पिछले कुछ वर्षों में स्मार्टवॉच लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुकी है। पहले जहां घड़ी का इस्तेमाल केवल समय देखने तक सीमित था, वहीं अब यह छोटी-सी डिवाइस स्वास्थ्य से जुड़ी कई जानकारियां भी उपलब्ध कराती है। हार्ट रेट की निगरानी, रोजाना चले गए कदमों की गिनती, ब्लड ऑक्सीजन लेवल, नींद का विश्लेषण और एक्सरसाइज ट्रैकिंग जैसी सुविधाओं के कारण करोड़ों लोग पूरे दिन इसे अपनी कलाई पर पहनकर रखते हैं। कई लोग तो रात में सोते समय भी स्मार्टवॉच नहीं उतारते ताकि उनकी नींद का डेटा रिकॉर्ड हो सके।
हालांकि, स्मार्टवॉच की बढ़ती लोकप्रियता के साथ इसके बारे में कई तरह की आशंकाएं और अफवाहें भी सामने आती रहती हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे दावे किए जाते हैं कि स्मार्टवॉच से निकलने वाली रेडिएशन शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकती है और लंबे समय तक इसे पहनने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी होने का खतरा बढ़ सकता है। इन दावों को देखकर कई लोग असमंजस में पड़ जाते हैं कि आखिर सच क्या है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि वैज्ञानिक शोध और स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस विषय पर क्या कहते हैं।
स्मार्टवॉच आखिर कैसे काम करती है?
स्मार्टवॉच को स्मार्टफोन या इंटरनेट से जोड़ने के लिए वायरलेस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। अधिकांश स्मार्टवॉच ब्लूटूथ के माध्यम से मोबाइल फोन से कनेक्ट रहती हैं। कई मॉडलों में वाई-फाई और कुछ में सिम या सेलुलर नेटवर्क की सुविधा भी उपलब्ध होती है। इन कनेक्शनों की मदद से नोटिफिकेशन, कॉल, मैसेज और स्वास्थ्य संबंधी डेटा का आदान-प्रदान होता है।
यह पूरा सिस्टम रेडियो फ्रीक्वेंसी सिग्नल के जरिए काम करता है। इसी कारण लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या ये रेडियो तरंगें शरीर को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
किस प्रकार की रेडिएशन निकलती है?
विशेषज्ञ बताते हैं कि स्मार्टवॉच से निकलने वाली रेडिएशन को नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन कहा जाता है। यह कम ऊर्जा वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी होती है, जिसका उपयोग ब्लूटूथ, वाई-फाई और अन्य वायरलेस संचार तकनीकों में किया जाता है।
यह रेडिएशन उस आयोनाइजिंग रेडिएशन से पूरी तरह अलग होती है, जो एक्स-रे या कुछ अन्य मेडिकल जांचों में इस्तेमाल होती है। आयोनाइजिंग रेडिएशन में इतनी ऊर्जा होती है कि वह कोशिकाओं के डीएनए को प्रभावित कर सकती है, जबकि नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन में ऐसी क्षमता नहीं होती।
यही कारण है कि दोनों प्रकार की रेडिएशन की तुलना करना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं माना जाता।
क्या कैंसर से जुड़ा कोई प्रमाण मिला है?
दुनिया की कई प्रमुख स्वास्थ्य संस्थाओं और वैज्ञानिक अध्ययनों ने अब तक इस विषय पर उपलब्ध शोध का विश्लेषण किया है। इन अध्ययनों में ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि स्मार्टवॉच या इसी तरह के कम पावर वाले वायरलेस उपकरण कैंसर का कारण बनते हैं।
कोशिकाओं, जानवरों और इंसानों पर किए गए अनेक शोधों की समीक्षा के बाद भी रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी और कैंसर के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं किया जा सका है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान वैज्ञानिक साक्ष्य यह नहीं बताते कि सामान्य उपयोग के दौरान स्मार्टवॉच से निकलने वाली रेडियो तरंगें स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं।
फिर लोगों में डर क्यों है?
तकनीक से जुड़ी नई चीजों को लेकर लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। सोशल मीडिया पर बिना वैज्ञानिक आधार वाले कई संदेश तेजी से वायरल हो जाते हैं। अक्सर अधूरी जानकारी या गलत व्याख्या के कारण यह धारणा बन जाती है कि हर तरह की रेडिएशन खतरनाक होती है।
असल में “रेडिएशन” शब्द सुनते ही लोग एक्स-रे या परमाणु विकिरण जैसी चीजों की कल्पना करने लगते हैं, जबकि स्मार्टवॉच से निकलने वाली रेडियो फ्रीक्वेंसी उनसे बिल्कुल अलग श्रेणी की होती है। यही भ्रम कई बार अनावश्यक डर का कारण बन जाता है।
ब्लूटूथ कितना शक्तिशाली होता है?
