अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हालिया चुनावी नतीजों से राजनीतिक झटका जरूर लगा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी राष्ट्रपति की कुर्सी पर तत्काल कोई संकट आ गया है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थिति मजबूत होने के बाद ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की चर्चा तेज हो सकती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विपक्षी सांसद मिलकर ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटा सकते हैं? क्या संसद में बहुमत हासिल करना ही किसी राष्ट्रपति को सत्ता से बाहर करने के लिए पर्याप्त है या इसके लिए कोई अलग संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है?
दरअसल, अमेरिका में राष्ट्रपति को हटाने का रास्ता भारत की राजनीतिक व्यवस्था से काफी अलग है। वहां राष्ट्रपति का चुनाव संसद के चुनाव से अलग होता है। इसलिए संसद में बहुमत खोने के बावजूद राष्ट्रपति अपने पद पर बने रह सकते हैं। यही वजह है कि चुनाव में ट्रंप की पार्टी को नुकसान होने के बाद भी उनका कार्यकाल खतरे में तभी आएगा, जब महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया के सभी जरूरी चरण पूरे होंगे।
अमेरिकी चुनाव में हार का राष्ट्रपति की कुर्सी पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका की राजनीतिक व्यवस्था में राष्ट्रपति और संसद के सदस्यों का चुनाव अलग-अलग तरीके से होता है। राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है, जबकि संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के सदस्य हर दो साल में चुने जाते हैं। दूसरी तरफ, संसद के ऊपरी सदन सीनेट के सदस्यों का कार्यकाल छह साल का होता है।
अमेरिकी संसद को कांग्रेस कहा जाता है, जिसके दो हिस्से हैं। पहला हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और दूसरा सीनेट। हाउस में कुल 435 सदस्य होते हैं, जबकि सीनेट में 100 सदस्य होते हैं। इन दोनों सदनों की चुनावी प्रक्रिया और कार्यकाल अलग होने के कारण यह जरूरी नहीं कि राष्ट्रपति की पार्टी को संसद के दोनों सदनों में भी बहुमत मिले।
यही व्यवस्था राष्ट्रपति को संसद से अलग राजनीतिक आधार देती है। उदाहरण के तौर पर, यदि राष्ट्रपति रिपब्लिकन पार्टी से है और संसद में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत मिल जाता है, तब भी राष्ट्रपति को पद छोड़ने की जरूरत नहीं होती। वह अपना निर्धारित कार्यकाल पूरा कर सकता है।
ट्रंप के मामले में भी यही स्थिति महत्वपूर्ण है। उनकी पार्टी का संसद में बहुमत कमजोर होने या विपक्ष के मजबूत होने से उनके अधिकार अपने आप समाप्त नहीं होते। हालांकि, इससे राष्ट्रपति के फैसलों पर संसद की निगरानी बढ़ सकती है और उनके खिलाफ जांच तथा राजनीतिक विरोध तेज हो सकता है।
महाभियोग की शुरुआत कैसे होती है?
अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए महाभियोग यानी इम्पीचमेंट का प्रावधान किया गया है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि महाभियोग लगने का अर्थ राष्ट्रपति को तुरंत पद से हटाना नहीं होता। यह केवल उनके खिलाफ औपचारिक आरोप तय किए जाने की प्रक्रिया का पहला चरण है।
इस पूरी प्रक्रिया में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट की अलग-अलग जिम्मेदारियां होती हैं। सबसे पहले निचला सदन राष्ट्रपति के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करता है। इसमें दस्तावेजों, गवाहों और अन्य सबूतों की मदद ली जा सकती है। जांच के दौरान यह देखा जाता है कि राष्ट्रपति ने अपने संवैधानिक पद का गलत इस्तेमाल किया है या नहीं।
अमेरिकी संविधान के मुताबिक राष्ट्रपति पर देशद्रोह, रिश्वतखोरी और अन्य गंभीर अपराधों या कदाचार के आरोपों में महाभियोग चलाया जा सकता है। इसके लिए संविधान में ‘हाई क्राइम्स एंड मिसडिमीनर्स’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसका दायरा केवल सामान्य आपराधिक मामलों तक सीमित नहीं है। इसमें सत्ता का गंभीर दुरुपयोग, सार्वजनिक विश्वास को नुकसान पहुंचाना और पद की जिम्मेदारियों का गंभीर उल्लंघन भी शामिल हो सकता है।
यदि जांच के बाद हाउस में आरोपों को बहुमत से मंजूरी मिल जाती है तो राष्ट्रपति को इम्पीच्ड घोषित कर दिया जाता है। इसके लिए हाउस के 435 सदस्यों में साधारण बहुमत की जरूरत होती है। यानी सामान्य परिस्थितियों में कम से कम 218 वोट मिलने पर महाभियोग का प्रस्ताव पारित हो सकता है।
इम्पीचमेंट के बाद भी राष्ट्रपति कैसे बच सकते हैं?
