्पतालों के मरीजों के आंकड़ों से सामने आई तस्वीर

ICMR की इस रिसर्च के लिए करीब 1.6 लाख अस्पताल में भर्ती मरीजों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया। इनमें लगभग 26,213 मरीज ऐसे थे, जिनमें ई. कोली सहित चार प्रमुख ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से संक्रमण पाया गया।

स्टडी का सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि इन संक्रमणों के 61.1% मामले कार्बापेनम रेजिस्टेंट पाए गए। यानी बड़ी संख्या में बैक्टीरिया उन एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर चुके थे, जिन्हें गंभीर संक्रमणों में लंबे समय से महत्वपूर्ण उपचार विकल्प माना जाता रहा है।

इस स्थिति का मतलब यह नहीं है कि हर बैक्टीरियल संक्रमण अब दवाओं से ठीक नहीं होगा। हालांकि, जब किसी बैक्टीरिया में कई महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स के खिलाफ प्रतिरोध पैदा हो जाता है, तो डॉक्टरों के सामने प्रभावी इलाज के विकल्प सीमित हो सकते हैं।

कार्बापेनम पर भी असर नहीं कर रहे कुछ बैक्टीरिया

कार्बापेनम एंटीबायोटिक्स का एक ऐसा समूह है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर गंभीर और जटिल बैक्टीरियल संक्रमणों में किया जाता है। इन्हें लंबे समय तक ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण विकल्प माना गया, जहां दूसरे एंटीबायोटिक्स प्रभावी नहीं होते थे।

लेकिन बैक्टीरिया में दवाओं के खिलाफ बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता ने स्थिति को बदल दिया है। कुछ बैक्टीरिया अब कार्बापेनम जैसी शक्तिशाली एंटीबायोटिक्स के प्रति भी रेजिस्टेंट हो रहे हैं।

यही वजह है कि अस्पतालों में गंभीर संक्रमणों का इलाज पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। जब पहली दवा काम नहीं करती, तो डॉक्टरों को संक्रमण की जांच, कल्चर रिपोर्ट और एंटीबायोटिक सेंसिटिविटी के आधार पर दूसरे उपचार विकल्प तलाशने पड़ते हैं।

रेजिस्टेंस के साथ बढ़ी मृत्यु दर

ICMR की स्टडी में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और मरीजों की मृत्यु के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया। ई. कोली के मामलों में रेजिस्टेंट संक्रमण वाले मरीजों की मृत्यु दर 24.4% दर्ज की गई। इसके मुकाबले सामान्य ई. कोली संक्रमण वाले मरीजों में मृत्यु दर 17.3% रही।

यानी रेजिस्टेंट ई. कोली संक्रमण वाले मरीजों में मृत्यु का अनुपात सामान्य संक्रमण की तुलना में ज्यादा था।

इसी तरह Klebsiella pneumoniae के मामलों में भी यही चिंता दिखाई दी। रेजिस्टेंट बैक्टीरिया से संक्रमित मरीजों में मृत्यु दर 31.2% रही, जबकि सामान्य संक्रमण वाले मरीजों में यह आंकड़ा 23.5% था।

ये आंकड़े बताते हैं कि दवा प्रतिरोध केवल डॉक्टरों के लिए इलाज की चुनौती नहीं है, बल्कि गंभीर संक्रमण वाले मरीजों के परिणाम पर भी इसका असर पड़ सकता है।

हालांकि, किसी व्यक्तिगत मरीज के ठीक होने या गंभीर होने का फैसला केवल बैक्टीरिया के रेजिस्टेंस से नहीं होता। मरीज की उम्र, उसकी पहले से मौजूद स्वास्थ्य स्थिति, संक्रमण की गंभीरता और इलाज शुरू होने का समय जैसे कई दूसरे कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इलाज में लग रहा ज्यादा पैसा और समय

AMR का प्रभाव अस्पताल के बिल और मरीज के अस्पताल में रहने की अवधि पर भी दिखाई देता है। रिसर्च के मुताबिक, रेजिस्टेंट संक्रमण के मामलों में इलाज की लागत सामान्य संक्रमण की तुलना में काफी अधिक रही।

ई. कोली के रेजिस्टेंट संक्रमण के इलाज पर करीब 420 डॉलर का खर्च आया, जबकि सामान्य ई. कोली संक्रमण के मामले में यह लागत लगभग 211 डॉलर रही। यानी रेजिस्टेंट संक्रमण में उपचार की लागत लगभग दोगुनी तक पहुंच गई।

इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जब शुरुआती एंटीबायोटिक प्रभावी नहीं रहती, तो मरीज के इलाज के लिए दूसरी या अधिक महंगी दवाओं की जरूरत पड़ सकती है। इसके साथ ही गंभीर मरीजों को अतिरिक्त निगरानी, जांच और अस्पताल में ज्यादा समय तक देखभाल की आवश्यकता हो सकती है।

इसका आर्थिक असर केवल मरीज और उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता। अस्पतालों पर बढ़ता बोझ और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता खर्च भी AMR को बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बनाता है।

अस्पताल में लंबे समय तक रहना पड़ सकता है

दवा-प्रतिरोधी संक्रमण का एक और महत्वपूर्ण असर अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि पर पड़ता है। सामान्य संक्रमण में यदि सही एंटीबायोटिक जल्दी मिल जाए तो मरीज का उपचार अपेक्षाकृत तेजी से आगे बढ़ सकता है।

लेकिन रेजिस्टेंट संक्रमण के मामलों में सही दवा चुनने की प्रक्रिया अधिक जटिल हो सकती है। डॉक्टरों को यह पता लगाना पड़ता है कि संबंधित बैक्टीरिया किन दवाओं के प्रति संवेदनशील है और किनके खिलाफ प्रतिरोध मौजूद है।

