आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन, टैबलेट, स्मार्ट टीवी और अन्य स्क्रीन बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, मनोरंजन और ऑनलाइन गतिविधियों के लिए तकनीक का इस्तेमाल बढ़ने के साथ छोटे बच्चों का स्क्रीन के सामने बिताया जाने वाला समय भी कई परिवारों में बढ़ा है। कई माता-पिता बच्चों को व्यस्त रखने या खाना खिलाने के लिए मोबाइल और टीवी का सहारा लेते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार बहुत कम उम्र में लंबे समय तक स्क्रीन देखने की आदत बच्चे की नींद, शारीरिक गतिविधि, भाषा सीखने और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
बच्चों के विकास के संदर्भ में स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म को लेकर भी अक्सर चर्चा होती है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर का कोई एक कारण नहीं होता और केवल स्क्रीन देखने को इसका सीधा कारण नहीं माना जा सकता। ऑटिज्म एक जटिल न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें आनुवंशिक और अन्य विकास संबंधी कारकों की भूमिका हो सकती है। दूसरी ओर, अत्यधिक स्क्रीन टाइम छोटे बच्चों के वास्तविक दुनिया के अनुभव, माता-पिता के साथ बातचीत और सामाजिक गतिविधियों को कम कर सकता है, जिससे कुछ विकासात्मक व्यवहार प्रभावित हो सकते हैं।
इसी वजह से विशेषज्ञ माता-पिता को सलाह देते हैं कि बच्चों के स्क्रीन उपयोग को उनकी उम्र के अनुसार नियंत्रित किया जाए और उनकी दिनचर्या में बातचीत, खेल, शारीरिक गतिविधि और परिवार के साथ समय को प्राथमिकता दी जाए।
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर क्या है?
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर यानी ASD एक न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है, जो व्यक्ति के सामाजिक संपर्क, संचार और व्यवहार के तरीके को प्रभावित कर सकती है। इसे ‘स्पेक्ट्रम’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके लक्षण हर बच्चे में एक जैसे नहीं होते। कुछ बच्चों में संकेत हल्के हो सकते हैं, जबकि कुछ बच्चों को रोजमर्रा की गतिविधियों और संचार में अधिक सहायता की आवश्यकता हो सकती है।
कुछ बच्चों में बोलने और भाषा के विकास में देरी दिखाई दे सकती है। कुछ बच्चे आंखों से कम संपर्क बनाते हैं या अपने नाम पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं देते। कई बच्चों को सामाजिक खेलों में रुचि कम हो सकती है, जबकि कुछ बच्चे किसी विशेष गतिविधि, वस्तु या विषय में बहुत अधिक रुचि दिखा सकते हैं।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इनमें से कोई एक संकेत अपने आप में ऑटिज्म का प्रमाण नहीं है। बच्चों का विकास अलग-अलग गति से होता है और कई अन्य कारणों से भी भाषा या सामाजिक व्यवहार में बदलाव दिखाई दे सकता है। इसलिए किसी भी चिंता की स्थिति में माता-पिता को स्वयं निष्कर्ष निकालने के बजाय बाल रोग विशेषज्ञ या विकासात्मक विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
क्या स्क्रीन टाइम ऑटिज्म का कारण बनता है?
ऑटिज्म को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे केवल स्क्रीन टाइम से जोड़कर देखना सही नहीं है। ऑटिज्म एक जटिल स्थिति है और इसके पीछे कई जैविक तथा आनुवंशिक कारक हो सकते हैं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि मोबाइल या टीवी देखने से किसी बच्चे को ऑटिज्म हो जाता है।
हालांकि, बहुत अधिक स्क्रीन टाइम छोटे बच्चों की विकासात्मक दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है। जब बच्चा लंबे समय तक स्क्रीन में व्यस्त रहता है, तो उसके पास माता-पिता से बातचीत करने, दूसरे बच्चों के साथ खेलने, आसपास की चीजों को देखने और वास्तविक परिस्थितियों से सीखने के अवसर कम हो सकते हैं।
बच्चों के शुरुआती वर्षों में सीखना केवल किताबों या वीडियो से नहीं होता। वे चेहरे के भाव देखकर, आवाज सुनकर, बातचीत करके, खिलौनों से खेलकर और आसपास के वातावरण के साथ बातचीत करके भी सीखते हैं। इसलिए स्क्रीन का अत्यधिक इस्तेमाल इन प्राकृतिक अनुभवों के लिए उपलब्ध समय को कम कर सकता है।
बच्चे के शुरुआती साल क्यों महत्वपूर्ण हैं?
बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष मस्तिष्क और व्यवहारिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इस दौरान बच्चे तेजी से नई चीजें सीखते हैं और उनके भाषा, भावनात्मक तथा सामाजिक कौशल विकसित होते हैं।
छोटे बच्चों के लिए माता-पिता की आवाज, चेहरे के भाव, स्पर्श और प्रतिक्रिया बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब कोई बच्चा अपनी मां या पिता से बात करता है और सामने से जवाब मिलता है, तो वह बातचीत और सामाजिक संपर्क का अनुभव करता है। इसी तरह खिलौनों से खेलना, बाहर घूमना और दूसरे बच्चों के साथ समय बिताना भी उसके विकास में योगदान देता है।
यदि इन गतिविधियों की जगह बच्चा लगातार स्क्रीन देखता रहे, तो उसकी दिनचर्या में सक्रिय सीखने और सामाजिक संपर्क का हिस्सा कम हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञ बच्चों के शुरुआती वर्षों में वास्तविक दुनिया के अनुभवों को प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।
18 महीने से कम उम्र में स्क्रीन को लेकर सावधानी जरूरी
छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को लेकर दुनिया भर की स्वास्थ्य संस्थाएं सावधानी बरतने की सलाह देती हैं। खासतौर पर 18 महीने से कम उम्र के बच्चों के लिए नियमित स्क्रीन उपयोग से बचने की सलाह दी जाती है, हालांकि परिवार को अपने बच्चे की व्यक्तिगत परिस्थितियों और डॉक्टर की सलाह को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इस उम्र में बच्चा अपने आसपास के लोगों और वातावरण से सीखता है। वह आवाजों को पहचानता है, चेहरे के भाव समझने की कोशिश करता है और अपनी इंद्रियों के माध्यम से नई चीजों का अनुभव करता है।
माता-पिता के लिए बेहतर विकल्प यह हो सकता है कि वे बच्चे से बात करें, उसे कहानियां सुनाएं, गाने गाएं, किताबों की तस्वीरें दिखाएं और सुरक्षित तरीके से खेलने का अवसर दें। इस तरह की गतिविधियाँ बच्चे के भाषा और सामाजिक विकास में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं।
ज्यादा स्क्रीन टाइम से कौन-कौन सी समस्याएं हो सकती हैं?
अत्यधिक स्क्रीन टाइम का असर हर बच्चे पर एक जैसा नहीं होता, लेकिन छोटे बच्चों में कुछ व्यवहारिक और दिनचर्या संबंधी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। इनमें नींद का प्रभावित होना, शारीरिक गतिविधि कम होना और परिवार के साथ बातचीत के लिए कम समय मिलना शामिल हो सकता है।
कुछ बच्चे स्क्रीन हटाने पर चिड़चिड़े या परेशान हो सकते हैं, खासकर यदि उन्हें लंबे समय से मोबाइल या टीवी देखने की आदत हो। कई बार बच्चे खाना खाते समय भी स्क्रीन की मांग करने लगते हैं, जिससे भोजन और परिवार के साथ बातचीत का समय भी प्रभावित हो सकता है।
यदि बच्चा लगातार स्क्रीन देखने का आदी हो रहा है, तो माता-पिता को धीरे-धीरे उसकी आदत बदलने की कोशिश करनी चाहिए। अचानक पूरी तरह रोकने के बजाय स्क्रीन टाइम को चरणबद्ध तरीके से कम करना कई परिवारों के लिए अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
बच्चों में किन विकासात्मक संकेतों पर ध्यान दें?
माता-पिता अपने बच्चे के विकास को सबसे करीब से देखते हैं। इसलिए यदि उन्हें बच्चे के व्यवहार या विकास में लगातार कुछ असामान्य दिखाई देता है, तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
कुछ संकेत जिन पर विशेषज्ञ से सलाह लेने पर विचार किया जा सकता है, उनमें आंखों से बहुत कम संपर्क बनाना, नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना, उम्र के अनुसार भाषा का विकास न होना और सामाजिक बातचीत में लगातार कठिनाई शामिल हो सकती है।
कुछ बच्चे पहले सीखे हुए शब्दों या कौशल का इस्तेमाल करना बंद कर सकते हैं। यदि बच्चे के व्यवहार या विकास में अचानक या स्पष्ट बदलाव दिखाई दे, तो माता-पिता को जल्द से जल्द बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।
यह जरूरी नहीं कि इन संकेतों का मतलब ऑटिज्म ही हो। सुनने से जुड़ी समस्या, भाषा विकास में देरी या अन्य विकासात्मक कारण भी ऐसे व्यवहार के पीछे हो सकते हैं। इसलिए सही कारण जानने के लिए विशेषज्ञ द्वारा मूल्यांकन जरूरी है।
आंखों का संपर्क और नाम पर प्रतिक्रिया क्यों महत्वपूर्ण हैं?
