शिमला: हिमाचल प्रदेश में अधिकारियों और कर्मचारियों को लेकर सियासी बयानबाजी अब नए विवाद का रूप लेती दिखाई दे रही है। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। इस बीच राज्य सरकार के ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री अनिरुद्ध सिंह तथा तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी ने संयुक्त रूप से भारतीय जनता पार्टी और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर पर निशाना साधते हुए कहा कि सार्वजनिक मंचों से सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को चेतावनी देना लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक निष्पक्षता के लिए उचित नहीं है।
रविवार को जारी संयुक्त प्रेस बयान में दोनों मंत्रियों ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को राजनीतिक विवादों में घसीटना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उनका कहना था कि प्रशासनिक अधिकारियों का दायित्व कानून और नियमों के अनुसार कार्य करना है तथा उन पर सार्वजनिक रूप से दबाव बनाने की कोशिश प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।
मंत्रियों ने आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं के हालिया बयान यह संकेत देते हैं कि विपक्ष सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के कार्यों को राजनीतिक नजरिए से देख रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी अधिकारी या कर्मचारी को उसके वैधानिक दायित्वों के निर्वहन के दौरान डराने या चेतावनी देने जैसी भाषा का प्रयोग लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है। सरकार का मानना है कि प्रशासनिक तंत्र को स्वतंत्र और निष्पक्ष वातावरण में कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए।
अनिरुद्ध सिंह और राजेश धर्माणी ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी लगातार कर्मचारियों के हितैषी होने का दावा करती रही है, लेकिन उसके शासनकाल का रिकॉर्ड इससे मेल नहीं खाता। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्मचारियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में भाजपा सरकार अपेक्षित निर्णय नहीं ले सकी। दोनों मंत्रियों ने कहा कि पुरानी पेंशन योजना सहित कर्मचारियों के कई वित्तीय अधिकार लंबे समय तक लंबित रहे और उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी आपराधिक या कानूनी मामले की वैधता का निर्णय केवल न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि किसी मामले में प्राथमिकी दर्ज हुई है या जांच चल रही है तो उसका अंतिम निष्कर्ष न्यायालय और जांच एजेंसियां तय करेंगी। राजनीतिक मंचों से दिए गए वक्तव्यों के आधार पर किसी मुकदमे को सही या गलत घोषित नहीं किया जा सकता।
मंत्रियों के अनुसार कानून के तहत दर्ज मामलों की जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप आगे बढ़ रही है और इसमें किसी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र है और उसे प्रभावित करने वाले बयान लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान की भावना के अनुरूप नहीं हैं।
कांग्रेस नेताओं ने भाजपा से यह भी सवाल किया कि यदि उसके शासनकाल में कानून के अनुसार दर्ज किए गए मुकदमों को वैधानिक माना जाता था, तो वर्तमान सरकार के दौरान उसी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं। उन्होंने इसे भाजपा की कथित दोहरी सोच बताते हुए कहा कि विपक्ष परिस्थिति के अनुसार अपने राजनीतिक तर्क बदल रहा है।
दोनों मंत्रियों ने आरोप लगाया कि भाजपा इस समय संगठनात्मक चुनौतियों और आंतरिक मतभेदों से गुजर रही है। उनके अनुसार पार्टी जनता से जुड़े वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय राजनीतिक विवादों को हवा देकर जनमत को प्रभावित करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि विपक्ष को रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन लगातार टकराव का माहौल बनाना राज्य के हित में नहीं है।
प्रेस बयान में सरकार की ओर से यह भी दोहराया गया कि प्रदेश के अधिकारियों और कर्मचारियों की गरिमा तथा स्वतंत्र कार्यप्रणाली की रक्षा करना राज्य सरकार की प्राथमिकता है। मंत्रियों ने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव में आने की आवश्यकता नहीं है और सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि वे संविधान और कानून के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें।
वित्तीय मामलों का उल्लेख करते हुए दोनों मंत्रियों ने दावा किया कि पूर्व भाजपा सरकार के कार्यकाल में केंद्र सरकार से आरडीजी तथा जीएसटी क्षतिपूर्ति सहित विभिन्न मदों में लगभग 60 हजार करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्राप्त हुई थी। इसके बावजूद कर्मचारियों को वेतन आयोग के एरियर और अन्य वित्तीय लाभ समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए। उनका कहना था कि उस अवधि में कर्मचारियों से जुड़े कई महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दे लंबित रहे।
इसके विपरीत वर्तमान कांग्रेस सरकार ने कर्मचारियों के हितों को प्राथमिकता देने का दावा करते हुए कहा कि सत्ता में आने के बाद पुरानी पेंशन योजना लागू करने सहित कई निर्णय लिए गए हैं। मंत्रियों के अनुसार सरकार कर्मचारियों और अधिकारियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए लगातार काम कर रही है तथा भविष्य में भी इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कर्मचारियों और अधिकारियों के साथ विश्वास और सहयोग के आधार पर कार्य करना चाहती है। प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और किसी भी कर्मचारी को राजनीतिक दबाव में कार्य करने की स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी जाएगी।
प्रदेश में अधिकारियों और कर्मचारियों को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका है। एक ओर भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रही है, वहीं कांग्रेस विपक्ष पर प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करने का आरोप लगा रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों दलों के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं, जबकि कर्मचारी संगठनों और प्रशासनिक हलकों की भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है।



