‘टॉक्सिक’ पर RGV का तंज या ‘धुरंधर’ की तारीफ? राम गोपाल वर्मा ने बताया कैसी होनी चाहिए रियल फिल्ममेकिंग

‘टॉक्सिक’ पर RGV का तंज या ‘धुरंधर’ की तारीफ? राम गोपाल वर्मा ने बताया कैसी होनी चाहिए रियल फिल्ममेकिंग

राम गोपाल वर्मा एक बार फिर रणवीर सिंह स्टारर फिल्म ‘धुरंधर’ को लेकर चर्चा में हैं। दिग्गज फिल्ममेकर ने इस बार किसी फिल्म का नाम लेकर सीधे टिप्पणी नहीं की, लेकिन उनकी पोस्ट को यश की हालिया रिलीज ‘टॉक्सिक’ से जोड़कर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि राम गोपाल वर्मा ने लगातार कई पोस्ट में ‘धुरंधर’ की तारीफ की है और अब उन्होंने विस्तार से बताया है कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है, जिससे दूसरे फिल्ममेकर्स को सीख लेनी चाहिए।

राम गोपाल वर्मा की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब यश की ‘टॉक्सिक’ अपनी लंबी अवधि, एक्शन सीक्वेंस और विजुअल ट्रीटमेंट को लेकर चर्चा में है। हालांकि RGV ने अपनी पोस्ट में न तो यश का नाम लिया और न ही ‘टॉक्सिक’ या उसकी निर्देशक गीतू मोहनदास का। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर उनकी बातों को ‘टॉक्सिक’ की शैली और उसके एक्शन सीन्स से जोड़कर देखा जा रहा है।

दरअसल, 26 अगस्त को राम गोपाल वर्मा ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि वह दोबारा ‘धुरंधर’ देख रहे हैं। इसके दो दिन बाद उन्होंने फिर पोस्ट कर बताया कि वह इस फिल्म को बार-बार देख रहे हैं। अब उन्होंने एक लंबा नोट शेयर करते हुए फिल्ममेकर्स को समझाने की कोशिश की कि किसी फिल्म को दर्शकों के करीब ले जाने के लिए सिर्फ बड़ा बजट या स्टार पावर ही पर्याप्त नहीं होती।

RGV के मुताबिक ‘धुरंधर’ की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

राम गोपाल वर्मा के मुताबिक ‘धुरंधर’ की खासियत उसके किरदार हैं। उनका मानना है कि फिल्म में मौजूद लोग सिर्फ स्क्रीन पर हीरो या विलेन की तरह दिखाई नहीं देते, बल्कि सामान्य इंसानों की तरह व्यवहार करते हैं। यही वजह है कि दर्शक उनके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ पाते हैं।

उन्होंने कहा कि हर फिल्ममेकर को ‘धुरंधर’ से यह बात सीखनी चाहिए कि पर्दे पर दिखने वाले किरदार जितने वास्तविक महसूस होंगे, फिल्म का असर उतना ही ज्यादा होगा। उनके अनुसार, दर्शक ऐसे किरदारों को पसंद करते हैं जिनमें कमजोरियां, गलतियां, डर और सामान्य मानवीय भावनाएं दिखाई दें।

RGV ने इस संदर्भ में अपनी चर्चित फिल्म ‘सत्या’ का भी जिक्र किया। 1998 में रिलीज हुई यह गैंगस्टर फिल्म आज भी हिंदी सिनेमा की कल्ट फिल्मों में गिनी जाती है। राम गोपाल वर्मा ने ‘सत्या’ को भी वास्तविक दुनिया से जुड़े किरदारों वाली फिल्म बताया और कहा कि जब कहानी और किरदार जिंदगी के करीब होते हैं, तो सिनेमा का प्रभाव अलग स्तर पर पहुंच जाता है।

हीरो को हर वक्त महान दिखाने की जरूरत नहीं

राम गोपाल वर्मा की पोस्ट का एक बड़ा हिस्सा फिल्मों में हीरो को पेश करने के तरीके पर है। उनका कहना है कि आज कई फिल्मों में मुख्य अभिनेता को हर सीन में बड़ा और प्रभावशाली दिखाने की कोशिश की जाती है। कैमरा लगातार उसके व्यक्तित्व को ग्लोरिफाई करता रहता है, लेकिन ‘धुरंधर’ ऐसा नहीं करती।

उनके मुताबिक फिल्म का मुख्य किरदार हमेशा सबसे ताकतवर या सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बनकर सामने नहीं आता। वह सामान्य परिस्थितियों में मौजूद रह सकता है, दूसरों की बातें सुन सकता है, खाना परोस सकता है, किसी स्थिति में गलत साबित हो सकता है और कभी-कभी छोटे किरदारों के सामने छोटा भी दिखाई दे सकता है।