छोटे बच्चों के सामाजिक विकास में आंखों से संपर्क और दूसरे व्यक्ति की आवाज पर प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण संकेत माने जाते हैं। जब बच्चा माता-पिता की ओर देखता है, मुस्कुराता है या नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया देता है, तो यह सामाजिक जुड़ाव का हिस्सा होता है।
यदि बच्चा लगातार आंखों से संपर्क से बचता है या नाम पुकारने पर बार-बार प्रतिक्रिया नहीं देता, तो माता-पिता को बच्चे के विकास पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, कभी-कभी बच्चा खेल में व्यस्त होने या ध्यान कहीं और होने के कारण भी प्रतिक्रिया नहीं देता। इसलिए किसी एक घटना के आधार पर चिंता करने के बजाय लगातार दिखाई देने वाले व्यवहार को समझना जरूरी है।
भाषा विकास में देरी को नजरअंदाज न करें
हर बच्चा अपनी गति से बोलना सीखता है, लेकिन यदि उम्र के अनुसार बच्चे की भाषा क्षमता विकसित नहीं हो रही है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है।
बच्चे से नियमित बातचीत करना, उसे कहानी सुनाना और उसके सवालों का जवाब देना भाषा सीखने के प्राकृतिक तरीके हैं। मोबाइल या टीवी पर वीडियो चलाकर बच्चे को लंबे समय तक अकेला छोड़ने के बजाय माता-पिता को उसके साथ बैठकर बातचीत करनी चाहिए।
यदि बच्चा बोलने में देरी कर रहा है, तो स्क्रीन टाइम कम करने के साथ-साथ बाल रोग विशेषज्ञ या स्पीच और लैंग्वेज विशेषज्ञ से उचित सलाह लेना अधिक प्रभावी हो सकता है।
स्क्रीन की जगह बच्चों को क्या गतिविधियां कराएं?
छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन का विकल्प बनाना माता-पिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती हो सकती है। इसके लिए उम्र के अनुसार सरल गतिविधियां अपनाई जा सकती हैं।
बच्चे को ब्लॉक्स से खेलने, चित्र बनाने, रंग भरने, किताब देखने, कहानी सुनने और संगीत पर गतिविधियां करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। घर के सुरक्षित वातावरण में शारीरिक खेल और बाहर घूमना भी उपयोगी हो सकता है।
माता-पिता बच्चे को रोजमर्रा के छोटे कामों में भी शामिल कर सकते हैं। उदाहरण के लिए खिलौने व्यवस्थित करना, रंगों की पहचान करना या चीजों के नाम बताना बच्चे के सीखने का हिस्सा बन सकता है।
माता-पिता खुद भी बनें उदाहरण
बच्चों की स्क्रीन आदतों पर माता-पिता के व्यवहार का भी असर पड़ सकता है। यदि घर में बड़े लोग लगातार मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं, तो बच्चे भी उसी व्यवहार की नकल कर सकते हैं।
इसलिए परिवार में कुछ समय ऐसा निर्धारित किया जा सकता है जब सभी सदस्य मोबाइल और टीवी से दूर रहें। भोजन के दौरान स्क्रीन बंद रखना और सोने से पहले शांत पारिवारिक गतिविधियां करना बच्चों की दिनचर्या को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है।
माता-पिता को यह भी समझना चाहिए कि स्क्रीन को पूरी तरह दुश्मन मानना जरूरी नहीं है। उम्र के अनुसार गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री का सीमित और निगरानी में उपयोग किया जा सकता है। मुख्य बात यह है कि स्क्रीन वास्तविक बातचीत, खेल, नींद और शारीरिक गतिविधि की जगह न ले।
समय रहते विशेषज्ञ की सलाह लेना क्यों जरूरी है?
यदि माता-पिता को बच्चे के विकास को लेकर चिंता है, तो इंतजार करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होता है। शुरुआती स्तर पर विकासात्मक समस्याओं की पहचान होने से बच्चे को जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध कराने की संभावना बढ़ जाती है।
बच्चे के विकास का मूल्यांकन बाल रोग विशेषज्ञ, विकासात्मक विशेषज्ञ, स्पीच थेरेपिस्ट या अन्य प्रशिक्षित पेशेवरों द्वारा किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर बच्चे के लिए व्यक्तिगत सहायता और थेरेपी की योजना भी बनाई जा सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि माता-पिता किसी भी विकासात्मक चिंता को लेकर खुद को दोषी न मानें और न ही बच्चे को लेकर किसी तरह का सामाजिक कलंक महसूस करें। हर बच्चे का विकास अलग होता है और सही समय पर उचित मार्गदर्शन मिलने से परिवार बच्चे की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकता है।




