दिल्ली में अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए सड़कों पर उतरने वाले राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और दूसरे आंदोलनकारी समूहों के सामने अब प्रदर्शन स्थल को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। राजधानी में लंबे समय से धरना-प्रदर्शन की पहचान रहे जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थल के रूप में मिली मान्यता खत्म करने के केंद्र सरकार के फैसले ने इस बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बीच यह निर्णय सामने आया है। विपक्षी दलों और कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति मांगी जा रही थी। इसी घटनाक्रम के बीच अब दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए तीन वैकल्पिक स्थान निर्धारित किए गए हैं। इनमें रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड शामिल हैं। इस बदलाव के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर जंतर-मंतर इतने वर्षों तक विरोध की आवाज उठाने का प्रमुख केंद्र कैसे बना रहा, यहां प्रदर्शन करने पर पहले रोक क्यों लगी थी और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या रुख अपनाया था?
दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का पुराना ठिकाना क्या था?
आज जंतर-मंतर का नाम सामने आते ही राजनीतिक विरोध, धरने और सामाजिक आंदोलनों की तस्वीर उभरती है। लेकिन राजधानी में विरोध प्रदर्शनों की परंपरा इससे कहीं पुरानी है। वर्ष 1990 के दशक की शुरुआत से पहले बोट क्लब दिल्ली में बड़े जन आंदोलनों के लिए प्रमुख स्थान माना जाता था। इंडिया गेट और वर्तमान कर्तव्य पथ के आसपास का यह इलाका राजनीतिक सभाओं तथा बड़े प्रदर्शनों के लिए जाना जाता था। उस समय विभिन्न संगठनों और किसान समूहों की ओर से अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाने के लिए यहां विशाल सभाएं आयोजित की जाती थीं।
साल 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हुआ किसानों का प्रदर्शन इस इतिहास की बड़ी घटनाओं में गिना जाता है। बताया जाता है कि इस आंदोलन में लगभग पांच लाख किसान शामिल हुए थे। किसानों की इतनी बड़ी मौजूदगी के कारण मध्य दिल्ली में सामान्य जनजीवन और यातायात बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इस तरह के विशाल जमावड़ों के बाद सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और आम लोगों की आवाजाही को लेकर चिंताएं बढ़ने लगीं। नतीजतन बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों को सीमित करने की दिशा में कदम उठाए गए।
बोट क्लब पर पाबंदियों के बाद आंदोलनकारियों को ऐसी जगह की जरूरत महसूस हुई, जहां वे अपनी बात सार्वजनिक रूप से रख सकें और प्रशासन के सामने अपनी मांगें दर्ज करा सकें। इसी दौर में जंतर-मंतर धीरे-धीरे प्रदर्शनकारियों की पसंद बनता गया। लगभग 1993 के आसपास इस स्थान ने दिल्ली के प्रमुख धरना स्थल के रूप में पहचान बनानी शुरू कर दी। हालांकि, इसे किसी एक सरकारी घोषणा के माध्यम से औपचारिक रूप से आंदोलन स्थल नहीं बनाया गया था। लगातार होने वाले प्रदर्शनों और राजनीतिक गतिविधियों ने समय के साथ इसे यह पहचान दिलाई।
खगोलीय अध्ययन के लिए बना था जंतर-मंतर
जंतर-मंतर का मूल उद्देश्य राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा नहीं था। इसका निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने वर्ष 1724 में करवाया था। इस परिसर को खगोलीय गणनाओं, ग्रहों की स्थिति के अध्ययन और समय से संबंधित जानकारियां प्राप्त करने के लिए विकसित किया गया था। यहां मौजूद स्थापत्य संरचनाएं उस दौर में खगोल विज्ञान के अध्ययन के लिए इस्तेमाल की जाती थीं।