यही चीज उन्हें वास्तविक लगती है। RGV के अनुसार, किसी स्टार को हर फ्रेम में पोस्टर जैसा दिखाना जरूरी नहीं है। यदि किरदार कहानी के हिसाब से व्यवहार करता है, तो दर्शक उससे ज्यादा जुड़ते हैं।

उन्होंने महंगे बजट वाली फिल्मों पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि बड़े बजट का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि हर चीज को कृत्रिम तरीके से भव्य बनाया जाए। उन्होंने हॉलीवुड की ‘टाइटैनिक’ का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बड़े पैमाने पर पैसा खर्च करने के बावजूद कोशिश यह थी कि चीजें ज्यादा से ज्यादा वास्तविक महसूस हों।

स्लो-मोशन और धुंध से नहीं बनती इंटेंसिटी

राम गोपाल वर्मा ने फिल्मों में जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल होने वाले स्लो-मोशन और विजुअल इफेक्ट्स पर भी अपनी राय रखी। उनका इशारा उन फिल्मों की तरफ था, जहां एक्शन या हीरो की एंट्री को प्रभावशाली बनाने के लिए लगातार स्लो-मोशन, धुआं, धुंध और ‘एलिवेशन शॉट्स’ का इस्तेमाल किया जाता है।

उनके मुताबिक अगर दर्शक किसी किरदार की जिंदगी और उसकी कहानी से जुड़ गया है, तो उसे हर कुछ मिनट में हीरो का बड़ा क्लोजअप या स्टाइलिश एंट्री दिखाने की जरूरत नहीं होती। कैमरा सिर्फ किरदारों को देखे और दर्शकों को उन्हें समझने का मौका दे, तो प्रभाव अपने आप पैदा हो सकता है।

उन्होंने कहा कि कई बार फिल्मों में विजुअल स्टाइल किरदारों की कहानी पर हावी हो जाता है। ऐसे में कैमरा कहानी को दिखाने के बजाय उसे बेचने लगता है। RGV के मुताबिक वास्तविक इंटेंसिटी लेखन और अभिनय से पैदा होनी चाहिए, केवल एडिटिंग या स्लो-मोशन से नहीं।

‘रहमान डकैत’ का भी किया खास जिक्र

राम गोपाल वर्मा ने अपनी पोस्ट में ‘धुरंधर’ के किरदार रहमान डकैत का भी उल्लेख किया। फिल्म में इस भूमिका को अक्षय खन्ना ने निभाया है। RGV के मुताबिक इस किरदार की खासियत यह नहीं है कि वह सिर्फ किसी पोस्टर या फोटो में प्रभावशाली दिखाई देता है, बल्कि उसकी पूरी शख्सियत अलग पहचान बनाती है।

उन्होंने रहमान डकैत की हंसी, उसके डर और बंदूक पकड़ने के तरीके तक का जिक्र किया। उनके अनुसार किरदार की पहचान केवल उसके लुक से नहीं बल्कि उसके व्यवहार और छोटी-छोटी आदतों से बनती है।

यही बात वह दूसरे फिल्ममेकर्स के लिए उदाहरण के तौर पर रखते हैं। उनके अनुसार किसी किरदार को यादगार बनाने के लिए उसे केवल स्टाइलिश कपड़े, शानदार संवाद या दमदार एंट्री देना पर्याप्त नहीं है। उसके व्यक्तित्व में ऐसी चीजें होनी चाहिए जो उसे दूसरे किरदारों से अलग बनाएं।

हिंसा को लेकर भी RGV ने रखी अपनी बात

‘धुरंधर’ में काफी हिंसा दिखाई गई है। राम गोपाल वर्मा ने इस हिंसा का बचाव करते हुए कहा कि फिल्म में हिंसा सिर्फ तमाशे के तौर पर इस्तेमाल नहीं की गई। उनके मुताबिक जब किसी कहानी में हिंसा होती है तो उसके परिणाम भी नजर आने चाहिए।

उनका मानना है कि हिंसा के बाद किसी किरदार की स्थिति बदलनी चाहिए, किसी को नुकसान उठाना चाहिए या कोई व्यक्ति भावनात्मक रूप से प्रभावित होना चाहिए। अगर हिंसा का कहानी पर कोई असर ही नहीं पड़ता, तो वह केवल दृश्यात्मक प्रदर्शन बनकर रह जाती है।

RGV ने ऐसी फिल्मों की आलोचना की जिनमें एक्शन सिर्फ स्टाइल दिखाने के लिए रखा जाता है। उन्होंने कहा कि कई बार कहानी बाद में आती है और पहले यह तय किया जाता है कि कौन-सा शॉट पोस्टर के लिए सबसे अच्छा दिखाई देगा।

उनके मुताबिक मजबूत सिनेमा वह है जिसमें एक्शन और हिंसा भी कहानी तथा किरदारों से जुड़ी हुई हो।

