सुखना झील के संरक्षण के लिए बड़ा कदम, सफाई और पुनर्जीवन अभियान से बढ़ेगी जल क्षमता

सुखना झील के संरक्षण के लिए बड़ा कदम, सफाई और पुनर्जीवन अभियान से बढ़ेगी जल क्षमता

चंडीगढ़ की पहचान मानी जाने वाली सुखना झील एक बार फिर बड़े संरक्षण अभियान के केंद्र में है। प्राकृतिक सौंदर्य, पर्यटन और पर्यावरणीय महत्व के लिए प्रसिद्ध यह झील लंबे समय से जलीय खरपतवार, गाद जमने और प्रदूषण जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इन समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने के लिए यूटी प्रशासन ने व्यापक योजना तैयार की है, जिसके तहत झील की सफाई, जल भंडारण क्षमता बढ़ाने और पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर कार्य किए जाएंगे।

प्रशासन का उद्देश्य केवल झील की सतही सफाई करना नहीं है, बल्कि इसे भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए भी तैयार करना है ताकि आने वाले वर्षों में इसकी प्राकृतिक संरचना और जल गुणवत्ता सुरक्षित रह सके।

झील में बढ़ती जलीय वनस्पतियों पर नियंत्रण की तैयारी

पिछले कुछ वर्षों में सुखना झील के कई हिस्सों में कमल के पौधों और अन्य जलीय खरपतवारों का तेजी से विस्तार हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमित मात्रा में ये वनस्पतियां पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होती हैं, लेकिन अत्यधिक फैलाव जल प्रवाह को प्रभावित कर सकता है और झील की उपयोगिता पर भी असर डाल सकता है।

इसी कारण प्रशासन ने लगभग दो लाख वर्गमीटर क्षेत्र में फैली अवांछित वनस्पतियों और ठोस कचरे को हटाने का निर्णय लिया है। इस कार्य पर करीब 29.64 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है। सफाई अभियान वैज्ञानिक पद्धति से संचालित किया जाएगा ताकि पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचे और जैव विविधता सुरक्षित बनी रहे।

कमल और खरपतवार क्यों बन रहे हैं चिंता का विषय?

कमल और अन्य जलजीव पौधे देखने में आकर्षक लगते हैं, लेकिन जब इनकी संख्या जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है तो कई समस्याएं पैदा होती हैं। ये पौधे पानी की सतह पर फैलकर सूर्य के प्रकाश को नीचे तक पहुंचने से रोक सकते हैं, जिससे पानी में ऑक्सीजन का स्तर प्रभावित होता है।

इसके अलावा अत्यधिक वनस्पति जल के प्राकृतिक प्रवाह को धीमा कर देती है और नौकायन जैसी गतिविधियों में भी बाधा उत्पन्न करती है। कई स्थानों पर यह गाद जमने की प्रक्रिया को भी तेज कर सकती है, जिससे झील की गहराई धीरे-धीरे कम होने लगती है।

वैज्ञानिक तरीके से होगी सफाई

इंजीनियरिंग विभाग ने स्पष्ट किया है कि सफाई अभियान में जल्दबाजी के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। विशेषज्ञ संस्थानों की सलाह के अनुसार अधिकतर कार्य मैन्युअल तरीके से किया जाएगा ताकि मशीनों के कारण झील के जीव-जंतुओं और प्राकृतिक आवास को नुकसान न पहुंचे।

पौधों को हटाने के साथ-साथ प्लास्टिक, बोतलें, अन्य ठोस अपशिष्ट और तैरता हुआ कचरा भी बाहर निकाला जाएगा। इससे पानी की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलेगी और झील का प्राकृतिक स्वरूप भी बेहतर दिखाई देगा।

डी-सिल्टिंग अभियान से बढ़ेगी जल संग्रहण क्षमता

सुखना झील की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक लगातार बढ़ती गाद है। वर्षों से मानसून के दौरान आसपास के कैचमेंट क्षेत्रों से मिट्टी और अवसाद झील में जमा होते रहे हैं, जिससे इसकी गहराई कम होती गई है।

इसी समस्या के समाधान के लिए रेगुलेटर एंड क्षेत्र में डी-सिल्टिंग अभियान शुरू किया गया है। गर्मियों में जल स्तर कम होने और कुछ हिस्सों के सूखने के बाद यह कार्य अपेक्षाकृत आसान हो गया है।

विशेषज्ञों के आकलन के अनुसार लगभग 34 हजार घन मीटर मिट्टी और गाद निकालने का लक्ष्य रखा गया है। इससे झील की जल भंडारण क्षमता में उल्लेखनीय सुधार होने की उम्मीद है।

गाद हटाने से क्या होगा फायदा?

