चंडीगढ़ की पुनर्वास कॉलोनियों में रहने वाले करीब 35 हजार परिवारों के लिए लंबे समय से चली आ रही मालिकाना हक की मांग अब पूरी होने की उम्मीद जगी है। प्रशासन ने इन मकानों को लीजहोल्ड या लाइसेंस फीस की व्यवस्था से बाहर निकालकर लोगों को मालिकाना अधिकार देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा है। प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने संकेत दिए हैं कि केंद्रीय गृह मंत्रालय इस प्रस्ताव को जल्द मंजूरी दे सकता है।
प्रशासक ने हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात के दौरान चंडीगढ़ की पुनर्वास कॉलोनियों के मकानों को मालिकाना हक देने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया था। प्रशासन की ओर से तैयार प्रस्ताव में उन मकानों को मालिकाना अधिकार देने की व्यवस्था पर विचार किया गया है, जो वर्षों पहले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के परिवारों के पुनर्वास के लिए आवंटित किए गए थे।
कटारिया ने कहा कि उन्होंने खुद केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात कर इस मामले को मजबूती से रखा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि गृह मंत्रालय जल्द ही इस संबंध में भेजी गई फाइल को मंजूरी दे देगा। उनके अनुसार प्रशासन का उद्देश्य कॉलोनियों में रहने वाले लोगों की वर्षों पुरानी परेशानियों का समाधान करना है।
35 हजार परिवारों को मिल सकता है सीधा लाभ
प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1980 से अब तक पुनर्वास योजना के तहत 34,965 मकान बनाए गए हैं। इन मकानों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के परिवारों को लीजहोल्ड अथवा मासिक लाइसेंस शुल्क के आधार पर आवंटित किया गया था।
समय के साथ इन मकानों में रहने वाले परिवारों की कई पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन संपत्ति का पूर्ण मालिकाना अधिकार अब तक उन्हें नहीं मिल पाया। मकान आवंटित होने के बावजूद परिवारों को सामान्य संपत्ति की तरह सभी अधिकार प्राप्त नहीं हुए। यही वजह है कि मालिकाना हक का मुद्दा पिछले कई वर्षों से प्रशासन और केंद्र सरकार के सामने उठता रहा है।
प्रशासन की ओर से तैयार प्रस्ताव का उद्देश्य इन परिवारों को उनके मकानों पर स्पष्ट और वैधानिक मालिकाना अधिकार उपलब्ध कराना है। हालांकि, अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की मंजूरी और इसके लिए तय किए जाने वाले नियमों के आधार पर होगा।
लीज की शर्तों के कारण संपत्ति अधिकार सीमित
पुनर्वास योजना के तहत बनाए गए अधिकतर मकान 99 साल की लीज व्यवस्था के तहत दिए गए थे। कुछ मकान मासिक लाइसेंस फीस के आधार पर भी आवंटित किए गए। इस व्यवस्था के कारण मकान में रहने वाले परिवारों को संपत्ति के हस्तांतरण और अन्य अधिकारों को लेकर कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
मालिकाना हक नहीं होने के कारण इन मकानों को सामान्य फ्रीहोल्ड संपत्ति की तरह बेचना या हस्तांतरित करना आसान नहीं है। इसके अलावा संपत्ति के दस्तावेजों और अधिकारों को लेकर भी कई तरह की जटिलताएं बनी हुई हैं।
कॉलोनीवासियों का कहना है कि उन्होंने इन मकानों में दशकों से जीवन बिताया है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें पूर्ण मालिकाना अधिकार नहीं मिल सका। ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से प्रस्ताव को मंजूरी मिलने की स्थिति में बड़ी संख्या में परिवारों को राहत मिलने की उम्मीद है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रांसफर पर लगी रोक