महाभियोग की प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसके बाद शुरू होता है। हाउस से आरोप पारित होने के बाद मामला सीनेट में पहुंचता है। यहां राष्ट्रपति के खिलाफ मुकदमे जैसी कार्यवाही होती है। सीनेट के सदस्य आरोपों और उपलब्ध सबूतों पर विचार करते हैं। राष्ट्रपति के महाभियोग ट्रायल की अध्यक्षता अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश करते हैं।
इस चरण में केवल साधारण बहुमत से काम नहीं चलता। राष्ट्रपति को दोषी ठहराकर पद से हटाने के लिए सीनेट में मौजूद सदस्यों के दो-तिहाई वोट की आवश्यकता होती है। यदि सीनेट के सभी 100 सदस्य मतदान में हिस्सा लेते हैं तो राष्ट्रपति को हटाने के लिए कम से कम 67 वोट चाहिए।
यही वह संवैधानिक बाधा है, जिसके कारण किसी राष्ट्रपति को पद से हटाना आसान नहीं होता। मान लीजिए हाउस में विपक्षी पार्टी के पास पर्याप्त संख्या है और वह राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित कर देती है। इसके बावजूद यदि सीनेट में जरूरी दो-तिहाई समर्थन नहीं मिलता तो राष्ट्रपति अपने पद पर बने रहेंगे।
इसलिए संसद में विपक्ष का बहुमत होना और राष्ट्रपति को हटाने के लिए पर्याप्त वोट होना दो अलग-अलग बातें हैं। ट्रंप के मामले में भी यही अंतर सबसे ज्यादा मायने रखता है।
अमेरिका में पहले भी कई बार राष्ट्रपति पर महाभियोग चल चुका है
अमेरिकी इतिहास में राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पहले भी अपनाई जा चुकी है। एंड्रयू जॉनसन, बिल क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप ऐसे राष्ट्रपति हैं, जिनके खिलाफ हाउस ने महाभियोग के आरोप पारित किए थे।
1868 में राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन को महाभियोग का सामना करना पड़ा था। उनके खिलाफ सीनेट में सुनवाई हुई, लेकिन उन्हें पद से हटाने के लिए जरूरी दो-तिहाई समर्थन नहीं मिल पाया।
इसके बाद 1998 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई हुई। उन पर शपथ के दौरान गलत जानकारी देने और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने से जुड़े आरोप लगाए गए थे। हालांकि, सीनेट में उन्हें दोषी ठहराने के लिए आवश्यक वोट नहीं मिले और वह राष्ट्रपति बने रहे।
डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी इतिहास में ऐसे पहले राष्ट्रपति बने, जिनके खिलाफ दो बार महाभियोग के आरोप पारित हुए। पहली बार 2019 में यूक्रेन से जुड़े मामले में उन पर सत्ता के दुरुपयोग और कांग्रेस के काम में बाधा डालने के आरोप लगे। दूसरी बार 2021 में कैपिटल हिल हिंसा के बाद उनके खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई हुई।
दोनों ही मामलों में सीनेट में उन्हें पद से हटाने के लिए जरूरी दो-तिहाई समर्थन नहीं मिला। दूसरी बार जब सीनेट में सुनवाई हुई, तब तक ट्रंप राष्ट्रपति पद छोड़ चुके थे। इस तरह अमेरिकी इतिहास में अब तक किसी राष्ट्रपति को महाभियोग के जरिए पद से नहीं हटाया जा सका है।
वॉटरगेट मामले में निक्सन ने क्यों दिया था इस्तीफा?
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का मामला भी इस संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण है। 1970 के दशक में सामने आए वॉटरगेट कांड ने उनकी राजनीतिक स्थिति को बेहद कमजोर कर दिया था। उन पर सत्ता के दुरुपयोग और मामले की जांच में बाधा डालने जैसे गंभीर आरोप लगे थे।
निक्सन के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी। हाउस की न्यायिक समिति ने उनके खिलाफ महाभियोग के अनुच्छेदों को मंजूरी भी दे दी थी। लेकिन इससे पहले कि पूरा हाउस उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर अंतिम मतदान करता, निक्सन ने अगस्त 1974 में राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया।
इसलिए निक्सन को महाभियोग के जरिए हटाया गया राष्ट्रपति नहीं माना जाता। उन्होंने संभावित पदच्युति से पहले ही अपना पद छोड़ दिया था।
क्या रिपब्लिकन सांसद अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ वोट कर सकते हैं?
