दुनिया में बदलते सुरक्षा हालात और सैन्य ताकत बढ़ाने की होड़ के बीच पाकिस्तान ने अपने रक्षा संबंधों को विस्तार देने की दिशा में एक और कदम उठाया है। पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया ने मिलकर रक्षा उद्योग को मजबूत करने के लिए बद्र समझौते पर सहमति जताई है। कतर की राजधानी दोहा में बुधवार को हुए इस करार के जरिए चारों देश हथियारों के निर्माण, सैन्य तकनीक के आदान-प्रदान, अनुसंधान और रक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रशिक्षण में एक-दूसरे का सहयोग करेंगे।
इस साझेदारी का प्रमुख उद्देश्य केवल हथियारों की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। इसके जरिए चारों देश ऐसी व्यवस्था विकसित करना चाहते हैं, जिसमें हथियार बनाने से लेकर उनकी तकनीकी देखरेख और उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक कई गतिविधियों में साझेदारी की जा सके। इससे उन्हें विदेशी हथियार निर्माताओं पर निर्भरता कम करने और अपने रक्षा उद्योग को अधिक सक्षम बनाने में मदद मिल सकती है।
पाकिस्तान के लिए यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि वह मुस्लिम बहुल देशों के साथ अपने रणनीतिक और सैन्य संबंधों को लगातार विस्तार देने की कोशिश कर रहा है। इससे पहले सऊदी अरब के साथ मक्का समझौते को लेकर भी पाकिस्तान की रक्षा कूटनीति चर्चा में रही थी। हालांकि, दोनों समझौतों का उद्देश्य अलग-अलग है। मक्का समझौता सामूहिक सुरक्षा और सैन्य सहयोग पर केंद्रित है, जबकि दोहा में हुआ बद्र करार मुख्य रूप से हथियारों के उत्पादन और रक्षा तकनीक को साझा करने से संबंधित है।
चार देशों की अलग-अलग क्षमताएं बनेंगी साझेदारी की ताकत
बद्र समझौते की अहमियत समझने के लिए चारों देशों की रक्षा क्षेत्र में मौजूद क्षमताओं पर नजर डालना जरूरी है। इन देशों के पास संसाधन, तकनीक, पूंजी और उत्पादन से जुड़ी अलग-अलग खूबियां हैं। अगर इनका सही तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, तो संयुक्त रक्षा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए एक मजबूत आधार तैयार हो सकता है।
तुर्किये इस समूह में तकनीकी विशेषज्ञता और विकसित रक्षा उद्योग के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थान रखता है। उसने सैन्य उपकरणों, हथियार प्रणालियों और रक्षा तकनीक के विकास में अपनी क्षमताएं मजबूत की हैं। वह कई देशों के साथ रक्षा परियोजनाओं पर काम भी कर रहा है। ऐसे में तुर्किये की कंपनियां दूसरे साझेदार देशों को तकनीकी सहयोग देने के साथ संयुक्त उत्पादन में भी भूमिका निभा सकती हैं।
पाकिस्तान और इंडोनेशिया के पास अपने-अपने रक्षा उत्पादन कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की क्षमता है। दोनों देशों के लिए विदेशी तकनीक को अपनाने के साथ उसे घरेलू स्तर पर विकसित करना भी महत्वपूर्ण है। इन देशों में उपलब्ध श्रमशक्ति और घरेलू बाजार संयुक्त परियोजनाओं के विस्तार में मदद कर सकते हैं।
दूसरी ओर, कतर की प्रमुख ताकत उसकी वित्तीय क्षमता और रक्षा क्षेत्र में निवेश करने की गुंजाइश है। रक्षा उद्योग में नई तकनीक विकसित करने, उत्पादन इकाइयां स्थापित करने और लंबे समय तक परियोजनाओं को चलाने के लिए पर्याप्त पूंजी की जरूरत होती है। कतर इस मामले में अपने सहयोगियों के लिए उपयोगी भागीदार साबित हो सकता है।
रक्षा विशेषज्ञों के आकलन के मुताबिक, चारों देशों की क्षमताओं को एक साथ लाने से ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा मिल सकता है, जिनमें किसी एक देश के लिए सभी जरूरी संसाधन जुटाना मुश्किल होता है। फिर भी इस सहयोग की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि समझौते के तहत कौन-सी परियोजनाएं शुरू होती हैं और उनके लिए तकनीकी तथा वित्तीय जिम्मेदारियां किस प्रकार तय की जाती हैं।
विदेशी हथियार खरीदने के बजाय घरेलू उत्पादन पर जोर
रक्षा क्षेत्र में किसी देश की ताकत केवल इस बात से नहीं आंकी जाती कि उसके पास कितने हथियार हैं। यह भी महत्वपूर्ण होता है कि वह जरूरत पड़ने पर अपने हथियारों का निर्माण, मरम्मत और उन्नयन कितनी तेजी से कर सकता है। विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता होने से संकट के समय हथियारों और उनके जरूरी कलपुर्जों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
