चंडीगढ़। पंजाब में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के महंगाई भत्ते यानी DA के लंबित भुगतान को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की ओर से राज्य सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) से जुड़े मामले में दिए गए निर्देश के बाद भाजपा ने भगवंत मान सरकार पर तीखा हमला बोला है। भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुघ ने अदालत के आदेश को पंजाब सरकार की वित्तीय व्यवस्था और कर्मचारियों के प्रति उसकी नीति पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला बताया है।
तरुण चुघ ने आरोप लगाया कि सरकार लंबे समय से अपने ही कर्मचारियों और पेंशनरों के बकाये को टालती रही, लेकिन अब न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद उसे भुगतान की दिशा में आगे बढ़ना पड़ा है। भाजपा नेता ने कहा कि अदालत की सख्ती ने सरकार के उन दावों की पोल खोल दी है, जिनमें लगातार वित्तीय अनुशासन और कर्मचारी हितों की बात की जाती रही है।
चुघ के मुताबिक, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पंजाब सरकार और PSPCL की अपीलों को खारिज करते हुए राज्य के कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित महंगाई भत्ते के भुगतान को लेकर सख्त समयसीमा तय की है। उन्होंने दावा किया कि करीब आठ लाख सरकारी कर्मचारी और पेंशनर इस मामले से प्रभावित हैं। उनके अनुसार, अदालत ने बकाया राशि का भुगतान निर्धारित अवधि में करने के निर्देश दिए हैं और देरी होने की स्थिति में ब्याज का प्रावधान भी रखा गया है।
भाजपा नेता ने कहा कि इस पूरे मामले में सरकार पर हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ने वाला है। उन्होंने बकाये की राशि करीब 14,191 करोड़ रुपये होने का दावा करते हुए कहा कि यह रकम राज्य के वित्तीय प्रबंधन की वास्तविक स्थिति को सामने लाती है। चुघ ने यह भी कहा कि अदालत के निर्देशों के तहत सरकार को निर्धारित समयसीमा के भीतर अनुपालन रिपोर्ट भी प्रस्तुत करनी होगी।
उन्होंने कहा कि यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। कर्मचारियों और पेंशनरों को लंबे समय से उनके DA और DR के भुगतान का इंतजार करना पड़ रहा है। चुघ ने आरोप लगाया कि सरकार ने समय पर अपने कर्मचारियों के अधिकारों का भुगतान करने के बजाय मामले को लगातार टालने का रास्ता अपनाया। उनके अनुसार, अब न्यायिक हस्तक्षेप के बाद सरकार पर बकाया राशि के भुगतान का दबाव बढ़ गया है।
तरुण चुघ ने कहा कि पंजाब सरकार ने वर्ष 2021 में छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार के पैटर्न पर DA और DR देने की व्यवस्था को मंजूरी दी थी। इसके बावजूद कर्मचारियों को इसका पूरा लाभ समय पर नहीं मिल पाया। उन्होंने दावा किया कि राज्य के कर्मचारी और पेंशनर केंद्र सरकार के कर्मचारियों की तुलना में DA के मामले में पीछे रह गए।
भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि लंबे समय तक बकाया भुगतान नहीं होने के कारण सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों पर आर्थिक दबाव बढ़ा। उनका कहना था कि महंगाई के दौर में DA कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं बल्कि कर्मचारियों की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में वर्षों तक भुगतान लंबित रखना कर्मचारियों के साथ अन्याय के समान है।
चुघ ने इस मामले में पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेश का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 8 अप्रैल को न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बरार की एकल पीठ ने सरकार की ओर से तैयार किए गए किस्तों में भुगतान के प्रस्ताव को चुनौती देने वाली याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। भाजपा नेता के अनुसार, सरकार ने 18 फरवरी 2025 को एक तरह की भुगतान योजना तैयार की थी, जिसके तहत बकाये को चरणबद्ध तरीके से चुकाने का प्रस्ताव था।
चुघ ने दावा किया कि एकल पीठ ने इस व्यवस्था को मनमाना बताते हुए रद्द कर दिया था और सरकार को बकाये का भुगतान करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद सरकार और PSPCL की ओर से इस फैसले को चुनौती दी गई। अब खंडपीठ द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद सरकार के सामने बकाया भुगतान का रास्ता और अधिक स्पष्ट हो गया है।
