भारत में तिरंगे के अलावा भी लहरा सकता है राज्य का झंडा? क्या कहता है कानून?

भारत में तिरंगे के अलावा भी लहरा सकता है राज्य का झंडा? क्या कहता है कानून?

भारत में राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा देश की एकता, संप्रभुता और लोकतांत्रिक पहचान का प्रतीक है। देश के सभी राज्यों की अपनी अलग भाषा, संस्कृति, परंपराएं और ऐतिहासिक विरासत हैं। इन्हीं क्षेत्रीय पहचानों के बीच समय-समय पर यह बहस भी सामने आती रही है कि क्या किसी राज्य का अपना आधिकारिक झंडा हो सकता है? क्या राज्य सरकार अपने प्रदेश की पहचान के लिए अलग ध्वज तैयार कर सकती है? अगर ऐसा झंडा बनाया जाता है तो क्या उसे मुख्यमंत्री के सरकारी आवास, विधानसभा या सरकारी कार्यालयों पर तिरंगे के साथ फहराया जा सकता है?

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) के नेता और मंत्री आधव अर्जुन की ओर से राज्य की पहचान को प्राथमिकता देने वाले अलग झंडे की मांग उठाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है। इस मांग पर बीजेपी की ओर से विरोध जताया गया और इसे अलगाववादी मानसिकता से जोड़कर देखा गया। हालांकि, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग इस पूरे विषय का एक संवैधानिक और कानूनी पक्ष भी है, जिसे समझना जरूरी है।

भारत में राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल के लिए बाकायदा नियम मौजूद हैं। वहीं राज्यों के अलग झंडे को लेकर संविधान में कोई विस्तृत व्यवस्था नहीं बनाई गई है। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि किसी राज्य की सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के बीच कानून किस तरह संतुलन तय करता है।

जम्मू-कश्मीर के पास था अलग झंडा, अब क्या है स्थिति?

भारत में अलग राज्य ध्वज की चर्चा होती है तो सबसे पहले जम्मू-कश्मीर का उदाहरण सामने आता है। वर्ष 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष संवैधानिक व्यवस्था प्राप्त थी। उस समय राज्य का अपना संविधान भी था, जिसमें अलग झंडे का प्रावधान किया गया था।

जम्मू-कश्मीर के संविधान की धारा 144 में राज्य के झंडे का उल्लेख था। इस झंडे का रंग लाल था और इसके बीच में सफेद रंग का हल बना हुआ था। इसके अलावा झंडे में तीन सफेद खड़ी पट्टियां भी थीं। लाल रंग को श्रमिकों और मेहनतकश लोगों का प्रतीक माना गया था, जबकि हल कृषि और खेती-किसानी का प्रतिनिधित्व करता था। तीन पट्टियों को जम्मू, कश्मीर और लद्दाख क्षेत्रों से जोड़कर देखा जाता था।

हालांकि, 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 से संबंधित संवैधानिक बदलावों की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लागू हुआ और 31 अक्टूबर 2019 से तत्कालीन राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया गया। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान और उसके तहत मौजूद अलग झंडे की व्यवस्था भी समाप्त हो गई। इस तरह अब जम्मू-कश्मीर के पास पहले जैसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत अपना अलग आधिकारिक राज्य ध्वज नहीं है।

कर्नाटक में भी उठ चुका है अलग झंडे का मामला

राज्यों के अलग झंडे का सवाल केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहा है। कर्नाटक में भी इस विषय पर पहले काफी चर्चा हो चुकी है। वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के लिए अलग आधिकारिक झंडे का प्रस्ताव तैयार किया था।

प्रस्तावित ध्वज में पीले, सफेद और लाल रंग की पट्टियां रखी गई थीं। इसके मध्य में कर्नाटक का राजकीय प्रतीक गंडभेरुंडा शामिल किया गया था। राज्य सरकार का तर्क था कि कन्नड़ भाषा और कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाने के लिए अलग झंडा बनाया जा सकता है।

इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास भी भेजा गया था, लेकिन इसे औपचारिक मंजूरी नहीं मिल सकी। यह मामला इस बात को भी सामने लाता है कि राज्य स्तर पर झंडे का प्रस्ताव तैयार करना और उसे आधिकारिक सरकारी ध्वज के रूप में मान्यता दिलाना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

संविधान में अलग राज्य झंडे को लेकर क्या लिखा है?