पुनर्वास कॉलोनियों के मकानों से जुड़ी एक बड़ी समस्या संपत्ति के हस्तांतरण को लेकर भी है। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद जीपीए के आधार पर संपत्ति के ट्रांसफर पर रोक लग गई थी। इसके बाद इन मकानों की खरीद-फरोख्त और हस्तांतरण को लेकर स्थिति और जटिल हो गई।
कॉलोनीवासियों के अनुसार जब किसी परिवार को आर्थिक जरूरत के कारण मकान बेचने की आवश्यकता पड़ती है तो उसे कई तरह की औपचारिकताओं और कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता है। वहीं, बैंक से संपत्ति के आधार पर ऋण लेने में भी परेशानी आती है।
मालिकाना हक मिलने की स्थिति में इन परिवारों को संपत्ति से जुड़े अधिकार स्पष्ट होने की उम्मीद है। इससे मकानों की खरीद-बिक्री, हस्तांतरण और बैंक से ऋण लेने जैसी प्रक्रियाओं में भी बदलाव आ सकता है।
डड्डूमाजरा से लेकर सेक्टर-56 तक इंतजार
चंडीगढ़ की कई पुनर्वास कॉलोनियों में लोग लंबे समय से मालिकाना हक की मांग कर रहे हैं। इनमें डड्डूमाजरा, इंदिरा कॉलोनी, मनीमाजरा, मौलीजागरा, धनास, बापूधाम, सेक्टर-52 और सेक्टर-56 सहित अन्य क्षेत्र शामिल हैं।
इन इलाकों में रहने वाले परिवारों का कहना है कि मकान मिलने के बावजूद संपत्ति का पूर्ण अधिकार नहीं होने के कारण वे इसे अपनी जरूरत के अनुसार इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। कई परिवारों के लिए यह मकान उनकी सबसे बड़ी संपत्ति है, लेकिन दस्तावेजी अधिकार सीमित होने के कारण इसकी वास्तविक आर्थिक उपयोगिता प्रभावित होती है।
कॉलोनीवासियों का कहना है कि हर लोकसभा चुनाव के दौरान मालिकाना हक का मुद्दा प्रमुखता से उठता रहा है। राजनीतिक दलों की ओर से भी इस मांग को पूरा करने का आश्वासन दिया जाता रहा है। लेकिन अब तक इसका स्थायी समाधान नहीं हो सका।
वर्ष 1990 में मिला था आवेदन का एक मौका
मालिकाना हक को लेकर कॉलोनीवासियों को वर्ष 1990 में एक बार आवेदन का अवसर मिला था। उस समय केवल एक महीने के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू की गई थी। बड़ी संख्या में परिवार निर्धारित अवधि में आवेदन नहीं कर सके और इसके बाद यह प्रक्रिया दोबारा व्यापक स्तर पर शुरू नहीं हुई।
कॉलोनीवासियों के मुताबिक उस समय जिन लोगों ने आवेदन नहीं किया, वे बाद में इस सुविधा से वंचित रह गए। इसके बाद कई वर्षों से लोग दोबारा आवेदन का अवसर और संपत्ति पर पूर्ण अधिकार देने की मांग करते रहे हैं।
अब प्रशासन की ओर से नया प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को भेजे जाने के बाद इन परिवारों को उम्मीद है कि वर्षों पुराना मामला दोबारा आगे बढ़ेगा और उन्हें संपत्ति का स्पष्ट अधिकार मिल सकेगा।
मालिकाना हक मिलने पर बढ़ सकती है संपत्ति की कीमत
कॉलोनीवासियों का कहना है कि मालिकाना हक मिलने से इन मकानों की बाजार कीमत में भी बड़ा बदलाव आ सकता है। अभी लीज या लाइसेंस आधारित व्यवस्था के कारण इन मकानों की खरीद-बिक्री और वित्तीय उपयोग में कई सीमाएं हैं।
लोगों के मुताबिक यदि मकानों को मालिकाना हक मिल जाता है तो उनकी बाजार कीमत बढ़ सकती है। उनका अनुमान है कि कई इलाकों में संपत्ति की कीमत मौजूदा स्तर से करीब दोगुनी तक हो सकती है। हालांकि वास्तविक कीमत इलाके, मकान के आकार, दस्तावेजों और बाजार की स्थिति के आधार पर अलग-अलग होगी।
