पौंग बांध के 1,880 भूमि आवंटन रद्द, अनुराग ठाकुर ने संसद में उठाया विस्थापितों का मुद्दा

पौंग बांध के 1,880 भूमि आवंटन रद्द, अनुराग ठाकुर ने संसद में उठाया विस्थापितों का मुद्दा

पौंग और भाखड़ा बांध परियोजनाओं के कारण विस्थापित हुए परिवारों के पुनर्वास का मुद्दा एक बार फिर संसद में उठाया गया। लोकसभा में भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने विस्थापित परिवारों को अब तक मिले पुनर्वास लाभ, भूमि आवंटन और लंबित मामलों के समाधान को लेकर केंद्र सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी। उन्होंने सरकार से यह भी पूछा कि पात्र परिवारों की पहचान, उन्हें भूमि उपलब्ध करवाने और वर्षों से लंबित मामलों के निपटारे के लिए गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति किस तरह काम कर रही है।

लोकसभा में उठाए गए सवाल के जवाब में जल शक्ति मंत्रालय के राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने भाखड़ा और पौंग बांध परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की स्थिति को लेकर आंकड़े सामने रखे। सरकार के अनुसार भाखड़ा बांध परियोजना से कुल 7,209 परिवार प्रभावित हुए थे। इन परिवारों के पुनर्वास के लिए वर्ष 1959 में लागू नीति के तहत मुआवजे या वैकल्पिक भूमि का प्रावधान किया गया था।

केंद्र सरकार ने बताया कि भाखड़ा बांध परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड की ओर से पूरी की जा चुकी है। सरकार के अनुसार इस परियोजना के कारण प्रभावित हुए परिवारों को उस समय लागू पुनर्वास नीति के प्रावधानों के तहत मुआवजा अथवा वैकल्पिक भूमि उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की गई थी।

लोकसभा में दिए गए जवाब के अनुसार पौंग बांध परियोजना से जुड़े विस्थापितों का मामला अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। सरकार ने बताया कि पौंग बांध के लिए कुल 16,100 विस्थापितों को पात्र माना गया था। इनमें से 12,971 पात्र विस्थापितों को भूमि आवंटित की जा चुकी है। हालांकि भूमि आवंटन की प्रक्रिया के दौरान कई तरह की समस्याएं सामने आईं और 1,880 मामलों में किए गए भूमि आवंटन को बाद में रद्द कर दिया गया।

पौंग बांध विस्थापितों के मामलों में भूमि विवाद और आवंटन से जुड़े मुद्दे लंबे समय से सामने आते रहे हैं। इसको लेकर राजस्थान सरकार के अधीन एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति काम कर रही है। समिति का उद्देश्य भूमि से जुड़े विवादों का समाधान करना और पात्र विस्थापितों से संबंधित मामलों को आगे बढ़ाना है।

सरकार ने संसद में यह भी बताया कि विस्थापितों को आवंटित भूमि पर कब्जा लेने की प्रक्रिया के लिए निर्धारित समयसीमा में बदलाव किया गया है। पहले भूमि आवंटन के बाद कब्जा लेने के लिए 90 दिनों की अवधि निर्धारित थी, जिसे बढ़ाकर 180 दिन कर दिया गया है। इस बदलाव से संबंधित लाभार्थियों को आवंटित भूमि पर कब्जा लेने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा।

अनुराग ठाकुर की ओर से उठाए गए सवाल में विस्थापित परिवारों की पात्रता को लेकर भी जानकारी मांगी गई थी। इसके अलावा उन्होंने यह जानना चाहा कि भूमि आवंटन की प्रक्रिया में सामने आ रही समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं और जिन मामलों में अब तक समाधान नहीं हुआ है, उन्हें निपटाने के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है।

पौंग बांध का निर्माण हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में हुआ था, जिससे बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए और उन्हें दूसरे क्षेत्रों में बसाया गया। पुनर्वास के तहत कई परिवारों को राजस्थान में भूमि आवंटित की गई थी। समय बीतने के साथ भूमि पर कब्जे, पात्रता, आवंटन और रद्द किए गए मामलों से जुड़े विवाद सामने आते रहे हैं। यही वजह है कि पौंग बांध विस्थापितों का पुनर्वास लंबे समय से राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बना हुआ है।

संसद में सरकार की ओर से रखे गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि पौंग बांध विस्थापितों के लिए भूमि आवंटन की प्रक्रिया में काफी प्रगति हुई है, लेकिन बड़ी संख्या में पुराने मामलों के कारण यह मुद्दा अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। 16,100 पात्र विस्थापितों में से 12,971 को भूमि आवंटित किए जाने के बावजूद 1,880 मामलों के रद्द होने से पुनर्वास प्रक्रिया की जटिलता सामने आती है।