गाद जमा होने से किसी भी झील की उपयोगी गहराई कम हो जाती है। परिणामस्वरूप बारिश का अतिरिक्त पानी लंबे समय तक संग्रहित नहीं हो पाता और जल क्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है।

डी-सिल्टिंग के बाद न केवल अधिक पानी संग्रहित किया जा सकेगा बल्कि जल प्रवाह भी बेहतर होगा। इससे जल गुणवत्ता सुधारने, बाढ़ नियंत्रण और दीर्घकालिक संरक्षण में मदद मिलने की संभावना है।

आईआईटी रुड़की और विशेषज्ञ संस्थाओं का सहयोग

इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें देश के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान आईआईटी रुड़की के विशेषज्ञों का मार्गदर्शन लिया जा रहा है।

संस्थान ने झील की वर्तमान स्थिति का अध्ययन कर कई तकनीकी सुझाव दिए हैं। इनके अलावा विश्व वन्यजीव कोष (WWF) और वन विभाग ने भी संरक्षण संबंधी महत्वपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत की हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर तैयार की गई योजना भविष्य में झील के लिए अधिक प्रभावी साबित हो सकती है।

पांच वर्षीय एकीकृत प्रबंधन योजना पर भी काम

प्रशासन ने केवल तत्काल सफाई तक खुद को सीमित नहीं रखा है। पिछले वर्ष तैयार की गई पांच वर्षीय एकीकृत प्रबंधन योजना के तहत झील के संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीति बनाई गई है।

इस योजना में जल गुणवत्ता सुधार, गाद नियंत्रण, कैचमेंट क्षेत्र प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, नागरिक भागीदारी और पर्यावरण शिक्षा जैसे कई पहलुओं को शामिल किया गया है।

इसका उद्देश्य केवल वर्तमान समस्याओं का समाधान करना नहीं बल्कि भविष्य में झील को होने वाले नुकसान को रोकना भी है।

मानसून से पहले तेज हुई तैयारियां

बरसात का मौसम सुखना झील के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी दौरान आसपास के क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में पानी झील तक पहुंचता है।

इसी को ध्यान में रखते हुए वन विभाग ने सुखना चो की सफाई शुरू कर दी है। यह प्रमुख जलधारा मानसून के दौरान झील को पानी उपलब्ध कराती है। यदि इसमें गाद या अवरोध जमा हो जाएं तो पानी का प्रवाह प्रभावित हो सकता है।

जलधारा की समय रहते सफाई से मानसून के दौरान पानी का बेहतर संचयन संभव होगा।

कैचमेंट क्षेत्र की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

किसी भी झील का स्वास्थ्य केवल उसके भीतर की स्थिति पर निर्भर नहीं करता बल्कि उसके आसपास के कैचमेंट क्षेत्र पर भी आधारित होता है।

यदि आसपास की पहाड़ियों और भूमि से अत्यधिक मिट्टी बहकर झील में आती रहे तो गाद जमने की समस्या लगातार बनी रहती है। इसलिए विशेषज्ञ कैचमेंट क्षेत्र में पौधारोपण, मिट्टी संरक्षण और जल निकासी व्यवस्था सुधारने पर भी जोर दे रहे हैं।

पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा लाभ

सुखना झील चंडीगढ़ के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में गिनी जाती है। यहां हर वर्ष हजारों पर्यटक सुबह की सैर, नौकायन, फोटोग्राफी और प्रकृति का आनंद लेने पहुंचते हैं।

यदि झील स्वच्छ और सुव्यवस्थित रहती है तो पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। स्थानीय व्यवसायों, छोटे विक्रेताओं और पर्यटन उद्योग को इसका सकारात्मक लाभ मिल सकता है।

पक्षियों और जैव विविधता के लिए भी महत्वपूर्ण

सुखना झील केवल इंसानों के लिए आकर्षण का केंद्र नहीं बल्कि कई स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास भी है।

सर्दियों के मौसम में यहां अनेक प्रवासी पक्षी पहुंचते हैं, जो इसे जैव विविधता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं। साफ पानी और संतुलित पारिस्थितिकी इन पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण कार्यों के दौरान इस प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखना प्राथमिकता होनी चाहिए।

नागरिकों की भागीदारी भी होगी अहम

किसी भी संरक्षण अभियान की सफलता केवल सरकारी प्रयासों पर निर्भर नहीं करती। स्थानीय नागरिकों, पर्यावरण संगठनों और स्वयंसेवकों की भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक होती है।

यदि लोग झील में कचरा फेंकने से बचें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें और स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग दें तो संरक्षण अभियान के परिणाम अधिक प्रभावी हो सकते हैं।

स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

भविष्य के लिए तैयार की जा रही रणनीति

प्रशासन केवल वर्तमान सफाई अभियान तक सीमित नहीं रहना चाहता। आने वाले समय में झील की नियमित निगरानी, जल गुणवत्ता परीक्षण, गाद की स्थिति का मूल्यांकन और जलीय वनस्पतियों की वृद्धि पर लगातार नजर रखने की योजना बनाई जा रही है।

जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ संस्थाओं की सलाह के अनुसार अतिरिक्त कदम भी उठाए जाएंगे ताकि भविष्य में समस्याएं दोबारा गंभीर रूप न ले सकें।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार की योजनाओं को समयबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाए तो सुखना झील आने वाले दशकों तक अपनी प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिक महत्व बनाए रख सकती है।

जलीय खरपतवार हटाने, डी-सिल्टिंग, जलधाराओं के रखरखाव, कैचमेंट क्षेत्र प्रबंधन और विशेषज्ञ संस्थाओं के सहयोग से तैयार की गई यह व्यापक योजना चंडीगढ़ की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहरों में से एक को नई ऊर्जा देने का प्रयास है। आने वाले महीनों में इन परियोजनाओं की प्रगति पर लगातार नजर रखी जाएगी ताकि झील की जल क्षमता, पर्यावरणीय संतुलन और पर्यटन महत्व को और अधिक मजबूत बनाया जा सके।