100 किलो गन्ने से चीनी ज्यादा फायदेमंद या एथेनॉल? जानिए पूरा हिसाब

100 किलो गन्ने से चीनी ज्यादा फायदेमंद या एथेनॉल? जानिए पूरा हिसाब

देश में इन दिनों चीनी की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। कई जगहों पर खुदरा बाजार में चीनी के भाव 60 से 70 रुपये प्रति किलो के आसपास पहुंचने की चर्चा है। घरेलू मांग को पूरा करने के लिए सरकार को आयात का सहारा लेने की जरूरत पड़ सकती है। सहकारी चीनी मिलों की संस्था NFCSF की ओर से संकेत दिए गए हैं कि आयातित चीनी की शुरुआती खेप 15 अक्टूबर से पहले भारत पहुंच सकती है।

इसी बीच गन्ने से एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी चर्चा तेज है। सरकार पिछले कुछ वर्षों से पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर 100 किलो यानी 1 क्विंटल गन्ने से कितनी चीनी बनती है और उससे कितना एथेनॉल तैयार किया जा सकता है? दोनों की मात्रा और प्रक्रिया को समझने के लिए गन्ने से मिलने वाले अलग-अलग उत्पादों का हिसाब देखना जरूरी है।

100 किलो गन्ने से कितनी चीनी निकलती है?

गन्ने में मौजूद पूरी शर्करा तैयार चीनी के रूप में नहीं मिलती। मिल में गन्ने की पेराई, रस की गुणवत्ता और उत्पादन प्रक्रिया के आधार पर रिकवरी तय होती है। सामान्य परिस्थितियों में 100 किलो गन्ने से लगभग 9 से 12 किलो चीनी प्राप्त हो सकती है।

मसलन, अगर किसी चीनी मिल की रिकवरी दर 10 प्रतिशत है, तो 100 किलो गन्ने की पेराई से करीब 10 किलो चीनी तैयार होगी। इसी तरह 11 प्रतिशत रिकवरी होने पर लगभग 11 किलो चीनी मिल सकती है।

रिकवरी पूरे सीजन में एक जैसी नहीं रहती। गन्ने की गुणवत्ता, मौसम और उसमें मौजूद सुक्रोज की मात्रा के कारण इसमें बदलाव आता रहता है। पेराई सीजन की शुरुआत में अक्सर रिकवरी अपेक्षाकृत कम रहती है। नवंबर के आसपास यह करीब 7 से 8 किलो प्रति क्विंटल के स्तर पर हो सकती है। इसके बाद गन्ने के अधिक पकने और ठंड के दौरान शर्करा की मात्रा बेहतर होने पर दिसंबर और जनवरी में रिकवरी करीब 10 से 11 किलो प्रति क्विंटल तक पहुंच सकती है।

यानी 1 क्विंटल गन्ने से मिलने वाली चीनी का आंकड़ा कोई स्थायी संख्या नहीं है। यह मिल और गन्ने की गुणवत्ता के हिसाब से बदलता है।

गन्ने से सिर्फ चीनी ही नहीं बनती

गन्ने की पेराई के बाद पूरा माल केवल चीनी में परिवर्तित नहीं होता। इस प्रक्रिया में कई उप-उत्पाद भी प्राप्त होते हैं। इनमें खोई और शीरा यानी मोलासेस प्रमुख हैं।

गन्ने से रस निकालने के बाद बचने वाले रेशेदार हिस्से को खोई कहा जाता है। इसका इस्तेमाल कई चीनी मिलों में ईंधन और ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, चीनी के निर्माण के दौरान बचने वाला गाढ़ा तरल शीरा कहलाता है। इसी शीरे से आगे एथेनॉल का उत्पादन भी किया जा सकता है।

यहीं से चीनी और एथेनॉल के बीच का पूरा गणित थोड़ा अलग हो जाता है।

चीनी बनाने की प्रक्रिया कैसे होती है?