समय के साथ दिल्ली के इस ऐतिहासिक परिसर की भूमिका बदलती गई। संसद और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालयों के नजदीक होने के कारण यह राजनीतिक तथा सामाजिक मुद्दों पर विरोध दर्ज कराने के लिए उपयुक्त स्थान माना जाने लगा। यहां प्रदर्शन करने वाले लोगों को उम्मीद रहती थी कि उनकी मांगें सरकार के संबंधित अधिकारियों और राष्ट्रीय मीडिया तक पहुंचेंगी। इसी वजह से छोटे समूहों से लेकर बड़े संगठनों तक ने जंतर-मंतर को अपनी आवाज उठाने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के नेतृत्व में वर्ष 2011 में चले आंदोलन ने जंतर-मंतर की पहचान को देशभर में मजबूत किया। इस आंदोलन के दौरान सरकारी व्यवस्था में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण जैसे मुद्दे व्यापक चर्चा का विषय बने। बाद के वर्षों में भी विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और खेल जगत से जुड़े मुद्दों पर यहां प्रदर्शन होते रहे। वर्ष 2023 में भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पहलवानों का आंदोलन भी जंतर-मंतर से जुड़ी चर्चित घटनाओं में शामिल रहा।
स्थानीय लोगों की शिकायतों से बढ़ा विवाद
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की लोकप्रियता के साथ कई व्यावहारिक समस्याएं भी सामने आती रहीं। सीमित क्षेत्र में लोगों की बड़ी संख्या जुटने से यातायात, सार्वजनिक व्यवस्था और आसपास के निवासियों की दिनचर्या प्रभावित होने की शिकायतें उठती थीं। प्रदर्शन के दौरान लाउडस्पीकर और अन्य माध्यमों से होने वाले शोर को लेकर भी आपत्तियां सामने आईं। दूसरी ओर, आंदोलनकारी संगठनों का तर्क रहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाने का जरूरी माध्यम है।
इसी तरह की चिंताओं के बीच अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को रोकने का आदेश दिया था। इस फैसले के पीछे ध्वनि प्रदूषण और स्थानीय निवासियों को होने वाली परेशानियों जैसे मुद्दे प्रमुख थे। आदेश के बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के अधिकार तथा आम नागरिकों के हितों के बीच संतुलन का सवाल महत्वपूर्ण बन गया।
यह विवाद केवल किसी एक मैदान पर प्रदर्शन करने की अनुमति तक सीमित नहीं था। इसके केंद्र में यह सवाल भी था कि सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल किस तरह किया जाए, ताकि आंदोलनकारियों को अपनी बात रखने का अवसर मिले और आसपास रहने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का रुख अहम माना गया।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
23 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों से संबंधित मामले में अपना फैसला सुनाया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और विरोध दर्ज कराने के अधिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का नजरिया उचित नहीं है। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ स्थानीय निवासियों और आम जनता के हितों की रक्षा करना भी जरूरी है।
इस फैसले का अर्थ यह नहीं था कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी भी सार्वजनिक स्थान पर धरना शुरू कर सकता है। प्रदर्शन के लिए संबंधित अधिकारियों की अनुमति, निर्धारित शर्तों और लागू नियमों का पालन आवश्यक बना रहा। अदालत के सामने मूल चुनौती ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने की थी, जिसमें लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाइश बनी रहे और सार्वजनिक जीवन भी बाधित न हो।
इसके बाद जंतर-मंतर पर सीमित स्तर पर प्रदर्शन फिर शुरू हुए। दिल्ली पुलिस के नियमों के अनुसार, यहां प्रदर्शन के दौरान लोगों की अधिकतम संख्या 1,000 तक सीमित रखने का प्रावधान बताया गया था। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रदर्शन के अधिकार को बनाए रखते हुए भीड़, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों को नियंत्रित करना था। हालांकि, अब केंद्र सरकार की ओर से जंतर-मंतर की आधिकारिक प्रदर्शन स्थल वाली पहचान समाप्त करने का फैसला इस स्थान के भविष्य को लेकर नई बहस खड़ी कर रहा है।
अब दिल्ली में कहां धरना दे सकेंगे लोग?