भाजपा नेता ने हाईकोर्ट के उस निर्देश को भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताया, जिसमें कर्मचारियों के बकाये का भुगतान होने तक बड़े पैमाने पर गैर-जरूरी विज्ञापन खर्च पर रोक की बात सामने आई है। चुघ ने इसे राज्य सरकार की कार्यशैली पर अदालत की गंभीर टिप्पणी के रूप में पेश किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि भगवंत मान सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी योजनाओं और उपलब्धियों के प्रचार पर भारी रकम खर्च की है। चुघ ने सरकार को ‘विज्ञापन आधारित राजनीति’ करने वाली सरकार बताते हुए कहा कि एक तरफ कर्मचारियों को उनके अधिकारों के भुगतान के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, जबकि दूसरी तरफ सरकार प्रचार अभियानों पर पैसा खर्च कर रही है।
भाजपा नेता ने कहा कि सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट होनी चाहिए। उनके अनुसार, सबसे पहले कर्मचारियों, पेंशनरों और श्रमिकों के वैध बकाये का भुगतान होना चाहिए और उसके बाद अन्य खर्चों पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि हाईकोर्ट के निर्देश से सरकार के वित्तीय फैसलों और खर्च करने की प्राथमिकताओं पर भी बहस शुरू हो गई है।
तरुण चुघ ने आरोप लगाया कि पंजाब सरकार पर पहले से ही भारी कर्ज का बोझ है और इसके बावजूद वह ऐसी योजनाओं को आगे बढ़ा रही है, जिनके लिए बड़ी मात्रा में सरकारी धन की आवश्यकता है। उन्होंने निर्माण श्रमिक कल्याण कोष से जुड़ी राशि का मुद्दा उठाते हुए दावा किया कि सरकार ने श्रमिक कल्याण के लिए निर्धारित धन को दूसरी योजना में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी।
चुघ ने ‘मुख्यमंत्री मावां-धियां सत्कार योजना’ का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि इसके लिए निर्माण श्रमिक कल्याण से जुड़ी राशि इस्तेमाल करने का प्रयास किया गया। उन्होंने इस योजना के लिए करीब 9,300 करोड़ रुपये के बजट प्रावधान का भी जिक्र किया। भाजपा नेता के मुताबिक, मजदूरों के कल्याण के लिए निर्धारित धन को किसी अन्य उद्देश्य में लगाने की कोशिश सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है।
उन्होंने कहा कि सरकार को सबसे पहले उन लोगों की समस्याएं दूर करनी चाहिए जो सीधे तौर पर सरकारी व्यवस्था से जुड़े हैं। चुघ ने सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों और मनरेगा मजदूरों के भुगतान को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि कई शिक्षक महीनों से वेतन की प्रतीक्षा कर रहे हैं और मनरेगा मजदूरों को भी समय पर मजदूरी नहीं मिल रही।
भाजपा नेता ने हाल ही में खन्ना में मनरेगा कर्मचारियों के प्रदर्शन के दौरान हुए कथित लाठीचार्ज का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे पंजाब सरकार के ‘कठोर रवैये’ का उदाहरण बताया। चुघ ने कहा कि जो सरकार कर्मचारियों और मजदूरों की समस्याओं का समाधान बातचीत से करने के बजाय उनके विरोध का सामना बल प्रयोग से करती है, वह अपने शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है।
चुघ ने कहा कि पंजाब के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों ने लंबे समय तक सरकार का साथ दिया है और प्रशासनिक व्यवस्था को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में उनके वेतन, भत्ते और पेंशन से जुड़े भुगतान को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि महंगाई भत्ता कर्मचारियों के जीवन-यापन की बढ़ती लागत से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसके भुगतान में देरी का सीधा असर परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ता है।
भाजपा नेता ने राज्य सरकार से मांग की कि वह अदालत के निर्देशों का पूरी गंभीरता से पालन करे और कर्मचारियों के बकाये का भुगतान तय समयसीमा में सुनिश्चित करे। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को अपने अधिकार के लिए बार-बार न्यायालय का रुख करने की स्थिति नहीं बननी चाहिए। सरकार को खुद पहल करके ऐसी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
