क्या मोबाइल और इंटरनेट बच्चों को बना रहे हैं नशे का आसान शिकार? देशभर के स्कूलों में हुए सर्वे ने बढ़ाई चिंता

क्या मोबाइल और इंटरनेट बच्चों को बना रहे हैं नशे का आसान शिकार? देशभर के स्कूलों में हुए सर्वे ने बढ़ाई चिंता

देश में किशोरों के बीच नशीले पदार्थों के बढ़ते खतरे को लेकर सामने आया एक नया अध्ययन अभिभावकों, शिक्षकों और नीति निर्माताओं के लिए गंभीर चेतावनी लेकर आया है। विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि किशोरावस्था जीवन का सबसे संवेदनशील दौर होती है, जब बच्चों के व्यवहार, सोच और आदतों में तेजी से बदलाव आते हैं। ऐसे समय में परिवार, स्कूल और समाज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अब हाल ही में प्रकाशित एक सर्वे ने संकेत दिया है कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो बड़ी संख्या में किशोर नशे की गिरफ्त में आ सकते हैं।

अध्ययन के मुताबिक देश के विभिन्न राज्यों के हजारों स्कूली विद्यार्थियों पर किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि हर पांच में से लगभग एक किशोर ऐसा है, जिसमें नशीले पदार्थों के सेवन की मध्यम या उच्च स्तर की आशंका मौजूद है। यह निष्कर्ष केवल वर्तमान स्थिति को नहीं दर्शाता, बल्कि भविष्य में पैदा होने वाली सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि रोकथाम के उपाय केवल जागरूकता तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि परिवार और स्कूल दोनों को मिलकर बच्चों के व्यवहार पर लगातार नजर रखनी होगी।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल “द लैंसेट रीजनल हेल्थ–साउथईस्ट एशिया” में प्रकाशित किया गया है। शोध के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित 108 सरकारी और निजी स्कूलों के छह हजार से अधिक किशोरों को शामिल किया गया। सर्वे का उद्देश्य यह समझना था कि किशोरों में नशीले पदार्थों के उपयोग का संभावित जोखिम कितना है और किन सामाजिक तथा व्यक्तिगत कारणों से यह खतरा बढ़ रहा है।

शोध में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, असम के कामरूप, महाराष्ट्र के नागपुर, गुजरात के राजकोट, झारखंड के देवघर और पुडुचेरी जैसे क्षेत्रों के स्कूलों को शामिल किया गया। अलग-अलग राज्यों के विद्यार्थियों से प्राप्त जानकारी का विश्लेषण करने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि लगभग 21.4 प्रतिशत किशोर ऐसे वर्ग में आते हैं, जिनमें भविष्य में नशीले पदार्थों के उपयोग का मध्यम या उच्च जोखिम देखा गया। इनमें करीब 10.3 प्रतिशत किशोर मध्यम जोखिम और 11.1 प्रतिशत उच्च जोखिम वाली श्रेणी में पाए गए।

राज्यों के बीच तुलना करने पर भी दिलचस्प अंतर सामने आया। अध्ययन के अनुसार गुवाहाटी और देवघर के स्कूलों में उच्च जोखिम वाले किशोरों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक थी, जबकि नागपुर और पुडुचेरी के स्कूलों में कम जोखिम वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत ज्यादा दर्ज किया गया। शोधकर्ताओं का मानना है कि अलग-अलग क्षेत्रों की सामाजिक परिस्थितियां, पारिवारिक माहौल, स्थानीय वातावरण और जागरूकता का स्तर इन अंतरों के पीछे महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं।

इस अध्ययन के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा विकसित स्क्रीनिंग टूल का उपयोग किया गया, जिससे यह आकलन किया गया कि किन किशोरों में नशीले पदार्थों की ओर झुकाव विकसित होने की संभावना अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे वैज्ञानिक परीक्षण शुरुआती स्तर पर जोखिम की पहचान करने में मदद करते हैं, जिससे समय रहते उचित हस्तक्षेप किया जा सकता है।

शोध की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इसमें केवल जोखिम के आंकड़े ही प्रस्तुत नहीं किए गए, बल्कि उन कारणों की भी पहचान की गई जो किशोरों को नशे की ओर आकर्षित कर सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार डिजिटल एक्सपोजर इस समस्या के प्रमुख कारणों में शामिल है। आज के समय में बच्चे पहले की तुलना में कहीं अधिक समय इंटरनेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिताते हैं। कई बार उन्हें ऐसी सामग्री देखने को मिलती है, जिसमें नशीले पदार्थों का सामान्यीकरण या अप्रत्यक्ष प्रचार दिखाई देता है। लगातार ऐसे कंटेंट के संपर्क में रहने से उनके मन में जिज्ञासा और प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल इंटरनेट ही नहीं, बल्कि नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता भी चिंता का विषय है। यदि किसी क्षेत्र में ऐसे पदार्थ आसानी से मिल जाते हैं और निगरानी कमजोर होती है, तो किशोरों के लिए उनका प्रयोग करने का जोखिम बढ़ सकता है। यही वजह है कि अध्ययन में रोकथाम के लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनाने की सिफारिश की गई है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस चुनौती से निपटने के लिए केवल स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम चलाना पर्याप्त नहीं होगा। परिवार, समुदाय, शिक्षकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और स्थानीय प्रशासन को मिलकर काम करना होगा। रिपोर्ट में सामुदायिक भागीदारी, साथियों के नेतृत्व वाले जागरूकता कार्यक्रम और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसी पहलों को प्रभावी बताया गया है। यदि किशोरों को सही समय पर परामर्श और सकारात्मक वातावरण मिले तो नशे की ओर बढ़ने की संभावना काफी हद तक कम की जा सकती है।

माता-पिता की भूमिका सबसे अहम है। बच्चों के साथ नियमित संवाद, उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर संतुलित निगरानी, दोस्ती के दायरे की जानकारी और मानसिक तनाव को समझना बेहद जरूरी है। केवल पढ़ाई या अंक पर ध्यान देने के बजाय उनके भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए। कई बार अकेलापन, तनाव या साथियों का दबाव भी बच्चों को गलत दिशा में ले जा सकता है।

स्कूलों के लिए भी यह अध्ययन महत्वपूर्ण संदेश देता है। शिक्षकों को विद्यार्थियों के व्यवहार में आने वाले अचानक बदलाव, पढ़ाई में गिरावट, सामाजिक दूरी या असामान्य गतिविधियों जैसे संकेतों पर ध्यान देना चाहिए। समय रहते ऐसे मामलों की पहचान होने पर काउंसलिंग और अभिभावकों के सहयोग से समस्या को गंभीर बनने से पहले रोका जा सकता है।

किशोरों को केवल नशे के नुकसान बताना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें स्वस्थ जीवनशैली, खेलकूद, रचनात्मक गतिविधियों और सकारात्मक सामाजिक वातावरण से भी जोड़ना होगा। जब बच्चों के पास अपनी ऊर्जा और समय को सही दिशा में लगाने के पर्याप्त अवसर होते हैं, तब वे जोखिम भरे व्यवहार से काफी हद तक दूर रहते हैं।

यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि भारत में किशोरों के बीच नशीले पदार्थों से जुड़े जोखिम को हल्के में नहीं लिया जा सकता। डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच परिवार, स्कूल और समाज की साझा जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। यदि शुरुआती स्तर पर जोखिम की पहचान कर उचित मार्गदर्शन और सहयोग दिया जाए, तो बड़ी संख्या में बच्चों को नशे की लत से बचाया जा सकता है और उनके भविष्य को सुरक्षित बनाया जा सकता है।

(Photo: AI Generated)