बद्र समझौते के पीछे यही रणनीतिक सोच एक महत्वपूर्ण वजह मानी जा रही है। संयुक्त उत्पादन की व्यवस्था बनने पर साझेदार देश कुछ हथियार प्रणालियों और उनके हिस्सों का निर्माण अपने यहां कर सकते हैं। इससे उन्हें तकनीकी जानकारी हासिल करने, कुशल कामगार तैयार करने और रक्षा उद्योग में नए रोजगार पैदा करने के अवसर मिल सकते हैं।
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज से जुड़े शोधकर्ता अल्बर्ट विडाल के आकलन के अनुसार, पाकिस्तान और इंडोनेशिया तुर्किये के हथियारों में रुचि रखने के साथ उनके कुछ हिस्सों का निर्माण अपने देशों में भी करना चाहते हैं। ऐसी व्यवस्था से तुर्किये की रक्षा कंपनियों को लगातार ऑर्डर मिलने की संभावना बन सकती है। वहीं, पाकिस्तान और इंडोनेशिया को घरेलू उत्पादन क्षमता विकसित करने में सहायता मिल सकती है।
हालांकि, संयुक्त निर्माण का अर्थ यह नहीं है कि सभी हथियारों का उत्पादन तुरंत चारों देशों में शुरू हो जाएगा। इसके लिए तकनीकी हस्तांतरण, उत्पादन सुविधाओं, निवेश, गुणवत्ता नियंत्रण और बौद्धिक संपदा से जुड़े नियमों पर काम करना होगा। समझौते के बाद इन विषयों पर होने वाली प्रगति ही तय करेगी कि यह पहल कितनी दूर तक जाती है।
पाकिस्तान और तुर्किये के युद्धपोत कार्यक्रम से मिल सकता है अनुभव
पाकिस्तान और तुर्किये पहले से ही रक्षा क्षेत्र में कई परियोजनाओं पर सहयोग कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच युद्धपोत निर्माण से जुड़ी परियोजना इसका एक प्रमुख उदाहरण है। इस कार्यक्रम में कुल चार युद्धपोत बनाए जाने हैं। इनमें दो जहाज तुर्किये के इस्तांबुल में और दो पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड में तैयार किए जाने की योजना है।
इस तरह की परियोजनाएं पाकिस्तान के लिए केवल समुद्री बेड़ा मजबूत करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि घरेलू शिपयार्ड की तकनीकी क्षमताएं बढ़ाने का अवसर भी हैं। जब किसी देश में आधुनिक युद्धपोत बनाए जाते हैं, तो उसके इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों को डिजाइन, निर्माण, उपकरणों के एकीकरण तथा रखरखाव जैसे क्षेत्रों में अनुभव मिलता है।
तुर्किये को भी इस सहयोग से अपने रक्षा उद्योग के लिए नए बाजार और दीर्घकालिक व्यावसायिक अवसर मिल सकते हैं। यदि संयुक्त परियोजनाओं का विस्तार होता है, तो भविष्य में अन्य सैन्य उपकरणों के निर्माण में भी दोनों देशों की साझेदारी बढ़ सकती है।
बद्र समझौते से ऐसी मौजूदा पहलों को व्यापक सहयोग ढांचे से जोड़ने की संभावना बनती है। हालांकि, युद्धपोत परियोजना और नए चार-पक्षीय करार के बीच किसी विशिष्ट नई योजना की घोषणा को अलग से देखना होगा। समझौते का होना अपने आप में हर पुरानी परियोजना के स्वरूप में बदलाव की पुष्टि नहीं करता।
इंडोनेशिया और तुर्किये के बीच भी रक्षा सहयोग
इंडोनेशिया और तुर्किये के संबंध भी रक्षा उत्पादन तक पहुंच चुके हैं। दोनों देश एक टैंक परियोजना पर मिलकर काम कर रहे हैं। यह सहयोग दिखाता है कि इंडोनेशिया अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी तकनीकी साझेदारों के साथ काम करने और घरेलू रक्षा क्षमताओं को विकसित करने में रुचि रखता है।
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट की वरिष्ठ शोधकर्ता बुर्कु ओजसेलिक के अनुसार, इस तरह की साझेदारी का एक महत्वपूर्ण पहलू अलग-अलग रक्षा समझौतों को व्यापक नेटवर्क से जोड़ना है। हर नई परियोजना के लिए अलग व्यवस्था बनाने के बजाय मौजूदा सहयोग को एक साझा ढांचे में लाने से समन्वय बेहतर हो सकता है।
अगर चारों देश इस दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो वे संयुक्त अनुसंधान, तकनीकी प्रशिक्षण और उत्पादन से जुड़े अनुभवों का लाभ उठा सकते हैं। इससे रक्षा उद्योग में काम करने वाले विशेषज्ञों के बीच संपर्क भी बढ़ सकता है। लेकिन इसके लिए प्रत्येक देश की सैन्य जरूरतों, बजट और तकनीकी प्राथमिकताओं में तालमेल जरूरी होगा।
कतर का निवेश और तुर्किये के साथ पुराने संबंध
कतर की भूमिका इस साझेदारी में विशेष महत्व रखती है, क्योंकि उसके पास रक्षा क्षेत्र में निवेश करने की वित्तीय क्षमता है। कतर एक दशक से अधिक समय से तुर्किये के रक्षा उद्योग में निवेश करता रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा के मामलों में भी सहयोग देखने को मिला है।
