सोने की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों के लिए इसे खरीदना लगातार मुश्किल बना दिया है। शादी-ब्याह से लेकर निवेश तक, हर जगह सोने की अहमियत बनी हुई है। ऐसे में अगर वैज्ञानिक प्रयोगशाला में ही सोना तैयार करने में कामयाब हो जाएं तो यह किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं होगा। हाल ही में अमेरिका की एक कंपनी ने ऐसा ही दावा करके वैज्ञानिक जगत से लेकर सोने के बाजार तक में चर्चा शुरू कर दी है। कंपनी का कहना है कि उसने न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीक की सहायता से पारे को सोने में बदलने का प्रयोग सफलतापूर्वक किया है।
यह दावा सैन फ्रांसिस्को की कंपनी मैराथन फ्यूजन की ओर से किया गया है। कंपनी के मुताबिक, उसने परमाणु स्तर पर बदलाव करने वाली तकनीक का इस्तेमाल करके पारे से सोना तैयार किया है। इतना ही नहीं, कंपनी का कहना है कि उसकी प्रयोगशाला में सोना बनने की दर यूरोप की प्रमुख परमाणु अनुसंधान संस्था CERN के वर्ष 2025 में दर्ज किए गए रिकॉर्ड से करीब 10 गुना ज्यादा रही है। हालांकि, इस उपलब्धि को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रयोगशाला में तैयार हुआ सोना बाजार में मिलने वाले सोने जितना शुद्ध है? क्या इससे आने वाले समय में सोने की कीमतों में कमी आ सकती है? आइए समझते हैं इस तकनीक के पीछे का पूरा विज्ञान।
सोना बनाने के लिए पारे का ही इस्तेमाल क्यों किया गया?
आमतौर पर लोग समझते हैं कि सोना केवल खदानों से ही निकाला जा सकता है। धरती के भीतर मौजूद चट्टानों और दूसरे खनिजों से इसे निकालने के लिए लंबी प्रक्रिया अपनाई जाती है। लेकिन विज्ञान के नजरिए से देखें तो किसी दूसरे तत्व को सोने में बदलना पूरी तरह असंभव नहीं है। इसके लिए पदार्थ के परमाणु की संरचना में बदलाव करना पड़ता है।
मैराथन फ्यूजन ने इसी सिद्धांत को आधार बनाया है। कंपनी ने पारे यानी मरकरी का इस्तेमाल किया। इसके पीछे एक खास वैज्ञानिक वजह है। पारे और सोने के परमाणुओं की संरचना में अंतर होता है। किसी तत्व की पहचान उसके परमाणु के केंद्र में मौजूद प्रोटॉनों की संख्या से होती है। सोने के परमाणु में 79 प्रोटॉन होते हैं, जबकि पारे में इनकी संख्या 80 होती है। ऐसे में पारे के परमाणु में जरूरी बदलाव करके उसे सोने के परमाणु में बदला जा सकता है।
इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन कहा जाता है। इसका मतलब है कि परमाणु के केंद्र यानी न्यूक्लियस में बदलाव करके एक तत्व को दूसरे तत्व में परिवर्तित करना। यह सामान्य रासायनिक प्रतिक्रिया से बिल्कुल अलग प्रक्रिया है।
न्यूक्लियर फ्यूजन से कैसे तैयार होता है सोना?
इस तकनीक को समझने के लिए सबसे पहले न्यूक्लियर फ्यूजन को समझना जरूरी है। न्यूक्लियर फ्यूजन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें हल्के परमाणु नाभिक आपस में मिलकर भारी नाभिक बनाते हैं। इस दौरान बहुत अधिक ऊर्जा निकलती है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसी प्रक्रिया का इस्तेमाल करके भविष्य के लिए स्वच्छ ऊर्जा तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
मैराथन फ्यूजन ने अपने प्रयोग में फ्यूजन रिएक्शन से निकलने वाले उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन का इस्तेमाल किया। कंपनी के मुताबिक, इस प्रक्रिया में मरकरी-198 नाम के आइसोटोप को न्यूट्रॉन के संपर्क में लाया गया। इसके बाद परमाणु संरचना में बदलाव हुआ और मरकरी-197 का निर्माण हुआ।
मरकरी-197 एक रेडियोएक्टिव आइसोटोप है। इसका मतलब है कि यह स्थायी अवस्था में नहीं रहता और समय के साथ रेडियोधर्मी क्षय की प्रक्रिया से गुजरता है। अंततः यह स्थिर गोल्ड-197 यानी सोने के आइसोटोप में परिवर्तित हो सकता है।
यही इस पूरे प्रयोग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। वैज्ञानिकों ने केवल किसी धातु पर रासायनिक प्रक्रिया करके उसका रंग नहीं बदला, बल्कि परमाणु के स्तर पर तत्व को बदलने का दावा किया है। हालांकि, इस प्रक्रिया से कितनी मात्रा में सोना मिला और उसमें कितनी शुद्धता है, इसकी पूरी जानकारी सामने आना अभी बाकी है।
क्या लैब में सोना बनाना कोई नई खोज है?
