हिमाचल को आपदाओं से सुरक्षित बनाने की तैयारी, ₹3500 करोड़ के रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर का CM सुक्खू ने किया ऐलान

हिमाचल को आपदाओं से सुरक्षित बनाने की तैयारी, ₹3500 करोड़ के रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर का CM सुक्खू ने किया ऐलान

हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने और भविष्य की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक व्यापक योजना पर काम शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने घोषणा की कि राज्य में लगभग 3,500 करोड़ रुपये की लागत से आपदा-रोधी (रेजिलिएंट) आधारभूत ढांचा विकसित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य केवल क्षतिग्रस्त संरचनाओं का पुनर्निर्माण करना नहीं, बल्कि ऐसी मजबूत व्यवस्था तैयार करना है जो बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान नुकसान को न्यूनतम कर सके।

मुख्यमंत्री शिमला स्थित हिमाचल प्रदेश इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (HIPPA) में आयोजित “टुवर्ड्स रेजिलिएंस इंफ्रास्ट्रक्चर प्लानिंग इन हिमालय” कार्यशाला के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां इसे देश के सबसे संवेदनशील पर्वतीय राज्यों में शामिल करती हैं। लगातार बदलते मौसम, जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं ने राज्य में आपदाओं का खतरा पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ा दिया है। ऐसे में पारंपरिक विकास मॉडल के बजाय आपदा-रोधी विकास को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता बन गया है।

भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखकर तैयार होगी योजना

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार दीर्घकालिक सोच के साथ कार्य कर रही है। नई परियोजना के तहत सड़कें, पुल, सरकारी भवन, जलापूर्ति योजनाएं, बिजली व्यवस्था और अन्य सार्वजनिक ढांचे इस प्रकार विकसित किए जाएंगे कि वे प्राकृतिक आपदाओं का अधिक मजबूती से सामना कर सकें। उन्होंने कहा कि केवल आपदा आने के बाद राहत देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना आवश्यक है जिससे जान-माल का नुकसान पहले ही कम किया जा सके।

उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर नई नीतियां तैयार कर रही है। पर्वतीय क्षेत्रों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए निर्माण मानकों में भी सुधार किया जाएगा ताकि भविष्य में होने वाले नुकसान को रोका जा सके।

2023 की त्रासदी से मिले सबक

मुख्यमंत्री ने वर्ष 2023 में आई भीषण प्राकृतिक आपदा का उल्लेख करते हुए कहा कि वह हिमाचल के इतिहास की सबसे कठिन परिस्थितियों में से एक थी। लगातार भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने पूरे राज्य में व्यापक तबाही मचाई थी।

उन्होंने बताया कि उस दौरान राज्य के विभिन्न पर्यटन स्थलों पर फंसे लगभग 75 हजार पर्यटकों को सुरक्षित बाहर निकालना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती थी। राहत एवं बचाव दलों, पुलिस, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और स्थानीय प्रशासन ने समन्वय के साथ अभियान चलाकर हजारों लोगों की जान बचाई।

मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से चंद्रताल क्षेत्र में फंसे करीब 300 पर्यटकों को सुरक्षित निकालने के अभियान का उल्लेख किया। उन्होंने इस अभियान में राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी और विधायक संजय अवस्थी सहित राहत टीमों की सराहना करते हुए कहा कि विषम परिस्थितियों में उनके साहस और समर्पण ने कई लोगों की जान बचाई।

हजारों मकान हुए थे क्षतिग्रस्त

मुख्यमंत्री के अनुसार वर्ष 2023 की आपदा में राज्यभर में लगभग 23 हजार मकान पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हुए। इसके अलावा 51 लोगों की मौत हुई, जबकि करोड़ों रुपये की सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा।

उन्होंने कहा कि इस त्रासदी ने सरकार को राहत एवं पुनर्वास नीति की समीक्षा करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद प्रभावित परिवारों को बेहतर सहायता उपलब्ध कराने के लिए मुआवजा राशि में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की गई।

राहत नीति में बड़ा बदलाव

मुख्यमंत्री ने बताया कि पहले पूरी तरह क्षतिग्रस्त मकानों के लिए प्रभावित परिवारों को 1.30 लाख रुपये की सहायता मिलती थी, लेकिन सरकार ने राहत नीति में संशोधन करते हुए इसे बढ़ाकर 8 लाख रुपये कर दिया। उनका कहना था कि पहाड़ी क्षेत्रों में मकानों का निर्माण अपेक्षाकृत महंगा होता है और पुराने मुआवजे से नया घर बनाना संभव नहीं था। इसलिए वास्तविक जरूरतों को देखते हुए सहायता राशि में कई गुना वृद्धि की गई।

उन्होंने कहा कि सरकार ने राहत वितरण प्रक्रिया को भी अधिक पारदर्शी और तेज बनाने के प्रयास किए हैं ताकि प्रभावित परिवारों को समय पर आर्थिक सहायता मिल सके।

