डीगढ़ के हेरिटेज फर्नीचर पर मंडराया विदेशी नीलामी का खतरा, केंद्र से कूटनीतिक हस्तक्षेप की अपील

डीगढ़ के हेरिटेज फर्नीचर पर मंडराया विदेशी नीलामी का खतरा, केंद्र से कूटनीतिक हस्तक्षेप की अपील

चंडीगढ़ की विश्वप्रसिद्ध वास्तु विरासत एक बार फिर विदेश में नीलामी के लिए पहुंच गई है। शहर की पहचान माने जाने वाले प्रसिद्ध वास्तुकार पियरे जेनरेट द्वारा डिजाइन किए गए मूल हेरिटेज फर्नीचर की अमेरिका में 13 अगस्त को प्रस्तावित नीलामी ने प्रशासन और विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। इस नीलामी में आठ दुर्लभ फर्नीचर आइटम शामिल हैं, जिन्हें कभी चंडीगढ़ के सरकारी भवनों और संस्थानों में उपयोग किया जाता था। इन वस्तुओं के विदेशी नीलामी घर तक पहुंचने के बाद अब इन्हें भारत वापस लाने और नीलामी रुकवाने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं।

जानकारी के अनुसार अमेरिका में होने वाली इस नीलामी में पियरे जेनरेट द्वारा डिजाइन की गई ऑफिस चेयर, लिनेन चेस्ट, डेस्क एवं चेयर सेट, डाइनिंग चेयर, फाइल रैक, राइटिंग चेयर, कमेटी टेबल और डे-बेड को शामिल किया गया है। नीलामी एजेंसी ने इन सभी वस्तुओं की अनुमानित कीमत 49,000 से 63,000 अमेरिकी डॉलर निर्धारित की है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग 40.94 लाख रुपये से 52.61 लाख रुपये के बीच बैठती है। विशेषज्ञों का मानना है कि नीलामी के दौरान इनकी कीमत अनुमान से कहीं अधिक भी जा सकती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चंडीगढ़ हेरिटेज फर्नीचर की मांग लगातार बढ़ रही है।

चंडीगढ़ की यह विरासत केवल फर्नीचर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस आधुनिक शहर की पहचान का हिस्सा है जिसकी परिकल्पना विश्वविख्यात वास्तुकार ली कॉर्बुजिए ने की थी। पियरे जेनरेट ने ली कॉर्बुजिए के साथ मिलकर चंडीगढ़ के प्रशासनिक भवनों, सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों के लिए विशेष रूप से यह फर्नीचर डिजाइन किया था। यही कारण है कि इन वस्तुओं को साधारण फर्नीचर नहीं बल्कि भारत की आधुनिक वास्तुकला और सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

इस पूरे मामले को लेकर अधिवक्ता एवं प्रशासक सलाहकार परिषद के सदस्य अजय जग्गा ने विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर तथा चंडीगढ़ प्रशासन के संस्कृति सचिव डॉ. सैयद आबिद रशीद शाह को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने आग्रह किया है कि भारत सरकार अमेरिका सरकार और संबंधित एजेंसियों के साथ कूटनीतिक स्तर पर बातचीत कर इस नीलामी को रोके तथा इन वस्तुओं की वैधता और स्वामित्व की जांच कराए।

अजय जग्गा का कहना है कि नीलामी सूची में इन फर्नीचर वस्तुओं के स्रोत के रूप में चंडीगढ़, प्रशासनिक भवन और पंजाब विश्वविद्यालय का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि ये वस्तुएं कभी सरकारी संस्थानों का हिस्सा रही हैं। ऐसे में यह जांच आवश्यक है कि इन्हें किस प्रक्रिया के तहत विदेश पहुंचाया गया और क्या इनके निर्यात के लिए आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं का पालन किया गया था या नहीं।

उन्होंने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि भारत 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। ऐसे समय में देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का विदेशों में नीलाम होना राष्ट्रीय गौरव और विरासत संरक्षण के दृष्टिकोण से गंभीर चिंता का विषय है। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में भी चंडीगढ़ से जुड़े और अधिक ऐतिहासिक फर्नीचर तथा अन्य धरोहरें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकती नजर आ सकती हैं।

उल्लेखनीय है कि यह पहला अवसर नहीं है जब चंडीगढ़ के हेरिटेज फर्नीचर की विदेशों में नीलामी की कोशिश की गई हो। पिछले कुछ वर्षों में यूरोप और अमेरिका के कई प्रतिष्ठित नीलामी घरों में पियरे जेनरेट के डिजाइन किए गए फर्नीचर लगातार बिक्री के लिए सामने आते रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनकी बढ़ती मांग के कारण इनकी कीमत करोड़ों रुपये तक पहुंच चुकी है।