चीनी मिल में गन्ने को तैयार चीनी में बदलने के लिए कई चरणों से गुजरना पड़ता है। सबसे पहले गन्ने को साफ करके मशीनों में डाला जाता है। बड़े रोलर्स की मदद से उसे दबाकर रस निकाला जाता है और रेशेदार खोई अलग हो जाती है।

इसके बाद कच्चे गन्ने के रस को साफ किया जाता है। इसमें जरूरी रसायनों की मदद से अशुद्धियों को हटाया जाता है। साफ किए गए रस को गर्म करके उसमें मौजूद पानी को भाप के रूप में निकाल दिया जाता है। इससे रस धीरे-धीरे गाढ़ा होकर चाशनी जैसा हो जाता है।

अगले चरण में इसी गाढ़ी चाशनी से चीनी के क्रिस्टल तैयार किए जाते हैं। इसके बाद सेंट्रीफ्यूज मशीन की मदद से चीनी के दानों को शीरे से अलग किया जाता है। अंत में चीनी को सुखाकर पैकिंग के लिए भेज दिया जाता है।

इस पूरी प्रक्रिया में गन्ने की कीमत के अलावा बिजली, पानी, श्रम, रसायन, मशीनरी और अन्य संचालन लागत भी शामिल होती है। बड़े पैमाने पर उत्पादन में प्रोसेसिंग से जुड़ी लागत अलग-अलग मिलों और परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।

1 क्विंटल गन्ने से कितना एथेनॉल बन सकता है?

एथेनॉल की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि उत्पादन के लिए गन्ने का कौन-सा हिस्सा इस्तेमाल किया जा रहा है। सीधे गन्ने के रस से एथेनॉल बनाया जाए तो पैदावार अलग होगी, जबकि चीनी निर्माण के बाद बचे शीरे से उत्पादन करने पर मात्रा अलग रहती है।

अगर गन्ने के रस से सीधे एथेनॉल तैयार किया जाए, तो 100 किलो गन्ने से लगभग 7 से 8.4 लीटर एथेनॉल प्राप्त होने का अनुमान लगाया जाता है। इसी हिसाब से एक टन यानी 1,000 किलो गन्ने से करीब 70 से 84 लीटर एथेनॉल तैयार हो सकता है।

अब यदि चीनी उत्पादन के बाद बचने वाले बी-हेवी शीरे को एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो 100 किलो गन्ने के आधार पर करीब 2.2 से 2.5 लीटर एथेनॉल मिल सकता है।

वहीं, चीनी निर्माण प्रक्रिया के अंतिम चरण में मिलने वाले सी-हेवी शीरे से एथेनॉल उत्पादन करने पर मात्रा और कम रहती है। इससे प्रति क्विंटल गन्ने के हिसाब से लगभग 1 से 1.1 लीटर एथेनॉल प्राप्त हो सकता है।

इससे साफ है कि एथेनॉल की पैदावार सीधे इस बात पर निर्भर करती है कि गन्ने को किस तरीके से प्रोसेस किया जा रहा है और कौन-सा कच्चा माल डिस्टिलरी में पहुंच रहा है।

गन्ने के रस से एथेनॉल बनाने में क्या होता है?

एथेनॉल उत्पादन की शुरुआत भी गन्ने की पेराई से होती है। गन्ने से रस निकालने के बाद उसे जरूरी प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इसके बाद उसमें विशेष प्रकार का यीस्ट यानी खमीर मिलाया जाता है।

यह खमीर गन्ने के रस में मौजूद शर्करा को फर्मेंटेशन की प्रक्रिया के जरिए अल्कोहल में बदलता है। इस प्रक्रिया में आम तौर पर एक से तीन दिन का समय लग सकता है। इसके बाद प्राप्त मिश्रण को डिस्टिलेशन यानी आसवन के लिए भेजा जाता है।

आसवन के दौरान गर्म करके अलग-अलग घटकों को अलग किया जाता है और एथेनॉल को अधिक सांद्रता में प्राप्त किया जाता है। इसके बाद डिहाइड्रेशन की प्रक्रिया से पानी की अतिरिक्त मात्रा हटाई जाती है। इस तरह फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल होने वाला लगभग 99.5 प्रतिशत शुद्ध एथेनॉल तैयार किया जा सकता है।

बी-हेवी और सी-हेवी शीरा क्यों महत्वपूर्ण है?

