पाकिस्तान से लौट रहे ईरानी नेताओं पर हमले की आशंका! आखिरी वक्त पर बदला रूट, ऐसे टला बड़ा खतरा

पाकिस्तान से लौट रहे ईरानी नेताओं पर हमले की आशंका! आखिरी वक्त पर बदला रूट, ऐसे टला बड़ा खतरा

ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से जारी तनाव के दौरान एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने उस दौर की कूटनीतिक गतिविधियों और सुरक्षा चुनौतियों को लेकर कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉork टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस समय इजरायल ने ईरान के दो प्रमुख नेताओं को निशाना बनाने की योजना बनाई थी, जब अमेरिका युद्धविराम और अंतरिम शांति समझौते की दिशा में बेहद संवेदनशील बातचीत में जुटा हुआ था।

रिपोर्ट में अमेरिका के मौजूदा और पूर्व अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि वॉशिंगटन को इस बात की गंभीर चिंता थी कि यदि ईरान के शीर्ष वार्ताकारों पर हमला हो जाता है, तो महीनों से चल रही बातचीत पूरी तरह पटरी से उतर सकती है। यही वजह थी कि अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों के माध्यम से ईरान तक संभावित खतरे की जानकारी पहुंचाने की कोशिश की, ताकि संबंधित नेताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

बताया गया है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद के स्पीकर मोहम्मद बाकर गालिबाफ उस समय अमेरिका सहित कई देशों के साथ संपर्क बनाए हुए थे। दोनों नेताओं की भूमिका युद्धविराम और स्थायी समाधान की दिशा में बेहद अहम मानी जा रही थी। इसी कारण वे इजरायल की कथित टारगेट लिस्ट में शामिल हो गए थे।

रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में दोनों नेता पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद गए थे, जहां अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के साथ बातचीत प्रस्तावित थी। इस बैठक को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा था। हालांकि, यात्रा के दौरान ईरानी सुरक्षा एजेंसियों को यह आशंका सताने लगी थी कि इजरायल इस मौके का इस्तेमाल कर उनके शीर्ष नेताओं पर हमला कर सकता है।

इसी खतरे को देखते हुए पाकिस्तान ने ईरानी प्रतिनिधिमंडल के विमान को अपनी सीमा तक विशेष सुरक्षा उपलब्ध कराई। जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने ईरानी विमान को एस्कॉर्ट किया ताकि उसकी सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सके। लेकिन वास्तविक चुनौती उस समय सामने आई, जब प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान से लौटकर ईरान की ओर बढ़ रहा था।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि तेहरान लौटते समय ईरानी सुरक्षा एजेंसियों को एक अहम खुफिया सूचना मिली। इसमें कहा गया था कि इजरायल के दो लड़ाकू विमान ईरानी हवाई क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं और प्रतिनिधिमंडल के विमान पर हमला किए जाने की आशंका है। सूचना मिलते ही सुरक्षा एजेंसियां तुरंत सक्रिय हो गईं और विमान के पायलट को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए।

संभावित खतरे को देखते हुए ईरानी विमान को सीधे राजधानी तेहरान ले जाने की बजाय उसका रूट बदल दिया गया। विमान को मशहद एयरपोर्ट पर उतारा गया, जो पाकिस्तान की सीमा के अपेक्षाकृत नजदीक स्थित है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना था कि इस तरह विमान को संभावित खतरे से दूर रखा जा सकता है और नेताओं को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सकता है।

मशहद पहुंचने के बाद भी यात्रा समाप्त नहीं हुई। वहां से अब्बास अराघची, मोहम्मद बाकर गालिबाफ और उनके साथ मौजूद प्रतिनिधिमंडल ने सड़क मार्ग का सहारा लिया। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब आठ घंटे की लंबी यात्रा के बाद पूरा दल सुरक्षित रूप से तेहरान पहुंचने में सफल रहा। इस दौरान सुरक्षा व्यवस्था को बेहद गोपनीय रखा गया ताकि किसी भी तरह की जानकारी सार्वजनिक न हो सके।

अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, यदि उस समय हमला सफल हो जाता, तो ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत पूरी तरह समाप्त हो सकती थी। इससे क्षेत्र में सैन्य तनाव और अधिक बढ़ने का खतरा था। इसी कारण अमेरिका ने अपने स्तर पर इजरायल को ऐसे कदम से बचने की सलाह भी दी थी। एक अधिकारी के मुताबिक, जब ट्रंप प्रशासन को यह जानकारी मिली कि गालिबाफ कथित निशाने पर हैं, तो इजरायल को स्पष्ट संदेश दिया गया कि इस तरह की कार्रवाई वार्ता प्रक्रिया को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाना इजरायल की व्यापक सैन्य रणनीति का हिस्सा माना जाता रहा है। युद्ध के शुरुआती चरण में इजरायल ने सैन्य ठिकानों के साथ-साथ राजनीतिक और सुरक्षा नेतृत्व पर भी फोकस किया था। उसका उद्देश्य निर्णय लेने वाली संरचना को कमजोर करना बताया गया।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि जहां अमेरिकी सैन्य अभियान मुख्य रूप से ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को सीमित करने पर केंद्रित थे, वहीं इजरायल की प्राथमिकता वरिष्ठ अधिकारियों को निशाना बनाना थी। इसी रणनीति के तहत कई ऐसे नेताओं के नाम भी सामने आए, जिनसे अमेरिका भविष्य में बातचीत की उम्मीद कर रहा था।

इनमें ईरान के वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी और पूर्व विदेश मंत्री कमाल खराजी का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन नेताओं को भी संभावित टारगेट के रूप में देखा जा रहा था। अमेरिकी पक्ष का मानना था कि यदि बातचीत में शामिल या शामिल होने वाले नेताओं को नुकसान पहुंचता है, तो किसी भी तरह का कूटनीतिक समाधान लगभग असंभव हो जाएगा।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि ईरानी नेतृत्व के खिलाफ कार्रवाई की रणनीति युद्ध शुरू होने के बाद और तेज हुई थी। इसी अभियान के दौरान फरवरी में हुए हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों के मारे जाने का भी जिक्र किया गया है। हालांकि, इन घटनाओं को लेकर अलग-अलग स्तर पर विभिन्न दावे और प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि उस दौर में कूटनीति और सैन्य कार्रवाई समानांतर रूप से चल रही थीं। एक तरफ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिशें जारी थीं, जबकि दूसरी ओर दोनों पक्ष अपनी-अपनी सुरक्षा और रणनीतिक बढ़त बनाए रखने में लगे हुए थे। ऐसे माहौल में किसी भी बड़े नेता पर हमला पूरे क्षेत्र को व्यापक संघर्ष की ओर धकेल सकता था।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान से लौट रहे ईरानी प्रतिनिधिमंडल के साथ जो घटनाक्रम हुआ, वह इस बात का उदाहरण है कि उस समय सुरक्षा एजेंसियां किस स्तर की सतर्कता बरत रही थीं। समय रहते खुफिया सूचना मिलना, विमान का मार्ग बदलना और उसके बाद सड़क मार्ग से यात्रा कराने जैसे फैसलों ने संभावित खतरे को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम पर संबंधित देशों की ओर से आधिकारिक स्तर पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन रिपोर्ट में किए गए दावों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। यदि इन दावों को सही माना जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि उस समय मध्य पूर्व में सिर्फ युद्ध ही नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे बेहद जटिल कूटनीतिक और सुरक्षा गतिविधियां भी लगातार चल रही थीं। ऐसी परिस्थितियों में ईरानी नेताओं की सुरक्षित वापसी को उस दौर की सबसे संवेदनशील सुरक्षा घटनाओं में से एक माना जा रहा है।