बच्चों की परवरिश में न करें ये 5 गलतियां, आत्मसम्मान पर पड़ सकता है बुरा प्रभाव

बच्चों की परवरिश में न करें ये 5 गलतियां, आत्मसम्मान पर पड़ सकता है बुरा प्रभाव

बच्चों के लिए परिवार और रिश्तेदारों के बीच होने वाली छोटी-छोटी बातें भी काफी मायने रखती हैं। शादी, जन्मदिन, पूजा, पार्टी या किसी पारिवारिक कार्यक्रम में अक्सर बच्चे सभी के आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। लोग उनसे बातचीत करना चाहते हैं, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं और कई बार मजाक-मजाक में उनसे कुछ ऐसा करने के लिए भी कह देते हैं, जिसमें बच्चा सहज महसूस नहीं करता। कई माता-पिता भी सामाजिक दबाव में आकर बच्चे को वह काम करने के लिए कह देते हैं।

बड़ों के लिए भले ही यह सामान्य व्यवहार हो, लेकिन बच्चे के लिए ऐसी स्थिति असहज या शर्मिंदगी भरी हो सकती है। बचपन में बनने वाला आत्मविश्वास इस बात से भी प्रभावित होता है कि माता-पिता उसकी भावनाओं, पसंद और सीमाओं को कितना महत्व देते हैं। इसलिए बच्चों को अनुशासन और सामाजिक व्यवहार सिखाना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर स्थिति में उनकी इच्छा को नजरअंदाज किया जाए।

विशेषज्ञों की सामान्य पेरेंटिंग सलाह भी यही है कि बच्चों को सम्मानजनक तरीके से सामाजिक व्यवहार सिखाने के साथ उनकी व्यक्तिगत सीमाओं को समझने का अवसर दिया जाना चाहिए। आइए जानते हैं ऐसी 5 बातें, जिन्हें सामाजिक समारोहों में माता-पिता को बच्चे पर थोपने से बचना चाहिए।

1. किसी से गले मिलने या किस करने के लिए मजबूर न करें

किसी रिश्तेदार या परिचित से मिलने पर बच्चे को गले लगाने, किस करने या गोद में जाने के लिए कहना काफी आम है। कई बार सामने वाला व्यक्ति प्यार से बच्चे के पास आता है, लेकिन बच्चा पीछे हट जाता है या अपनी झिझक जाहिर करता है। ऐसी स्थिति में उसे जबरदस्ती गले लगवाना या किस करवाना उचित नहीं है।

बच्चे को यह समझने का मौका मिलना चाहिए कि वह अपने शरीर के बारे में कुछ सीमाएं खुद भी तय कर सकता है। अगर वह किसी को गले नहीं लगाना चाहता तो इसका मतलब यह नहीं कि वह बदतमीज है या उसे संस्कार नहीं दिए गए हैं।

माता-पिता ऐसी परिस्थिति में बच्चे को दूसरे विकल्प दे सकते हैं। वह नमस्ते कर सकता है, हाथ हिला सकता है, मुस्कुराकर अभिवादन कर सकता है या हाई-फाइव कर सकता है। इससे बच्चे को सामाजिक व्यवहार भी सीखने को मिलेगा और उसकी सहजता भी बनी रहेगी।

बच्चे की इच्छा का सम्मान करने से उसे यह संदेश मिलता है कि उसकी भावनाएं महत्वपूर्ण हैं। यही भावना आगे चलकर उसे अपनी सीमाएं समझने और जरूरत पड़ने पर उन्हें व्यक्त करने में मदद कर सकती है।

2. सबके सामने बच्चे को गाने, डांस या परफॉर्म करने के लिए मजबूर न करें

पारिवारिक कार्यक्रमों में अक्सर कोई न कोई बच्चे से कह देता है कि गाना सुनाओ, कविता सुनाओ, डांस करके दिखाओ या कोई एक्ट करके दिखाओ। कुछ बच्चे ऐसे मौकों का आनंद लेते हैं, लेकिन हर बच्चा लोगों के सामने प्रदर्शन करने में सहज हो, यह जरूरी नहीं है।