ट्रंप को हटाने की चर्चा में एक और संवैधानिक पहलू काफी अहम है। अमेरिका में सांसदों के लिए भारत की तरह पार्टी के निर्देशों का पालन करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है। वहां राजनीतिक दल अपने सदस्यों को पार्टी की नीति के अनुसार मतदान करने के लिए कह सकते हैं, लेकिन भारत के दल-बदल विरोधी कानून जैसी व्यवस्था नहीं है, जिसके तहत पार्टी के खिलाफ वोट करने पर सांसद की सदस्यता समाप्त हो जाए।
इसका मतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी का कोई सांसद भी ट्रंप के खिलाफ मतदान कर सकता है। ऐसा करने पर उसकी संसद की सदस्यता अपने आप खत्म नहीं होगी। हालांकि पार्टी उसके खिलाफ राजनीतिक कार्रवाई कर सकती है, अगले चुनाव में टिकट देने से इनकार कर सकती है या पार्टी के भीतर उसकी जिम्मेदारियां कम कर सकती है।
ट्रंप के पिछले महाभियोग ट्रायल में इसका उदाहरण भी देखने को मिला था। 2021 में सात रिपब्लिकन सीनेटरों ने अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ दोषी ठहराने के पक्ष में वोट दिया था। पहले महाभियोग मामले में भी एक रिपब्लिकन सीनेटर ने ट्रंप को दोषी ठहराने का समर्थन किया था।
इससे साफ है कि पार्टी के सांसदों के पास स्वतंत्र रूप से फैसला लेने का विकल्प मौजूद है। इसलिए सैद्धांतिक रूप से ट्रंप की अपनी पार्टी के सदस्य भी उनके खिलाफ मतदान कर सकते हैं।
ट्रंप को हटाने के लिए कितने रिपब्लिकन सांसदों का साथ जरूरी होगा?
ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती सीनेट में दो-तिहाई समर्थन जुटाना होगी। यदि डेमोक्रेटिक पार्टी के पास सीनेट में लगभग 54 सीटें हैं, तो 67 वोटों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के कुछ सदस्यों का समर्थन भी जरूरी होगा।
ऐसी स्थिति में करीब 13 से 14 रिपब्लिकन सीनेटरों को भी ट्रंप के खिलाफ मतदान करना पड़ सकता है। इतनी बड़ी संख्या में अपनी ही पार्टी के राष्ट्रपति के खिलाफ जाना आसान राजनीतिक फैसला नहीं होगा।
हालांकि, अमेरिकी व्यवस्था में इसकी संवैधानिक अनुमति है। यदि रिपब्लिकन सांसदों को लगता है कि राष्ट्रपति के साथ खड़े रहने से उनकी राजनीतिक छवि या भविष्य के चुनावों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, तो वे अलग रास्ता अपना सकते हैं।
ट्रंप के लिए एक और अहम बात यह है कि अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के अनुसार कोई व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं चुना जा सकता। ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने हैं। ऐसे में उनके राजनीतिक भविष्य और रिपब्लिकन पार्टी के अगले नेतृत्व को लेकर भी पार्टी के भीतर अलग-अलग विचार हो सकते हैं।
क्या ट्रंप को हटाने का रास्ता पूरी तरह बंद है?
कानूनी तौर पर ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाने का विकल्प मौजूद है, लेकिन इसके लिए केवल हाउस में विपक्ष का बहुमत होना पर्याप्त नहीं है। पहले आरोपों को हाउस से पारित कराना होगा और उसके बाद सीनेट में दो-तिहाई समर्थन जुटाना पड़ेगा।
इसके अलावा राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग के अलावा भी संवैधानिक परिस्थितियों में पद से हटने या हटाए जाने के दूसरे रास्ते मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, यदि राष्ट्रपति इस्तीफा दे दें या 25वें संशोधन की प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति की जिम्मेदारियां निभाने में असमर्थता की स्थिति सामने आए तो अलग संवैधानिक व्यवस्था लागू हो सकती है। हालांकि, ये महाभियोग से अलग प्रक्रियाएं हैं और इन्हें केवल चुनावी हार या संसद में बहुमत बदलने के आधार पर लागू नहीं किया जा सकता।
ट्रंप की पार्टी का संसद में कमजोर होना उनके लिए राजनीतिक परेशानी जरूर पैदा कर सकता है। विपक्ष उनके फैसलों की जांच कर सकता है, सुनवाई करा सकता है और महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर सकता है। लेकिन राष्ट्रपति की कुर्सी छीनने के लिए सीनेट में बड़ी संख्या में रिपब्लिकन सांसदों का भी विरोध में आना जरूरी होगा। जब तक ऐसा नहीं होता, केवल संसद में बहुमत बदलने से ट्रंप को राष्ट्रपति पद छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।