उच्चाधिकार प्राप्त समिति को भूमि विवादों के समाधान की जिम्मेदारी दिए जाने से उम्मीद है कि लंबे समय से लंबित मामलों में आगे बढ़ने का रास्ता तैयार होगा। हालांकि विस्थापित परिवारों के लिए वास्तविक राहत तभी सुनिश्चित होगी जब पात्र लोगों को भूमि का अधिकार और उस पर वास्तविक कब्जा मिल सके।

अनुराग ठाकुर द्वारा संसद में यह मुद्दा उठाए जाने के बाद एक बार फिर बांध विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की स्थिति चर्चा में आ गई है। उनका सवाल केवल पुराने आंकड़ों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि दशकों से चले आ रहे पुनर्वास संबंधी मामलों को अंतिम रूप देने के लिए वर्तमान में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

भाखड़ा बांध से प्रभावित परिवारों के संबंध में सरकार ने स्पष्ट किया कि 1959 की पुनर्वास नीति के तहत मुआवजा या वैकल्पिक भूमि उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की गई थी और भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड ने पुनर्वास प्रक्रिया समाप्त कर दी है। दूसरी ओर पौंग बांध विस्थापितों से जुड़े मामलों में अभी भी भूमि आवंटन और विवादों के समाधान की प्रक्रिया जारी है।

पौंग बांध से विस्थापित परिवारों के लिए राजस्थान में भूमि आवंटन की प्रक्रिया लंबे समय से संवेदनशील विषय रही है। हिमाचल प्रदेश से विस्थापित परिवारों को राजस्थान में बसाने की योजना के तहत भूमि उपलब्ध करवाई गई थी, लेकिन समय के साथ कई मामलों में आवंटित भूमि पर कब्जा, पात्रता और आवंटन रद्द होने जैसी समस्याएं सामने आईं।

सरकार की ओर से कब्जा लेने की समयसीमा 90 दिन से बढ़ाकर 180 दिन किया जाना भी इसी प्रक्रिया को आसान बनाने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। इससे लाभार्थियों को भूमि संबंधी औपचारिकताएं पूरी करने और निर्धारित प्रक्रिया के तहत कब्जा लेने के लिए अधिक समय मिल सकेगा।

लोकसभा में दिए गए जवाब ने यह भी स्पष्ट किया कि भाखड़ा और पौंग बांध विस्थापितों के मामले एक समान स्थिति में नहीं हैं। भाखड़ा बांध से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास को सरकार ने पूरा बताया है, जबकि पौंग बांध विस्थापितों से जुड़े भूमि आवंटन और विवादित मामलों का निपटारा अभी भी प्रशासनिक स्तर पर जारी है।

अनुराग ठाकुर ने सरकार से यह भी जानने की कोशिश की कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति लंबित मामलों पर किस तरह काम कर रही है और विस्थापित परिवारों के हितों को ध्यान में रखते हुए भूमि विवादों का समाधान कब तक किया जा सकेगा। सरकार ने बताया कि राजस्थान सरकार के अधीन यह समिति भूमि विवादों के निपटारे के लिए काम कर रही है।

पौंग और भाखड़ा बांध परियोजनाओं से विस्थापित परिवारों का मुद्दा कई दशकों पुराना है। इन परियोजनाओं ने देश के विकास और सिंचाई व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इनके निर्माण से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया कई मामलों में लंबी खिंच गई। ऐसे में संसद में यह मुद्दा उठना उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो अब भी भूमि और पुनर्वास से जुड़े मामलों के अंतिम समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

सरकार के ताजा जवाब के मुताबिक भाखड़ा बांध के 7,209 प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास नीति के तहत मुआवजे या वैकल्पिक भूमि की व्यवस्था की गई थी और संबंधित पुनर्वास प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है। वहीं पौंग बांध के 16,100 पात्र विस्थापितों में से 12,971 को भूमि आवंटित की जा चुकी है। 1,880 मामलों में आवंटन रद्द होने के बाद इनसे जुड़े विवाद और दावों का निपटारा उच्चाधिकार प्राप्त समिति के माध्यम से किया जा रहा है।

अब निगाह इस बात पर रहेगी कि लंबित भूमि विवादों और रद्द किए गए आवंटनों से जुड़े मामलों को समिति किस गति से सुलझाती है और पात्र विस्थापित परिवारों को वास्तविक रूप से उनका हक कब तक मिल पाता है। संसद में उठे इस मुद्दे ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि दशकों पहले विकास परियोजनाओं के लिए अपनी जमीन गंवाने वाले परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया को पूरी तरह समाप्त करने के लिए क्या अंतिम कदम उठाए जाने बाकी हैं।