इसके लिए माइक्रोबायोलॉजी लैब में कल्चर और अन्य जांचों की जरूरत पड़ सकती है। रिपोर्ट आने में समय लगने के कारण इलाज की दिशा तय करने में भी अतिरिक्त समय लग सकता है।

अगर संक्रमण गंभीर हो या शुरुआती उपचार काम न करे, तो मरीज को लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रखना पड़ सकता है। इससे इलाज की लागत और मरीज तथा उसके परिवार पर आर्थिक और मानसिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।

ICMR वैज्ञानिक ने बताया क्यों जरूरी है सही इस्तेमाल

ICMR की सीनियर वैज्ञानिक और इस रिसर्च की को-ऑथर डॉ. कामिनी वालिया ने AMR को भविष्य में आने वाली कोई दूर की समस्या मानने के बजाय मौजूदा चुनौती के रूप में देखने की जरूरत बताई है।

उनके मुताबिक, केवल नई एंटीबायोटिक्स विकसित कर देना इस समस्या का पूरा समाधान नहीं है। संक्रमण की समय पर पहचान, सही जांच, संक्रमण की रोकथाम और उपलब्ध एंटीबायोटिक्स का उचित इस्तेमाल भी उतना ही जरूरी है।

यही वजह है कि एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह और जरूरत के मुताबिक करना महत्वपूर्ण माना जाता है। हर बुखार, सर्दी या वायरल बीमारी में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती। गलत परिस्थिति में इन दवाओं का इस्तेमाल बैक्टीरिया में प्रतिरोध बढ़ाने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है।

बिना जरूरत एंटीबायोटिक लेना बन सकता है बड़ी समस्या

एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरियल संक्रमणों के इलाज के लिए बनाई गई हैं। वायरल संक्रमणों पर इनका असर नहीं होता। इसके बावजूद कई बार लोग डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक्स लेना शुरू कर देते हैं या पुरानी बीमारी में बची हुई दवाओं का इस्तेमाल कर लेते हैं।

दवा की गलत मात्रा लेना या डॉक्टर द्वारा बताई गई अवधि से पहले दवा बंद कर देना भी समस्या पैदा कर सकता है। ऐसे मामलों में कुछ बैक्टीरिया बच सकते हैं और भविष्य में उसी दवा के खिलाफ प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं।

इसलिए विशेषज्ञों की ओर से बार-बार यह सलाह दी जाती है कि एंटीबायोटिक्स केवल जरूरत पड़ने पर और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही ली जाएं।

सिर्फ नई दवा बनाना समाधान नहीं

AMR से निपटने के लिए नई दवाओं की खोज निश्चित रूप से जरूरी है, लेकिन ICMR की स्टडी इस बात की ओर भी ध्यान दिलाती है कि रोकथाम की रणनीति उतनी ही महत्वपूर्ण है।

अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण के बेहतर उपाय, हाथों की स्वच्छता, उपकरणों की सही सफाई, संक्रमण की जल्दी पहचान और मरीज के लिए उपयुक्त एंटीबायोटिक का चयन इसके अहम हिस्से हैं।

इसके अलावा लैब में बैक्टीरिया की पहचान और उनकी दवा-संवेदनशीलता की जांच बेहतर होने से डॉक्टरों को सही उपचार चुनने में मदद मिल सकती है। इससे अनावश्यक रूप से व्यापक प्रभाव वाली एंटीबायोटिक्स देने की जरूरत भी कम हो सकती है।

आम संक्रमणों को लेकर क्यों बढ़ी चिंता

एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इसका असर केवल बेहद दुर्लभ बीमारियों तक सीमित नहीं रहता। ई. कोली और Klebsiella pneumoniae जैसे बैक्टीरिया कई तरह के संक्रमणों से जुड़े हो सकते हैं।

अगर इनमें दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध लगातार बढ़ता रहा, तो ऐसे संक्रमणों का उपचार ज्यादा मुश्किल हो सकता है। यही कारण है कि AMR को दुनिया भर में स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने मौजूद महत्वपूर्ण खतरों में गिना जाता है।

ICMR की यह स्टडी भारत में समस्या की गंभीरता को समझने के लिए महत्वपूर्ण आंकड़े उपलब्ध कराती है। करीब 1.6 लाख मरीजों के आंकड़ों से सामने आया यह पैटर्न बताता है कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस को केवल भविष्य की चुनौती मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मरीजों की सुरक्षा के लिए सावधानी जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार, आम लोगों की भूमिका भी इस समस्या को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण है। बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक शुरू नहीं करनी चाहिए। डॉक्टर ने जितनी मात्रा और जितने दिनों के लिए दवा लिखी है, उसका पालन करना जरूरी है।

साथ ही संक्रमण से बचाव के लिए हाथों की स्वच्छता, साफ-सफाई और अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन भी जरूरी है।

ICMR की स्टडी का संदेश यही है कि एंटीबायोटिक्स की ताकत को बनाए रखना केवल नई दवाएं खोजने का विषय नहीं है। इसके लिए डॉक्टरों, अस्पतालों, लैब, स्वास्थ्य संस्थानों और आम लोगों—सभी को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी।

अगर बैक्टीरिया मौजूदा दवाओं के खिलाफ इसी तरह प्रतिरोधी होते गए, तो आज आसानी से इलाज होने वाले कई संक्रमणों का उपचार भविष्य में कहीं ज्यादा कठिन, महंगा और लंबा हो सकता है। इसलिए एंटीबायोटिक्स का समझदारी से इस्तेमाल और संक्रमण की रोकथाम AMR से मुकाबले की सबसे अहम रणनीतियों में शामिल हैं।

(Photo : AI Generated)