दरअसल, प्रयोगशाला में सोना बनाने का विचार विज्ञान के लिए नया नहीं है। कई दशकों से वैज्ञानिक परमाणु प्रतिक्रियाओं के जरिए एक तत्व को दूसरे तत्व में बदलने के प्रयोग करते रहे हैं। पुराने समय में कीमियागर भी सीसा और दूसरी धातुओं को सोने में बदलने की कोशिश करते थे। हालांकि, उनके पास आधुनिक विज्ञान और परमाणु संरचना की जानकारी नहीं थी।
आज वैज्ञानिक तकनीक की मदद से परमाणुओं के नाभिक में बदलाव करना संभव हो चुका है। यूरोपियन ऑर्गनाइजेशन फॉर न्यूक्लियर रिसर्च यानी CERN में भी इस तरह के प्रयोग किए जा चुके हैं। वहां वैज्ञानिकों ने परमाणु टकराव और अन्य न्यूक्लियर प्रक्रियाओं के जरिए सोने के परमाणु तैयार किए थे।
लेकिन इन प्रयोगों में सोने की मात्रा बेहद कम रही। इसे सामान्य उत्पादन प्रक्रिया की तरह इस्तेमाल करना संभव नहीं था। मैराथन फ्यूजन का दावा है कि उसने उत्पादन की दर के मामले में CERN के वर्ष 2025 के रिकॉर्ड से 10 गुना बेहतर प्रदर्शन किया है। फिर भी केवल उत्पादन की दर अधिक होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि कंपनी बड़े पैमाने पर कम कीमत में सोना तैयार कर सकती है।
क्या प्रयोगशाला में बना सोना 24 कैरेट जैसा ही होगा?
यह इस खोज से जुड़ा सबसे अहम सवाल है। इसका जवाब समझने के लिए सोने के आइसोटोप और उसकी शुद्धता के बीच अंतर जानना जरूरी है।
प्राकृतिक सोने का मुख्य और स्थिर आइसोटोप गोल्ड-197 यानी Au-197 है। इसका अर्थ है कि यदि वैज्ञानिक किसी भी प्रक्रिया से Au-197 तैयार कर लेते हैं तो परमाणु के स्तर पर वह सोना बिल्कुल वही होगा, जो प्राकृतिक रूप से खदानों से मिलता है। उसकी पहचान, रासायनिक गुण और मूल परमाणु संरचना में कोई अंतर नहीं होगा।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब सोना बनाने की प्रक्रिया में दूसरे रेडियोएक्टिव आइसोटोप भी तैयार हो जाते हैं। ऐसे आइसोटोप स्थिर नहीं होते और समय के साथ रेडिएशन छोड़ते हुए दूसरे तत्वों में बदल सकते हैं।
अतीत में किए गए कुछ वैज्ञानिक प्रयोगों में Au-190 से लेकर Au-199 तक सोने के अलग-अलग आइसोटोप बनने की जानकारी सामने आई थी। इनमें से केवल Au-197 स्थिर होता है। बाकी आइसोटोप रेडियोधर्मी हो सकते हैं। ऐसे में प्रयोगशाला में तैयार किए गए पदार्थ में रेडियोएक्टिव तत्वों की मौजूदगी एक गंभीर समस्या बन सकती है।
ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के रसायन विज्ञान विभाग से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी के मुताबिक, परमाणु रिएक्टर में तैयार सोने में अन्य रेडियोआइसोटोप के मिलने की आशंका रहती है। अगर ऐसा होता है तो उसे सीधे आभूषण बनाने या निवेश के लिए इस्तेमाल करना सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
इसलिए लैब में सोना बन जाने और बाजार में बिकने लायक शुद्ध सोना तैयार होने के बीच बड़ा अंतर है। इसके लिए केवल यह साबित करना पर्याप्त नहीं होगा कि सोने के परमाणु बन गए हैं। यह भी जांचना होगा कि तैयार पदार्थ में स्थिर Au-197 की मात्रा कितनी है और रेडियोएक्टिव अशुद्धियां मौजूद हैं या नहीं।
सोने की शुद्धता जांचने में क्या होगी चुनौती?
