रूस और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग को लेकर एक नया अध्याय शुरू होने की तैयारी है। दोनों देशों ने अपने गृह मंत्रालयों के स्तर पर एक सुरक्षा समझौते (MoU) की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमति जताई है। हाल ही में हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान इस प्रस्ताव पर सकारात्मक चर्चा हुई, जिसे दोनों देशों के आंतरिक सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो रूस और पाकिस्तान के बीच कानून-व्यवस्था, आतंकवाद विरोधी अभियान और सीमा पार अपराधों से निपटने में सहयोग बढ़ सकता है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक माहौल लगातार बदल रहा है। लंबे समय तक रूस और पाकिस्तान के रिश्ते सीमित दायरे में रहे, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में संपर्क बढ़ाने की कोशिश की है। अब सुरक्षा क्षेत्र में संभावित साझेदारी इस रिश्ते को नया आयाम दे सकती है।
जानकारी के अनुसार, दोनों देशों के गृह मंत्रियों की हालिया बैठक में अंतरराष्ट्रीय अपराध, चरमपंथ, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और संगठित अपराध से जुड़े मामलों में सहयोग बढ़ाने पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रस्तावित समझौते का उद्देश्य दोनों देशों की सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान को संस्थागत रूप देना बताया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक सामान्य प्रशासनिक समझौता नहीं है, बल्कि इसके जरिए रूस और पाकिस्तान अपने संबंधों को रक्षा सहयोग से आगे बढ़ाकर आंतरिक सुरक्षा और कानून प्रवर्तन तक विस्तारित करना चाहते हैं। इससे भविष्य में दोनों देशों के बीच संयुक्त प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने जैसे कदम भी देखने को मिल सकते हैं।
रूस और पाकिस्तान के संबंधों में बदलाव को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते समीकरणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। एक समय था जब रूस की रणनीतिक प्राथमिकता भारत के साथ उसके दशकों पुराने संबंध थे और इसी वजह से पाकिस्तान के साथ रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्र में दूरी बनी रही। हालांकि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में रूस अपनी विदेश नीति को अधिक संतुलित और बहुआयामी बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसके चलते वह पाकिस्तान सहित कई नए साझेदारों के साथ भी रिश्ते मजबूत कर रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में रूस और पाकिस्तान ने संयुक्त सैन्य अभ्यास, ऊर्जा परियोजनाओं और आर्थिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी संपर्क बढ़ाया है। अब यदि सुरक्षा समझौता भी लागू होता है तो यह दोनों देशों के रिश्तों को और अधिक संस्थागत रूप दे सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत की चिंताएं स्वाभाविक मानी जा रही हैं। भारत और रूस के संबंध लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी पर आधारित रहे हैं। रक्षा क्षेत्र में भारत की बड़ी निर्भरता आज भी रूसी तकनीक और सैन्य उपकरणों पर बनी हुई है। भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना के कई प्रमुख हथियार, मिसाइल प्रणाली, टैंक, लड़ाकू विमान और अन्य रक्षा प्लेटफॉर्म रूसी मूल के हैं। ऐसे में यदि रूस पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग को लगातार विस्तार देता है तो नई दिल्ली इस पर निश्चित रूप से करीबी नजर रखेगी।
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से सीमा विवाद, आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर तनाव बना हुआ है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान का किसी बड़े रक्षा साझेदार के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाना भारत के रणनीतिक हितों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अभी तक सामने आई जानकारी के अनुसार प्रस्तावित समझौता मुख्य रूप से आंतरिक सुरक्षा और कानून प्रवर्तन से जुड़ा है, लेकिन भविष्य में इसके दायरे का विस्तार होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर पाकिस्तान इस समझौते को अपनी कूटनीतिक सफलता के रूप में भी पेश कर सकता है। हाल के महीनों में इस्लामाबाद ने खुद को क्षेत्रीय संवाद और मध्यस्थता की भूमिका में स्थापित करने का प्रयास किया है। पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम कराने के प्रयासों का भी उल्लेख किया है, हालांकि पश्चिम एशिया में हालात अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हैं और विभिन्न क्षेत्रों में तनाव जारी है।
पाकिस्तान लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि वह आतंकवाद का सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल है। उसके अनुसार देश के भीतर कई आतंकी संगठनों के खिलाफ बड़े स्तर पर अभियान चलाए गए हैं। दूसरी ओर भारत सहित कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ और कई देश यह आरोप लगाते रहे हैं कि पाकिस्तान की धरती पर वर्षों तक विभिन्न आतंकी संगठनों को सुरक्षित ठिकाने मिलते रहे हैं।
दुनिया के सबसे चर्चित आतंकवादी ओसामा बिन लादेन का पाकिस्तान के एबटाबाद में पाया जाना लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवालों का विषय बना रहा। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित कई आतंकियों की पाकिस्तान में मौजूदगी को लेकर भी समय-समय पर विभिन्न देशों ने चिंता व्यक्त की है। भारत लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि सीमा पार से संचालित आतंकवादी गतिविधियों को पाकिस्तान का समर्थन मिलता है। पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार करता रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि यदि रूस और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ता है तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस बात पर भी रहेगी कि यह सहयोग किस सीमा तक और किन क्षेत्रों में लागू होता है। विशेष रूप से आतंकवाद विरोधी अभियानों, खुफिया जानकारी साझा करने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग को लेकर पारदर्शिता महत्वपूर्ण होगी।
भारत और रूस के संबंध केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, परमाणु सहयोग, अंतरिक्ष, विज्ञान, व्यापार और बहुपक्षीय मंचों पर भी मजबूत साझेदारी रही है। यही कारण है कि नई दिल्ली और मॉस्को के बीच नियमित उच्चस्तरीय वार्ताएं होती रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस का पाकिस्तान के साथ बढ़ता संपर्क भारत-रूस संबंधों को पूरी तरह प्रभावित करेगा, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन भारत इस पूरे घटनाक्रम का रणनीतिक मूल्यांकन जरूर करेगा।
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार भारत अपनी सुरक्षा रणनीति में लगातार विविधीकरण की नीति अपना रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका, फ्रांस, इजराइल और अन्य देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ाया है। इसके बावजूद रूस आज भी भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। ऐसे में रूस और पाकिस्तान के बीच किसी भी नए सुरक्षा सहयोग को भारत गंभीरता से देख सकता है।
भू-राजनीतिक दृष्टि से दक्षिण एशिया में बदलते समीकरण आने वाले समय में कई नए गठबंधनों को जन्म दे सकते हैं। रूस, चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों के बीच बदलते संबंध क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि रूस-पाकिस्तान प्रस्तावित सुरक्षा समझौते को केवल द्विपक्षीय पहल नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
फिलहाल दोनों देशों के बीच प्रस्तावित समझौते की रूपरेखा पर आगे की प्रक्रिया जारी है। यदि इसे औपचारिक मंजूरी मिलती है तो रूस और पाकिस्तान के गृह मंत्रालयों के बीच सहयोग का नया ढांचा तैयार होगा। इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों के बीच संयुक्त कार्यक्रम, प्रशिक्षण, सूचना साझा करने और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे कई क्षेत्रों में नई पहल देखने को मिल सकती है। वहीं भारत इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए रखते हुए अपने रणनीतिक और सुरक्षा हितों के अनुरूप आगे की नीति तय करेगा।




