भारत में ब्रेस्ट कैंसर से जंग अभी भी मुश्किल, समय पर जांच की कमी बनी बड़ी चुनौती; WHO रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

भारत में ब्रेस्ट कैंसर से जंग अभी भी मुश्किल, समय पर जांच की कमी बनी बड़ी चुनौती; WHO रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

भारत में ब्रेस्ट कैंसर के इलाज और जागरूकता को लेकर पिछले कुछ वर्षों में सकारात्मक बदलाव जरूर देखने को मिले हैं, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की नई रिपोर्ट बताती है कि अभी भी लंबा सफर तय करना बाकी है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में ब्रेस्ट कैंसर का पता चलने के बाद पांच साल तक जीवित रहने वाली महिलाओं की संख्या विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह बीमारी की देर से पहचान, जांच कराने में झिझक, इलाज तक समय पर पहुंच न बन पाना और आर्थिक परेशानियां हैं।

ब्रेस्ट कैंसर दुनिया भर में महिलाओं में सबसे अधिक पाए जाने वाले कैंसरों में शामिल है। चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि यदि शुरुआती चरण में इस बीमारी की पहचान हो जाए तो इलाज की सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है। इसके बावजूद भारत में बड़ी संख्या में महिलाएं शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देती हैं या सामाजिक संकोच और जागरूकता की कमी के कारण समय रहते डॉक्टर से संपर्क नहीं कर पातीं। यही कारण है कि कई मामलों में बीमारी तब सामने आती है, जब वह उन्नत चरण में पहुंच चुकी होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तैयार किए गए नए विश्लेषण में उसके सभी 194 सदस्य देशों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। यह अध्ययन प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 से 2021 के बीच भारत में ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों का पांच वर्षीय सर्वाइवल रेट लगभग 65.7 प्रतिशत दर्ज किया गया। इसका अर्थ यह है कि बीमारी की पुष्टि होने के बाद हर तीन महिलाओं में से लगभग दो महिलाएं कम से कम पांच वर्ष तक जीवित रह पाती हैं। हालांकि यह पहले की तुलना में बेहतर स्थिति है, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा अभी भी काफी कम माना जा रहा है।

रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में पांच वर्षीय औसत सर्वाइवल रेट 77.8 प्रतिशत है। यदि विकसित और उच्च आय वाले देशों की बात करें तो वहां यह दर 87.3 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। अमेरिका में यह लगभग 88.5 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि यूरोप के कई देशों में यह करीब 84 प्रतिशत रही। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं, बेहतर स्क्रीनिंग सिस्टम और समय पर इलाज की उपलब्धता मरीजों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में पिछले तीन दशकों के दौरान ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। पहले जहां मरीजों के बचने की संभावना काफी कम थी, वहीं अब आधुनिक तकनीकों, बेहतर दवाओं और उपचार सुविधाओं के कारण परिणाम पहले से कहीं बेहतर हुए हैं। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम की 2024 में सामने आई भारतीय स्टडी के मुताबिक 1990 के दशक में देश के अलग-अलग क्षेत्रों में पांच वर्षीय सर्वाइवल रेट लगभग 31 से 54 प्रतिशत के बीच था। बाद के वर्षों में लगातार सुधार हुआ और वर्ष 2012 से 2015 के दौरान यह बढ़कर करीब 66.4 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह बदलाव स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का संकेत देता है, लेकिन विकसित देशों के स्तर तक पहुंचने के लिए अभी और प्रयास जरूरी हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ब्रेस्ट कैंसर के मामले में समय सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि शुरुआती स्टेज में गांठ या अन्य असामान्य बदलाव की पहचान हो जाए और मरीज तुरंत इलाज शुरू करा दे, तो सफल उपचार की संभावना काफी अधिक रहती है। इसके विपरीत जब बीमारी अंतिम चरण में पहुंच जाती है, तब इलाज जटिल हो जाता है और मरीज के बचने की संभावना भी घट जाती है। भारत में बड़ी संख्या में महिलाएं नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं करातीं, जिसके कारण शुरुआती संकेत नजरअंदाज हो जाते हैं।

सामाजिक कारण भी इस समस्या को गंभीर बनाते हैं। कई महिलाएं परिवार या समाज के संकोच के कारण स्तन से जुड़ी किसी भी परेशानी के बारे में खुलकर बात नहीं करतीं। कुछ मामलों में शर्म या डर की वजह से जांच टाल दी जाती है, जबकि कई बार महिलाओं को यह जानकारी ही नहीं होती कि शुरुआती लक्षण क्या हो सकते हैं। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक सीमित पहुंच भी समस्या को बढ़ा देती है।