वर्ष 2017 में कतर और उसके कुछ पड़ोसी देशों के बीच गंभीर कूटनीतिक विवाद हुआ था। उस दौरान तुर्किये ने कतर में अपने सैनिक भेजे थे। इस घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक संबंधों को चर्चा में ला दिया था।
बद्र समझौता अब इस तरह के द्विपक्षीय संबंधों से आगे बढ़कर चार देशों को एक साझा रक्षा औद्योगिक पहल में जोड़ता है। कतर के निवेश और तुर्किये की तकनीकी क्षमताओं का मेल पाकिस्तान तथा इंडोनेशिया की उत्पादन संबंधी जरूरतों के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि, निवेश की वास्तविक राशि और प्रत्येक देश की हिस्सेदारी के बारे में विस्तृत जानकारी सामने आने पर ही इस साझेदारी के आर्थिक प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा।
अमेरिका पर निर्भरता घटाने की रणनीति
बदलते वैश्विक हालात में कई देश अपने हथियारों की आपूर्ति के लिए सीमित संख्या में विदेशी साझेदारों पर निर्भर रहने के जोखिम को कम करना चाहते हैं। युद्ध या अंतरराष्ट्रीय तनाव की स्थिति में हथियारों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, निर्यात नियम, तकनीक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध और कलपुर्जों की उपलब्धता भी किसी देश की सैन्य तैयारियों को प्रभावित कर सकती है।
इसी वजह से रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और अलग-अलग देशों के साथ तकनीकी सहयोग को महत्व दिया जा रहा है। बद्र समझौते को भी इसी व्यापक रणनीतिक बदलाव के संदर्भ में देखा जा सकता है। इससे चारों देश अपने रक्षा उद्योगों को मजबूत करने और हथियारों की आपूर्ति के विकल्प बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं।
चैथम हाउस के मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका कार्यक्रम से जुड़े शोधकर्ता बदर मूसा अल-सैफ के आकलन के मुताबिक, खाड़ी देशों की रक्षा साझेदारी में एशिया और अन्य विकासशील देशों की भूमिका बढ़ रही है। मुस्लिम बहुल देशों के बीच सहयोग की बढ़ती दिलचस्पी को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
फिर भी इस समझौते को अमेरिका के साथ सभी रक्षा संबंध समाप्त करने की योजना मानना उचित नहीं होगा। इसका संभावित उद्देश्य विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं और उत्पादन साझेदारों के साथ विकल्प बढ़ाना है। वास्तविक बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले समय में कौन-से हथियार, तकनीक और उत्पादन सुविधाएं इस व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं।
मक्का समझौते से कैसे अलग है बद्र करार?
पाकिस्तान की रक्षा कूटनीति में सऊदी अरब और तुर्किये के साथ संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने अगस्त में मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस करार का मुख्य उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा और सैन्य सहयोग को मजबूत करना बताया गया है। इसके तहत किसी एक देश पर हमले को तीनों देशों की सुरक्षा से जुड़ा मामला माना जाएगा।
हालांकि, तुर्किये की सेना को विदेश में तैनात करने जैसे कदमों के लिए वहां की संसद की अलग मंजूरी जरूरी है। इसलिए रक्षा समझौते और किसी विशेष सैन्य कार्रवाई की अनुमति को एक ही बात नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर, दोहा में हुआ बद्र समझौता रक्षा उद्योग के व्यावहारिक पहलुओं पर केंद्रित है। इसमें हथियारों का संयुक्त उत्पादन, तकनीकी जानकारी का आदान-प्रदान, प्रशिक्षण और अनुसंधान प्रमुख विषय हैं। यानी मक्का करार जहां सामूहिक सुरक्षा के सवाल से जुड़ा है, वहीं बद्र समझौता सैन्य उपकरणों के निर्माण और रक्षा औद्योगिक क्षमता बढ़ाने पर जोर देता है।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान, तुर्किये, कतर और इंडोनेशिया की यह साझेदारी क्षेत्रीय रक्षा सहयोग को नया स्वरूप देने की क्षमता रखती है। चारों देशों के पास मौजूद तकनीक, पूंजी, उत्पादन अनुभव और बाजार का बेहतर तालमेल उन्हें लाभ पहुंचा सकता है। लेकिन इसे किसी बड़े सैन्य गठबंधन या तत्काल हथियार उत्पादन में बदलाव के रूप में देखने से पहले समझौते के क्रियान्वयन, घोषित परियोजनाओं और वास्तविक निवेश की जानकारी का इंतजार करना होगा।