अगर बच्चा मना कर रहा है, शर्म महसूस कर रहा है या साफ तौर पर असहज दिखाई दे रहा है, तो उसे सबके सामने परफॉर्म करने के लिए मजबूर करने से बचना चाहिए। खासकर तब, जब कई लोग उसकी ओर देख रहे हों और उसका वीडियो भी बनाया जा रहा हो।

बच्चे को यह विकल्प दिया जा सकता है कि वह जब मन करे तब अपनी प्रतिभा दिखाए। अगर वह घर पर गाना गाता है लेकिन मेहमानों के सामने नहीं गाना चाहता, तो दोनों परिस्थितियों को अलग-अलग समझना जरूरी है। घर में सहज होना और भीड़ के सामने सहज होना एक जैसी बात नहीं है।

माता-पिता चाहें तो बच्चे से कह सकते हैं कि अगर वह अभी नहीं करना चाहता तो कोई बात नहीं। इससे उस पर प्रदर्शन का अनावश्यक दबाव नहीं बनेगा और वह अपनी इच्छा से भविष्य में ऐसी गतिविधियों में हिस्सा ले सकेगा।

3. दूसरे बच्चों से उसकी तुलना करने की आदत से बचें

“देखो, तुम्हारा कजिन कितना अच्छा पढ़ता है”, “उसके नंबर तुमसे ज्यादा हैं”, “वह तो सबके सामने कितने आत्मविश्वास से बोलता है” जैसी बातें पारिवारिक समारोहों में सुनने को मिल जाती हैं। कई बार इन्हें बच्चे को प्रेरित करने के लिए कहा जाता है, लेकिन लगातार तुलना बच्चे के मन में नकारात्मक धारणा पैदा कर सकती है।

हर बच्चे की सीखने की गति, रुचियां और व्यक्तित्व अलग होते हैं। कोई बच्चा पढ़ाई में अच्छा हो सकता है, तो दूसरा खेल, संगीत, चित्रकारी या किसी अन्य गतिविधि में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। इसलिए किसी एक बच्चे को दूसरे के सामने आदर्श बनाकर पेश करना हमेशा उपयोगी नहीं होता।

तुलना के बजाय माता-पिता बच्चे के अपने प्रयासों पर ध्यान दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, “पिछली बार से तुमने इस बार ज्यादा अच्छा किया” जैसी बात बच्चे को अपनी प्रगति देखने में मदद करती है। इससे उसे यह समझ आता है कि सफलता का मतलब हर किसी से आगे निकलना नहीं, बल्कि खुद में सुधार करना भी है।

अगर कोई रिश्तेदार बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से करता है, तो माता-पिता बिना माहौल खराब किए बातचीत को दूसरी दिशा में ले जा सकते हैं। इससे बच्चे को भी महसूस होगा कि उसके माता-पिता उसकी तुलना किसी और से नहीं कर रहे हैं।

4. बच्चे की गलतियों या कमजोरियों का मजाक सबके सामने न बनाएं

बच्चे कई बार कुछ गलत बोल देते हैं, खाना गिरा देते हैं, किसी सवाल का जवाब नहीं दे पाते या किसी नए व्यक्ति के सामने घबरा जाते हैं। ऐसे समय पर हंसकर उसकी बात सबको बताना बड़ों को मजेदार लग सकता है, लेकिन बच्चा इसे अलग तरीके से महसूस कर सकता है।

मसलन, बच्चे ने कोई शब्द गलत बोल दिया और माता-पिता उसे बार-बार रिश्तेदारों के सामने दोहराकर हंसने लगे। ऐसी स्थिति बच्चे को भविष्य में बोलने से रोक सकती है। उसे डर लग सकता है कि गलती करने पर लोग उसका मजाक उड़ाएंगे।