स्मार्टवॉच में इस्तेमाल होने वाला ब्लूटूथ बहुत कम पावर पर काम करता है। इसका उद्देश्य केवल थोड़ी दूरी पर मौजूद स्मार्टफोन या अन्य डिवाइस के साथ डेटा साझा करना होता है।
कम ऊर्जा होने के कारण इससे निकलने वाली रेडियो तरंगों की तीव्रता भी काफी सीमित रहती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ इसे सामान्य परिस्थितियों में सुरक्षित मानते हैं।
क्या आगे और रिसर्च की जरूरत है?
हालांकि वर्तमान वैज्ञानिक प्रमाण स्मार्टवॉच को कैंसर से जोड़ने का समर्थन नहीं करते, लेकिन विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि विज्ञान लगातार विकसित होने वाली प्रक्रिया है। नई तकनीकों पर समय-समय पर नए अध्ययन किए जाते रहते हैं।
कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि कई वर्षों तक लगातार शरीर के संपर्क में रहने वाले वायरलेस उपकरणों के प्रभावों पर आगे भी अध्ययन जारी रहने चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि स्मार्टवॉच खतरनाक साबित हो चुकी है, बल्कि वैज्ञानिक समुदाय भविष्य में भी नए प्रमाणों का मूल्यांकन करता रहेगा।
क्या लगातार पहनना जरूरी है?
स्मार्टवॉच स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देने में उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसे 24 घंटे लगातार पहनना हर व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं है। यदि किसी को केवल दिनभर की एक्टिविटी ट्रैक करनी है तो रात में सोते समय घड़ी उतारी जा सकती है।
कुछ लोग केवल नींद की निगरानी के लिए इसे रात में पहनते हैं, जबकि बाकी लोग जरूरत के अनुसार इसका उपयोग करते हैं। यह पूरी तरह व्यक्तिगत आवश्यकता पर निर्भर करता है।
विशेषज्ञ किन सावधानियों की सलाह देते हैं?
भले ही अभी तक किसी गंभीर खतरे का प्रमाण नहीं मिला है, फिर भी सामान्य सावधानी अपनाना हमेशा बेहतर माना जाता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जब स्मार्टवॉच की जरूरत न हो तो उसके वायरलेस फीचर बंद किए जा सकते हैं।
यदि ब्लूटूथ या इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता नहीं है तो उन्हें बंद रखने से बैटरी भी बचती है और अनावश्यक सिग्नल ट्रांसमिशन भी कम हो जाता है।
इसके अलावा, रात में सोते समय यदि नींद ट्रैक नहीं करनी है तो स्मार्टवॉच उतारकर रखी जा सकती है। इससे त्वचा को भी आराम मिलता है और डिवाइस चार्ज करने का समय भी मिल जाता है।
बच्चों के लिए क्या सलाह है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों में किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का अत्यधिक उपयोग सीमित होना चाहिए। हालांकि स्मार्टवॉच से कैंसर का कोई प्रमाणित खतरा नहीं मिला है, लेकिन बच्चों को लंबे समय तक लगातार स्मार्टवॉच पहनाने की आवश्यकता भी नहीं होती।
बच्चों के शरीर का विकास जारी रहता है, इसलिए उनके लिए स्क्रीन टाइम और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग को संतुलित रखना बेहतर माना जाता है।
क्या स्मार्टवॉच के फायदे ज्यादा हैं?
आज की स्मार्टवॉच केवल समय बताने वाली घड़ी नहीं रह गई है। यह कई बार स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण संकेत भी समय रहते पहचानने में मदद कर सकती है। हार्ट रेट में असामान्य बदलाव, रोजाना की शारीरिक गतिविधि, एक्सरसाइज रिकॉर्ड और नींद के पैटर्न जैसी जानकारियां उपयोगकर्ताओं को अपनी जीवनशैली बेहतर बनाने में मदद करती हैं।
हालांकि, किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या का अंतिम निर्णय केवल स्मार्टवॉच के डेटा के आधार पर नहीं लेना चाहिए। यदि कोई असामान्य संकेत दिखाई देता है तो डॉक्टर से सलाह लेना ही सबसे उचित विकल्प होता है।
अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक शोधों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय के अनुसार स्मार्टवॉच से निकलने वाली कम शक्ति वाली नॉन-आयोनाइजिंग रेडियो फ्रीक्वेंसी को कैंसर का कारण साबित करने वाला कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है। सोशल मीडिया पर फैलने वाले कई दावे वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं, इसलिए उन पर आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए।
फिर भी संतुलित उपयोग और सामान्य सावधानियां अपनाना हमेशा समझदारी माना जाता है। जरूरत न होने पर वायरलेस कनेक्शन बंद रखना, रात में आवश्यक न हो तो स्मार्टवॉच उतार देना और बच्चों को लंबे समय तक लगातार इसका उपयोग न करने देना जैसी छोटी-छोटी आदतें अपनाई जा सकती हैं।
कुल मिलाकर, मौजूदा वैज्ञानिक जानकारी यही संकेत देती है कि सामान्य उपयोग के दौरान स्मार्टवॉच पहनने और कैंसर के बीच कोई प्रमाणित संबंध स्थापित नहीं हुआ है। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक शोध और विशेषज्ञों की राय पर भरोसा करना ही सबसे बेहतर तरीका है।




