मानसून की रफ्तार धीमी क्यों पड़ी? जानिए मौसम के पीछे छिपी वैज्ञानिक वजह और आगे का पूरा अनुमान

मानसून की रफ्तार धीमी क्यों पड़ी? जानिए मौसम के पीछे छिपी वैज्ञानिक वजह और आगे का पूरा अनुमान

देश के कई हिस्सों में इस बार मानसून की चाल उम्मीद से काफी सुस्त दिखाई दे रही है। जून के आखिरी हफ्ते तक भी बारिश का वह व्यापक और लगातार पैटर्न नहीं बन पाया है, जिसकी आमतौर पर इस समय तक उम्मीद रहती है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार मानसून की प्रगति में कई जटिल वायुमंडलीय कारण बाधा बन रहे हैं, जिनकी वजह से बारिश का वितरण असमान और कमजोर बना हुआ है।

हालिया आंकड़ों के अनुसार, देश में अब तक मानसूनी वर्षा में लगभग 40 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। कई राज्यों में जहां भारी बारिश का दौर शुरू हो जाना चाहिए था, वहां या तो हल्की फुहारें देखने को मिली हैं या फिर लंबे सूखे अंतराल। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल एक कारण से नहीं बल्कि कई मौसमी प्रणालियों के एक साथ कमजोर या असंतुलित होने से बनी है।


मानसून की चाल क्यों हुई धीमी?

मौसम विज्ञानियों के मुताबिक, इस बार मानसून की गति को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला कारण वायुमंडलीय दबाव प्रणालियों का असंतुलन है। सामान्य परिस्थितियों में हिंद महासागर के दक्षिणी हिस्से में एक मजबूत उच्च दबाव क्षेत्र बनता है, जिसे “मास्कारेन हाई” कहा जाता है। यही प्रणाली नमी से भरी हवाओं को भारतीय उपमहाद्वीप की ओर खींचने में अहम भूमिका निभाती है।

इसके विपरीत, भारत और पाकिस्तान के उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में गर्मियों के दौरान एक निम्न दबाव क्षेत्र विकसित होता है, जिसे हीट लो कहा जाता है। जब महासागर का उच्च दबाव और भूमि का निम्न दबाव मजबूत होता है, तो समुद्र से नमी वाली हवाएं तेजी से भारत की ओर बढ़ती हैं और मानसून सक्रिय हो जाता है।

इस बार स्थिति थोड़ी अलग है। उत्तर भारत में बना लो प्रेशर अपेक्षाकृत कमजोर है, जिससे समुद्री हवाओं को आगे बढ़ने की पर्याप्त ताकत नहीं मिल पा रही है। परिणामस्वरूप मानसूनी पवनें कई जगहों पर रुक-रुक कर आगे बढ़ रही हैं।


चक्रवाती परिसंचरण भी बना बड़ी बाधा

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस समय दो प्रमुख चक्रवाती परिसंचरण (Cyclonic Circulation) सिस्टम सक्रिय हैं, जो मानसून की दिशा और गति को प्रभावित कर रहे हैं। इनमें से एक पश्चिमी सीमा के आसपास पाकिस्तान और राजस्थान के क्षेत्र में बना हुआ है, जबकि दूसरा पूर्वी भारत यानी बिहार और पश्चिम बंगाल के आसपास देखा जा रहा है।

ये दोनों सिस्टम वातावरण में दबाव का ऐसा संतुलन बना रहे हैं, जिससे मानसून की सामान्य उत्तर और पश्चिम की ओर बढ़ने वाली गति बाधित हो रही है। मानसून को आगे बढ़ाने वाली ट्रफ रेखाएं भी इस समय पूरी तरह संतुलित नहीं हैं, जिससे बारिश का फैलाव सीमित रह गया है।


ट्रफ रेखाओं की भूमिका और वर्तमान स्थिति

मानसून की प्रगति में ट्रफ लाइन यानी कम दबाव की लंबी रेखाएं बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस समय भारत में दो प्रमुख ट्रफ लाइनें मौजूद हैं, लेकिन दोनों का प्रभाव पूरी तरह समान नहीं है।

एक ट्रफ पश्चिम बंगाल तक सीमित है, जबकि दूसरी छत्तीसगढ़ से लेकर तमिलनाडु तक फैली हुई है। आदर्श स्थिति में ये ट्रफ लाइनें मानसूनी हवाओं को उत्तर की ओर खींचती हैं और पूरे देश में बारिश फैलाती हैं। लेकिन इस बार इनका प्रभाव कमजोर है, जिससे मानसून का आगे बढ़ना धीमा पड़ गया है।


अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की हवाओं में असंतुलन

मानसून की ताकत केवल एक दिशा से आने वाली हवाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों से आने वाली नमी वाली हवाओं का संतुलन बेहद जरूरी होता है। फिलहाल स्थिति यह है कि अरब सागर से आने वाली हवाएं तो कुछ हद तक सक्रिय हैं, लेकिन बंगाल की खाड़ी से आने वाली पूर्वी हवाएं अभी तक पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाई हैं। यही कारण है कि बारिश का वितरण असमान हो गया है और कुछ इलाकों में ही हल्की से मध्यम बारिश हो रही है।

विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक दोनों तरफ से आने वाली हवाएं आपस में मिलकर एक मजबूत मानसूनी प्रणाली नहीं बनातीं, तब तक तेज और व्यापक बारिश की उम्मीद कम रहती है।


सोमाली जेट हवाएं क्यों हैं कमजोर?