आमतौर पर बाजार में मिलने वाले सोने की शुद्धता कैरेट के आधार पर मापी जाती है। 24 कैरेट सोने को लगभग शुद्ध सोना माना जाता है। लेकिन परमाणु तकनीक से तैयार सोने के मामले में केवल कैरेट की जांच काफी नहीं होगी।
यहां वैज्ञानिकों को आइसोटोप की संरचना और रेडियोधर्मिता की भी जांच करनी पड़ेगी। अगर तैयार सोने में रेडियोएक्टिव तत्व मौजूद हैं तो उन्हें अलग करना जरूरी होगा। यह काम बेहद जटिल और खर्चीला हो सकता है।
इसके अलावा, यह भी देखना होगा कि तैयार सोने में अन्य धातुओं या परमाणु प्रतिक्रियाओं से पैदा हुए अवशेषों की मौजूदगी तो नहीं है। जब तक इन सभी पहलुओं की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच नहीं होती, तब तक इसे पूरी तरह सुरक्षित और बाजार में इस्तेमाल करने योग्य सोना मानना जल्दबाजी होगी।
मैराथन फ्यूजन के दावे के बावजूद कंपनी ने उत्पादित सोने की वास्तविक मात्रा, उसकी अंतिम शुद्धता और रेडियोएक्टिव अशुद्धियों से जुड़ी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। इसलिए इस उपलब्धि को फिलहाल एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दावा माना जा सकता है, न कि सोने के व्यावसायिक उत्पादन का प्रमाण।
क्या अब सोना खरीदना हो जाएगा सस्ता?
अगर प्रयोगशाला में सोना बनाना संभव हो गया है तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में सोने की कीमतें कम हो सकती हैं। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा मानने की कोई ठोस वजह नहीं है।
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इस तकनीक की लागत है। न्यूक्लियर फ्यूजन से सोना बनाने के लिए अत्याधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों, विशेष सुविधाओं और नियंत्रित परमाणु परिस्थितियों की जरूरत पड़ती है। इन सभी व्यवस्थाओं पर भारी खर्च होता है। इसके मुकाबले अगर बहुत कम मात्रा में सोना तैयार होता है तो उसकी बाजार में कीमत काफी अधिक हो सकती है।
दूसरी चुनौती उत्पादन क्षमता की है। प्रयोगशाला में कुछ मात्रा में सोना तैयार कर लेना और औद्योगिक स्तर पर लगातार बड़ी मात्रा में उसका उत्पादन करना दो अलग-अलग बातें हैं। इसके लिए तकनीक को बड़े स्तर पर विकसित करना होगा।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण चुनौती शुद्धता की है। अगर तैयार सोने में रेडियोएक्टिव आइसोटोप मौजूद रहते हैं तो उसे सुरक्षित बनाने के लिए अतिरिक्त प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ेगी। इससे उत्पादन की लागत और बढ़ सकती है।
आने वाले समय में क्या बदल सकता है?
मैराथन फ्यूजन का प्रयोग सफलतापूर्वक व्यावसायिक स्तर तक पहुंचता है या नहीं, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल इस तकनीक को सोने के पारंपरिक उत्पादन का विकल्प मानना सही नहीं होगा।
हालांकि, परमाणु स्तर पर एक तत्व को दूसरे तत्व में बदलने की क्षमता विज्ञान के लिए बड़ी उपलब्धि है। इससे भविष्य में न्यूक्लियर तकनीक के नए इस्तेमाल के रास्ते खुल सकते हैं। अगर वैज्ञानिक उत्पादन की लागत घटाने, मात्रा बढ़ाने और रेडियोएक्टिव अशुद्धियों को नियंत्रित करने में सफल होते हैं तो इसका महत्व और बढ़ सकता है।
लैब में सोना बनाने का दावा विज्ञान की दुनिया में दिलचस्प संभावना जरूर पेश करता है, लेकिन आम लोगों के लिए सस्ता सोना उपलब्ध कराने की मंजिल अभी दूर है। फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनी अपने दावे के समर्थन में उत्पादन की वास्तविक मात्रा, शुद्धता और लागत से जुड़े कितने ठोस आंकड़े पेश करती है।
(Photo : AI Generated)