हीरो और विलेन दोनों को इंसान की तरह दिखाना जरूरी

राम गोपाल वर्मा ने अपनी पोस्ट में एक और महत्वपूर्ण बात कही। उनका मानना है कि दर्शकों को सिर्फ हीरो की भावनाएं नहीं, बल्कि कहानी में मौजूद दूसरे लोगों की भावनाएं भी महसूस होनी चाहिए।

उनके मुताबिक कई फिल्मों में हीरो को इस तरह पेश किया जाता है कि वह हर परिस्थिति में सबसे ताकतवर दिखाई दे। विलेन या बाकी किरदार केवल उसके सामने कमजोर साबित होने के लिए मौजूद रहते हैं। लेकिन जब हर किरदार को उसकी अपनी भावनाओं और परिस्थितियों के साथ दिखाया जाता है, तो कहानी ज्यादा प्रभावशाली बनती है।

RGV के अनुसार ‘धुरंधर’ में यही चीज दिखाई देती है। फिल्म में मुख्य किरदार के साथ-साथ अन्य पात्रों को भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का अवसर मिलता है। इससे दर्शकों को ऐसा महसूस होता है कि वे किसी वास्तविक दुनिया के लोगों को देख रहे हैं, न कि सिर्फ स्टार्स को स्क्रीन पर प्रदर्शन करते हुए।

क्या RGV की बातों का संबंध ‘टॉक्सिक’ से है?

यही सवाल अब सबसे ज्यादा चर्चा में है। यश की ‘टॉक्सिक’ 3 घंटे 14 मिनट लंबी फिल्म है और रिलीज के बाद इसके विजुअल ट्रीटमेंट और एक्शन सीक्वेंस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। फिल्म में कई जगह स्लो-मोशन और स्टाइलिश एक्शन का इस्तेमाल किया गया है।

ऐसे समय में RGV का बार-बार ‘धुरंधर’ की तारीफ करना और स्लो-मोशन तथा हीरो के लगातार ‘एलिवेशन’ पर टिप्पणी करना लोगों को ‘टॉक्सिक’ से जोड़ने का मौका दे रहा है। हालांकि राम गोपाल वर्मा ने कहीं भी सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि उनकी आलोचना ‘टॉक्सिक’ के लिए है।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि RGV ने यश या गीतू मोहनदास पर सीधे निशाना साधा है। उनकी पोस्ट को ज्यादा सही तरीके से एक फिल्ममेकिंग राय के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें वह वास्तविक किरदारों और कहानी आधारित सिनेमा को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं।

‘टॉक्सिक’ की कमाई भी चर्चा में

उधर यश की ‘टॉक्सिक’ बॉक्स ऑफिस पर भी लगातार खबरों में बनी हुई है। फिल्म ने रिलीज के पहले दिन भारत में करीब 101.10 करोड़ रुपये की कमाई की थी। इसके बाद वीकेंड में कलेक्शन में गिरावट देखने को मिली। रविवार को फिल्म ने लगभग 23 करोड़ रुपये का कारोबार किया।

रिपोर्ट के मुताबिक फिल्म का वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन 285.20 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। करीब 500 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म से काफी बड़ी उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।

‘टॉक्सिक’ का निर्देशन गीतू मोहनदास ने किया है और यश इसमें मुख्य भूमिका में हैं। यश फिल्म के को-राइटर भी हैं। फिल्म को मॉन्स्टर माइंड क्रिएशन्स और KVN प्रोडक्शन्स के बैनर तले बनाया गया है।

फिल्म की स्टारकास्ट में यश के साथ कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरैशी, रुक्मिणी वसंत, तारा सुतारिया और अक्षय ओबेरॉय जैसे कलाकार शामिल हैं। फिल्म को कन्नड़ और अंग्रेजी में तैयार किया गया है, जबकि हिंदी, तमिल, तेलुगू और मलयालम में इसके डब वर्जन भी रिलीज किए गए हैं।

फिलहाल राम गोपाल वर्मा की पोस्ट ने ‘धुरंधर’ बनाम ‘टॉक्सिक’ की तुलना को एक बार फिर हवा दे दी है। हालांकि RGV ने किसी फिल्म का नाम लेकर आलोचना नहीं की है, लेकिन उनके द्वारा वास्तविक किरदारों, जरूरत से ज्यादा स्लो-मोशन और हीरो के लगातार एलिवेशन पर कही गई बातें सोशल मीडिया पर खूब चर्चा बटोर रही हैं। अब देखना यह है कि आने वाले दिनों में वह ‘धुरंधर’ को लेकर अपनी तारीफ का सिलसिला जारी रखते हैं या फिर किसी दूसरी फिल्ममेकिंग तकनीक पर अपनी बेबाक राय सामने रखते हैं।