तरुण चुघ ने वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी भगवंत मान सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार यदि अपने कर्मचारियों और पेंशनरों के बकाये का भुगतान करने में कठिनाई महसूस कर रही है, तो उसे अपने खर्चों की प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए। उनके अनुसार, गैर-जरूरी खर्चों को रोककर सबसे पहले वेतन, पेंशन, DA और श्रमिकों की मजदूरी जैसे अनिवार्य भुगतान किए जाने चाहिए।
भाजपा नेता ने दावा किया कि हाईकोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि कर्मचारियों से जुड़े वित्तीय दायित्वों को लंबे समय तक टालना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने सरकार को निर्धारित समय के भीतर कार्रवाई करने का निर्देश देकर कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर स्पष्ट संदेश दिया है।
चुघ ने कहा कि यह मामला केवल DA के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे सरकार की प्रशासनिक सोच और वित्तीय प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़े होते हैं। उनका कहना था कि यदि राज्य सरकार के पास विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसा है, तो कर्मचारियों और पेंशनरों के लंबित भुगतान को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री ने इस पूरे घटनाक्रम को पंजाब की वित्तीय स्थिति से जोड़ते हुए कहा कि राज्य पहले से ही कर्ज के दबाव में है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की ओर से लगातार नई योजनाओं की घोषणा की जा रही है, लेकिन उनके लिए स्थायी वित्तीय संसाधन जुटाने की दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठाए जा रहे। चुघ के अनुसार, इसका असर अंततः कर्मचारियों, पेंशनरों और आम जनता पर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि पंजाब के लोगों को यह समझना होगा कि सरकार की घोषणाओं और वास्तविक वित्तीय क्षमता के बीच कितना अंतर है। भाजपा नेता ने दावा किया कि लंबे समय तक बकाया भुगतान न होना सरकार की वित्तीय योजना में गंभीर खामियों की ओर संकेत करता है।
आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चुघ ने भाजपा की ओर से कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए कई वादे भी किए। उन्होंने कहा कि यदि पंजाब में भाजपा की सरकार बनती है तो केंद्र सरकार के बराबर DA और पेंशन से संबंधित बकाये का भुगतान करने को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा शासन में कर्मचारियों, शिक्षकों और मजदूरों के वेतन या मजदूरी के भुगतान में अनावश्यक देरी नहीं होने दी जाएगी।
चुघ ने कहा कि सरकारी कर्मचारी और पेंशनर किसी भी सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। उनके हितों की अनदेखी करके कोई भी सरकार प्रभावी प्रशासन नहीं चला सकती। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर सरकार को संवेदनशील और जवाबदेह दोनों होना चाहिए।
उन्होंने पंजाब सरकार से अपील की कि वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर कर्मचारियों के लंबित भुगतान का समाधान करे। चुघ ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार के पास अब स्थिति स्पष्ट है और उसे अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए निर्धारित समय में भुगतान की प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए।
भाजपा नेता ने अंत में कहा कि पंजाब की जनता सरकार के कामकाज का मूल्यांकन केवल घोषणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि इस बात से करेगी कि कर्मचारियों, शिक्षकों, पेंशनरों और मजदूरों को उनका हक समय पर मिलता है या नहीं। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में वित्तीय प्रबंधन और कर्मचारी हितों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
इस पूरे मामले ने पंजाब की राजनीति में एक बार फिर कर्मचारी हितों और राज्य की वित्तीय स्थिति को केंद्र में ला दिया है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सरकार के सामने अब लंबित DA भुगतान को लेकर ठोस कदम उठाने की चुनौती है। वहीं भाजपा इसे भगवंत मान सरकार के खिलाफ बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से अनुपालन रिपोर्ट और बकाया भुगतान को लेकर उठाए जाने वाले कदम इस विवाद की अगली दिशा तय करेंगे।