भारतीय संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट अनुच्छेद नहीं है, जो राज्यों को अलग झंडा रखने की सीधी अनुमति देता हो। दूसरी तरफ संविधान में ऐसा स्पष्ट प्रतिबंध भी नहीं मिलता, जिसमें कहा गया हो कि कोई राज्य अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए अलग ध्वज नहीं बना सकता।

इसलिए इस विषय पर केवल संविधान के किसी एक अनुच्छेद के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। राज्य का अलग झंडा बनाने का विचार, उसकी सरकारी मान्यता और सार्वजनिक स्थानों पर उसके प्रदर्शन को अलग-अलग कानूनी पहलुओं के रूप में देखना पड़ता है।

संविधान के अनुच्छेद 51A में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। इसके खंड (a) के अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह संविधान, उसके आदर्शों और संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज तथा राष्ट्रगान का सम्मान करे। वहीं खंड (c) देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करने की जिम्मेदारी बताता है।

इसका अर्थ है कि क्षेत्रीय पहचान के प्रतीक और राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता। किसी राज्य की सांस्कृतिक विशिष्टता अपनी जगह है, जबकि राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान संवैधानिक जिम्मेदारी है।

तिरंगे के साथ दूसरा झंडा लगाने पर क्या हैं नियम?

राष्ट्रीय ध्वज को कहां और किस तरह प्रदर्शित किया जा सकता है, इसके लिए केंद्र सरकार ने फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, 2002 लागू किया है। यह कोड 26 जनवरी 2002 से प्रभावी हुआ था। इसमें तिरंगे के आकार, अनुपात, सम्मानजनक प्रदर्शन और अन्य झंडों के साथ उसकी स्थिति से संबंधित निर्देश दिए गए हैं।

फ्लैग कोड के कुछ महत्वपूर्ण नियम इस प्रकार हैं:

  • राष्ट्रीय ध्वज को हमेशा सम्मानजनक और विशिष्ट स्थान दिया जाना चाहिए।
  • किसी दूसरे झंडे या पताका को तिरंगे से ऊपर या उसके ऊपर नहीं लगाया जा सकता।
  • राष्ट्रीय ध्वज को इस तरह प्रदर्शित नहीं किया जाना चाहिए, जिससे उसकी गरिमा और विशिष्टता प्रभावित हो।
  • तिरंगे को एक ही झंडे के खंभे यानी सिंगल मास्टहेड पर किसी दूसरे झंडे के साथ एक ही समय में नहीं फहराया जा सकता।
  • अलग-अलग झंडों के लिए अलग-अलग खंभों की व्यवस्था होनी चाहिए।

इन नियमों से स्पष्ट होता है कि यदि किसी राज्य का अलग झंडा बनाया भी जाता है तो उसके प्रदर्शन में राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा।

क्या अलग-अलग खंभों पर तिरंगे और राज्य के झंडे को फहराया जा सकता है?

यह सवाल भी काफी अहम है कि अगर किसी राज्य के पास अपना ध्वज हो तो क्या उसे राष्ट्रीय ध्वज के साथ प्रदर्शित किया जा सकता है? फ्लैग कोड के अनुसार तिरंगे को किसी दूसरे झंडे के साथ एक ही खंभे पर एक समय में फहराने की अनुमति नहीं है। इसके लिए अलग-अलग झंडे के खंभों की व्यवस्था जरूरी है।

राष्ट्रीय ध्वज को हमेशा सम्मानजनक और प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। किसी दूसरे झंडे को उससे ऊपर या उसके ऊपर नहीं लगाया जा सकता। राष्ट्रीय ध्वज के साथ दूसरे झंडे के प्रदर्शन में भी कोड के प्रावधानों का ध्यान रखना होगा। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि राज्य का झंडा और तिरंगा किसी भी परिस्थिति में साथ प्रदर्शित नहीं हो सकते। असली बात यह है कि दोनों के प्रदर्शन का तरीका निर्धारित नियमों के अनुरूप होना चाहिए।

क्या राज्य सरकार को झंडे के लिए केंद्र से अनुमति लेनी होगी?

किसी राज्य के अलग झंडे के लिए संविधान में कोई विशेष आवेदन प्रक्रिया या मंजूरी का स्पष्ट प्रावधान नहीं दिया गया है। यही वजह है कि इस विषय पर कानूनी चर्चा होती रही है। कर्नाटक का 2018 वाला मामला इसका उदाहरण है, जब राज्य सरकार ने अपने प्रस्ताव को केंद्र के पास भेजा था।

हालांकि, राज्य सरकार द्वारा किसी झंडे का डिजाइन तैयार कर लेना और उसे आधिकारिक राजकीय झंडे का दर्जा मिलना अलग बातें हैं। सरकारी कार्यक्रमों, कार्यालयों और संवैधानिक संस्थानों में उसके इस्तेमाल के लिए नियमों और राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े प्रावधानों को ध्यान में रखना होगा।

तमिलनाडु में उठी नई मांग के संदर्भ में भी यही सवाल महत्वपूर्ण है कि प्रस्तावित झंडे का स्वरूप क्या होगा, उसे किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा और क्या उसके लिए केंद्र से औपचारिक स्वीकृति की आवश्यकता होगी। फिलहाल संविधान में ऐसी कोई स्पष्ट प्रक्रिया दर्ज नहीं है, जिसके आधार पर हर राज्य के लिए एक समान मंजूरी व्यवस्था बताई जा सके।

क्या अलग झंडा बनाने पर हो सकती है कानूनी कार्रवाई?