हालांकि पिछले दो महीनों के दौरान भारत सरकार और चंडीगढ़ प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से दो अलग-अलग मामलों में बड़ी सफलता मिली थी। वर्ष 2026 में फ्रांस और स्पेन में प्रस्तावित चंडीगढ़ हेरिटेज फर्नीचर की नीलामी को केंद्र सरकार के कूटनीतिक हस्तक्षेप के बाद रोक दिया गया था। उन मामलों में भी प्रशासन ने संबंधित देशों के अधिकारियों से संपर्क कर यह दलील दी थी कि ये वस्तुएं भारत की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं और इनके स्वामित्व की जांच आवश्यक है। इसी अनुभव के आधार पर अब अमेरिका में प्रस्तावित नीलामी को भी रुकवाने की उम्मीद जताई जा रही है।

सूत्रों के अनुसार जैसे ही अमेरिका में प्रस्तावित नीलामी की जानकारी चंडीगढ़ प्रशासन तक पहुंची, संस्कृति विभाग ने पूरे मामले की जानकारी जुटानी शुरू कर दी। विभाग अब इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर केंद्र सरकार को भेजेगा ताकि विदेश मंत्रालय उचित स्तर पर हस्तक्षेप कर सके। प्रशासन यह भी पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि संबंधित फर्नीचर किस समय और किन परिस्थितियों में भारत से बाहर गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि चंडीगढ़ का हेरिटेज फर्नीचर केवल ऐतिहासिक महत्व ही नहीं रखता, बल्कि यह आधुनिक भारतीय वास्तुकला के विकास की कहानी भी बताता है। पियरे जेनरेट द्वारा डिजाइन की गई कुर्सियां, टेबल, अलमारियां और अन्य फर्नीचर अपनी सादगी, उपयोगिता और विशिष्ट डिजाइन के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय संग्रहकर्ता और कला प्रेमी इन वस्तुओं को ऊंची कीमत पर खरीदने के लिए तैयार रहते हैं।

विरासत संरक्षण से जुड़े जानकार लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि चंडीगढ़ के सभी मूल हेरिटेज फर्नीचर की व्यापक सूची तैयार कर उन्हें डिजिटल रिकॉर्ड में शामिल किया जाए। साथ ही सरकारी भवनों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में उपलब्ध मूल फर्नीचर की सुरक्षा के लिए विशेष निगरानी व्यवस्था लागू की जाए ताकि भविष्य में ऐसी ऐतिहासिक वस्तुएं अवैध रूप से निजी हाथों या विदेशी बाजारों तक न पहुंच सकें।

कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि इन वस्तुओं के स्वामित्व और निर्यात से जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाएं तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-सी वस्तुएं अधिकृत प्रक्रिया के तहत बेची गईं और कौन-सी संदिग्ध परिस्थितियों में देश से बाहर पहुंचीं। इससे भविष्य में विरासत संरक्षण के लिए प्रभावी नीति बनाने में भी मदद मिलेगी।

फिलहाल सभी की नजरें 13 अगस्त को अमेरिका में प्रस्तावित नीलामी पर टिकी हैं। यदि भारत सरकार समय रहते कूटनीतिक और कानूनी स्तर पर हस्तक्षेप करती है तो एक बार फिर चंडीगढ़ की इस अमूल्य विरासत को विदेशी नीलामी से बचाया जा सकता है। वहीं यदि नीलामी होती है तो इन ऐतिहासिक वस्तुओं के निजी संग्रहकर्ताओं के पास पहुंचने की संभावना बढ़ जाएगी, जिससे भविष्य में उन्हें भारत वापस लाना और अधिक कठिन हो सकता है।

चंडीगढ़ प्रशासन, संस्कृति विभाग और केंद्र सरकार के बीच अब इस मामले को लेकर समन्वय तेज हो गया है। विरासत संरक्षण से जुड़े संगठनों का भी मानना है कि चंडीगढ़ की पहचान बन चुके इन ऐतिहासिक फर्नीचर को केवल आर्थिक मूल्य के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इन्हें देश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वास्तु विरासत के रूप में संरक्षित करना समय की आवश्यकता है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि भारत सरकार के प्रयास अमेरिका में प्रस्तावित इस नीलामी को रोकने में कितने सफल साबित होते हैं।