मानसून की रफ्तार को प्रभावित करने वाला एक और अहम फैक्टर सोमाली जेट स्ट्रीम है। यह तेज गति से चलने वाली हवाओं की एक धारा होती है, जो अफ्रीका के सोमालिया और मेडागास्कर क्षेत्र से होकर अरब सागर तक पहुंचती है। इस बार यह जेट स्ट्रीम कमजोर बनी हुई है। जब यह सिस्टम मजबूत होता है, तो पश्चिमी तटीय क्षेत्रों जैसे केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात में भारी बारिश देखने को मिलती है। लेकिन इस बार इसकी कमजोरी के कारण पश्चिमी तट पर भी मानसून की रफ्तार सुस्त रही है। मुंबई जैसे शहर, जो आमतौर पर इस समय तक लगातार बारिश से भीग चुके होते हैं, वहां भी अभी तक अपेक्षाकृत कम वर्षा दर्ज की गई है।


क्या एल नीनो भी जिम्मेदार है?

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार मानसून पर एल नीनो का भी आंशिक प्रभाव देखा जा रहा है। एल नीनो वह समुद्री स्थिति है जिसमें प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न प्रभावित होता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि केवल एल नीनो को ही जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। यह कई कारकों में से एक है, जबकि असली प्रभाव वायुमंडलीय दबाव प्रणालियों और जेट स्ट्रीम की कमजोरी का भी है।


मौजूदा बारिश का पैटर्न कैसा है?

वर्तमान में देश के कई हिस्सों में बारिश तो हो रही है, लेकिन उसकी तीव्रता बहुत अधिक नहीं है। अधिकतर क्षेत्रों में 40 से 80 मिलीमीटर तक ही वर्षा दर्ज की गई है, जो सामान्य मानसूनी चरण की तुलना में कम मानी जाती है। कहीं-कहीं हल्की फुहारें तो कहीं मध्यम बारिश देखने को मिल रही है, लेकिन लगातार और व्यापक बारिश का पैटर्न अभी विकसित नहीं हुआ है।


क्या मानसून आगे बढ़ेगा या रुक जाएगा?

मौसम विभाग और विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून पूरी तरह रुका नहीं है, बल्कि फिलहाल एक “ब्रेक फेज” में है। कई बार मानसून कुछ दिनों के लिए धीमा पड़ जाता है और फिर अचानक तेजी पकड़ लेता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुमान के अनुसार, 23 जून के आसपास देश के कई हिस्सों में मौसम की परिस्थितियां अनुकूल हो सकती हैं। महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में मानसून के आगे बढ़ने के संकेत मिल सकते हैं। यदि यह स्थिति मजबूत होती है, तो मानसून की गति में सुधार आने की संभावना है और वह धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर बढ़ सकता है।


दिल्ली-एनसीआर में कब तक पहुंच सकता है मानसून?

मौसम विभाग के अनुमान के अनुसार, यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो 25 से 30 जून के बीच मानसून दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच सकता है। हालांकि इससे पहले हल्की बूंदाबांदी की संभावना बनी हुई है, लेकिन इसे पूरी तरह मानसूनी बारिश नहीं माना जाएगा। इस दौरान उमस और गर्मी लोगों को परेशान करती रह सकती है, क्योंकि पर्याप्त बारिश न होने से वातावरण में नमी और गर्मी दोनों बनी रहती हैं।


क्या आगे बारिश में सुधार होगा?

विशेषज्ञों का कहना है कि अगले 5 से 7 दिनों का मौसम बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। इसी अवधि में यह स्पष्ट हो सकेगा कि मानसून इस साल सामान्य रहेगा, कमजोर रहेगा या फिर देर से सक्रिय होकर भरपाई करेगा। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि मानसून शुरुआती चरण में कमजोर दिखता है, लेकिन बाद में तेज बारिश कर पूरे सीजन की कमी को काफी हद तक पूरा कर देता है।


इस समय मानसून की स्थिति पूरी तरह चिंताजनक नहीं कही जा सकती, लेकिन इसकी गति निश्चित रूप से धीमी है। वायुमंडलीय दबाव, जेट स्ट्रीम की कमजोरी, ट्रफ लाइनों का असंतुलन और समुद्री हवाओं की कमजोर सक्रियता मिलकर इस स्थिति का कारण बन रहे हैं।आने वाले दिनों में मौसम के बदलाव पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी, क्योंकि वही तय करेगा कि यह मानसून सामान्य रहेगा या फिर असामान्य पैटर्न दिखाएगा।

(Photo : AI Generated)