2025 की आपदाओं में बेहतर तैयारी का मिला फायदा

मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2023 के अनुभवों से सीख लेकर सरकार ने आपदा प्रबंधन प्रणाली में कई सुधार किए। इसका परिणाम यह रहा कि वर्ष 2025 के दौरान आई प्राकृतिक आपदाओं का सामना पहले की तुलना में अधिक प्रभावी तरीके से किया गया और नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा।

उन्होंने बताया कि प्रशासनिक समन्वय, त्वरित चेतावनी प्रणाली, राहत दलों की बेहतर तैयारी और स्थानीय स्तर पर योजनाबद्ध कार्यवाही के कारण कई संभावित दुर्घटनाओं को रोका जा सका। भविष्य में भी इसी मॉडल को और मजबूत किया जाएगा।

जलवायु परिवर्तन बना बड़ी चुनौती

मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं में लगातार वृद्धि चिंता का विषय है। उन्होंने इसका एक बड़ा कारण वैश्विक जलवायु परिवर्तन को बताया। उनके अनुसार मौसम के बदलते पैटर्न के कारण अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि बड़े बांधों के जलाशयों से बढ़ने वाला वाष्पीकरण भी स्थानीय मौसम प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इस विषय पर वैज्ञानिक स्तर पर और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है ताकि भविष्य की रणनीतियां तथ्यों के आधार पर तैयार की जा सकें।

विशेष रिपोर्ट का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने हाइड्रो-मेट्रोलॉजिकल आपदाओं पर तैयार की गई एक विशेष रिपोर्ट का विमोचन भी किया। इस रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश में बाढ़, भूस्खलन, अत्यधिक वर्षा और अन्य जलवायु आधारित आपदाओं के जोखिम तथा उनके समाधान से जुड़े महत्वपूर्ण सुझाव शामिल किए गए हैं।

सरकार का मानना है कि इस अध्ययन से भविष्य की विकास योजनाओं और आपदा प्रबंधन रणनीतियों को अधिक वैज्ञानिक आधार मिलेगा।

एसआईएयू पोर्टल हुआ लॉन्च

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने हिमाचल सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट मैनेजमेंट सिस्टम (SIAU Portal) का भी शुभारंभ किया। यह डिजिटल प्लेटफॉर्म विभिन्न सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने, परियोजनाओं से जुड़े आंकड़ों का व्यवस्थित प्रबंधन करने और डेटा आधारित निर्णय लेने में मदद करेगा।

सरकार का कहना है कि पोर्टल के माध्यम से प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी और योजनाओं के प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना भी आसान होगा।

विशेषज्ञों ने सुझाए कई अहम कदम

कार्यशाला में शामिल विशेषज्ञों ने भी हिमालयी राज्यों के लिए अलग रणनीति अपनाने पर जोर दिया।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के उपाध्यक्ष दीपक राठौर ने कहा कि भविष्य में नुकसान कम करने के लिए मजबूत अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करना बेहद जरूरी है। उन्होंने संवेदनशील हिमनदीय झीलों (ग्लेशियल लेक्स) की नियमित निगरानी और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग इंजीनियरिंग मानकों को लागू करने की आवश्यकता बताई।

मुख्य सचिव केके पंत ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल क्षतिग्रस्त ढांचे की मरम्मत करना नहीं है, बल्कि ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना है जो भविष्य की प्राकृतिक चुनौतियों का भी मजबूती से सामना कर सके। उन्होंने कहा कि विकास योजनाओं में आपदा जोखिम को शामिल करना अब अनिवार्य हो गया है।

नीति आयोग के पूर्व सदस्य डॉ. वीके पॉल ने वैश्विक तापमान वृद्धि को गंभीर चेतावनी बताते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की चुनौती बन चुका है। उन्होंने सुझाव दिया कि पर्यावरण, जल संसाधन, शहरी विकास, लोक निर्माण और आपदा प्रबंधन सहित सभी विभागों को साझा रणनीति के तहत कार्य करना होगा। उनके अनुसार वैज्ञानिक अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और सामुदायिक भागीदारी को मिलाकर ही हिमालयी राज्यों को सुरक्षित बनाया जा सकता है।

दीर्घकालिक सुरक्षा पर सरकार का जोर

राज्य सरकार का मानना है कि हिमाचल प्रदेश में तेजी से बदल रही जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए विकास की दिशा में नई सोच अपनाना जरूरी है। 3,500 करोड़ रुपये की प्रस्तावित परियोजना इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसके तहत आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक योजना, मजबूत निर्माण मानकों और प्रभावी आपदा प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से राज्य को अधिक सुरक्षित और आपदा-रोधी बनाने का लक्ष्य रखा गया है। आने वाले वर्षों में इस योजना के तहत विभिन्न विभागों के सहयोग से चरणबद्ध तरीके से परियोजनाओं को लागू किया जाएगा, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ राज्य के विकास को भी स्थायी और टिकाऊ बनाया जा सके।