चंडीगढ़ में लंबे समय से कचरे के बड़े ढेर और उससे जुड़ी पर्यावरणीय समस्याओं के लिए पहचाने जाने वाला डड्डूमाजरा डंपिंग ग्राउंड अब एक नए बदलाव की दिशा में बढ़ रहा है। यहां प्रस्तावित कंप्रैस्ड बायोगैस यानी CBG प्लांट को शहर के कचरा प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की दिशा में एक महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। इस योजना का उद्देश्य केवल डंपिंग ग्राउंड में जमा कचरे की समस्या को कम करना नहीं है, बल्कि गीले और जैविक कचरे को उपयोगी ऊर्जा में बदलकर एक ऐसा मॉडल तैयार करना है, जिसमें कचरे से आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों तरह के लाभ हासिल किए जा सकें।
प्रस्तावित परियोजना के तहत प्रतिदिन लगभग 200 टन गीले कचरे को प्रोसेस करने की योजना है। इस प्रक्रिया से प्रतिदिन करीब 8 टन या 8,000 किलोग्राम कंप्रैस्ड बायोगैस तैयार होने का अनुमान है। यह गैस प्राकृतिक गैस के वैकल्पिक ईंधन के तौर पर इस्तेमाल की जा सकती है और वाहनों के लिए CNG की तरह उपयोग में लाई जा सकती है।
इस परियोजना को Indian Oil Corporation Limited यानी IOCL द्वारा विकसित किए जाने की योजना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लगभग 125 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना को आईओसीएल अपने स्तर पर विकसित करेगी। इससे चंडीगढ़ नगर निगम पर परियोजना निर्माण के लिए सीधे वित्तीय बोझ पड़ने की संभावना कम होगी। इस मॉडल में नगर निगम की भूमिका कचरे की उपलब्धता और संबंधित स्थानीय व्यवस्थाओं से जुड़ी हो सकती है, जबकि प्लांट की स्थापना और संचालन की जिम्मेदारी परियोजना से जुड़े संस्थान द्वारा संभाली जाएगी।
200 टन गीले कचरे से रोजाना तैयार होगी CBG
प्रस्तावित CBG प्लांट की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी कचरा प्रसंस्करण क्षमता है। योजना के अनुसार, रोजाना करीब 200 टन गीले और जैविक नगर कचरे को प्लांट में प्रोसेस किया जाएगा। इस तरह के कचरे में भोजन के अवशेष, सब्जियों और फलों का जैविक कचरा तथा अन्य आसानी से विघटित होने वाली सामग्री शामिल हो सकती है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य कचरे को सीधे लैंडफिल या डंपिंग साइट पर भेजने के बजाय उसका वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करना है। जैविक कचरे को नियंत्रित परिस्थितियों में प्रोसेस करने से उससे बायोगैस तैयार की जाती है। इसके बाद गैस को शुद्ध और कंप्रेस करके CBG में परिवर्तित किया जा सकता है।
यदि परियोजना अपनी प्रस्तावित क्षमता के अनुसार काम करती है, तो प्रतिदिन करीब 8,000 किलोग्राम CBG उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इससे डंपिंग ग्राउंड पर जाने वाले गीले कचरे की मात्रा में कमी आ सकती है और शहर के कचरा प्रबंधन तंत्र पर भी दबाव कम हो सकता है।
CBG उत्पादन से बन सकता है आर्थिक मॉडल
CBG प्लांट का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका संभावित आर्थिक लाभ भी है। CBG की कीमत कई परिस्थितियों में CNG के बाजार मूल्य के आसपास हो सकती है। यदि अनुमानित कीमत 91 रुपये प्रति किलोग्राम मानी जाए और प्रतिदिन 8,000 किलोग्राम CBG का उत्पादन हो, तो सकल गणना के आधार पर प्रतिदिन करीब 7.28 लाख रुपये मूल्य की गैस तैयार हो सकती है।