आर्थिक स्थिति भी इलाज में बड़ी बाधा बनती है। कैंसर का उपचार लंबा और महंगा हो सकता है। हालांकि सरकार की विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं ने कई मरीजों को राहत पहुंचाई है, फिर भी बड़ी आबादी ऐसी है जो समय पर जांच या इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होती। इसी वजह से कई मरीज इलाज शुरू करने में देरी कर देते हैं या बीच में ही उपचार छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

सरकार द्वारा चलाई जा रही आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) जैसी योजनाओं ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को इलाज उपलब्ध कराने में मदद की है। इसके अलावा कई राज्यों में सामुदायिक स्तर पर कैंसर स्क्रीनिंग अभियान भी चलाए जा रहे हैं। इन पहलों का उद्देश्य बीमारी की जल्दी पहचान करना और मरीजों को शुरुआती चरण में उपचार उपलब्ध कराना है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्क्रीनिंग कार्यक्रमों का दायरा और बढ़ाया जाए तो भविष्य में सर्वाइवल रेट में और सुधार संभव है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में अलग-अलग आय वर्ग वाले देशों के बीच भी बड़ा अंतर सामने आया है। उच्च आय वाले देशों में पांच वर्षीय सर्वाइवल रेट 87.3 प्रतिशत दर्ज किया गया। उच्च-मध्यम आय वाले देशों में यह 78.7 प्रतिशत रहा। निम्न-मध्यम आय वाले देशों में यह आंकड़ा घटकर 60.1 प्रतिशत पर पहुंच गया, जबकि कम आय वाले देशों में केवल 41.9 प्रतिशत मरीज ही पांच वर्ष तक जीवित रह पाए। यह अंतर दर्शाता है कि स्वास्थ्य ढांचे, इलाज की उपलब्धता और आर्थिक संसाधनों का मरीजों के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में पूरी दुनिया में ब्रेस्ट कैंसर के कारण लगभग 6.9 लाख लोगों की मौत हुई। इनमें से करीब 70 प्रतिशत मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में दर्ज की गईं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन देशों में स्क्रीनिंग सुविधाओं का विस्तार किया जाए, लोगों को बीमारी के प्रति जागरूक बनाया जाए और सस्ती चिकित्सा उपलब्ध कराई जाए तो बड़ी संख्या में जानें बचाई जा सकती हैं।

डॉक्टर महिलाओं को सलाह देते हैं कि यदि स्तन में किसी प्रकार की गांठ, त्वचा में बदलाव, असामान्य दर्द, निप्पल से स्राव या आकार में बदलाव जैसे लक्षण दिखाई दें तो बिना देरी किए विशेषज्ञ से संपर्क करें। नियमित जांच और आवश्यकता पड़ने पर मैमोग्राफी जैसी स्क्रीनिंग जांच बीमारी का जल्द पता लगाने में मदद कर सकती हैं। खासकर 40 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं और जिनके परिवार में पहले से ब्रेस्ट कैंसर का इतिहास रहा हो, उन्हें नियमित स्वास्थ्य परीक्षण कराने की सलाह दी जाती है।

WHO की इस रिपोर्ट का एक प्रमुख उद्देश्य दुनिया भर में समय से पहले होने वाली मौतों में हर साल 2.5 प्रतिशत की कमी लाना है। संगठन का अनुमान है कि यदि समय पर पहचान, प्रभावी उपचार और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित की जाएं तो वर्ष 2040 तक लगभग 25 लाख लोगों की जान बचाई जा सकती है। इसके लिए केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि समाज में जागरूकता फैलाना, महिलाओं को बिना झिझक जांच कराने के लिए प्रेरित करना और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक स्क्रीनिंग सुविधाएं पहुंचाना भी उतना ही जरूरी होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने ब्रेस्ट कैंसर के इलाज और सर्वाइवल रेट में निश्चित रूप से प्रगति की है, लेकिन अभी भी विकसित देशों के मुकाबले बड़ा अंतर मौजूद है। यदि जागरूकता अभियान तेज किए जाएं, समय पर जांच को बढ़ावा मिले, इलाज हर वर्ग तक सुलभ बनाया जाए और सामाजिक झिझक को दूर किया जाए, तो आने वाले वर्षों में हजारों महिलाओं की जान बचाई जा सकती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार समय पर जांच, सही जानकारी और बिना देरी इलाज शुरू करना है।

(Photo : AI Generated)