गलती होने पर बच्चे को अकेले में समझाना ज्यादा बेहतर तरीका हो सकता है। यदि वह लोगों के सामने कोई बात गलत कह देता है, तो उसी समय उसे शर्मिंदा करने के बजाय सामान्य तरीके से स्थिति संभाली जा सकती है।

बच्चे को यह भरोसा होना चाहिए कि गलती करना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है। जब घर का माहौल ऐसा होता है, तो बच्चा सवाल पूछने, नई चीजें आजमाने और अपनी बात रखने में ज्यादा सहज महसूस कर सकता है।

5. बच्चे को सबके सामने डांटने, शर्मिंदा करने या उसकी निजी बातें बताने से बचें

किसी सामाजिक समारोह में बच्चा अगर शरारत करता है, खाना नहीं खाता, किसी बात पर रोता है या माता-पिता की बात तुरंत नहीं मानता, तो उसे सबके सामने डांट देना आसान लग सकता है। लेकिन अनुशासन सिखाने और सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने में फर्क है।

बच्चे को सुधारना जरूरी हो सकता है, लेकिन उसकी गलती को सभी के सामने बार-बार बताना या उसे अपमानित करना स्थिति को और खराब कर सकता है। बेहतर होगा कि जरूरत पड़ने पर बच्चे को अलग ले जाकर शांत तरीके से समझाया जाए।

इसी तरह बच्चे की निजी बातें भी रिश्तेदारों के सामने साझा करने से बचना चाहिए। उसकी कोई आदत, डर, रोने की वजह, स्कूल की समस्या या घर में हुई कोई व्यक्तिगत घटना सबके सामने बताने से वह असहज हो सकता है। बच्चों को भी अपनी निजता और सम्मान का अधिकार है।

माता-पिता अगर बच्चे के सामने उसकी अच्छी बातें करते हैं, उसकी कोशिशों की सराहना करते हैं और गलती होने पर शांत तरीके से समझाते हैं, तो बच्चे के अंदर सुरक्षित महसूस करने की भावना मजबूत हो सकती है।

बच्चों को संस्कार दें, लेकिन उनकी भावनाओं को भी समझें

बच्चों को बड़ों का सम्मान करना, मेहमानों से ठीक तरह बात करना और सामाजिक परिस्थितियों में उचित व्यवहार करना सिखाना जरूरी है। लेकिन संस्कार सिखाने का मतलब बच्चे को हर स्थिति में अपनी इच्छा के विरुद्ध काम करने के लिए मजबूर करना नहीं होना चाहिए।

माता-पिता बच्चे को यह समझा सकते हैं कि किसी से मिलते समय अभिवादन करना अच्छी आदत है, लेकिन अभिवादन का तरीका परिस्थिति और बच्चे की सहजता के अनुसार अलग हो सकता है। इसी तरह परफॉर्म करना, किसी से गले मिलना या बातचीत करना तभी सकारात्मक अनुभव बनता है, जब बच्चा उसमें खुद को सुरक्षित और सहज महसूस करे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को यह भरोसा मिले कि उसके माता-पिता उसके साथ हैं। जब बच्चा जानता है कि उसकी बात सुनी जाएगी और गलती करने पर उसे सबके सामने नीचा नहीं दिखाया जाएगा, तो वह धीरे-धीरे अपनी बात रखने में ज्यादा आत्मविश्वासी बन सकता है।

इसलिए अगली बार किसी शादी, पार्टी या पारिवारिक समारोह में बच्चे से कोई काम करवाने से पहले एक पल रुककर उसकी प्रतिक्रिया जरूर देखें। वह क्या चाहता है, किस चीज में सहज है और किस बात से असहज हो रहा है—इन संकेतों को समझना भी अच्छी परवरिश का अहम हिस्सा है। बच्चे का आत्मविश्वास केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से भी बनता है कि उसके अपने लोग उसकी भावनाओं और सीमाओं का कितना सम्मान करते हैं।

Photo : istock