मासिक आधार पर यह राशि दो करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। हालांकि वास्तविक आय उत्पादन क्षमता, बिक्री मूल्य, प्लांट की परिचालन लागत, रखरखाव, गैस की गुणवत्ता और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। इसलिए इन आंकड़ों को संभावित सकल मूल्य के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सीधे मुनाफे के रूप में।
फिर भी, इस तरह की परियोजना का आर्थिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि इसमें कचरे को एक संसाधन में बदलने की कोशिश की जा रही है। यदि प्लांट लंबे समय तक प्रभावी ढंग से संचालित होता है, तो यह शहर के लिए वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल का उदाहरण बन सकता है।
गीले कचरे का वैज्ञानिक तरीके से होगा इस्तेमाल
CBG प्लांट के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता सही तरीके से अलग किए गए जैविक कचरे है। प्रस्तावित मॉडल में सेग्रीगेटिड ऑर्गेनिक म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट यानी अलग किए गए जैविक नगर ठोस कचरे का इस्तेमाल किया जाएगा।
इसका मतलब है कि गीले कचरे को सूखे कचरे और अन्य गैर-जैविक सामग्री से अलग रखना जरूरी होगा। यदि कचरे में प्लास्टिक, धातु, कांच या अन्य अवांछित सामग्री बड़ी मात्रा में मिल जाती है, तो उसके प्रसंस्करण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
इसलिए परियोजना की सफलता केवल प्लांट की तकनीक पर निर्भर नहीं करेगी। घरों, बाजारों, होटलों और अन्य संस्थानों से निकलने वाले कचरे का स्रोत स्तर पर पृथक्करण भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। शहर में कचरा अलग करने की व्यवस्था जितनी मजबूत होगी, प्लांट के लिए गुणवत्तापूर्ण जैविक कचरे की उपलब्धता उतनी ही बेहतर हो सकती है।
डंपिंग साइट के पास बनाया जा सकता है CBG रिटेल आउटलेट
प्रस्तावित योजना का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा CBG की बिक्री से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, आईओसीएल डंपिंग साइट के आसपास एक रिटेल आउटलेट स्थापित करने की योजना पर काम कर रही है। यहां तैयार CBG को वाहनों के ईंधन के रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है।
इस व्यवस्था से परिवहन लागत और गैस की सप्लाई से जुड़ी कुछ चुनौतियों को कम करने में मदद मिल सकती है। स्थानीय स्तर पर CBG उपलब्ध होने से निजी और व्यावसायिक वाहन भी इस वैकल्पिक ईंधन का उपयोग कर सकते हैं, बशर्ते संबंधित वाहनों और ईंधन वितरण व्यवस्था के लिए आवश्यक तकनीकी एवं सुरक्षा मानक पूरे किए जाएं।
इस मॉडल का एक अहम हिस्सा नगर निगम के कचरा संग्रहण वाहनों को भी भविष्य में CBG आधारित ईंधन पर चलाने की योजना है। यदि ऐसा होता है, तो कचरा उठाने वाले वाहनों में डीजल की खपत कम की जा सकती है। इससे ईंधन खर्च में कमी के साथ-साथ वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को भी कम करने में मदद मिल सकती है।
45 एकड़ जमीन के उपयोग की बनाई गई योजना
डड्डूमाजरा क्षेत्र में उपलब्ध करीब 45 एकड़ जमीन के बेहतर और योजनाबद्ध उपयोग की योजना भी इस परियोजना का हिस्सा है। प्रस्तावित भूमि उपयोग में अलग-अलग क्षेत्रों को उनकी जरूरत के अनुसार विकसित करने की बात सामने आई है।
उपलब्ध योजना के अनुसार लगभग 14 एकड़ क्षेत्र को ग्रीन जोन के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा मौजूदा कचरे के लिए करीब 8 एकड़ और प्रस्तावित कचरा क्षेत्र के लिए लगभग 8 एकड़ भूमि निर्धारित की जा सकती है। CBG प्लांट के लिए लगभग 10 एकड़ क्षेत्र और भविष्य में विस्तार के लिए करीब 5 एकड़ जमीन रखने की योजना बताई गई है।