चीनी उद्योग में शीरे की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एथेनॉल उत्पादन के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराता है। बी-हेवी शीरे में मौजूद शर्करा का उपयोग डिस्टिलरी में एथेनॉल बनाने के लिए किया जा सकता है।

सी-हेवी शीरा चीनी निर्माण के अंतिम चरण से मिलता है और इसमें किण्वन योग्य चीनी अपेक्षाकृत कम होती है। इसलिए इससे मिलने वाले एथेनॉल की मात्रा भी बी-हेवी शीरे की तुलना में कम रहती है।

यही वजह है कि गन्ने से सीधे एथेनॉल बनाने और चीनी बनाने के बाद बचे उप-उत्पाद से एथेनॉल बनाने के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई देता है।

एथेनॉल बनाने में कितना खर्च आता है?

एथेनॉल की लागत केवल गन्ने की कीमत से तय नहीं होती। डिस्टिलरी में बिजली, पानी, रसायन, श्रमिक, रखरखाव और अन्य संचालन खर्च भी जुड़ते हैं। बड़े पैमाने की डिस्टिलरी में इन खर्चों को मिलाकर प्रति लीटर उत्पादन लागत कई परिस्थितियों में करीब 20 से 30 रुपये के दायरे में बताई जाती है।

इसके अलावा गन्ने की खरीद कीमत भी कुल आर्थिक गणना का अहम हिस्सा है। गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य यानी FRP केंद्र सरकार द्वारा तय किया जाता है और इसमें समय-समय पर बदलाव हो सकता है। इसलिए एथेनॉल की वास्तविक उत्पादन लागत का आकलन करते समय गन्ने की कीमत और मिल से मिलने वाले सह-उत्पादों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

तो 1 क्विंटल गन्ने से चीनी ज्यादा या एथेनॉल?

अगर केवल मात्रा की तुलना की जाए, तो 100 किलो गन्ने से चीनी लगभग 9 से 12 किलो तक मिल सकती है, जबकि गन्ने के रस से सीधे एथेनॉल बनाने पर लगभग 7 से 8.4 लीटर तक एथेनॉल प्राप्त हो सकता है। हालांकि किलो चीनी और लीटर एथेनॉल को सीधे एक-दूसरे से ज्यादा या कम बताना सही आर्थिक तुलना नहीं है, क्योंकि दोनों अलग-अलग उत्पाद हैं और उनकी कीमत, ऊर्जा क्षमता तथा उत्पादन प्रक्रिया अलग है।

इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि हर परिस्थिति में एथेनॉल के लिए गन्ना इस्तेमाल करना चीनी उत्पादन से बेहतर या खराब है। मिल के लिए फैसला बाजार भाव, सरकारी नीति, गन्ने की उपलब्धता, रिकवरी, शीरे की कीमत और एथेनॉल की मांग जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।

वर्तमान में चीनी की कीमतों और एथेनॉल मिश्रण नीति के कारण यह मुद्दा चर्चा में जरूर है, लेकिन गन्ने से बनने वाले दोनों उत्पादों का अपना अलग आर्थिक महत्व है। गन्ने की एक ही फसल से चीनी, शीरा, खोई और एथेनॉल जैसे कई उत्पाद तैयार होते हैं।

सबसे अहम बात यह है कि 1 क्विंटल गन्ने का अंतिम उत्पादन मिल की रिकवरी, गन्ने की गुणवत्ता और इस्तेमाल की जा रही तकनीक पर निर्भर करता है। यही वजह है कि अलग-अलग चीनी मिलों में एक ही मात्रा के गन्ने से मिलने वाली चीनी और एथेनॉल की मात्रा में अंतर देखने को मिलता है।

(Photo : AI Generated)