जंतर-मंतर के स्थान पर अब दिल्ली में तीन निर्धारित जगहों को प्रदर्शन के वैकल्पिक केंद्र के रूप में सामने रखा गया है। इन स्थलों पर भी प्रदर्शन करने के लिए पुलिस की अनुमति और सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन करना होगा।
रामलीला मैदान: राजधानी में राजनीतिक रैलियों, जनसभाओं और सामाजिक आंदोलनों का यह पुराना केंद्र रहा है। यहां पहले भी बड़ी संख्या में लोग जुटते रहे हैं। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान भी रामलीला मैदान में व्यापक स्तर पर गतिविधियां हुई थीं। बड़े जमावड़ों के लिए उपलब्ध जगह इसकी प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।
बुराड़ी मैदान: दिल्ली के उत्तरी हिस्से में स्थित यह मैदान बड़े समूहों के एकत्र होने के लिए वैकल्पिक स्थल के रूप में निर्धारित किया गया है। यहां प्रदर्शन आयोजित करने की स्थिति में भी आयोजकों को प्रशासन की शर्तों और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं का ध्यान रखना होगा।
सीबीडी ग्राउंड: पूर्वी दिल्ली में स्थित इस मैदान को भी आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों की सूची में शामिल किया गया है। इसके जरिए राजधानी के पूर्वी हिस्से में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए एक निर्धारित स्थान उपलब्ध होगा। हालांकि, किसी भी आयोजन की अनुमति संबंधित प्रशासनिक नियमों के अनुसार ही मिलेगी।
इन तीनों स्थलों के निर्धारण के बाद प्रदर्शनकारियों को अपनी रणनीति नए सिरे से तय करनी पड़ सकती है। किसी भी आंदोलन के लिए केवल लोगों को एकत्र करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि आयोजन स्थल तक पहुंच, मीडिया की मौजूदगी, सुरक्षा और सरकार के संबंधित कार्यालयों से दूरी जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण होते हैं।
क्या जंतर-मंतर की जगह कोई दूसरा स्थल ले पाएगा?
जंतर-मंतर की खासियत केवल इसका ऐतिहासिक महत्व नहीं था, बल्कि राजधानी के राजनीतिक केंद्र के नजदीक इसकी स्थिति भी थी। यहां प्रदर्शन करने वाले संगठनों को लगता था कि उनकी मांगों पर राजनीतिक नेतृत्व और मीडिया का ध्यान जल्दी आकर्षित किया जा सकता है। किसी आंदोलन की दृश्यता उसके संदेश को व्यापक स्तर पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में नए प्रदर्शन स्थलों पर स्थानांतरण से आयोजकों को अपने कार्यक्रमों की योजना और प्रचार के तरीके में बदलाव करना पड़ सकता है।
हालांकि, किसी आंदोलन का प्रभाव केवल उसके आयोजन स्थल पर निर्भर नहीं करता। लोगों की भागीदारी, मुद्दे की गंभीरता, संगठन की तैयारी और जनता का समर्थन भी उसकी दिशा तय करते हैं। रामलीला मैदान जैसे स्थान पहले से ही बड़े आंदोलनों का अनुभव रखते हैं, जबकि बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड को भी निर्धारित विकल्पों के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। फिर भी इन स्थलों की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि अनुमति की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट है और प्रदर्शनकारियों को वहां अपनी बात रखने के लिए किस तरह की सुविधाएं मिलती हैं।
दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के केंद्र का इतिहास बताता है कि समय और प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार आंदोलन की जगह बदलती रही है। बोट क्लब से जंतर-मंतर तक का सफर इसी बदलाव का उदाहरण है। अब जंतर-मंतर की आधिकारिक पहचान समाप्त किए जाने के बाद रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिकों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना आगे भी प्रशासन और अदालतों के सामने अहम मुद्दा बना रहेगा।
Photo: Aaj Tak