भूमि का ऐसा विभाजन डंपिंग ग्राउंड को धीरे-धीरे अधिक व्यवस्थित रूप देने में मदद कर सकता है। हालांकि वास्तविक भूमि उपयोग परियोजना की अंतिम स्वीकृत योजना, तकनीकी जरूरतों और पर्यावरणीय मंजूरियों के अनुसार बदल सकता है।
ग्रीन जोन से आसपास के क्षेत्रों को मिल सकती है राहत
डड्डूमाजरा डंपिंग ग्राउंड के आसपास रहने वाले लोगों के लिए लंबे समय से दुर्गंध, धूल और प्रदूषण जैसी समस्याएं चिंता का विषय रही हैं। ऐसे में प्रस्तावित ग्रीन जोन को स्थानीय पर्यावरण सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
यदि 14 एकड़ क्षेत्र में व्यवस्थित तरीके से हरियाली विकसित की जाती है, तो इससे आसपास के इलाके के दृश्य स्वरूप में सुधार हो सकता है। पेड़-पौधों और हरित पट्टी का विकास धूल को नियंत्रित करने और स्थानीय माइक्रोक्लाइमेट को बेहतर बनाने में भी कुछ भूमिका निभा सकता है।
हालांकि, केवल ग्रीन बेल्ट विकसित करना ही डंपिंग ग्राउंड से जुड़ी सभी पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान नहीं होगा। कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण, लीचेट प्रबंधन, दुर्गंध नियंत्रण और पुराने कचरे के उपचार जैसे उपाय भी समान रूप से आवश्यक होंगे।
पांच साल तक संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी
परियोजना की एक खास बात यह है कि आईओसीएल की भूमिका केवल प्लांट लगाने तक सीमित नहीं रहने की योजना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अगले पांच वर्षों तक प्लांट के संचालन, रखरखाव, इंटरनेट कनेक्टिविटी और उपकरणों के बीमा जैसी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी भी परियोजना से जुड़ी एजेंसी द्वारा संभाली जा सकती है।
इससे तकनीकी उपकरणों के रखरखाव और संचालन से संबंधित जिम्मेदारियां स्पष्ट रहने की उम्मीद है। बड़े तकनीकी प्लांट में मशीनों का नियमित रखरखाव बेहद जरूरी होता है, क्योंकि किसी उपकरण के लंबे समय तक बंद रहने से कचरा प्रसंस्करण और गैस उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
पांच वर्ष की संचालन व्यवस्था से परियोजना के शुरुआती चरण में सिस्टम को स्थिर बनाने और स्थानीय स्तर पर इसके संचालन का अनुभव विकसित करने में मदद मिल सकती है।
परियोजना की टाइमलाइन पर भी नजर
इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए विभिन्न चरणों की समयसीमा प्रस्तावित की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 20 नवंबर 2025 को MoU पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके बाद 19 जनवरी 2026 को जमीन चिन्हांकन का चरण पूरा होने की जानकारी दी गई है।
प्रस्तावित टाइमलाइन में 30 जून 2026 तक कन्सेशन एग्रीमेंट, 31 जनवरी 2027 तक इंजीनियरिंग और आवश्यक मंजूरियों का चरण तथा 1 अप्रैल 2027 से निर्माण कार्य शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद 31 अक्टूबर 2028 तक प्री-ऑपरेशन प्रक्रिया और 31 दिसंबर 2028 तक प्लांट शुरू करने का प्रस्तावित लक्ष्य बताया गया है।
हालांकि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में पर्यावरणीय मंजूरी, तकनीकी परीक्षण, भूमि संबंधी औपचारिकताएं और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण समयसीमा में बदलाव संभव होता है। इसलिए वास्तविक संचालन की तारीख परियोजना की प्रगति और सभी आवश्यक स्वीकृतियों पर निर्भर करेगी।
डंपिंग ग्राउंड से वेस्ट-टू-वेल्थ मॉडल की ओर बदलाव