मालिकाना हक मिलने से बैंक से ऋण लेने की प्रक्रिया भी आसान होने की उम्मीद है। फिलहाल कई मामलों में बैंक संपत्ति की मौजूदा कानूनी स्थिति को देखते हुए ऋण देने में संकोच करते हैं।
नीड बेस चेंज पर भी राहत की तैयारी
मालिकाना हक के साथ प्रशासन पुनर्वास कॉलोनियों के मकानों में किए गए छोटे-मोटे निर्माण और बदलावों को नियमित करने के विकल्प पर भी काम कर रहा है। इसे नीड बेस चेंज के तौर पर देखा जा रहा है।
कई परिवारों ने समय के साथ अपनी जरूरत के अनुसार मकानों में मामूली बदलाव किए हैं। परिवार बढ़ने, बच्चों के लिए अतिरिक्त जगह की जरूरत या अन्य घरेलू आवश्यकताओं के कारण कुछ मकानों में अतिरिक्त निर्माण या संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं।
प्रशासन का संकेत है कि ऐसे छोटे और जरूरत आधारित बदलावों के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे उन परिवारों को राहत मिल सकती है, जिन्होंने अपनी वास्तविक जरूरतों के अनुसार मकानों में बदलाव किए हैं।
हालांकि, नीड बेस चेंज को लेकर भी अंतिम फैसला निर्धारित नियमों और केंद्र सरकार की मंजूरी के आधार पर ही होगा। प्रशासन यह व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रहा है कि वास्तविक जरूरत के तहत किए गए मामूली बदलावों को नियमों के दायरे में लाया जा सके।
कटारिया बोले- लोगों की दिक्कतें दूर करने का प्रयास
प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने कहा कि कॉलोनियों में रहने वाले लोगों की सभी दिक्कतों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वह इस मामले को लेकर खुद केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात कर चुके हैं और मालिकाना हक देने की मांग को मजबूती से केंद्र के सामने रखा गया है।
कटारिया के अनुसार, “कॉलोनी में रहने वाले लोगों की सभी दिक्कतें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। मैं खुद इसके लिए गृह मंत्री से मिलकर आया हूं। मालिकाना हक देने की मांग प्रशासन की ओर से मजबूती से रखी गई है। उम्मीद है कि जल्द ही गृह मंत्रालय से फाइल को मंजूरी मिल जाए।”
उन्होंने नीड बेस चेंज को लेकर भी कहा कि लोगों ने अपनी जरूरत के अनुसार जो छोटे-मोटे बदलाव किए हैं, उन्हें मंजूर करने का प्रयास किया जा रहा है।
केंद्र की मंजूरी के बाद तय होंगे नियम
प्रशासन की ओर से प्रस्ताव आगे बढ़ाए जाने के बाद अब निगाहें केंद्रीय गृह मंत्रालय के फैसले पर हैं। मंजूरी मिलने के बाद मालिकाना हक देने की प्रक्रिया, पात्रता, शुल्क, दस्तावेज और अन्य शर्तों को लेकर विस्तृत व्यवस्था तय की जा सकती है।
करीब 35 हजार परिवारों से जुड़ा यह मामला चंडीगढ़ की पुनर्वास कॉलोनियों में दशकों से लंबित है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो इन परिवारों को अपने मकानों पर अधिक स्पष्ट संपत्ति अधिकार मिलने का रास्ता खुल सकता है। साथ ही नीड बेस चेंज को लेकर राहत मिलने पर मकानों में जरूरत के अनुसार किए गए छोटे निर्माण को भी नियमित कराने का विकल्प सामने आ सकता है।
फिलहाल प्रशासन की ओर से केंद्र के निर्णय का इंतजार किया जा रहा है। मंजूरी के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन शर्तों और प्रक्रिया के तहत पुनर्वास कॉलोनियों के मकानों को मालिकाना हक दिया जाएगा।