किसी राज्य की भाषा, संस्कृति या क्षेत्रीय पहचान को प्रदर्शित करने वाला झंडा अपने आप में अपराध नहीं बन जाता। केवल अलग झंडा तैयार करने या सांस्कृतिक कार्यक्रम में उसका इस्तेमाल करने को राष्ट्रीय ध्वज का अपमान नहीं माना जा सकता। हालांकि, अगर उसके प्रदर्शन के दौरान तिरंगे का अपमान किया जाता है या राष्ट्रीय ध्वज से संबंधित कानूनों का उल्लंघन होता है तो कानूनी कार्रवाई का सवाल उठ सकता है।

राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 की धारा 2 के तहत राष्ट्रीय ध्वज को जलाना, विकृत करना, नुकसान पहुंचाना, पैरों से कुचलना या सार्वजनिक रूप से उसका अपमान करना दंडनीय है। इस अपराध के लिए अधिकतम तीन साल की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। बार-बार दोषी पाए जाने पर कानून में अलग से सजा का प्रावधान भी मौजूद है।

यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि किसी दूसरे झंडे को प्रदर्शित करना और राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करना एक जैसी बातें नहीं हैं। कानूनी कार्रवाई इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित गतिविधि में वास्तव में किस नियम या कानून का उल्लंघन हुआ है।

क्या राज्य के पास दूसरे आधिकारिक प्रतीक भी हो सकते हैं?

भारत के विभिन्न राज्यों की अपनी सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहचान है। इसी आधार पर राज्य अपने राजकीय पशु, पक्षी, फूल, पेड़ और प्रतीक चिह्न निर्धारित कर सकते हैं। इनका इस्तेमाल सरकारी दस्तावेजों, कार्यक्रमों और दूसरे प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है।

उदाहरण के तौर पर किसी राज्य का अपना प्रतीक चिह्न होना राष्ट्रीय पहचान के खिलाफ नहीं माना जाता। इसी तरह क्षेत्रीय भाषाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों को भी संवैधानिक व्यवस्था में जगह मिली हुई है। लेकिन राज्य का प्रतीक चिह्न और उसका आधिकारिक झंडा अलग विषय हैं। दोनों के लिए कानूनी व्यवस्था और इस्तेमाल के नियम एक जैसे नहीं हैं।

इसलिए किसी राज्य के पास अलग सांस्कृतिक पहचान होना और उसके पास स्वतंत्र आधिकारिक ध्वज होना दो अलग-अलग बातें हैं। झंडे के मामले में राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा और फ्लैग कोड के नियमों का पालन करना सबसे महत्वपूर्ण होगा।

राष्ट्रीय ध्वज और क्षेत्रीय पहचान के बीच क्या है अंतर?

भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है, जिसमें अलग-अलग राज्यों को अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने का अधिकार और अवसर मिलता है। तमिलनाडु की तमिल संस्कृति, कर्नाटक की कन्नड़ पहचान, पंजाब की पंजाबी विरासत और दूसरे राज्यों की क्षेत्रीय परंपराएं देश की विविधता का हिस्सा हैं।

लेकिन राष्ट्रीय ध्वज पूरे देश का साझा प्रतीक है। इसका सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। अनुच्छेद 51A(a) और 51A(c) इसी जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं। इसलिए किसी भी क्षेत्रीय प्रतीक को इस तरह पेश नहीं किया जा सकता कि उससे देश की संप्रभुता, एकता और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान से जुड़े नियम प्रभावित हों।

कुल मिलाकर, भारतीय संविधान राज्यों के अलग झंडे के मुद्दे पर कोई सीधा और विस्तृत प्रावधान नहीं करता। न तो अलग राज्य झंडे के लिए स्पष्ट संवैधानिक अनुमति लिखी गई है और न ही ऐसा सीधा प्रतिबंध मौजूद है। लेकिन राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन को लेकर फ्लैग कोड और राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम के नियम लागू होते हैं। ऐसे में तमिलनाडु की नई मांग पर अंतिम कानूनी स्थिति तय करने के लिए प्रस्तावित झंडे की प्रकृति, उसके आधिकारिक इस्तेमाल और संबंधित सरकारी नियमों को देखना जरूरी होगा।