डड्डूमाजरा CBG परियोजना का सबसे बड़ा उद्देश्य कचरे को समस्या के बजाय संसाधन के रूप में देखने की दिशा में बदलाव करना है। आमतौर पर शहरों में गीला कचरा लैंडफिल में पहुंचने के बाद कई पर्यावरणीय समस्याएं पैदा कर सकता है। वहीं, यदि इसी जैविक कचरे को सही तरीके से अलग करके प्रोसेस किया जाए तो उससे ऊर्जा उत्पादन की संभावना बनती है।
CBG उत्पादन के साथ जैविक कचरे का उपयोग होने से कचरे के प्रबंधन का एक वैकल्पिक रास्ता तैयार हो सकता है। इससे एक ओर लैंडफिल पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक ईंधन उपलब्ध कराने की संभावना भी बनती है।
शहर के परिवहन क्षेत्र को मिल सकता है वैकल्पिक ईंधन
यदि नगर निगम के कचरा संग्रहण वाहनों को CBG पर चलाने की योजना सफल होती है, तो यह शहर के सार्वजनिक सेवा वाहनों के लिए एक उपयोगी मॉडल बन सकता है। कचरा उठाने वाले वाहन रोजाना बड़ी दूरी तय करते हैं और नियमित रूप से ईंधन की आवश्यकता होती है।
स्थानीय स्तर पर तैयार CBG का उपयोग इन्हीं वाहनों में करने से कचरा प्रबंधन और ऊर्जा उत्पादन के बीच एक सर्कुलर मॉडल तैयार किया जा सकता है। यानी शहर से निकलने वाला जैविक कचरा ऊर्जा में बदले और उसी ऊर्जा का इस्तेमाल शहर की सफाई व्यवस्था में किया जाए।
इस तरह की व्यवस्था भविष्य में अन्य नगर निकायों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है, हालांकि इसके लिए वाहन तकनीक, ईंधन की उपलब्धता, गैस की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।
परियोजना की सफलता के लिए कचरा पृथक्करण सबसे जरूरी
CBG प्लांट की क्षमता और तकनीक जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी नागरिकों का सहयोग भी है। यदि घरों और व्यावसायिक संस्थानों से निकलने वाला गीला कचरा अलग नहीं किया जाता, तो प्लांट को लगातार गुणवत्तापूर्ण जैविक कच्चा माल उपलब्ध कराने में कठिनाई आ सकती है।
इसलिए इस परियोजना के साथ शहर में स्रोत स्तर पर कचरा पृथक्करण को मजबूत करना जरूरी होगा। लोगों को गीले और सूखे कचरे को अलग रखने के लिए जागरूक करना, नियमित कलेक्शन व्यवस्था बनाना और कचरा पृथक्करण के नियमों का पालन सुनिश्चित करना परियोजना की दीर्घकालिक सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
पर्यावरणीय निगरानी और पारदर्शिता भी होगी महत्वपूर्ण
किसी भी बड़े कचरा प्रसंस्करण संयंत्र के लिए पर्यावरणीय निगरानी जरूरी होती है। CBG प्लांट के संचालन के दौरान हवा की गुणवत्ता, दुर्गंध, अपशिष्ट पदार्थों के प्रबंधन और प्लांट से निकलने वाले अवशेषों की उचित व्यवस्था पर लगातार नजर रखनी होगी।
साथ ही, परियोजना की प्रगति और पर्यावरणीय प्रदर्शन से संबंधित जानकारी को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करना स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ाने में मदद कर सकता है। डड्डूमाजरा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए नियमित निगरानी और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
चंडीगढ़ में प्रस्तावित CBG प्लांट डड्डूमाजरा डंपिंग ग्राउंड के लंबे समय से चले आ रहे कचरा प्रबंधन मॉडल में बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। करीब 200 टन गीले कचरे के दैनिक प्रसंस्करण, लगभग 8,000 किलोग्राम CBG उत्पादन, संभावित ग्रीन जोन विकास और नगर निगम के वाहनों में वैकल्पिक ईंधन के उपयोग जैसी योजनाएं इस परियोजना को व्यापक बनाती हैं। परियोजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्माण, पर्यावरणीय स्वीकृतियां, कचरा पृथक्करण, प्लांट संचालन और रखरखाव की व्यवस्थाएं निर्धारित मानकों के अनुसार कितनी प्रभावी ढंग से लागू होती हैं।



